भविष्‍य की तलाश में वाराणसी का डीजल रेल इंजन कारखाना

    स्पष्ट सोच वाले सीआरबी पर अब निर्भर है डीरेका का अस्तित्व

    वाराणसी : डीजल रेल इंजन कारखाने (डीरेका) का शिलान्‍यास 23 अप्रैल 1956 को भारत के प्रथम राष्‍ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा देश के विकास को मद्देनजर रखते हुए एक दूरदर्शी सोच के साथ किया गया था. वर्ष 1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्‍त्री ने डीरेका द्वारा निर्मित प्रथम डीजल रेल इंजन राष्‍ट्र को समर्पित किया था. इसके पश्‍चात डीरेका ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 60 के दशक की तकनीकी से शुरूआत कर वर्तमान में डीरेका 21वीं सदी की अत्याधुनिक तकनीकियों को आत्‍मसात कर प्रगति की राह पर निरंतर अग्रसर है. तब से लेकर अब तक डीरेका ने विभिन्‍न प्रकार के रेल इंजनों (लोकोमोटिव) का निर्माण किया और अपनी अभूतपूर्व अनुकूलन क्षमता से भारतीय रेल की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

    कार्य संस्‍कृति और सकारात्‍मक सोच के संदर्भ में डीरेका भारतीय रेल के सर्वोतम संस्‍थानों में से एक है. पिछले दो वर्षों से यह ‘सर्वोतम उत्पादन इकाई’ से पुरस्‍कृत है. मशीनिंग एवं वेल्डिंग ज्ञान में डीरेका विश्व के बेहतरीन कारखानों के समकक्ष है, जहां अति आधुनिकतम मशीनें एवं उत्‍तम श्रम-शाक्ति उपलब्‍ध है. मशीनिंग और वेल्डिंग की ऐसी विशेषज्ञता पूरे देश में कुछ गिने-चुने संस्‍थानों को ही हासिल है. डीरेका में स्थित शीट मेटल शॉप और टर्बो असेंबली शॉप अपने विशिष्‍ट कार्य के कारण अद्वितीय हैं. यहां की लोको शॉप का महत्‍व इस बात से समझा जा सकता है कि डीरेका वर्तमान में प्रतिदिन एक से अधिक औसत के साथ डीजल लोकोमोटिव का उत्‍पादन कर रहा है.

    डीरेका के पास योजना, टूल रूम एवं प्‍लांट अभिकल्‍प सामग्री प्रबंधन एवं प्रशिक्षण संस्‍थान का ऐसा बेहतरीन नेटवर्क है कि यहां रातों-रात किसी भी तकनी‍की को अपनाया जा सकता है. डीरेका ने तीन माह में विद्युत इंजन का रिकॉर्ड उत्‍पादन करके सभी को आश्‍चर्यचकित कर दिया तथा अब यहां दो विद्युत लोकोमोटिव प्रतिमाह की दर से स्थिरता के साथ उत्‍पादन कार्य जारी है. डीरेका ने भारत को विश्‍व मंच पर एक अलग पहचान दी है. यहां निर्मित उच्‍च गुणवत्‍ता के डीजल रेल इंजन श्रीलंका, बांग्‍लादेश, म्‍यांमार, मोजाम्बिक आदि देशों में चल रहे हैं तथा भविष्‍य में ईरान एवं थाइलैंड जैसे देशों को भी आपूर्ति की जाने वाली है. डीरेका के मार्केटिंग विभाग ने विगत दो वर्षों में 300 करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा अर्जित की है, जबकि 400 करोड़ के आर्डर और मिले हुए हैं. डीरेका में डीजल रेल इंजन निर्माण/उत्पादन बंद कर देने पर मार्केटिंग विभाग भी मृतप्राय हो जाएगा.

    विगत दो वर्षों से डीरेका के विस्‍तार का कार्य चल रहा था, जो अब लगभग पूरा होने जा रहा है, परंतु रेलवे बोर्ड द्वारा आने वाले वित्‍तीय वर्षों के लिए उचित लक्ष्‍य अब तक नहीं दिया गया है. इससे इस महत्वपूर्ण संस्‍थान का भविष्‍य अंधकार में जा रहा है. विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री द्वारा अनेकों बार डीरेका प्रवास एवं संस्‍थान की विभिन्‍न योजनाओं को हरी झंडी दिखाने के बावजूद यह संस्‍थान उचित दिशा-निर्देश के अभाव में दिशाहीन होकर अपनी साख के अनुसार कार्य नहीं कर पा रहा है. उच्‍च प्रबंधन से लेकर नीचे के कर्मचारियों तक को कोई ठोस दिशा-निर्देश प्राप्‍त नहीं हैं.

    मीडिया के माध्यम से विभिन्‍न उच्‍च रेल अधिकारियों और रेलमंत्री द्वारा बिना किसी ठोस आधार के इस संस्थान के बारे में भांति-भांति के निर्देश प्राप्‍त हो रहे हैं, जो संस्‍थान की सेहत को और खराब कर रहे हैं. पिछले 50 वर्षों से डीरेका जिस तकनीकी को तराश रहा है, उसे अचानक बंदकर संपूर्ण रूप से नई तकनीकी अपनाना डीरेका के साथ-साथ पूरे रेल-तंत्र के लिए खतरनाक है. वर्तमान में यहां लगभग 3000 करोड़ की इन्वेंट्री पड़ी धूल फांक रही है, जो कि डीजल इंजन में ही इस्‍तेमाल हो सकती है. लगभग 3000 करोड़ से अधिक कीमत का कच्‍चा माल भी खरीद प्रक्रिया में है. डीजल रेल इंजन निर्माण में यहां 1200 से अधिक विशेषज्ञ श्रम शक्ति कार्यरत है. उल्लेखनीय है कि तकनीकी रूप से सक्षम एक कुशल व्‍यक्ति को तैयार करने में 1.5 से 2 वर्ष का समय और अथक परिश्रम लगाना पड़ता है.

    अचानक परिवर्तन से लगभग लगभग 500 करोड़ की लागत की मशीनों, 6000 करोड़ का सामान, 1200 से अधिक विशेषज्ञ श्रम शक्ति, 5000 से अधिक परिवार, 200 से अधिक कंपनियों और बनारस शहर के लाखों लोगों को नुकसान होगा. इस कारखाने को बंद करने से हजारों लोग बेरोजगार होंगे. प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ का यह कैसा प्रयोग होने जा रहा है? यह इस पूरे तंत्र के सतही ज्ञान की कड़वी सच्‍चाई को उजागर कर रहा है. तकनीकी परिवर्तन कभी गलत नहीं कहा जा सकता, गलत है योजनाबद्ध परिवर्तन लाने के प्रयास का अभाव, बिना उचित ऑर्डर हासिल किए चालू कार्य को बंद करने का निष्‍ठुर निर्णय. इसके अलावा सवाल यह भी है कि संपूर्ण रूप से विद्युत लोकोमोटिव का प्रयोग कहां तक उचित होगा?

    अब इस मुद्दे पर कोई सटीक अध्ययन उपलब्ध नहीं है कि विद्युत लोकोमोटिव पर पूर्णतः निर्भर रहने के नफा-नुकसान क्या-क्या हो सकते हैं? आज भी अमेरिका डीजल लोकोमोटिव का इस्‍तेमाल क्‍यों कर रहा है? क्‍या सभी रेल मार्गों पर इलेक्ट्रिफिकेशन आवश्‍यक है? क्‍या इलेक्ट्रिफिकेशन की लागत का इस्‍तेमाल नई लाइनें बिछाने में करना अधिक उचित न होगा? क्‍या सिर्फ एक साधन पर निर्भर रहना आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है? क्‍या आने वाले समय में सीएनसी-एलएनजी या अन्‍य वैकल्पिक र्इंधन वाले लोकोमोटिव की जरूरत नहीं होगी? सबसे महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न, क्या देश में आवश्‍यकता से अधिक बिजली पैदा हो रही और इस उत्‍पादन की कितनी कीमत देश के पर्यावरण को चुकानी पड़ रही है?

    डीरेका में विद्युत् इंजनों के निर्माण का जल्दबाजी में लिया गया निर्णय यह दर्शाता है कि उपरोक्‍त यक्ष प्रश्‍नों पर विचार नहीं किया गया. इतिहास गवाह है कि दिशाहीन साम्राज्‍य का क्ष्‍ारण निश्चित होता है. डीरेका के साथ यही हो रहा है. आज फिर से डीरेका को अपना अस्‍तित्‍व तलाशना पड़ रहा है, क्योंकि रेलवे का उच्‍च प्रबंधन शायद ‘उत्‍पादन इकाई’ का मतलब ही भूल गया है.

    नई-नई तकनीकी अपनाना डीरेका के लिए कभी मुश्किल नहीं रहा. अब यह विद्युत लोकोमोटिव का निर्माण भी अधिक गुणवत्‍ता के साथ कर रहा है. परंतु कर्मी-दल को चिंता इस बात की है कि वर्षों से अपनाई जा रही तकनीकी, विशेषज्ञता, कुशल श्रम शक्ति और इन सब पर देश की जनता की गाढ़ी कमाई से निवेश किए गए अरबों रुपये की संपत्ति का क्या होगा? स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव और दिग्भ्रमित प्रबंधन के चलते सब कुछ उपलब्ध होने के बावजूद डीरेका का भविष्य दिशाहीन और अंधकारमय हो रहा है. इससे जाहिर है कि डीरेका का अस्तित्व अब रेलवे बोर्ड के वर्तमान स्पष्ट सोच वाले शीर्ष प्रबंधन और भारत सरकार की दूरदर्शिता पर निर्भर है.

    इस संदर्भ में उपरोक्त सभी तथ्यों के साथ डीरेका कर्मचारी परिषद के संयुक्त सचिव विष्णु देव दुबे ने चेयरमैन, रेलवे बोर्ड अश्वनी लोहानी को एक विस्तृत पत्र भेजा है. इस पत्र की प्रतियां उन्होंने प्रधानमंत्री एवं स्‍थानीय सांसद वाराणसी लोकसभा क्षेत्र नरेंद्र मोदी सहित रेलमंत्री पीयूष गोयल और रेलराज्‍य मंत्री मनोज सिन्हा को भेजी हैं.

सम्पादकीय