संरक्षा से खिलवाड़ आखिर कब तक?

    अधिकारियों को ड्राइवर/मोटरमैन कैब में चढ़ने का शिष्टाचार सिखाए रेल प्रशासन

    सुरेश त्रिपाठी

    संरक्षा, किताब में पढ़ने या बकवास करने से नहीं, बल्कि अमल में लाने से सुनिश्चित होती है. परंतु अक्सर मुंबई मंडल उपनगरीय गाड़ियों में इस ‘कथनी और करनी’ में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है. हाल ही में यहां हुआ ऐसा एक मामला ‘रेलवे समाचार’ के संज्ञान में आया है. मुंबई मंडल, मध्य रेलवे, इंजीनियरिंग विभाग के एक जूनियर स्केल अधिकारी कर्जत स्टेशन पर अपने फोकट के तीन सरकारी चेलों के साथ मोटरमैन के पास आए और रौब गांठते हुए मोटरमैन कैब में घुसने का प्रयास करने लगे.

    (यह अलग बात है कि रिटायरमेंट के बाद ऐसे रेल अधिकारियों को कोई भी नहीं पहचानता और न ही पूछता है. जबकि इन्हें घर में काम वाली बाई को भी अपनी जेब से न सिर्फ भुगतान करना नागवार गुजरता है, बल्कि रिटायरमेंट के बाद तो ये खुद ही घर में झाड़ू-पोंछा लगाते नजर आते हैं. मगर रेल सेवा में रहते हुए ये तथाकथित अधिकारी न सिर्फ घर में चार-चार सरकारी नौकर रखते हैं, बल्कि कहीं भी आते-जाते हुए अपने साथ दो-चार सरकारी चेले-चपेटों को लेकर चलने में अपनी भारी शान समझते हैं.)

    बहरहाल, मोटरमैन के पूछने पर उक्त अधिकारी महोदय ने मुंह से कुछ बोले बिना ही कैब की तरफ उंगली के इशारे से बताया कि उनको इसी कैब में जाना है. बताते हैं कि संरक्षा की दृष्टि से किसी अपरिचित व्यक्ति को कैब में घुसने नहीं देने के चिर-परिचित आदेश के चलते मोटरमैन ने उन अधिकारी महोदय को कैब में प्रवेश करने से रोक दिया.

    मोटरमैन के मना कर देने पर अधिकारी महोदय को अपने फोकट के सरकारी चेलों के सामने बड़ी बेइज्जती महसूस हुई. पद के घमंड में चूर अधिकारी अथवा अहंकार से भरे व्यक्ति की हमेशा मति मारी जाती है, ऐसे में वह सदाचरण भूल जाता है. उन अधिकारी महोदय ने भी वही किया. उन्होंने फौरन मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) को उक्त मोटरमैन के खिलाफ लंबी-चौड़ी शिकायत लिख भेजी.

    मंडल रेल प्रबंधक महोदय ने भी इसमें अपने अहमक अधिकारी का ही पक्ष लिया और उक्त मोटरमैन से जवाबतलब करने के लिए संबंधित अधिकारी को आदेशित कर दिया. इस प्रकार उक्त मोटरमैन की एक दिन की ड्यूटी का नुकसान रेलवे को हुआ, क्योंकि उसे बिना कोई काम किए उस दिन के वेतन का भुगतान रेलवे को करना ही है. जबकि इस संपूर्ण अहंमन्य कार्यवाही का नतीजा शून्य रहा. यदि थोड़ी समझदारी दिखाते हुए सर्वप्रथम संबंधित अधिकारी से ही उसकी करतूत या व्यवहार के बारे में दरयाफ्त कर लिया गया होता, तो मोटरमैन की एक दिन की ड्यूटी के रूप में रेलवे का नुकसान नहीं होता.

    मुंबई उपनगरीय लोकल गाड़ियों में अधिकारियों और सुपरवाइजरों, जिन्हें कैब पास मिला होता है, के ऐसे दुर्व्यवहार का सामना आए दिन मोटरमैनों को करना पड़ता है. यह कदाचार या तो नए-नए बने विभागीय अधिकारी या फिर रेलवे में नए-नए आए सीधी भर्ती युवा अधिकारी अक्सर करते पाए जाते हैं.

    पुराने या वरिष्ठ अधिकारियों को ड्राइवरों अथवा मोटरमैनों के साथ ऐसा दुराचरण करते हुए कभी नहीं देखा गया. पहले की अपेक्षा वर्तमान में सैकड़ों अधिकारियों और सुपरवाइजर्स को रेवड़ी की तरह कैब पास बांट दिए गए हैं. जबकि होना यह चाहिए कि जब किसी अधिकारी या सुपरवाइजर को निरीक्षण के लिए जाना हो, तभी उसे कैब पास दिया जाना जाए.

    उल्लेखनीय है कि ड्राइवर या मोटरमैन की कैब में यात्रा करने की एक संस्कृति और परंपरा है, जिसका पालन करना सभी के लिए अनिवार्य है. चूंकि ट्रेन का यह बेहद संवेदनशील क्षेत्र होता है, जिसका संरक्षा और सुरक्षा की दृष्टि से बहुत बड़ा महत्व है. इसी के मद्देनजर कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को ही ‘कैब पास’ जारी किए जाते हैं. उक्त ‘कैब पास’ धारक को केबिन में प्रवेश हेतु पहले अपना ‘कैब पास’ दिखाकर चालक से कैब में प्रवेश करने की स्वीकृति लेना अनिवार्य है. यदि कैब में निर्धारित संख्या में पहले से ही व्यक्ति मौजूद हैं, तो आने वाले व्यक्ति या अधिकारी को खुद ही मोटरमैन से कुछ पूछे या कहे बिना अन्यत्र चला जाना होता है.

    ड्राइवर या मोटरमैन कैब में आए व्यक्ति को कम से कम वार्तालाप करना होता है और जब अत्यंत जरूरी हो, तभी सीमित मात्रा में फोन का प्रयोग करने की अनुमति होती है. गाड़ी का संचालन कर रहे ड्राइवर या मोटरमैन से कोई अनावश्यक पूछताछ नहीं किए जाने के दिशा-निर्देश हैं. परंतु रेलवे में नए-नए अधिकारी बने लोग अपने से कम ग्रेड वाले को अपना ‘पर्सनल सर्वेंट’ मानकर व्यवहार करना सर्वप्रथम अधिकार मानते हैं और उनसे स्वीकृति लेना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं.

    सबसे पहले तो वह बिना परिचय दिए अथवा मोटरमैन या ड्राइवर से पूछे बिना अचानक कैब में घुस जाते हैं. यदि कोई परिचय पत्र मांग लेता है, तो इसे वह अपनी शान के खिलाफ इतनी बड़ी बेइज्जती मानते हैं कि अनर्गल शब्दावली के इस्तेमाल पर उतर आते हैं. ऐसे कितने ही तथाकथित रेलवे के ये कर्णधार मोटरमैन को धमकाने पर उतारू हो जाते हैं. यह कैब से बाहर निकलते ही मोटरमैन को अशिष्ट घोषित कर देते हैं. कैब में घुसते ही लगातार फोन पर बातें करते रहना, उसी पर अपने मातहतों पर रौब गांठना, ये सब इनकी स्टाइलें होती हैं.

    संरक्षा निदेशालय, रेलवे बोर्ड के स्पष्ट निर्देश हैं कि ड्राइवर और मोटरमैन को न तो तनावपूर्ण स्थिति में डयूटी शुरू करनी है, और न ही ड्यूटी पर कोई भी व्यक्ति उन्हें मानसिक तनाव दे सकता है. परंतु यहां उपरोक्त वर्णित लोगों के कारण अक्सर तनावपूर्ण माहौल बन जाता है, जो कि ड्राइवर और मोटरमैन सहित उनकी गाड़ी में यात्रा कर रहे हजारों रेलयात्रियों में से किसी के लिए भी सुरक्षित नहीं है. कभी-कभी इसी बात पर कहासुनी भी हो जाती है.

    इसी प्रकार की एक घटना में एक बार ऐसे ही एक बदतमीज एसीएम को मोटरमैन ने कैब में ही अच्छी तरह से धुनकर मिड-सेक्शन में उतार दिया था. इसी तरह एक अकड़बाज एओएम को भी प्लेटफार्म पर ही लात-घूंसों से बुरी तरह धुनाई करके भागने की प्रैक्टिस करवाई गई थी. एक बार जब स्टार्ट हो चुकी लोकल की कैब में अचानक दौड़कर चढ़े दो ट्रेनी एडीईएन होशियारी बघारी थी, तो उनका ऐसा हाल किया गया था कि कैब के अंदर ही वह मोटरमैन के हाथ-पांव जोड़ने लगे थे.

    ‘रेलवे समाचार’ का मानना है कि उपरोक्त वाकयों से मोटरमैन की कोई शान नहीं बढ़ गई होगी, मगर अभद्र व्यवहार करने वाले संबंधित अधिकारियों को सबक जरूर मिल गया था. शिष्टाचार और अपनी गरिमा इसी में है कि नियमों-निर्देशों का सही तरह से पालन किया जाए तथा कैब में तनावपूर्ण माहौल बनाने की जगह दोस्ताना माहौल बनाए रखकर रेल का संचालन भी संरक्षित एवं सुरक्षित तरीके से किया जाए. इसी में सबकी भलाई है.

    सदभावनापूर्ण आचरण से सभी संबंधित अधिकारी आदर और सम्मान के पात्र बन सकते हैं. मुंबई उपनगरीय रेल नेटवर्क में मोटरमैनों को वैसे ही अत्यंत तनावपूर्ण माहौल में काम करना पड़ता है. कुछ न कुछ पूछकर कभी यात्री उन्हें परेशान करते हैं, तो कभी कैब में बिना परिचय दिए घुस आए अधिकारीगण अपने अनुचित आचरण से उन्हें तनाव देते हैं. ऐसे में रेल प्रशासन को चाहिए कि वह सबसे पहले अपने अधिकारियों को सदाचार की शिक्षा प्रदान करे और कैब में चढ़ने का शिष्टाचार भी उन्हें सिखाया जाए.

    # सभी फोटो परिदृश्य दर्शाने हेतु प्रस्तुत किए गए हैं.

सम्पादकीय