जेएस/ई-2 ने सीआरबी के स्पीकिंग ऑर्डर को झूठा ठहराया

    सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रे.बो. ने किया 257 कन्फ़र्म्ड प्रमोटी जेएजी को डिमोट

    गेंद अब रेलमंत्री पीयूष गोयल के पाले में, जल्दी क्लियर करनी होगी डिमोशन की फाइल

    सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खाने के बाद भी मीडिया को गुमराह कर रहे हैं इरपोफ पदाधिकारी

    आरबीएसएस के साथ मिलकर फर्जी पत्रों से जोनों को दिग्भ्रमित करने में जुटे पदाधिकारी

    सुरेश त्रिपाठी

    अरबों रुपये के अधिकारी पदोन्नति घोटाले के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पूरा रेलवे बोर्ड सहमा हुआ नजर आ रहा है. सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बाद रेलवे बोर्ड द्वारा आपात-कालीन मीटिंग बुलाकर 257 कन्फ़र्म्ड जेएजी प्रमोटी अधिकारियों को डिमोट कर अंतिम आदेश के लिए संबंधित फाइल रेलमंत्री पीयूष गोयल के पास भेज दी गई है. ऐसा करके रेलवे बोर्ड के सभी संबंधित अधिकारियों ने अपना पिंड छुड़ा लिया है. प्राप्त जानकारी के अनुसार चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) सहित सभी बोर्ड मेंबर्स ने इस फाइल पर हस्ताक्षर किए हैं. आगे यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अवमानना का सवाल आता है, तो अब कोर्ट में इसके लिए रेलमंत्री को सीधे जिम्म्मेदार ठहराया जाएगा.

    इस पूरे प्रकरण में आरबीएसएस और प्रमोटी अधिकारी संगठन द्वारा स्थापना नियमों के साथ छेड़छाड़ का जीता-जागता उदाहरण मिल रहा है, जिसमें मुख्य भूमिका आरबीएसएस से प्रमोशन प्राप्त जॉइंट सेक्रेटरी, स्थापना-2 बी. मजूमदार की बताई जा रही है, क्योंकि हर तरफ उन्हीं के चर्चे हैं. बताया जा रहा है कि ये मजूमदार महाशय एक तरफ दाएं हाथ से प्रमोटी अधिकारियों के डिमोशन के पत्र पर हस्ताक्षर करते हैं, तो बाएं हाथ से प्रमोटी अधिकारियों के पक्ष में तमाम सबूत जुटाने की जुगत में लग जाते हैं. हाल ही में मजूमदार मोशाय ने एक ऐसा पत्र जारी किया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘डीओपीटी ने खुद ही स्वीकार किया है कि उसका ओएम रेलवे पर लागू नहीं होता है.’ प्रमोटी अधिकारी होने के नाते मजूमदार बाबू को भी डर है कि डिमोशन की आग कहीं उन तक भी न पहुंच जाए. चूंकि प्रमोशन का यह गोरखधंधा वर्ष 1997 से ही चल रहा है. इसलिए मजूमदार मोशाय भी बहुत हताश और परेशान बताए जा रहे हैं.

    डीओपीटी के इस ओ.एम. की कहानी को फिर से समझते हैं-

    1. जब पूर्व मध्य रेलवे के आर. के. कुशवाहा ने रेलवे बोर्ड पर यह सवाल उठाया कि इतनी भारी संख्या में प्रमोटी अधिकारियों को ग्रुप ‘ए’ प्रोमोशन क्यों दिया जा रहा है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के प्रोमोशन पड़ रहा है. तब तत्कालीन चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) ने इस सवाल या आरोप को एक स्पीकिंग ऑर्डर (दि. 9 जून 2015) देकर खारिज कर दिया था, इसके पैरा-2 में वस्तुस्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया गया था कि प्रमोटी अधिकारियों की संख्या में दिखाई देने वाली बढ़ोत्तरी डीओपीटी के वर्ष 2001 के आदेश पर की गई है. पैरा-3 में बताया गया कि रेलवे के प्रमोटी अधिकारियों को मिलाकर कराई जाने वाली डीपीसी भी डीओपीटी के वर्ष 1989 के ओ. एम. के आधार पर की जा रही है. अर्थात सीआरबी ने अदालत के आदेश पर स्पीकिंग आर्डर देते हुए स्वीकार किया है कि डीओपीटी के ओ. एम. के आधार पर ही ग्रुप ‘ए’ अधि-कारियों के नियम नियंत्रित होते हैं. अतः बी. मजूमदार महाशय द्वारा दिए गए 20 दिसंबर के पत्र, जिसमें उन्होंने कहा है कि डीओपीटी का ओ. एम. रेलवे पर मान्य नहीं है, वाली बात सीआरबी द्वारा अदालत में दिए गए हलफनामे को गलत ठहराती है. अब यह तो समय ही बताएगा कि मजूमदार साहब सही हैं या सीआरबी?