राजनीतिक दबाव के समक्ष नतमस्तक रेलवे बोर्ड

    अरबों रुपये के पदोन्नति घोटाले में रेलवे बोर्ड ने रचा नया कुचक्र

    राजनीतिक दबाव के सामने अदालत के आदेशों की कोई अहमियत नहीं?

    कैट/मुंबई के आदेश पर फौरन जारी की गई कंप्लायंस और ऑफिस मेमोरेंडम

    सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध रोकी ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की पदोन्नति

    कैट/पटना एवं सर्वोच्च अदालत के आदेश पर दो साल बाद भी कोई विचार नहीं

    सुरेश त्रिपाठी

    रेलवे में हुए अरबों रुपये के अधिकारी पदोन्नति घोटाले में आए सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेशों को दरकिनार करते हुए रेलवे बोर्ड ने 19 जनवरी 2018 को जारी एक पत्र के माध्यम से यूपीएससी से सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की पदोन्नति पर भी रोक लगा दी है. ‘रेलवे समाचार’ को यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ग्रुप ‘सी’ से पदोन्नत प्रमोटी अधिकारियों द्वारा लाए गए राजनीतिक दबाव के चलते रेलवे बोर्ड द्वारा यह कदम उठाया गया. यह भी सही है कि सर्वोच्च न्यायालय से मुंह की खाने के बाद प्रमोटी संगठन जोड़-तोड़, खरीद-फरोख्त का पुराना हथकंडा अपनाते हुए नया आदेश का जारी करवाने में सफल हुआ है. ऐसे में क्या यह माना जाना चाहिए कि राजनीतिक दबाव के सामने अदालत के आदेशों की कोई अहमियत नहीं है?

    फोटो परिचय : इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन के पदाधिकारियों के साथ केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, जिनके कथित दबाव में रेलवे बोर्ड ने 19 जनवरी को एक पत्र जारी करके ग्रुप ‘ए’ सीधी भर्ती अधिकारियों की पदोन्नति में रोक लगा दी.

    देश के वर्तमान राजनीतिक वातावरण में जहां सर्वोच्च अदालत के सबसे वरिष्ठ जजों को भी मीडिया के सामने आकर लोकतंत्र की दुहाई देते हुए खुद के लिए न्याय और उनकी बात सुने जाने की गुहार लगानी पड़ रही हो, वहां एक केंद्रीय मंत्रालय द्वारा उनके आदेशों की यदि ऐसी अवहेलना की जा रही हो, तो किसी को कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए. वर्तमान समय में राजीनीतिक हस्तक्षेप और दबाव के आगे किसी केंद्रीय मंत्रालय के इतने लाचार और पक्षपातपूर्ण होने का कोई दूसरा उदाहरण मिलना दुर्लभ है.

    इस पूरे मामले को यहां इस प्रकार से पुनः सिलसिलेवार समझा जा सकता है..

    1. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को लागू करने के लिए कैट/पटना द्वारा आदेश जारी किया जाता है. परंतु मेंबर स्टाफ, सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड और चेयरमैन, रेलवे बोर्ड के अप्रूवल के बाद भी रेलवे बोर्ड का संबंधित निदेशालय इस पर कोई आदेश जारी नहीं करता है.

    2. पूरा मामला सर्वोच्च न्यायालय के पास पहुंचता है. सर्वोच्च न्यायलय से भी रेलवे बोर्ड को कड़ी फटकार मिलती है, फिर भी रेलवे बोर्ड पर इसका कोई असर नहीं होता है.

    3. कैट/पटना में अवमानना का केस दायर होता है. अदालत के कटघरे से बचने के लिए एक अंतरिम समाधान के तहत रेलवे बोर्ड द्वारा ग्रुप ‘सी’ से पदोन्नत प्रमोटी अधिकारियों से एडहॉक जेएजी पदोन्नति वापस ले ली जाती है.

    4. मामला पुनः सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचता है. सर्वोच्च न्यायालय प्रमोटी अधिकारियों से एडहॉक जेएजी के साथ-साथ कनफर्म्ड जेएजी को भी वापस लेने का आदेश जारी करता है. परंतु रेलवे बोर्ड द्वारा इस आदेश पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है.

    5. फिर अचानक 19 जनवरी के आदेश के तहत रेलवे बोर्ड द्वारा सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की भी एडहॉक जेएजी में पदोन्नति पर रोक लगा दी जाती है.

    6. अब प्रश्न यह उठता है कि जब पूरा मामला सर्वोच्च अदालत के सामने है और उसने सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के विरुद्ध ऐसा कोई आदेश नहीं दिया है, तब रेलवे बोर्ड ऐसा कैसे कर सकता है?

    फोटो परिचय : चेयरमैन, रेलवे बोर्ड अश्वनी लोहानी, सेक्रेटरी/रे.बो. रंजनेश सहाय, डीजी/पर्सनल आनंद माथुर के साथ इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन और जोनल प्रमोटी संगठनों के पदाधिकारी.

    तथापि, ऐसा किया गया है और ऐसा रेलवे बोर्ड में बैठे कुछ तिकड़मी अधिकारी ही कर सकते हैं, जो कि इस अरबों रुपये के अधिकारी पदोन्नति घोटाले के लिए जिम्मेदार हैं और इसीलिए किसी भी तिकड़म से स्वयं को बचाना चाहते हैं. यह एक सोची-समझी अपराधिक साजिश है, जो किसी संवैधानिक व्यवस्था के लिए अत्यंत अशोभनीय है. एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर कोई कार्यवाही नहीं की गई, तो दूसरी तरफ सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की पदोन्नति पर रोक लगाकर प्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना करते हुए उसे दरकिनार किया जा रहा है.

    इतना दुस्साहस सिर्फ रेलवे बोर्ड के तिकड़मी अधिकारी ही कर सकते हैं. वर्तमान समय में अप्रत्यक्ष रूप से इतने बड़े भ्रष्टाचार और दोगलेपन का उदाहरण शायद कोई और नहीं हो सकता है. समता आंदोलन समिति की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘रिजर्वेशन इन प्रमोशन’ के विरुद्ध दिए गए निर्णय पर राजनीतिक दबाव के चलते डीओपीटी ने अब तक कोई अंतर-मंत्रालयीन विभागीय आदेश निर्गत नहीं किया है. यही वजह है कि यूपीएससी द्वारा ग्रुप ‘सी’ से पदोन्नत प्रमोटी अधिकारियों की डीपीसी नहीं हो पाई है. डीपीसी में देरी होने पर रेलवे बोर्ड का कोई योगदान नहीं है.

    तथापि, रेलवे का एक प्रमोटी अधिकारी कैट/मुंबई से 19 दिसंबर को एक आदेश ले आता है. उस आदेश में सिर्फ डीपीसी की स्टेटस रिपोर्ट चार सप्ताह के अंदर बताने के लिए कहा जाता है. लेकिन रेलवे बोर्ड द्वारा इस आदेश को ब्रह्मा की लकीर मान लिया जाता है और इस पर निदेशक/स्थापना/रे.बो. द्वारा 5 जनवरी को फौरन कंप्लायंस पत्र जारी कर दिया जाता है. यही नहीं, इसके बाद 16 जनवरी को इस पर ऑफिस मेमोरेंडम भी जारी कर दिया गया.

    रेलवे बोर्ड के जिन अधिकारियों द्वारा जोनल रेलों के संदर्भों पर महीनों तक कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया जाता है, उसी रेलवे बोर्ड के अधिकारियों द्वारा जिस तरह सुपरजेट स्पीड में काम करते हुए कैट/मुंबई के आदेश को पक्षपातपूर्ण तरीके से एक पक्ष के निहितार्थ अपनाया जाता है, वह यह दर्शाता है कि वर्तमान में रेलवे बोर्ड में किस तरह की अंधेरगर्दी का खेल चल रहा है और पूरा रेलवे बोर्ड किस तरह अपना दिमागी संतुलन खोकर पक्षपातपूर्ण व्यवहार कर रहा है?

    प्रश्न यह भी उठता है कि यदि कैट/पटना के आदेश को लागू करने के लिए मेंबर स्टाफ, सेक्रेटरी/रे.बो. और चैयरमैन/रे.बो. की सहमति के बाद मामला रेलमंत्री को अग्रसारित किया गया था, तो कैट/मुंबई के आदेश को लागू करने के लिए समान प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई? सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड को फिर क्यों बैठाया गया है? क्या रेलवे बोर्ड में उन्हें सिर्फ ‘समानांतर पॉवर सेंटर’ चलाने के लिए बैठाया गया है? सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में इस तरह के निर्णय सेक्रेटरी स्तर पर ही लिए जाते हैं. ऐसे में रेलवे बोर्ड द्वारा सीधी भर्ती वाले अधिकारियों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों होना चाहिए?

    एक तरफ यह सच्चाई सबको पूरी तरह से स्पष्ट है कि अधिकारियों की पदोन्नति में भारी भ्रष्टाचार और अरबों रुपये का घोटाला हुआ है. यह भी जगजाहिर हो चुका है कि वर्ष 2001 से 2009 के बीच समाप्त (स्क्रेप) किए गए करीब चार हजार अधिकारी पदों को ‘बैकलॉग’ के नाम पर पुनः इस्तेमाल कर लिया गया. इसी वजह से आज रेलवे में अधिकारियों की इफरात हो गई है. इससे यह भी जाहिर है कि इसी वजह से ग्रुप ‘ए’ सीधी भर्ती अधिकारियों के अपेक्षा ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी अधिकारियों को पदोन्नति में वरीयता मिली और वह ग्रुप ‘ए’ से आगे निकल गए. स्पष्ट है कि 50:50 प्रतिशत निर्धारित कोटे का अनुपालन भी नहीं किया गया. अब जब दोनों पक्षों में अपने अधिकार की अदालती और कानूनी लड़ाई शुरू हुई, तो अदालत का निर्णय ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के पक्ष में गया है. अब सारी स्थिति शीशे की तरह साफ है. रेलवे बोर्ड को भी अब यह समझ में आ गया है कि यदि इस घोटाले पर अदालत ने वास्तव में संज्ञान ले लिया और अदालत की देखरेख में सीबीआई जांच बैठा दी गई, तो देश के सामने सब नंगे हो जाएंगे. ऐसे में, ऐसा लगता है कि रेलवे बोर्ड भी अब उन तमाम दलालों और घोटालेबाजों को बचाने पर उतरू हो गया है.

    एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय के डिमोशन के आदेश पर सेक्रेटरी/रे.बो., मेंबर स्टाफ और चेयरमैन/रे.बो. के स्तर पर निर्णय हो जाने के बाद भी मामला रेलमंत्री के पास रेफर कर दिया जाता है तथा अदालत के आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. तो वहीं दूसरी तरफ कैट/मुंबई को सर्वोच्च न्यायालय से भी ऊपर तव्वजो देते हुए फटाफट कंप्लायंस और ऑफिस मेमोरेंडम जारी कर दिया जाता है. आखिर ऐसी विसंगतिपूर्ण प्रक्रिया कैसे अपनाई जा रही है, क्या रेलवे बोर्ड में बैठे सभी संबंधित अधिकारी मूढ़ हैं अथवा यह सब जानबूझकर और साजिशन किया जा रहा है?

    यह भी तब हो रहा है जब रेलमंत्री स्वयं 29 दिसंबर 2017 को एक पत्र के जवाब में सांसद तारिक अनवर को लिखकर बता चुके हैं कि सब कुछ अदालत के आदेश पर निर्धारित नियम-कानून के अनुरूप किया जा रहा है, जिसमें कहीं कोई गलती नहीं है. इस पत्र में रेलमंत्री ने स्पष्ट रूप से माना है कि भारतीय रेलवे स्थापना कोड में जो लिखा है, वह वैधानिक है. ‘रेलवे समाचार’ के पास रेलमंत्री के उक्त पत्र की प्रति मौजूद है.

    ऐसे में यही कहना पड़ेगा कि हे रेलवे बोर्ड ! गजब है तेरी कहानी, किसी को दूध-मलाई और किसी को नसीब नहीं हो रहा पानी. ऐसे में ‘धूर्तों का अड्डा’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है, जहां यह कहा जाता है कि ‘शो मी योर फेस, देन आई विल शो यू द रूल.’ रेलवे बोर्ड द्वारा चेहरा देखकर नियम बनाए और बिगाड़े जाते हैं. यह बात ‘रेलवे समाचार’ पिछले 25 वर्षों से सुनता आ रहा है. यह भी कि नौकरशाही को अदालतों और उनके आदेशों की कोई परवाह नहीं होती है. इस पर यदि उसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो जाता है, तो फिर उसके लिए ‘सोने में सुहागा’ यानि तब बेखौफ होकर उसके लिए पूरी मनमानी करने की स्थिति बन जाती है.

    अब पूरा खेल स्पष्ट दिखाई दे रहा है. निकट भविष्य में समय का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो फिलहाल कोई नहीं जानता, परंतु यह सभी को बखूबी पता है कि ‘असहाय’ सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड के साथ-साथ ‘प्रमोटी प्रेम’ में रेलवे बोर्ड में व्याप्त भ्रष्टाचार का सूरज शायद कभी अस्त नहीं होने वाला है. ‘रेलवे समाचार’ को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इस कानूनी लड़ाई का पलड़ा अंततः दोनों पक्षों में से किस पक्ष में झुकता है. ‘रेलवे समाचार’ को इस बात का भी कोई आश्चर्य नहीं है कि वर्तमान सत्ताधारी कानून और अदालत का सम्मान तो तब करेंगे, जब वह अपनी ही विगत सरकार द्वारा संसद में पारित कानून का पालन सुनिश्चित नहीं कर रहे हैं. मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर इस सबका बहुत फर्क पड़ता है. अतः सीमित राजनीतिक उद्देश्यों को परे रखकर लोकतंत्र की दुहाई देने वालों को व्यवस्था की भलाई के लिए इस मुद्दे पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए.

सम्पादकीय