निरीक्षण पर परिवार सहित गए एडीआरएम/रांची की जांच

    उच्च स्तरीय विवेकहीनता और मूढ़ता का सर्वोत्तम उदाहरण

    रांची : दक्षिण पूर्व रेलवे, रांची मंडल के एक एडीआरएम गत सप्ताह मंडल के टोरी और मूरी सेक्शन के निरीक्षण के लिए मातहत अधिकारियों के साथ गए थे. प्राप्त जानकारी के अनुसार उनके साथ उनका और उनके मातहतों का परिवार भी गया था. बताते हैं कि टोरी के पास एक नदी है, जिस पर बना रेलवे पुल न सिर्फ दर्शनीय है, बल्कि उसके आसपास का क्षेत्र एक प्रसिद्ध पिकनिक स्पॉट भी है. बताते हैं कि एडीआरएम सहित सभी मातहतों ने अपने परिजनों को पिकनिक स्पॉट पर छोड़कर अपना निरीक्षण कार्यक्रम निपटाने में लग गए थे. मगर वह खाना खाने के लिए लंच टाइम में एक साथ बैठे थे. तभी किसी कुटिल कर्मचारी ने उनकी फोटो खींचकर रेलवे बोर्ड को व्हाट्सऐप पर भेज दी.

    निश्चित रूप से रेलवे बोर्ड को यह फोटो भेजे जाने के पीछे उक्त कुटिल कर्मचारी अथवा प्रेस प्रतिनिधि का उद्देश्य रेलवे बोर्ड के विवेकहीन अधिकारियों को यह दर्शाना और बताना था कि एडीआरएम निरीक्षण के बहाने अपने परिवार के साथ पिकनिक मना रहे हैं. तथापि, रेलवे बोर्ड के संबंधित मूढ़ अधिकारी ने अपने विवेक का इस्तेमाल किए बिना ही उक्त फोटो दक्षिण पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक को भेज दी. महाप्रबंधक ने जांच और उचित कार्रवाई के लिए उक्त फोटो एसडीजीएम को फॉरवर्ड कर दी. जिस तरह रेलवे बोर्ड के अधिकारी ने अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया, उसी तरह दक्षिण पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक और एसडीजीएम ने भी भरपूर मूढ़ता का परिचय दिया.

    रेलवे बोर्ड सहित महाप्रबंधक और एसडीजीएम यहां यह भूल गए कि निरीक्षण के दौरान न सिर्फ वह, बल्कि लगभग सभी विभाग प्रमुख भी अपने परिवार को साथ लेकर जाते हैं. भारतीय रेल में यह न सिर्फ एक पुरानी परंपरा चली आ रही है, बल्कि निरीक्षण के दौरान परिवार को साथ ले जाने पर नियमतः कोई पाबंदी भी नहीं है. अब इस मूढ़ता भरे प्रकरण के बाद न सिर्फ रांची मंडल के सभी अधिकारियों में भारी रोष है, बल्कि इससे सभी संबंधित अधिकारीगण अपने परिवार के समक्ष बेहद अपमानित महसूस कर रहे हैं. अधिकारियों का कहना है कि रेलवे बोर्ड सभी फील्ड कर्मचारियों और बाहरी या प्रेस प्रतिनिधियों अपना को व्हाट्सऐप नंबर देकर कौन सा महान मकसद हासिल करना चाहता है?

    उल्लेखनीय है कि रेलवे के वर्तमान निजाम पर रेल अधिकारियों की खुलेआम बेइज्जती करने की प्रवृत्ति कुछ ज्यादा ही हावी हो रही है. इसके कई उदाहरण सामने आ चुके हैं. अधिकारियों का कहना है कि यदि इसी तरह अधिकारियों को लगातार बेइज्जत किया जाता रहा, तो वह एक दिन इसका खुलकर विरोध करने के लिए मजबूर हो जाएंगे. उनका यह भी कहना है कि रेलवे बोर्ड अथवा मंत्री अपनी ड्रामेबाजी और दिखावा करने के अलावा फील्ड स्तर पर वास्तव में जो काम करना चाहिए, वह तो वे कर नहीं रहे हैं, बल्कि अधिकारियों एवं कर्मचारियों को बेइज्जत करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं. इस तरह से तो कोई भी संस्था बहुत दिन तक नहीं चल सकती है. उनका कहना है कि रेलवे बोर्ड को इस बारे में स्पष्ट नीति घोषित करनी चाहिए.

सम्पादकीय