प.म.रे. वाणिज्य विभाग की मनमानी, जबरन हटाई खानपान स्टालों की ट्रालियां

    पूरी भारतीय रेल में ट्रालियां हटाने की जबरन कार्रवाई सिर्फ भोपाल मंडल में हुई

    खानपान ट्रालियों को जबरन हटाने से हजारों की संख्या में बेरोजगार हुए लोग

    ट्रालियों पर कार्यरत वेंडर्स को हटाने से होगी करोड़ों रेलयात्रियों को भारी असुविधा

    रेल प्रशासन को अपनी तुगलकी कैटरिंग पालिसी-17 पर पुनर्विचार करना चाहिए

    भोपाल : पश्चिम मध्य रेलवे, भोपाल मंडल के वाणिज्य विभाग के अफलातून फरमान ने रेलवे स्टेशनों के निजी खानपान स्टालों से संबद्ध ट्रालियों पर कार्यरत हजारों निजी कैटरिंग वेंडरों को रातोंरात बेरोजगारी की खाईं में ढ़केल दिया है. ज्ञातव्य है कि पश्चिम मध्य रेलवे, भोपाल मंडल मुख्यालय ने कैटरिंग पालिसी-2017 का हवाला देते हुए 29 नवंबर की शाम को एक आदेश निकालकर मंडल के सभी निजी खानपान स्टालों को बरकरार रखते हुए उनके साथ जुड़ी खानपान ट्रालियों को 30 नवंबर की आधी रात में आरपीएफ को साथ लेकर जबरन स्टेशनों से हटा दिया.

    उल्लेखनीय है कि भोपाल मंडल के वाणिज्य विभाग (सीनियर डीसीएम) द्वारा जारी उक्त तुगलकी आदेश में न तो इस बात ध्यान रखा गया कि निजी खानपान स्टालों से संबद्ध इन ट्रालियों पर कार्यरत हजारों लोग रातोंरात बेरोजगार हो जाएंगे, और न ही उन्होंने इसका ख्याल किया कि स्टेशनों पर लाखों रेलयात्रियों को होने वाली असुविधा का क्या होगा? इसके अलावा उन्होंने किसी भी खानपान स्टाल लाइसेंसधारी को इसके किसी विकल्प या उपाय के लिए कोई मौका भी नहीं दिया. नाम न उजागर करने की शर्त पर ‘रेलवे समाचार’ से बात करते हुए कई खानपान स्टाल धारकों ने कहा कि उन्हें अपनी बात कहने का कोई मौका न देकर रेल प्रशासन द्वारा उनके साथ अन्याय किया गया है.

    इसके अलावा इन खानपान लाइसेंसधारियों का यह भी कहना है कि एक तरफ मोदी सरकार रोजगार बढ़ाने और बेरोजगार युवाओं को नए रोजगार उपलब्ध कराए जाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, दूसरी तरफ कुछ रेल अधिकारियों द्वारा इस प्रकार से जबरन लोगों का रोजगार छीना जा रहा है. उनका कहना था कि पूरी भारतीय रेल में इस तरह की मनमानी कार्यवाही सिर्फ भोपाल मंडल में ही की गई है. उनका यह भी कहना था कि एक तरफ जहां रेल प्रशासन द्वारा यात्री सुविधाओं को बढ़ाए जाने की बात की जाती है, वहीं दूसरी तरफ इस तरह की कार्यवाही से यात्री सुविधाओं में कटौती की जा रही है.

    इससे करीब एक हजार ट्राली वेंडरों और उनके परिजनों सहित लगभग पांच हजार लोगों के सामने रातोंरात रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गई है. ऐसा भी नहीं है कि इन खानपान लाइसेंसधारियों ने रेलवे का कोई बकाया रखा है. सामान्यतः सभी लाइसेंसधारी समय पर लाइसेंस फीस का भुगतान कर रहे हैं. अब रेलवे बोर्ड और प.म.रे. मुख्यालय को इस समस्या का उचित समाधान निकालना होगा, अन्यथा लाखों की संख्या में न सिर्फ लोग बेरोजगार होंगे, बल्कि करोड़ों रेलयात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ेगा.

    ‘रेलवे समाचार’ को भोपाल स्थित अपने अत्यंत विश्वसनीय सूत्रों से यह भी ज्ञात हुआ है कि भोपाल मंडल के वाणिज्य विभाग ने यह तुगलकी और मनमानी एकतरफा कार्रवाई एक सांसद के कथित मुंहजबानी आदेश पर की है. सूत्रों का यह भी कहना है कि डीआरएम/कमर्शियल उर्फ सीनियर डीसीएम, भोपाल मंडल ने भले ही कैटरिंग लाइसेंसीज को जारी किए गए पत्रों में प.म.रे. मुख्यालय और रेलवे बोर्ड का हवाला दिया है, परंतु वास्तव में उन्हें इसके लिए प.म.रे. मुख्यालय, जबलपुर से ऐसी कोई एडवाइस जारी नहीं की गई है, और न ही मंडल को रेलवे बोर्ड के संबंधित अधिकारियों से ऐसा कोई आदेश दिया गया है.

    इसका सीधा अर्थ यह है कि सीनियर डीसीएम ने उक्त सांसद के कथित मुंहजबानी आदेश पर यह एकतरफा कार्रवाई की है. सूत्रों का कहना है कि उक्त सांसद ने वास्तव में मंडल के लगभग सभी कैटरिंग लाइसेंसीज से एकमुश्त रकम की मांग की थी, जिसकी पूर्ति जो लाइसेंसी समय पर नहीं कर पाए, उनकी ट्रालियां जबरन बंद करा दी गईं. सूत्रों ने कहा कि सांसद के साथ यदि सीनियर डीसीएम का भी इसमें कोई निहितस्वार्थ जुड़ा रहा हो, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी.

    ‘रेलवे समाचार’ का मानना है कि जहां आज भी रेल मंत्रालय द्वारा लंबी दूरी की सैकड़ों मेल/एक्सप्रेस एवं सवारी गाड़ियों में पैंट्रीकार उपलब्ध नहीं करवाई जा सकी हैं, वहीं रेलवे स्टेशनों पर स्थित निजी खानपान स्टालों (स्टेटिक कैटरिंग यूनिटों) से संबद्ध चल ट्रालियों में कार्यरत लाखों निजी कैटरिंग वेंडरों को हटाने की मनमानी एवं तुगलकी योजना से प्लेटफार्मों पर उन लंबी-लंबी गाड़ियों के यात्रियों को खाने के लिए कुछ भी नहीं मिल पाएगा, जिन गाड़ियों में रेल प्रशासन द्वारा अब तक पैंट्रीकार उपलब्ध नहीं करवाई गई हैं.

    इससे न सिर्फ प्रतिदिन करोड़ों रेलयात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ेगा, बल्कि लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार हो जाएंगे. यदि कुछ निहितस्वार्थी वाणिज्य अधिकारी इन छोटी-छोटी कैटरिंग यूनिटों और खानपान ट्रालियों को हटाकर बड़े-बड़े कैटरर्स को इनकी जगह स्थापित करने का मन बना रहे हैं, तो यह भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है. रेल प्रशासन को अपनी तुगलकी कैटरिंग पालिसी पर पुनर्विचार करना चाहिए.

सम्पादकीय