रेलवे में हो रहा ‘करप्शन का कॉर्पोरेटाईजेशन’

    ‘रेलवे समाचार’ की खबर से जेवी फर्मों में मचा हड़कंप, रेल प्रशासन हुआ सतर्क

    सिर्फ ‘गुडविल’ और ‘टेंडर खरीद’ हेतु प्रक्रिया में शामिल होता है क्रेडेंशियल विक्रेता

    जेवी/पार्टनरशिप फर्मों ने कई-कई पैन नं. के साथ एक ही टिन नं. इस्तेमाल किया

    कई जेवी मेंबर्स ने बैंक एकाउंट बदल दिया, कईयों ने अन्य खातों में भुगतान लिया

    एफओबी/आरयूबी निर्माण मानक के अनुरूप नहीं, ज्यादातर का एलाइनमेंट फेल हुआ

    सुरेश त्रिपाठी

    ‘रेलवे समाचार’ द्वारा मंगलवार, 21 नवंबर को “जेवी फर्मों द्वारा रेलवे में सैकड़ों करोड़ का छुपा भ्रष्टाचार” शीर्षक से प्रकाशित खबर से जहां एक तरफ जेवी के नाम पर अपनी क्रेडेंशियल बेचकर घर बैठे मुनाफा कमाने वाली तमाम फर्मों के बीच भारी हड़कंप मच गया, वहीं दूसरी तरफ रेल प्रशासन भी काफी सतर्क हो गया है. मंगलवार को पूरे दिन उत्तर रेलवे निर्माण संगठन सहित सभी जोनल रेलों में इस विषय पर गहन विचार-विमर्श किया गया और इसकी पूरी नीति पर पुनर्विचार एवं उसके पुनर्निर्धारण को लेकर चर्चा हुई.

    इसके साथ ही कई फर्मों ने ‘रेलवे समाचार’ को कॉल करके इस विषय को उठाए जाने पर अपनी आपत्ति दर्ज कराने के साथ ही इसके तकनीकी पहलू पर विस्तार से प्रकाश भी डाला, जो कि स्वाभाविक रूप से उनके पक्ष में जाता है. जबकि इसके साथ ही कई पूर्व एवं वर्तमान वरिष्ठ रेल अधिकारियों ने भी कॉल करके ‘रेलवे समाचार’ का न सिर्फ उत्साहवर्धन किया, बल्कि इस विषय के तमाम तकनीकी पहलुओं पर गहराई से चर्चा भी की.

    उन्होंने इस बात को लेकर गहरी चिंता भी जाहिर की है कि जेवी कॉन्ट्रैक्ट्स के मामलों में रेलवे को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, और कुछ फर्मों से उनके क्रेडेंशियल खरीदकर गलत लोग इस क्षेत्र में आ रहे हैं, जिससे निर्धारित समय पर न तो कोई प्रोजेक्ट पूरा हो पाता है, और न ही गुणवत्तापूर्ण कार्य हो पा रहा है.

    उनकी इस चिंता के दो ताजा उदाहरण 1. एस. के. सूद इंजीनियर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर्स बनाम जीएम/उ.रे., जिसका मामला अभी एक दिन पहले ही 20 नवंबर को दिल्ली हाई कोर्ट से उसके पक्ष में आर्बिट्रेटर की नियुक्ति के बाद निपटा है, और 2. मेसर्स सुविधा इंजीनियर्स (प्रोजेक्ट) बनाम डिप्टी सीई/कंस्ट्रक्शन/उ.रे. हैं, इसका मामला भी 23 मई 2016 को आर्बिट्रेटर की नियुक्ति के बाद सुलटा है.

    एस. के. सूद इंजीनियर्स को जो कार्य 12 महीनों में पूरा करना था, वह उसने करीब पांच साल में किया. इस दरम्यान उसने न सिर्फ 1.79 करोड़ का एक्सेस पेमेंट ले लिया, बल्कि पार्टनर और जेवी का मसौदा भी बदल दिया था. रेलवे को पूर्व सूचना दी थी, मगर उत्तर रेलवे ने समय पर संज्ञान नहीं लिया, इसलिए अदालत में उसे मुंह की खानी पड़ी और आर्बिट्रेटर की नियुक्ति के लिए मानना पड़ा. यही स्थिति सुविधा इंजीनियर्स के मामले में भी उत्तर रेलवे की रही.

    रेलवे टेंडर्स में उपरोक्त प्रकार के तमाम कानूनी विवाद विशेष रूप से रेल लाइन के नीचे भूमिगत मार्ग (आरयूबी) और सड़क ऊपरी पुल (आरओबी) बनाने जैसे विभिन्न बड़े निर्माण कार्यों में पैदा होते हैं. इन कार्यों के अधूरा रह जाने अथवा पूरा न होने का एकमात्र कारण संबंधित कांट्रेक्टर के पास फंड की कमी होना ही होता है, क्योंकि उसका जेवी मेंबर इसमें एक पैसे का भी निवेश नहीं करता है, वह तो टेंडर की कुल लागत का एक निर्धारित प्रतिशत लेकर चुपचाप बैठ जाता है. टेंडर वर्क पूरा होने या न होने के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती है.

    बहुत हुआ तो वह अधिकारियों की अनुनय-विनय पर मेहरबानी दर्शाते हुए उनके साथ एकाध बार निगोसिएशन के लिए बैठ जाता है, और एकाध बार साइट पर चला जाता है. इससे ज्यादा उसका कोई योगदान नहीं होता है, और न ही संबंधित अधिकारी इससे ज्यादा कोई योगदान करने के लिए उसे मजबूर कर पाते हैं. इसके साथ ही टेंडर वर्क समय पर और गुणवत्तापूर्ण ढ़ंग से पूरा न हो पाने के लिए संबंधित फर्म के पास खुद की योग्यता का न होना भी इसका एक अन्य कारण होता है.

    जानकारों का कहना है कि उपरोक्त कारणों की वजह से ही उत्तर रेलवे में ज्यादातर एफओबी/आरयूबी का काम निर्धारित मानक के अनुरूप नहीं हुआ है. ज्यादातर एफओबी/आरयूबी का एलाइनमेंट फेल हुआ है और उनके बॉक्स का निर्माण अलग-अलग स्तर का हुआ है.

    उन्होंने बताया कि इस पर जब रेल अधिकारियों ने संबंधित एजेंसियों को साइट पर बुलाया, जिनकी क्रेडेंशियल का इस्तेमाल इन कॉन्ट्रैक्ट्स को अवार्ड करने में हुआ था, तो उन्होंने जेवी मेंबर्स के बीच हुआ एक अलग एग्रीमेंट प्रस्तुत कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि मुख्य जेवी मेंबर, जिसकी क्रेडेंशियल इस्तेमाल हुई है, किसी प्रकार के नुकसान अथवा वित्तीय निवेश या साइट मैनेजमेंट इत्यादि के लिए उत्तरदायी नहीं है. वह सिर्फ और सिर्फ ‘गुडविल’ और टेंडर की खरीद के औचित्य से इस प्रक्रिया में शामिल है.

    इस तरह उत्तर रेलवे के कई बड़े निर्माण कार्य फंड की कमी के कारण बहुत बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं, क्योंकि जिस फर्म के क्रेडेंशियल वित्तीय औचित्य के लिए इस्तेमाल हुए, उसने अंतिम समय में फंड की कमी के कारण कार्य करने से मना कर दिया.

    जानकारों का कहना है कि कुछ मामलों में जेवी मेंबर्स ने देनदारी चुकाने से मना कर दिया और अपना बैंक एकाउंट बंद करके भाग गए, कुछ ने कार्य के दौरान ही जेवी फर्म का संविधान ही बदल दिया. इस तरह उन्होंने रेलवे को करोड़ों-करोड़ रुपये का चूना लगाया है.

    इसके साथ कुछ ऐसे भी जेवी मेंबर्स हैं, जिन्होंने एक्जीक्यूशन के दौरान अपना बैंक एकाउंट बदल दिया और रेलवे से अन्य बैंक खातों में भुगतान ले लिया, जबकि उसका खामियाजा अब संबंधित अधिकारियों को भुगतना पड़ रहा है.

    कई मामले तो ऐसे भी ‘रेलवे समाचार’ के संज्ञान में आए हैं, जहां कई जेवी फर्मों और पार्टनरशिप फर्मों के मेंबर्स ने टेंडर प्रक्रिया में दो-दो, तीन-तीन पैन नंबर का इस्तेमाल भिन्न-भिन्न नामों से किया है, जबकि उन सबके लिए उनके द्वारा एक ही टीआईएन (टिन) नंबर इस्तेमाल किया गया है. अब यह सभी फर्में और ऐसे सभी जेवी/पार्टनरशिप मेंबर्स जीएसटी काउंसिल के राडार पर आ गए हैं.

    ‘रेलवे समाचार’ को पता चला है कि उपरोक्त तमाम प्रकार की धोखाधड़ी विगत में तमाम जेवी मेंबर्स एवं पार्टनरशिप फर्मों द्वारा की गई है और उनकी यह धोखाधड़ी वर्तमान में भी जारी है. इस तरह की धोखाधड़ी इन जेवी मेंबर्स एवं पार्टनरशिप फर्मों द्वारा टेंडर वर्क एक्जीक्यूशन के दौरान क्रेडेंशियल्स को मेनुपुलेट करने के लिए की जा रही है.

    जेवी फर्म की क्रेडेंशियल पर लिए जा रहे हैं टेंडर

    इस संबंध में पूर्व मेंबर इंजीनियरिंग, रेलवे बोर्ड एस. के. विज का कहना है कि यदि एल-1 के क्रेडेंशियल प्रॉपर नहीं हैं, तो उसे बाईपास करके एल-2 से एल-9 तक किसी को भी टेंडर दिया जा सकता है, जिसके क्रेडेंशियल संबंधित टेंडर की शर्तों को पूरा कर रहे हों. इसमें सीवीसी कहीं भी रोक नहीं लगाता है. श्री विज ने यहां एक और बात कही कि इस प्रकार से खरीदी गई क्रेडेंशियल्स के माध्यम से अयोग्य लोग इस क्षेत्र में आ रहे हैं, जो कि खरीदी गई क्रेडेंशियल पर कोई एक काम पूरा करके उसकी योग्यता पर अगली बार खुद टेंडर लेने का दावा कर देते हैं, जबकि उनकी कोई क्रेडेंशियल नहीं होती है, वे जिस क्रेडेंशियल पर टेंडर लेने का दावा करते हैं, वह वास्तव में जेवी फर्म की क्रेडेंशियल होती है, उनकी व्यक्तिगत नहीं. मगर फिर भी इस तरह भी टेंडर आवंटित किए जा रहे हों तो कोई आश्चर्य नहीं. उनका कहना है कि यह विषय अत्यंत गंभीर है और इस पर रेल प्रशासन को गंभीरतापूर्वक ध्यान देना चाहिए.

    व्यापक है क्रेडेंशियल की खरीद-फरोख्त वाली जेवी फर्मों का रोग

    प्राप्त जानकारी के अनुसार क्रेडेंशियल की खरीद-फरोख्त वाली जेवी फर्मों का रोग जोनल रेलों के सभी निर्माण संगठनों सहित राइट्स, रेलटेल, आरवीएनएल और डीएफसी के कार्यों में भी लगा हुआ है. इनकी बदौलत न सिर्फ तमाम प्रोजेक्ट अधूरे पड़े हुए हैं, तमाम अब तक पूरे नहीं हुए हैं, कई प्रोजेक्ट्स को अधूरा छोड़कर कांट्रेक्टर भाग गया हैं, बल्कि इनके कारण ही अब तक रेलवे और इसके उक्त पीएसयू’ज को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है.

    ‘रेलवे समाचार’ का मानना है कि यदि जेवी की वर्तमान व्यवस्था (नीति) को बदलकर उस एजेंसी को टेंडर की जिम्मेदारी दी जाए, जिसके क्रेडेंशियल वास्तव में इस्तेमाल होने वाले हैं, और उसे ही पूरे टेंडर वर्क के लिए जिम्मेदार-उत्तरदायी ठहराया जाए, तथा अन्य जेवी मेंबर, जिसकी वित्तीय लागत लगने वाली है, को समान उत्तरदायी बनाया जाए, तो शायद कुछ काम बन सकता है. या फिर जेवी का चलन ही सिरे से समाप्त कर दिया जाना चाहिए.

    करप्शन का कॉर्पोरेटाईजेशन

    इस मामले में ‘रेलवे समाचार’ का यह भी मानना है कि बड़ी फर्में ही सबसे ज्यादा डिफाल्टर होती हैं. बड़ी फर्मों के पास पर्याप्त फंड तो होता है, मगर क्रेडेंशियल नहीं होती है. ऐसे में वह किसी छोटी फर्म के साथ ज्वाइंट वेंचर (जेवी) तो कर लेती हैं, मगर रेलवे के कार्यों का उन्हें पर्याप्त अनुभव नहीं होने और एग्रीमेंट की शर्तों के अनुसार क्रेडेंशियल देने वाली फर्म का साइट पर सहयोग न मिलने के कारण वह टेंडर वर्क को सही ढ़ंग से संपादित नहीं कर पाती हैं और भाग खड़ी होती हैं.

    ऐसा ही एक कार्य टाटा समूह की एक फर्म द्वारा दक्षिण पश्चिम रेलवे में कोच मेंटेनेंस का जोनल वर्क किया जा रहा है. बताया गया है कि उसको दिए गए कार्य का उसे कोई पूर्व अनुभव नहीं है. परिणामस्वरूप उसे टेंडर आवंटित होने के 6-7 महीने बीत जाने के बावजूद अब तक सभी जगह वह काम की शुरुआत भी नहीं कर पाई है. ऐसे में इन कथित बड़ी फर्मों के रौब-दाब में आकर संबंधित अधिकारीगण क्रेडेंशियल देने वाली फर्म को ब्लैक-लिस्ट कर देने की धमकी देकर उसे काम पूरा करने के लिए मजबूर कर रहे हैं.

    इस संबंध में प्राप्त ताजा जानकारी के अनुसार आजकल रेलवे बोर्ड के एक कदाचारी मेंबर द्वारा उन कॉन्ट्रैक्टर्स पर ऐसे कार्यों को मात्र तीन-चार महीनों में पूरा करने का दबाव बनाया जा रहा है, जिनको टेंडर शर्तों के अनुसार कार्य पूरा करने का समय 12 महीने दिया गया है. जानकारों का कहना है कि इसके पीछे संबंधित मेंबर का उद्देश्य 25-50 करोड़ के टेंडर लेने वाले छोटे-छोटे कॉन्ट्रैक्टर्स को हटाकर बड़े कॉर्पोरेट घरानों को 200-300-500 करोड़ के बड़े-बड़े टेंडर जारी करना है.

    उल्लेखनीय है कि सितंबर महीने में रेलवे बोर्ड द्वारा जीएम/कोर की रिपोर्टिंग संबंधित मेंबर के मातहत किए जाने के ठीक अगले दिन ही उसने कोर की वेबसाइट पर पहले से अपलोड हो चुके तमाम टेंडर हटाने का मौखिक आदेश दे दिया था, मगर ‘रेलवे समाचार’ द्वारा अगले दिन 14 सितंबर को “जीएम/कोर की रिपोर्टिंग मिलते ही मेंबर ट्रैक्शन हुए सक्रिय” शीर्षक से उनके उक्त मुंह-जबानी आदेश को उजागर कर दिया गया था. इसके परिणामस्वरूप तब कोर की वेबसाइट से कोई टेंडर नहीं हटाया जा सका था.

    जानकारों का कहना है कि ‘ऊपर’ के आदेश से कदाचारी मेंबर आजकल बहुत सक्रिय हो रहे हैं और बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बड़े-बड़े टेंडर दिए जाने के ‘ऊपरी दबाव’ के चलते आजकल वह कॉन्ट्रैक्टर्स पर दादागीरी झाड़ रहे हैं, ब्लैकलिस्ट कर देने के लिए उन्हें धमका रहे हैं, और टेंडर टर्मिनेट कर देने की खुली धमकी दे रहे हैं. जानकारों का मानना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि प्रोजेक्ट्स की प्रोग्रेस रिपोर्ट देने का ऊपर से भारी दबाव है.

    यही पर जानकारों का यह भी कहना है कि पूर्व मेंबर इंजीनियरिंग वी. के. गुप्ता से लेकर अब तक लगभग सभी बोर्ड मेंबर्स ने पुराने पैमाने बदलकर फर्जी आंकड़े और फर्जी प्रोग्रेस रिपोर्ट्स दी हैं, जिनका खामियाजा आगे चलाकर रेल भवन की उक्त कुर्सियों पर बैठने वाले लोगों को भुगतना पड़ेगा.

    जानकारों का यह भी कहना है कि रेलवे बोर्ड की गलत नीति और नियोजन के कारण ही विकास और आधुनिकीकरण के नाम पर 23 स्टेशनों की ‘नीलामी’ संभव नहीं हो पाई. मगर अब रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन और बड़े-बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स की योजना बनाकर और उनके टेंडर आवंटित करके रेलवे को सिरे से लूटने की तैयारी की जा रही है. इसीलिए कदाचारी मेंबर द्वारा कुछ अपने लिए और कुछ अपने आकाओं के स्वार्थ साधन के लिए कुछ छोटे-मोटे कॉन्ट्रैक्टर्स को धमकाकर, कुछ को ब्लैकलिस्ट करके और कुछ को टर्मिनेट करके भगाने की नीति अपनाई जा रही है, जिससे बड़े कॉर्पोरेट घरानों को सैकड़ों करोड़ के बड़े-बड़े टेंडर देकर अपने सहित अपने ऊपर वालों के लिए भी मोटा कमीशन बनाने का अवसर मिल सके. इस तरह अब रेलवे में भी ‘करप्शन का कॉर्पोरेटाईजेशन’ किया जा रहा है. क्रमशः

    M/s. SUVIDHA ENGINEERS (PROJECT) Vs. THE DY CHIEF ENGINEER (CONST) & ORS

    IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI

    Order delivered on: 23rd May, 2016, ARB. P. No.71/2012


    V. K. SOOD ENGINEERS AND CONTRACTORS..... Petitioner
                         versus

    GENERAL MANAGER NORTHERN RAILWAY.... Respondent

    Reserved on: 13th November 2017
    Pronounced on: 20th November 2017, ARB.P. 456/2017

    1. The Petitioner M/s V.K. Sood Engineers & Contractors, a registered partnership firm with Mr. Puneet Kumar Sood and Vineet Kumar Sood as its Partners in the ratio of 99%:1% on 03.01.2012 was awarded the work of "Construction Of Road Bridges in lieu of Level Crossing No.52-C at Km. 75/6-7 at Garhmukteshwar on Moradabad - Ghaziabad Section over Moradabad Division" vide letter dated 03.01.2012. A contract agreement dated 30.03.2012 was executed between the parties.

    2. The stipulated date of start was 03.01.2012 and the stipulated date of completion was 02.01.2013. The contract value was of ₹6,97,64,729.01. The final date of completion of contract was 30.09.2016.

    3. It is alleged one another firm viz., M/S V.K. Sood Engineers & Contractors- DDS(JV) was awarded another work by the respondent which was satisfactorily completed but the respondent issued a recovery notice of Rs. 1.79 crores against the said sole partnership firm which notice was challenged before the competent Court and it obtained a stay order. Later the respondent intended to recover the said amount from the petitioner herein despite the submissions of the petitioner that it is a distinct entity from M/s V.K. Sood Engineers & Contractors DDS(JV). The respondent rather acted illegally and withheld 17th running bill of the petitioner. The petitioner filed OMP(I)(COMM) No. 242/2016 where to vide order dated 31.08.2016 the respondent was directed to release the payment within 4 weeks. The respondent filed an appeal FAO(OS) (COMM) 5/2017 but deposited Rs. 44,09,733 after deducting recoveries. The matter was remanded and was allowed by single judge vide order dated 17.07.2017.

    4. The petitioner then sent a legal notice dated 24.04.2017 for balance payment and/or to appoint arbitrator relying upon clause viz., 64(1)(i), which runs as under :

    "64(1)(i) - Demand for Arbitration-In the event of any dispute or difference between the parties hereto as to the construction or operation of this contract, or the respective rights and liabilities of the parties on any matter in question, dispute or difference on any account or as to the withholding by the Railway of any certificate to which the contractor may claim to be entitled to, or if the Railway fails to make a decision within 120 days, then and in any, such case, but except in any of the "excepted matters" referred to in Clause 63 of these conditions, the contractor, after 120 days but within 180 days of his presenting his final claim on disputed matters shall demand in writing that the dispute or difference be referred to arbitration."

    5. Learned counsel for the respondent relied upon para 6 of Annexure K2 and para 2.5.1 of the conditions of contract to say there is no privity of contract between the parties as the contract was entered into by the respondent with the partnership firm wherein Puneet Kumar Sood and Vineet Kumar Sood were partners but later on 01.04.2014 without prior permission of the respondent, the constitution of the partnership firm was changed and Mr Pramod Kumar Bhatia was taken as a partner as Mr Vineet had left the partnership firm. This was in violation of the terms of the contract reproduced herein below.

    "Para 6 of Annexure K-2: Once the tender has been submitted, the constitution of the firm shall not be allowed to be modified/ altered /terminated during the validity of the tender as well as the currency of the contract except when modification becomes inevitable due to succession law etc. In which case prior permission should be taken from Railway and in any case, the minimum eligibility criteria should not get vitiated. The reconstitution of the firm in such cases should be followed by notary certified Supplementary Deed. The approval of a change of constitution of the firm, in any case, shall be at the sole discretion of Railway and the tenderer shall have no claims whatsoever. Any change in the constitution of the Partnership Firm after the opening of tender shall be with the consent of all the partners and with the signature of all partners as that in Partnership Deed. Failure to observe this requirement shall render the offer invalid and full EMD shall be forfeited. If any partners withdraw from the firm after the opening of tender and before the award of tender, the offer shall be rejected. If any new partner joins the firm after the opening of tender but prior to award of the contract, his/her credentials shall not qualify for consideration towards eligibility criteria either individually or in proportion to his share in the previous firm. In case the tenderer fails to inform Railway beforehand about any such changes/modifications in the constitution which is inevitable due to succession law etc. and the contract is awarded to such firm, then it will be considered a breach of contract conditions, liable for determination of contract under Clause 62 of General Conditions of Contract.

    Para 2.5.1: The Railway will not be bound by any power of attorney granted by tenderer/s or by changing's in the composition of the firm made subsequent to the execution of the contract. The Railway may, however, recognized such power of attorney and change after obtaining proper legal advice cost of which shall be chargeable to the contractor.

    6. Learned counsel for the respondent alleged the petitioner was not entitled to change the constitution of its firm except with the prior permission of the respondent and that too only on a condition of succession etc., and not otherwise. However, the learned counsel for the petitioner referred to two letters dated 2.05.2014 and of dated 5.05.2014 whereby the petitioner had intimated the respondent qua the change in its constitution. Though the letter dated 02.05.2014 is denied by the respondent but it cannot deny letter dated 05.05.2014 as had replied to it. It is alleged by the petitioner despite those letters being sent to the respondent, the respondent did not object or terminate the contract but rather allowed the petitioner to complete the substantial work thereafter and hence now cannot allege it had no privity of contract with the petitioner.

    7. The learned counsel for the respondent also raised a plea of limitation in reference to clause 64(1)(i) stating inter alia the petitioner did not approach the respondent within the period prescribed. The learned counsel for the petitioner submits the law is settled qua reduction of the period of limitation by any term of the contract, being void to such an extent, per Section 28 of the Indian Contract Act. However, I need not go into such details as the learned counsel for the respondent says she would have no objection to the appointment of an arbitrator, provided the following issues viz (a) privity of contract between the parties and (b) of limitation are left open; hence such issues are left open to be determined by the arbitrator.

    8. In the circumstances, Sh. B.S. Mathur, Retired ADJ (Mobile No.9873724057) is hereby appointed as a sole arbitrator to adjudicate the disputes between the parties. The fee of the arbitrator shall be in accordance with the fee schedule of the Delhi International Arbitration Centre, High Court of Delhi, New Delhi.

सम्पादकीय