स्टेशनों पर जरूरत है ज्यादा कर्मचारी नियुक्त करने की, ‘डायरेक्टरों’ की नहीं

    बेहतर होता स्टेशन प्रबंधकों और एरिया अफसरों को पॉवरफुल बनाया जाता

    स्टेशनों पर कार्यरत रेलकर्मियों को रास नहीं आई डायरेक्टर्स की नई व्यवस्था

    ‘डायरेक्टरों’ की नियुक्ति से स्टेशनों पर खुला ‘नया पॉवर एवं एक्स्टोर्शन सेंटर’

    सभी स्टेशन निदेशकों की व्यवस्था के लिए होगा करीब दो हजार करोड़ का खर्च

    ज्यादा एडीआरएम और स्टेशन डायरेक्टर्स की नियुक्ति का औचित्य सिद्ध नहीं कर पा रहा रेल प्रशासन

    सुरेश त्रिपाठी

    रेलवे बोर्ड के एक ‘अविचारित’ आदेश पर ‘ए’ एवं ‘ए-1’ श्रेणी के महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों पर स्टेशन निदेशकों (स्टेशन डायरेक्टर्स) की नियुक्ति की गई है. इसके लिए जोनल और मंडल मुख्यालयों से अधिकारी पदों के एलीमेंट को स्टेशनों पर ट्रांसफर किया गया है. रेलवे बोर्ड अथवा रेल प्रशासन इस बारे में भले ही चाहे कितनी सफाई दे, और अपने इस निर्णय को उचित ठहराए, मगर उसका यह निर्णय न सिर्फ अविचारित है, बल्कि इसका कोई औचित्य साबित करने में भी वह विफल है. रेलवे स्टेशनों पर स्टेशन निदेशक की नियुक्ति का रेलयात्रियों को क्या लाभ होगा, अथवा इससे रेल परिचालन किस प्रकार सुधर जाएगा, गाड़ियों की लेट-लतीफी इससे किस प्रकार सुधर जाएगी, स्टेशनों का प्रबंधन और रख-रखाव इससे किस तरह बेहतर हो जाएगा, इत्यादि सवाल अनुत्तरित हैं, जिनका कोई वाजिब जवाब रेल प्रशासन के पास नहीं है.

    इसके अलावा रेल प्रशासन द्वारा इन तथाकथित स्टेशन निदेशकों को समुचित अधिकार भी नहीं सौंपे गए हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार मूल योजना के मुताबिक ‘ए’ एवं ‘ए-1’ श्रेणी के बड़े एवं महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों के दायरे में कार्यरत सभी विभागों के जूनियर/सीनियर स्केल सहित जेएजी स्तर तक के सभी अधिकारियों और सभी विभागों के सीनियर सुपरवाइजर्स तथा स्टेशन पर कार्यरत सभी कर्मचारियों की रिपोर्टिंग स्टेशन डायरेक्टर को दी जानी थी. यह योजना सामने आने के बाद इसमें जानबूझकर ‘विभागवाद’ पैदा किया गया और कहा गया कि इससे सिर्फ ट्रैफिक विभाग के अधिकारियों को लाभ होगा. अतः अन्य विभागों के बोर्ड स्तरीय उच्च अधिकारियों ने अपने-अपने विभागों के जूनियर/सीनियर स्केल अधिकारियों सहित सीनियर सबार्डिनेट्स को भी स्टेशन निदेशक के मातहत देने से साफ मना कर दिया.

    इसके परिणामस्वरूप मूल योजना का प्रारूप पुनः बदला गया और यह तय किया गया कि सिर्फ स्टेशन पर कार्यरत रेलकर्मी ही स्टेशन निदेशक के मातहत होंगे और सिर्फ वही उसे रिपोर्ट करेंगे. हालांकि कुछ जोनल महाप्रबंधकों का कहना है कि उन्होंने सभी विभागों के सीनियर सबार्डिनेट्स को स्टेशन निदेशक के मातहत किया है. मगर जब उनसे ‘रेलवे समाचार’ द्वारा यह पूछा गया कि क्या इन ‘सभी सीनियर सबार्डिनेट्स’ में वह अधिकारीगण भी शामिल हैं, जिनके कार्यालय संबंधित स्टेशनों के दायरे में स्थित हैं और जो कि वहां कार्यरत हैं, तो इसका कोई समुचित जवाब उनके पास नहीं था. इसका मतलब यह है कि सिर्फ स्टेशनों पर कार्यरत सामान्य टिकट बुकिंग, आरक्षण, गुड्स/पार्सल, उप स्टेशन अधीक्षक, स्टेशन मास्टर, कुली और टिकट चेकिंग स्टाफ ही स्टेशन निदेशक के मातहत किया गया है.

    इसके अलावा ज्यादा से ज्यादा स्टेशन पर कार्यरत ट्रेन लाइटिंग और सीएंडडब्ल्यू स्टाफ स्टेशन निदेशक को रिपोर्ट करेगा. मूल योजना में बदलाव के साथ ही इस योजना में बंदरबांट के लिए अब रेलवे की सभी आठों संगठित सेवाओं के वह अधिकारी भी शामिल हो गए हैं, जिनका ट्रेन ऑपरेशन से कोई सीधा संबंध नहीं होता है. जबकि स्टेशनों पर पदस्थ अधिकांश रेलकर्मियों का सीधा संबंध ट्रेन ऑपरेशन से है और उनके लिए अपने स्टेशनों पर मात्र ट्रेन ऑपरेशन ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य होता है. यह कार्य वे अब तक स्टेशन मास्टर/स्टेशन प्रबंधक और क्षेत्रीय प्रबंधक (एरिया ऑफिसर) के मार्गदर्शन में करते आ रहे थे. इनका अब भी यही कार्य होगा, मगर तथाकथित स्टेशन निदेशक के कार्य स्पष्ट नहीं हैं कि वह स्टेशन पर क्या करेगा?

    इससे अब ऐसे तमाम बड़े रेलवे स्टेशनों, जहां स्टेशन निदेशकों की नियुक्ति की गई है, पर एक ‘नया पॉवर सेंटर’ खुल गया है, जिसका मुख्य कार्य स्टेशनों पर उगाही का होगा. इस प्रकार स्टेशनों पर एक ‘नया एक्स्टोर्शन सेंटर’ स्थापित हो गया है. हालांकि कुछ वरिष्ठ रेल अधिकारियों का यह भी कहना है कि बिबेक देबरॉय कमेटी का मूल सुझाव यह था कि दिल्ली, हावड़ा, चेन्नई, मुंबई जैसे देश के बड़े रेलवे स्टेशनों पर स्टेशन निदेशकों की नियुक्ति की जाए. हालांकि वहां पहले से ही जूनियर/सीनियर अथवा जेएजी स्तर के अधिकारी कार्यरत थे. इस सुझाव का वृहद् स्तर पर विस्तार करके रेल प्रशासन ने यह साबित कर दिया है कि उसके पास अधिकारियों की संख्या ज्यादा है. रेल प्रशासन ने यह बात प्रत्येक मंडल में तीन-तीन, चार-चार अपर मंडल रेल प्रबंधकों (एडीआरएम) की नियुक्ति करके भी साबित की है.

    नई दिल्ली स्टेशन पर जेएजी स्तर का अधिकारी बतौर स्टेशन मैनेजर पिछले बीसों साल से कार्यरत रहा है, जिसकी प्रतिदिन की अवैध आय लाखों में रही है, इसीलिए वह डीआरएम तक को कोई तवज्जो नहीं देता था, क्योंकि उसे हमेशा रेलवे बोर्ड और उत्तर रेलवे मुख्यालय के उच्च अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त रहा है. अब उसके ऊपर एक और उसी स्तर का अधिकारी नियुक्त हो जाने से उनके बीच स्टेशन की अवैध आय के लिए आपसी प्रतिद्वंद्विता होगी. यही स्थित देश के ऐसे सभी रेलवे स्टेशनों पर होगी, जहां स्टेशन निदेशकों की नियुक्ति की गई है. इसी परिप्रेक्ष्य में यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि इस योजना में कई ऐसे अधिकारियों की बतौर स्टेशन निदेशक नियुक्ति की गई है, जिनकी विश्वसनीयता पहले से ही संदिग्ध है और उन्हें घोषित रूप से भ्रष्ट माना जाता रहा है. इससे स्टेशन पर कार्यरत रेल कर्मचारियों की मुसीबत बढ़ेगी. जबकि वास्तविक आवश्यकता स्टेशनों पर पर्याप्त अथवा स्वीकृत संख्या में रेलकर्मियों की नियुक्ति किए जाने की है. ऐसा न करके रेल प्रशासन ने वास्तव में उन लाखों रेलयात्रियों को मुंह चिढ़ाने वाला काम किया है, जिन्हें स्टाफ की कमी के चलते स्टेशनों पर समुचित सुविधा समय पर नहीं मिल पाती है.

    स्टेशनों पर स्टेशन निदेशक की नियुक्ति का न सिर्फ सर्वसामान्य जनता यानि रेलयात्रियों ने विरोध करना शुरू कर दिया है, बल्कि रेलकर्मियों द्वारा भी इस सर्वथा अनावश्यक नियुक्ति का विरोध होना शुरू हो गया है. इस नई व्यवस्था के बारे में कल्याण स्टेशन पर कई रेलयात्रियों को बताकर ‘रेलवे समाचार’ द्वारा जब इसके बारे में उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई, तो उनका कहना था कि यदि स्टेशन निदेशक के बदले ज्यादा रेल कर्मचारी नियुक्त किए जाते और सामान्य टिकट बुकिंग एवं आरक्षण खिड़कियों की संख्या बढ़ाई जाती, तो रेल यात्रियों का ज्यादा भला होता. इसके अलावा उनका यह भी कहना है कि काफी समय से बंद पड़े प्लेटफार्म नं. 1 को प्लेटफार्म नं. 2 से जोड़ने वाले पुल (एफओबी) का शीघ्र नवीनीकरण कराया जाता, प्लेटफार्म पर शौचालय की साफ-सफाई की उचित व्यवस्था की जाती, तो ज्यादा अच्छा होता. यहां स्टेशन निदेशक की नियुक्ति का कोई औचित्य नहीं है.

    ‘कल्याण स्टेशन सहित ऐसे सभी बड़े रेलवे स्टेशनों पर स्टेशन प्रबंधक एवं क्षेत्रीय अधिकारी की नियुक्ति पहले से ही है. अब तीसरे अधिकारी की नियुक्ति का क्या औचित्य है?’ यह कहना है स्टेशनों पर कार्यरत वरिष्ठ रेल कर्मचारियों का. उनका कहना है कि प्रशासनिक अधिकारियों को यह सोचना चाहिए था कि अधिकारी बढ़ेंगे, तो उनके और उनके स्टाफ के बैठने की उचित व्यवस्था करने की भी जरूरत पड़ेगी, जिसका खर्च अनुमान से ज्यादा होगा. इस खर्च से रेल यात्री को कोई फायदा मिलने वाला नहीं है. यदि नए अधिकारी की नियुक्ति करने के बजाय यहां पहले से ही नियुक्त अधिकारियों को उससे संबंधित समस्त अधिकार दे दिए जाते, तो न सिर्फ रेलवे के करोड़ों रुपये की बचत होती, बल्कि स्टेशन पर कार्यरत कर्मचारियों के मनोबल में भी वृद्धि होती और वह मन लगाकर अपना काम करते.

    जो सामान्य बात रेलकर्मियों और रेलयात्रियों दोनों की समझ में आ गई, वह बात रेल प्रशासन अथवा रेलवे बोर्ड की ऊंची कुर्सियों पर बैठे उच्च अधिकारियों की समझ में नहीं आई. जैसी कल्याण स्टेशन पर नव-नियुक्त स्टेशन निदेशक और उसके स्टाफ को बैठने के लिए करीब पांच करोड़ रुपये की लागत से स्टेशन निदेशक कार्यालय का निर्माण किए जाने का बजट प्रस्ताव मंडल कार्यालय को भेजा गया है. इस प्रकार देखा जाए तो ऐसे करीब 300 से 400 स्टेशन निदेशकों के लिए कुल लगभग 1,500 से 2,000 करोड़ रुपये की लागत इसी में स्वाहा हो जाएगी. देश की जनता की गाढ़ी कमाई की इतनी बड़ी और कीमती धनराशि का इस तरह अपव्यय करने का क्या औचित्य है? इसका कौन सा लाभ देश और जनता को मिलने वाला है? इन सवालों का कोई वाजिब जवाब रेल प्रशासन अथवा मंत्री के पास नहीं है. इसका सीधा मतलब यह है कि इस मामले में भी भ्रष्टाचार सन्निहित है और हर स्तर पर सरकारी राजस्व की बंदरबांट जारी है.

    इसके अलावा जीएम्स अथवा रेलवे बोर्ड के संबंधित अधिकारियों के पास इस बात का भी कोई उचित जवाब नहीं है कि स्टेशन निदेशकों की नियुक्ति किए जाने के बजाय सभी संबंधित स्टेशन मैनेजर्स और एरिया ऑफिसर्स को ही यह अधिकार सौंपकर उन्हें ही ज्यादा अधिकारसंपन्न क्यों नहीं बनाया जा सकता था? इसके साथ ही इन सभी स्टेशन निदेशकों की रिपोर्टिंग सीधे एडीआरएम को है, जिससे किसी भी ब्रांच ऑफिसर का उन पर कोई नियंत्रण नहीं रहेगा और न ही यह स्टेशन निदेशक उनकी किसी बात को कोई तवज्जो देंगे. जबकि स्टेशनों पर कार्यरत सभी विभागों के कर्मचारियों की रिपोर्टिंग उनके संबंधित ब्रांच अफसरों को होने से उन पर उनका सीधा नियंत्रण था, जो कि अब स्टेशन निदेशक को रिपोर्ट करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएंगे. इस प्रकार मंडल मुख्यालय में बैठे ब्रांच अफसरों का अब इन स्टेशन कर्मचारियों पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है. इससे स्टेशनों पर अव्यवस्था फैलने के पूरे आसार हैं.

    डीआरएम को बनाया गया शंकर जी की मूरत

    इसी प्रकार प्रत्येक छोटे-बड़े मंडल मुख्यालय में अब तीन-तीन चार-चार एडीआरएम की नियुक्ति की जा रही है. इसके साथ ही डीआरएम को ज्यादा अधिकारसंपन्न बनाया गया है. डीआरएम को अब मंडल स्तर पर जूनियर स्केल स्तर के किसी भी अधिकारी का अन्य सेक्शन अथवा विभाग में ट्रांसफर करने का अधिकार दिया गया है. सबसे पहले इसका सबसे बड़ा नुकसान ट्रैफिक और कमर्शियल विभाग को होने वाला है, क्योंकि डीआरएम नाराज होने की स्थिति में बिना जोनल मुख्यालय की अनुमति के अब किसी भी जूनियर स्केल कमर्शियल अधिकारी को ऑपरेटिंग में और जूनियर स्केल ऑपरेटिंग अधिकारी को कमर्शियल में भेज देने में सक्षम होगा. इस तरह यह सभी जूनियर स्केल अधिकारी अब न सिर्फ डीआरएम की ‘गुड बुक’ में बने रहना चाहेंगे, बल्कि उसकी चापलूसी में भी लगे रहेंगे. जबकि अन्य विभागों के जूनियर स्केल अधिकारियों को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि यदि डीआरएम उनसे नाराज भी हो जाएगा, तो वह उनका सिर्फ सेक्शन ही बदल पाने में सक्षम होगा.

    इसी तरह तीन-तीन चार-चार एडीआरएम भी न सिर्फ डीआरएम की गुड बुक में रहने की कोशिश करते रहेंगे, बल्कि अपने-अपने कैडर के अनुसार उसकी खैरख्वाही में लगे रहेंगे, जिससे ज्यादा संख्या में मंडलों में उनकी नियुक्ति का औचित्य सिद्ध हो पाना काफी मुश्किल होगा. इससे विभागवाद और मजबूत होगा, जबकि इसे खत्म किए जाने का रोना लगभग हर अधिकार रोता नजर आता है, मगर वही अधिकारी इस विभागवाद को बढ़ावा देने के लिए भी जिम्मेदार हैं. इससे बेहतर यह होता कि मंडलों के सभी ब्रांच अफसरों को ही एडीआरएम का दर्जा दे दिया जाता. तब मंडल प्रशासन ज्यादा सक्षम हो गया होता.

    ऐसे में रेल प्रशासन ज्यादा एडीआरएम और स्टेशन डायरेक्टर्स की नियुक्ति का कोई औचित्य सिद्ध नहीं कर पा रहा है. जाहिर है कि भारतीय रेल में अधिकारियों की संख्या जरूरत से ज्यादा हो गई है, जबकि कर्मचारियों की कमी का रोना सभी स्तर पर रोया जा रहा है, मगर रेल प्रशासन को इसकी कोई चिंता नहीं है, वह सिर्फ ड्रामेबाजी और दिखावे वाले लोकप्रिय निर्णय लेने में व्यस्त है. इस प्रकार तो कभी-भी भारतीय रेल का पुनरुथान नहीं हो पाएगा. ऐसे में क्या यह ज्यादा बेहतर नहीं होगा कि इन इफरात अधिकारियों को घर भेजकर उनके ही वेतन-भत्तों की लागत पर हजारों कर्मचारियों की नियुक्ति की जाए, जिससे कि भारतीय रेल की जिस सेफ्टी, सिक्योरिटी और पंक्चुअलिटी का सत्यानाश हुआ पड़ा है, उसे पुनर्स्थापित किया जा सके!

सम्पादकीय