क्या है सीएसटी को म्यूजियम बनाए जाने के पीछे उद्देश्य?

    चुप क्यों हैं राजनीतिक विपक्ष और रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठन?

    म्यूजियम से भारतीय रेल और देश के बजाय किसका हितलाभ होने वाला है?

    म्यूजियम के नाम पर कहीं किसी बड़े घोटाले को अंजाम तो नहीं दिया जा रहा?

    मंत्री को क्यों है सीएसटी की वेशकीमती जगह को ‘मुर्दाघर’ बनाए जाने की आतुरता?

    लालू के बीएनआर होटलों की तरह ही गोयल का बड़ा घोटाला साबित होगा म्यूजियम?

    सुरेश त्रिपाठी

    रेलमंत्री पीयूष गोयल छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) की विश्व धरोहर इमारत और वेशकीमती जगह को तथाकथित ‘वर्ल्ड क्लास रेल म्यूजियम’ बनाने जा रहे हैं. बताते हैं कि उनका यह विचार तब से उनके दिमाग में काम कर रहा था, जब वह मंत्री भी नहीं थे. रेलमंत्री बनने के बाद उनका यह विचार एकाएक सतह पर आ गया और एक दिन अचानक उन्होंने टहलते हुए इसको म्यूजियम बनाने की घोषणा कर दी. दिग्भ्रमित मीडिया उनकी इस घोषणा पर गदगद है, परंतु उसे यह नहीं दिखाई दे रहा है कि इस विश्व धरोहर इमारत और वेशकीमती जगह को ‘मुर्दाघर’ बनाए जाने का लाभ आखिर किसको मिलने वाला है? इसके अलावा शायद गुजरात चुनाव के चलते इस मुद्दे पर राजनीतिक विपक्ष फिलहाल चुप है, मगर रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों की चुप्पी समझ से परे है.

    पुराने लोगों में ‘विक्टोरिया टर्मिनस’ (वीटी) के नाम से आज भी सुप्रसिद्ध सीएसएमटी की इस वेशकीमती जगह और विश्व धरोहर इमारत को मुर्दाघर बनाए जाने की मंत्री की आतुरता को इस बात से समझा जा सकता है कि इसकी घोषणा के फौरन बाद इस इमारत में स्थित मध्य रेलवे मुख्यालय और महाप्रबंधक कार्यालय सहित कई विभाग प्रमुखों के कार्यालय यत्र-तत्र शिफ्ट किए जाने की प्रक्रिया तुरंत शुरू कर दी गई है. इसके लिए ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट फॉर ऑफिस स्पेस’ की निविदा भी जारी कर दी गई, जिसके लिए अब रेलवे को अनावश्यक रूप से करोड़ों रुपये का किराया प्रतिमाह देना पड़ेगा. इसके अलावा प्लेटफार्म-18 की तरफ पी.डि’मेलो रोड पर मध्य रेलवे का नया मुख्यालय बनाने में सैकड़ों करोड़ रुपये का अपव्यय भी किया जाएगा. रेलवे के पीएसयू कार्यालयों से जो करोड़ों रुपये का सालाना किराया मिल रहा है, उससे भी मध्य रेलवे को वंचित होना पड़ेगा, क्योंकि उन्हें जगह खाली करने का नोटिस थमा दिया गया है.

    इस संदर्भ में मध्य रेलवे के महाप्रबंधक देवेंद्र कुमार शर्मा ने 30 नवंबर 2017 को चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) अश्वनी लोहानी को लिखे एक पत्र में सीएसएमटी इमारत को वर्ल्ड क्लास रेल म्यूजियम बनाए जाने की सारी जिम्मेदारी रेलवे बोर्ड के कार्यकारी निदेशक/धरोहर (ईडी/हैरिटेज) को सौंपे जाने की बात कही है. इस पत्र के मजमून का एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि महाप्रबंधक/म.रे. सहित इस जोनल रेलवे का कोई भी अधिकारी रेलमंत्री के इस बेतुके निर्णय से कतई सहमत नहीं है. उन्होंने पत्र में लिखा है कि रेलमंत्री द्वारा सीएसएमटी इमारत को म्यूजियम में तब्दील किए जाने के निर्णय से बिल्डिंग के उन्नयन/पुनर्स्थापन सहित यहां स्थित विद्युत् सब-स्टेशन एवं टेलीफोन एक्सचेंज को शिफ्ट करने में कुल 41 करोड़ रुपये का खर्च आने वाला है, जिसका प्रावधान वर्क्स प्रोग्राम 2018-19 में पहले से ही किया गया है. चूंकि यह प्रावधान अगले वित्तवर्ष के वर्क्स प्रोग्राम में किया गया है, अतः उन्होंने सीआरबी से चालू वर्ष के खर्च से इसकी अनुमति/संस्तुति जल्दी दिए जाने का अनुरोध किया है.

    उन्होंने लिखा है कि चूंकि यह एक अत्यंत विशेष प्रकृति का कार्य है, इसलिए रेलवे बोर्ड के हैरिटेज डायरेक्टरेट (ईडी/हैरिटेज) को यह कार्य सौंप दिया जाना चाहिए, जिससे वह एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी करके कार्य की संस्तुति लें और विशेषज्ञों की रिपोर्ट के अनुसार कार्य को अंजाम दें. उन्होंने लिखा है कि पी.डिमेलो रोड पर नई मुख्यालय इमारत के निर्माण की जगह की पहचान की गई और वर्ष 2018-19 के वर्क्स प्रोग्राम में इसका प्रस्ताव संस्तुति के लिए शीघ्र भेजा जाएगा. जब तक कार्यालय इमारत का निर्माण नहीं हो जाता, तब तक के लिए कार्यालयों को वर्तमान इमारतों में अस्थाई रूप से समायोजित किया जा रहा है और इसके साथ ही उपयुक्त इमारत के लिए ईओआई भी जारी किया गया है. इसके अलावा पीएसयू को अपने कार्यालय अन्यत्र शिफ्ट करने का नोटिस दे दिया गया है.

    आनन-फानन में अथवा मजबूरी में लिखे गए महाप्रबंधक के उपरोक्त पत्र के मजमून से जाहिर है कि मंत्री जी का कितना बड़ा दबाव इसके पीछे काम कर रहा है. इस वेशकीमती जगह और दुनिया की एकमात्र ‘सर्विंग’ विश्व धरोहर इमारत को कथित ‘वर्ल्ड क्लास रेल म्यूजियम’ बनाए जाने की हड़बड़ी के पीछे मंत्री जी का छिपा उद्देश्य क्या है? यह न तो महाप्रबंधक को समझ में आ रहा है और न ही मध्य रेलवे के किसी अधिकारी या कर्मचारी को. इसी बात के मद्देनजर सेंट्रल रेलवे मजदूर संघ (सीआरएमएस) ने मंत्री के इस निर्णय के विरोध में महाप्रबंधक कार्यालय के तल पर एक बोर्ड लिखकर लगाया है. बाकी कोई श्रमिक संगठन या राजनीतिक विपक्ष अब तक इसके विरोध में सामने नहीं आया है. शायद इसीलिए गुजरात चुनावों का मौका ताड़कर मंत्री जी अपना यह बेतुका निर्णय लागू करवाने में सफल हो रहे हैं.

    सीएसएमटी ऐसी जगह स्थित है, जहां रोजाना करीब 25-30 लाख से ज्यादा यात्रियों/सैलानियों की आवाजाही होती है. इतनी भारी भीड़ वाली जगह पर एक और ‘दर्शनीय मुर्दाघर’ बनाए जाने से यहां भीड़ की स्थिति और ज्यादा भयावह होगी, क्योंकि मध्य रेलवे की लोकल सेवाओं को अन्यत्र शिफ्ट किए जाने का कोई उपाय नहीं हो सकता है. तथापि, मंत्री की इस हड़बड़ी को इस बात से समझा जा सकता है कि वह अपने इस बेतुके-बेगैरत निर्णय पर अमल कराने के लिए लगातार मुंबई में डेरा डाले हुए हैं. कभी वह अस्पताल में भर्ती होने और वहीं रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक करने का दिखावा करते हैं, तो कभी रात को चर्चगेट और सीएसएमटी स्टेशन पर अकेले टहलने निकल पड़ते हैं. बिना इस बात की सूचना सक्षम रेल अधिकारियों को दिए उनका इस तरह निकलना खतरे से खाली नहीं है, यदि खुदा-न-खास्ता उनके साथ कोई अप्रिय घटना घट जाती है, तो बाद में वह स्टेशनों पर सुरक्षा इंतजामों में खामी की बात कहकर इन्हीं अधिकारियों को फांसी पर लटका देंगे!

    मध्य रेलवे के महाप्रबंधक सहित मध्य रेलवे का कोई भी अधिकारी और कर्मचारी रेलमंत्री के इस निहितस्वार्थी एवं तुगलकी निर्णय से कतई सहमत नहीं है, मगर खुलकर कोई भी कुछ कहने की स्थिति में इसलिए नहीं है, क्योंकि सत्ता में काबिज सरकार उनकी है और ऐसे में वह जो चाहे कर सकते हैं. कई वरिष्ठ अधिकारियों ने ‘रेलवे समाचार’ से बात करते हुए उनका नाम उजागर न किए जाने की शर्त पर कहा कि सन 1888 में निर्मित यह विश्व की एकमात्र ऐसी धरोहर इमारत है, जो आज 129 साल बाद भी न सिर्फ रिहायसी स्थिति में है, बल्कि काफी मजबूत भी है. इसके रखरखाव में सालाना करोड़ों रुपये रेलवे द्वारा खर्च किए जा रहे हैं. विश्व धरोहर घोषित होने के बाद से कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं भी इसके रखरखाव के लिए पर्याप्त योगदान देने लेगी हैं. गोथिक शैली से निर्मित यह अत्यंत दर्शनीय एवं सौन्दर्यशील इमारत 16 अप्रैल 1854 को भारत में शुरू हुई रेलवे की सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक है. अब इसे निरर्थक रूप से मुर्दाघर में तब्दील किए जाने से उन्हें भारी सदमा लगा है. उनका यह भी कहना है कि रेलवे बोर्ड भी रेलमंत्री के इस बेतुके निर्णय से खुश नहीं है.

    किसी भावी कार्य योजना पर अमल करने से पहले उसके कई पहलुओं पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाता है. जैसे 1. क्या किया जाना है? 2. क्या और कैसे होना चाहिए? 3. क्या कर रहे हैं? 4. उसके परिणाम क्या होंगे? 5. उसको किए जाने का उद्देश्य क्या है? इन सबको भूलकर मंत्री जी सिर्फ अपना निहित-उद्देश्य हासिल करने के लिए चारों दिशाओं में न सिर्फ खुद भटक रहे हैं, बल्कि समस्त रेल अधिकारियों को भी भटका रहे हैं. पारिस्थितिकी का यह सास्वत नियम है कि यदि हम अलग-अलग दिशाओं में एकसाथ चलेंगे, तो घूम-फिरकर पुनः वहीं आ जाएंगे, कहीं-किसी मंजिल पर कभी नहीं पहुंच पाएंगे. यानि स्थिति ज्यों की त्यों रहेगी. नतीजा शून्य होगा. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सर्वप्रथम इस कथित म्यूजियम की स्थापना के उद्देश्य, इसके परिणाम, हानि-लाभ इत्यादि पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए और यह भी देखा जाना चाहिए कि इसका अंतिम लाभ किसको होने वाला है. हमारी एक अत्यंत महत्वपूर्ण इमारत हड़पने की कहीं यह कोई अंतरराष्ट्रीय साजिश तो नहीं है? अन्यथा आने वाले समय में पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा सभी बीएनआर हैरिटेज होटलों को निजी हाथों में सौंपे जाने की तरह ही भाजपा सरकार का यह ‘मुर्दाघर’ एक बहुत बड़ा घोटाला साबित होने वाला है.

सम्पादकीय