"चौबे गए थे छब्बे बनने, दुबे बन कर आ गए”

    अरबों रुपयों के पदोन्नति घोटाले पर सर्वोच्च अदालत का सख्त आदेश

    एडहॉक के साथ ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी अधिकारियों ने कन्फ़र्म्ड जेएजी भी गंवाया

    वाह री व्यवस्था, ग्रुप सी आरबीएसएस कर्मचारी संभालता है ग्रुप ‘ए’ का कैडर

    भा. रे. स्थापना नियमावली की व्याख्या अपने फायदे के लिए करने का है आरोप

    सुरेश त्रिपाठी

    अरबों रुपये के अधिकारी पदोन्नति घोटाले में 15 दिसंबर 2017 को उच्चतम न्यायालय में एक दिलचस्प घटना घटी. प्रमोटी अधिकारी संगठन द्वारा कुछ राजनेताओं के दम पर रेलवे बोर्ड को अपने पॉकेट में रखने वाले उनके दंभ को अदालत ने चूर-चूर कर दिया, जिसका खामियाजा पूरे प्रमोटी कुनबे को भुगतना पड़ेगा. जब रेलवे बोर्ड के पत्र दिनाँक 6 और 7 दिसंबर पर स्टे चाहने की याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने प्रमोटी अधिकारी संगठन की याचिका को खारिज कर दिया तथा न्यायालय को हल्के में लेने का हर्जाना भी प्रोमिटी अधिकारियों को चुकाना पड़ा. परिणामस्वरूप एडहॉक जेएजी के साथ साथ, दि. 15.07.2016 के बाद तय हुए कन्फ़र्म्ड जेएजी भी इनके हाथ से निकल गई.

    सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की तरफ से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने न्यायालय को जब अवगत कराया कि प्रमोटी अधिकारी संगठन पहले हाई कोर्ट पटना के आदेश के विरूद्ध एसएलपी ले कर आया, जिस पर स्टे नही मिला. अगली सुनवाई पर प्रमोटी अधिकारी संगठन ने 10 हप्ते का समय मांगा, जिस वजह से न्यायालय ने अगली तारीख़ 15 जनवरी को मुकर्रर की है. उसके बाद भी भारत के मुख्य न्यायाधीश के बेंच में जाकर सुनवाई की तय तारीख़ को पहले करवाकर 15 दिसंबर को रखवाया. मुकुल रोहतगी ने यह भी कहा कि प्रमोटी अधिकारी संगठन ने 10-15 का ग्रुप बनाकर देश की सभी कैट में रेलवे बोर्ड के पत्र के खिलाफ याचिका दायर करवाई.

    अर्थात प्रमोटी अधिकारी संगठन एन. आर, परमार मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को अमल में लाने के खिलाफ ही विविध तरीके से याचिका दायर कर न्यायालय के साथ साथ रेल प्रशासन का भी कीमती समय बर्बाद कर रहा है. जिस पर बेंच ने काफी नाराजगी जताई. बेंच के नाराज रुख को प्रमोटी अधिकारियों के वकील ने भांपते हुए न्यायालय से रहम की गुहार लगाई कि कम से कम कन्फ़र्म्ड जेएजी प्राप्त प्रमोटी अधिकारियों का डिमोशन न किया जाए. इस पर बैंच ने पर्याप्त दयानतदारी दिखाते हुए  कट ऑफ डेट 15.07.2017 रख दी. अर्थात प्रमोटी अधिकारी संगठन अपनी होशियारी दिखाने के चक्कर् में कन्फ़र्म्ड जेएजी भी गवां बैठा.

    इस पूरे मामले पर तीन बातें सामने आ रही हैं..

    1. यदि डीओपीटी ये कहता है कि रेलवे अपना निर्णय लेने में स्वतंत्र है, तो क्या इस स्वायत्तता का कैबिनेट द्वारा पुनरावलोकन किया जाएगा, क्योंकि आईआरईसी स्प्ष्ट करता है कि रेलवे का सिर्फ ग्रुप ‘सी’ और ग्रुप ‘डी’ कर्मचारियों पर पूर्ण नियंत्रण है तथा आईआरईसी को आर्टिकल 309 के तहत वैधानिक स्थिति प्राप्त है. ऐसी परिस्थिति में कैबिनेट के द्वारा यह स्पष्ट/सुनिश्चित किया जाएगा कि डीओपीटी का कथन सही है या आईआरईसी की वैधानिकता.

    2. एन. आर. परमार और पी. सुधाकर राव दोनों मामलों पर दिया गया सर्वोच्च न्यायालय का आदेश रेलवे पर लागू होगा या नहीं? यह प्रश्न आते ही प्रमोटी खेमा बैक फुट पर चला जाएगा, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश सर्वमान्य (लॉ ऑफ़ लैंड) होता है, जो भारत के सभी संस्थानों पर समान रूप से लागू होता है. यही बात सुनवाई के दौरान मुकुल रोहतगी ने बेंच के समक्ष  कही और तर्क दिया कि यदि एक बार के लिए यह मान भी लिया जाए कि डीओपीटी का ओ.एम. मान्य नही है, तो क्या सर्वोच्च न्यायालय का आदेश भी रेलवे पर लागू नहीं होगा? इस पर न्यायालय हरक़त में आया और अपना फरमान सुना दिया. वैसे भी सभी सुनवाई की तारीख़ सोमवार और शुक्रवार को ही रखी गई है तथा अगली सुनवाई भी शुक्रवार, 2 फ़रवरी को तय हुई है. इन दोनों दिनों में ही अब तक लगातार सुनवाई रखे जाने का यह मतलब निकाला जा रहा है कि न्यायालय पूरी तरह से इस बात को समझ चुका है कि इस मामले में कोई दम नहीं है और अंततः इसे खारिज ही होना है. इसका आभास विगत सुनवाई में ही तब मिल गया था, जब प्रमोटी खेमे के वकील ने बहस करने के क्रम में बोला था कि माई लॉर्ड अभी तो केस एडमिट ही नही हुआ है, तो स्टे देकर शुरुआत करने की कृपा करें. वैसे भी तीन तारीखें निकले जाने के बाद भी सर्विस मैटर से संबंधित केस एडमिट नहीं किया गया, जिससे स्प्ष्ट होता है कि प्रमोटी अधिकारी संगठन की राह आसान नही है.

    3. एक तरफ खुद प्रमोटी अधिकारी संगठन न्यायालय में दलीलें दे रहा है कि 2001 के डीओपीटी के ओ.एम. के आधार पर प्रमोटी अधिकारियों की ग्रुप ‘ए’ में संख्या ज़्यादा हो गई है और मौजूद दस्तावेज भी यही कहते हैं कि यह ज्यादा पद उन्हें सीधी भर्ती वाले स्क्रैप पदों को पुनर्जीवित करके प्रमोटी अधिकारियों को दे दिए गए थे. मतलब न्यायालय एक-एक सुनवाई के बाद धीरे-धीरे निकर्ष पर पहुंचता जा रहा है कि वाकई में रेलवे में बहुत बड़ा पदोन्नति घोटाला किया गया है. ऐसा होना प्रमोटी अधिकारियों के साथ-साथ रेल प्रशासन के लिए भी अत्यंत नुकसानदेह साबित हो रहा है.

सम्पादकीय