घनश्याम सिंह, मेंबर ट्रैक्शन हैं या जीएम/कोर?

    जीएम/कोर को बाईपास करके टेंडर टर्मिनेट करने के आदेश दे रहे हैं घनश्याम सिंह

    अवास्तविक लक्ष्य पर काम पूरा करने के निर्देश, कॉन्ट्रैक्टर्स में चौतरफा डर का माहौल

    नियम विरुद्ध टेंडर टर्मिनेट करने वाले आर. पी. गुप्ता को पू.त.रे. में बनाया गया सीईई

    रेलमंत्री और भाजपा सरकार की बदनामी का कारण बनते जा रहे हैं कदाचारी मेंबर ट्रैक्शन

    समय रहते एमटीआर को नहीं हटाया गया तो नहीं पूरा होगा रेलवे का संपूर्ण विद्युतीकरण

    सुरेश त्रिपाठी

    जिस दिन से सेंटर फॉर रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन (कोर) के महाप्रबंधक की रिपोर्टिंग मेंबर ट्रैक्शन, रेलवे बोर्ड, घनश्याम सिंह को दी गई है, उसके तत्काल बाद से घनश्याम सिंह की न सिर्फ मन-मांगी मुराद पूरी हो गई है, बल्कि उसी दिन से वह महाप्रबंधक/कोर को बाईपास करके बतौर जीएम/कोर, जोनल रेलों के विद्युत् विभाग के सभी संबंधित अधिकारियों सहित कोर के भी सीईई/पीएंडडी एवं सीएओ/कोर जैसे अधिकारियों को सीधे निर्देश दे रहे हैं. इससे न सिर्फ अधिकारियों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है, बल्कि वह यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं कि वे जीएम/कोर के मातहत हैं, या मेंबर ट्रैक्शन (एमटीआर) के, इन दोनों में से वे पहले किसके आदेश पर अमल करें? और किसका आदेश मानें?

    इसके अलावा एमटीआर सीधे तमाम इलेक्ट्रिकल कॉन्ट्रैक्टर्स को कॉल करके और उन्हें अवास्तविक लक्ष्य देकर कार्य पूरा करने का आदेश दे रहे हैं. इसके साथ ही वह जोनल रेलों के संबंधित अधिकारियों को भी सीधे आदेश दे रहे हैं कि जो कांट्रेक्टर उनके दिए लक्ष्य (टारगेट) पर काम पूरा करने में आनाकानी करे, उसे तुरंत सात दिन और 48 घंटे का नोटिस देकर उसका टेंडर टर्मिनेट कर दिया जाए. यही आदेश वह सभी जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को भी दे रहे हैं. हालांकि इस बारे में ‘रेलवे समाचार’ द्वारा पूछताछ किए जाने पर किसी भी महाप्रबंधक ने स्पष्ट रूप से तो कुछ नहीं कहा, परंतु उनका यह अवश्य कहना था कि एमटीआर से उन्हें कॉन्ट्रैक्टर्स के साथ मीटिंग करके उनसे वर्क प्रोग्रेस तेज करने को कहने के लिए अवश्य कहा जा रहा है.

    इस संदर्भ में प्राप्त विस्तृत जानकारी के अनुसार कई महाप्रबंधकों ने अपने जोन के अंतर्गत चल रहे कार्यों से संबंधित ठेकेदारों को बुलाकर उन्हें एमटीआर के आदेश से अवगत करा दिया है कि एमटीआर द्वारा दिए गए लक्ष्य पर यदि उन्होंने काम पूरा नहीं किया, तो उनके टेंडर टर्मिनेट कर दिए जाएंगे. पता चला है कि एमटीआर ने कॉन्ट्रैक्टर्स को ऐसे अवास्तविक लक्ष्य दिए हैं, जिन पर काम पूरा कर पाना किसी भी कांट्रेक्टर के लिए संभव नहीं है. जैसे- यदि टेंडर आवंटित करते समय उससे संबंधित कार्य को पूरा करने की निर्धारित समय-सीमा तीन साल की है, तो एमटीआर द्वारा उसे न्यूनतम 9 महीनों और अधिकतम 10 महीनों में पूरा करने के लिए कहा जा रहा है.

    उदाहरण के लिए, पनवेल-पेण सेक्शन के विद्युतीकरण का कांट्रेक्ट 13 जुलाई 2017 को और पेण-थल सेक्शन का टेंडर 23 अगस्त 2017 आवंटित किया गया है. यह दोनों काम पूरा करने की समय-सीमा 24-24 महीने यानि दो-दो साल दी गई है और इनकी कम्पलीशन डेट क्रमशः 12 जुलाई 2017 तथा 22 अगस्त 2017 है. जबकि यह काम अधिकतम आठ-नौ महीनों में पूरा करने के लिए एमटीआर द्वारा दबाव डाला जा रहा है. इसी प्रकार पेण-रोहा सेक्शन का टेंडर 4 सितंबर 2017 को आवंटित किया गया है. इसका काम पूरा करने का समय 12 महीना और अंतिम तारीख 3 सितंबर 2018 है. मगर एमटीआर द्वारा यह काम 31 मार्च 2018 से पहले पूरा करने का दबाव कांट्रेक्टर पर डाला गया है. यही नहीं, बताते हैं कि कांट्रेक्टर द्वारा जब इस बारे में यह कहा गया कि किसी भी स्थिति में 12 महीनों का यह काम तीन महीनों में पूरा कर पाना संभव नहीं है, तो उसे सात दिन का नोटिस थमा दिया गया.

    हालांकि संबंधित अधिकारियों का कहना है कि उक्त कांट्रेक्टर को यह नोटिस वर्क प्रोग्रेस तेज करने के लिए दिया गया था और उसके जवाब के बाद उक्त नोटिस वापस ले लिया गया है. तथापि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कांट्रेक्टर को यह नोटिस एमटीआर के दबाव में ही दिया गया था. अधिकारियों ने दबी जबान से यह भी स्वीकार किया कि इसी तरह एमटीआर ने पूरे देश में रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन का काम कर रहे तमाम कॉन्ट्रैक्टर्स की नाक में दम कर दिया है. जबकि डरे हुए और भारी दबाव में काम करने को मजबूर कई कॉन्ट्रैक्टर्स ने नाम न उजागर करने की शर्त पर ‘रेलवे समाचार’ से बात करते हुए कहा कि वह टेंडर भरते समय उसकी समय-सीमा के हिसाब से लेबर एवं मटीरियल इत्यादि की गणना करके ही रेट कोट करते हैं.

    कॉन्ट्रैक्टर्स का यह भी कहना है कि अब यदि 24 या 36 महीनों के हिसाब से काम करना है तो उसी के अनुसार मटीरियल और लेबर के इंतजाम का ऑर्डर दिया जाता है. उनका कहना है कि 24 या 36 महीनों के कार्य को यदि 8 या 12 महीनों में पूरा करने के लिए कहा जाएगा, तो उसके लिए अतिरिक्त मटीरियल और लेबर लगेगा तथा उसी के अनुसार फिर रेट की भी गणना की जाएगी. उनका यह भी कहना था कि अब पांच रुपये की दर से 36 महीनों के लिए काम लेकर उसको 25 रुपये की दर से 12 महीनों में कैसे किया जा सकता है? उन्होंने यह भी बताया कि एमटीआर द्वारा न सिर्फ संबंधित ठेकेदारों को सीधे हड़काया जा रहा है, बल्कि संबंधित अधिकारियों को भी यह कहकर उत्पीड़ित किया जा रहा है कि यदि वह उनके द्वारा दिए गए (अवास्तविक) लक्ष्य के अनुसार ठेकेदारों से काम नहीं करवा सकते हैं, तो वीआरएस लेकर घर चले जाएं.

    कॉन्ट्रैक्टर्स का कहना है कि पहले कोर में भुगतान की जो व्यवस्था थी, उससे छोटी-छोटी आपूर्ति और मटीरियल का भुगतान मिल जाता था. परंतु एमटीआर ने यह व्यवस्था खत्म करके अब मंडलों की एकमुश्त भुगतान व्यवस्था कोर के टेंडर्स के साथ भी लागू कर दी है, जिससे अब जब सारा मटीरियल आ जाएगा, तभी उसका भुगतान किया जाएगा. इससे अब किश्तों और बड़ी लॉट में मटीरियल मंगवाना पड़ता है. उनका कहना है कि ऐसा लगता है कि छोटे ठेकेदारों से एमटीआर कोई खुन्नस निकाल रहे हैं और वह बड़े-बड़े ठेकेदारों एवं कंपनियों को 500-1000 करोड़ के बड़े टेंडर देकर मोटा कमीशन खाना चाहते हैं, क्योंकि ऐसे बड़े टेंडर्स में क्वांटिटी-क्वालिटी, ड्राइंग-डिजाइन का कोई ठिकाना नहीं होता है, यह सब संबंधित ठेकेदार पर डालकर सिर्फ अपने कमीशन से मतलब रखा जाता है. ऐसे में रेलवे में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. इस बात को संबंधित अधिकारियों ने न चाहते हुए भी स्वीकार किया है.

    कई ठेकेदारों सहित कई वरिष्ठ विद्युत् अधिकारियों का कहना है कि एमटीआर को कोर की रिपोर्टिंग मिल जाने से वह रेलवे की बड़े पैमाने पर बरबादी करने में जुट गए हैं. उनका कहना है कि यदि एमटीआर को जल्दी ही उनके पद से नहीं हटाया गया अथवा कोर की रिपोर्टिंग उनसे लेकर किसी अन्य बोर्ड मेंबर को नहीं सौंपी जाती है, तथा यही स्थिति कुछ समय तक और जारी रहती है, तो रेलवे का बहुत बड़ा नुकसान होगा. उनका कहना है कि एमटीआर विशेष रूप से जेवी कॉन्ट्रैक्टर्स को अवास्तविक लक्ष्य देकर और यह कहकर डरा रहे हैं कि उनके लक्ष्य के अनुरूप काम पूरा करें, अन्यथा उनकी जेवी रद्द करके उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा. इसके लिए संबंधित अधिकारियों पर 7 दिन और 48 घंटे का नोटिस देकर उनके कांट्रेक्ट टर्मिनेट करने के लिए एमटीआर द्वारा भारी दबाव डाला जा रहा है.

    संबंधित अधिकारियों ने इस बात की भी पुष्टि की है कि एमटीआर के दबाव और अवास्तविक लक्ष्य के कारण सभी अधिकारियों एवं कॉन्ट्रैक्टर्स में भारी दहशत और भय का माहौल व्याप्त है. उनका कहना है कि जब हम खुद जानते हैं कि एमटीआर द्वारा दिया जा रहा टारगेट अवास्तविक है और उस पर काम पूरा कर पाना किसी भी कांट्रेक्टर के लिए संभव नहीं है, ऐसे में हम किस मुंह से कॉन्ट्रैक्टर्स को कहें कि वह एमटीआर के लक्ष्य पर काम पूरा करके दें. उनका कहना है कि जिसका काम कांट्रेक्ट एग्रीमेंट के अनुसा 24 या 36 महीनों में पूरा होना है, उस पर एमटीआर 9 महीने में काम पूरा करने का दबाव डाल रहे हैं. अधिकारियों का यह भी स्वीकार किया कि भारतीय रेल में इससे पहले इतना गंदा और खराब माहौल कभी नहीं रहा, जितना वर्तमान एमटीआर ने बनाया हुआ है. उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर मुद्दा है, इस पर सीआरबी अथवा रेलवे बोर्ड को उचित ध्यान देना चाहिए.

    अधिकारियों ने बताया कि इस सबके अलावा उन पर एमटीआर द्वारा नियम विरुद्ध कार्य करने का भी दबाव डाला जा रहा है. ‘रेलवे समाचार’ द्वारा इसका कोई उदाहरण पूछे जाने पर अधिकारियों ने बताया कि सबसे पहले तो एमटीआर ने मध्य रेलवे में एक दागी प्रिंसिपल सीईई को लाकर बैठाया और उससे अपने मन-मुताबिक काम लेना शुरू किया. इसके बाद आर. पी. गुप्ता जैसे एक अन्य अवसरवादी अधिकारी को सिर्फ इसलिए मध्य रेलवे में लाया गया कि जिससे वह क्वालिटी इंजीनियर्स के सभी टेंडर एमटीआर के कहे अनुसार टर्मिनेट कर दें. उन्होंने बताया कि गुप्ता ने ऐसा ही किया. उन्होंने कहा कि क्वालिटी इंजीनियर्स के कई कांट्रेक्ट एमटीआर ने नियम विरुद्ध सिर्फ इसलिए टर्मिनेट करवा दिए हैं, कि उसने उनके भ्रष्टाचार की शिकायत की थी.

    अधिकारियों ने बताया कि एमटीआर के कहने पर गुप्ता ने निर्धारित नियमों का घोर उल्लंघन करते हुए क्वालिटी इंजीनियर्स के वह टेंडर भी टर्मिनेट कर दिए, जिनमें रेलवे ने खुद ‘वर्क कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ दिया हुआ है. इसके अलावा गारंटी पीरियड में नियमानुसार कोई टेंडर टर्मिनेट नहीं किया जा सकता है, तथापि एमटीआर के कहने पर गुप्ता ने यह निकृष्ट कार्य भी किया है. इसके साथ ही नियम विरुद्ध उसकी तमाम बैंक गारंटी और ईएमडी भी जप्त करवा ली हैं. उनका कहना है कि यह किसी कांट्रेक्टर को सिरे से बरबाद करने वाली कार्यवाही एमटीआर के कहने पर ही की गई है. उन्होंने बताया कि इस सबके लिए आर. पी. गुप्ता को पुरस्कार स्वरूप पूर्व तट रेलवे में प्रिंसिपल सीईई बनाया जा रहा है.

    अधिकारियों का कहना था कि संबंधित कांट्रेक्टर रेलमंत्री से लेकर रेलवे बोर्ड के सभी संबंधित अधिकारियों का दरवाजा खटखटा आया है, जबकि महाप्रबंधक ने अपनी असमर्थता जताते हुए उसकी कोई भी मदद या न्याय करने से इंकार कर दिया है. उधर एमटीआर ने सबको कुछ इस तरह से ‘मैनेज’ किया हुआ है कि कोई भी उसकी बात सुनने और उसके साथ न्याय करने के लिए तैयार नहीं है. उन्होंने कहा कि यदि ऐसा ही माहौल रहा, तो नोटबंदी और जीएसटी के मारे हुए तमाम रेलवे कांट्रेक्टर टेंडर छोड़कर भाग खड़े होंगे. उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में यदि एमटीआर की इन तमाम गलत गतिविधियों पर लगाम नहीं लगाई जाती है और उन्हें एमटीआर के पद एवं कोर के इंचार्ज से नहीं हटाया जाता है, तो रेलमंत्री और भाजपा सरकार का दो साल में रेलवे के संपूर्ण विद्युतीकरण का लक्ष्य धरा रह जाएगा.

सम्पादकीय