क्या रेल प्रशासन सो रहा है? पटना कैट का सवाल

    अवमानना मामले में सीआरबी/सेक्रेटरी के साथ अब रेलमंत्री को भी पार्टी बनाया जाए

    अवमानना मामले में अदालत का बड़ा फैसला, प्रमोटियों का अब नहीं होगा प्रमोशन

    यूपीएससी से चयनित ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों को जानबूझकर डिमोट किया गया

    निरस्त सीनियरटी लिस्ट से प्रमोटी अधिकारियों को दी गई जेएजी में पदोन्नति

    पीसीपीओ/पू.म.रे. की लापरवाही से पैदा हुआ अधिकारियों की पदोन्नति का संकट

    प्रमोटी डिप्टी सीपीओ/पू.म.रे. ने जानबूझकर बदलकर प्रस्तुत किया कैट का आदेश

    सुरेश त्रिपाठी

    भारतीय रेल में हुए करोड़ों-अरबों रुपये के ‘अधिकारी पदोन्नति घोटाले’ में पटना कैट के समक्ष चल रहे अवमानना के मामले में गुरूवार, 16 नवंबर को अदालत में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच गरमागरम बहस हुई. इसके अलावा अदालत को वादी का पूरा पक्ष सुनना पड़ा और उसके द्वारा प्रस्तुत सप्लीमेंट्री पेटीशन को भी स्वीकार करना पड़ा. इसके साथ ही अदालत को वादी के वकील का यह कहना भी मानना पड़ा कि जब इस ट्रिब्यूनल ने भारतीय रेल स्थापना नियमावली में बदलाव किए बिना किसी भी प्रमोटी अधिकारी को पदोन्नति नहीं दिए जाने का आदेश दिया था, तब रेल प्रशासन उसके आदेश का उल्लंघन करके ऐसा कैसे कर रहा है? वादी ने सप्लीमेंट्री पेटीशन में तत्संबंधी तमाम तथ्य सप्रमाण अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए. वास्तव में रेलवे बोर्ड द्वारा गुरूवार को अदालत के समक्ष ‘कंप्लायंस रिपोर्ट’ प्रस्तुत करना था अथवा सीआरबी एवं सेक्रेटरी/रे.बो. की व्यक्तिगत उपस्थिति पर निर्णय होना था, जिसका आदेश पिछली तारीख में दिया गया था, परंतु बेंच बदलने अथवा आतंरिक अदालती कारणों से उक्त दोनों मुद्दे दरकिनार हो गए.

    वादी के वकील एम. पी. दीक्षित ने अदालत से कहा कि इस ट्रिब्यूनल ने जिस सीनियरिटी लिस्ट को अपने 3 मई 2016 के आदेश से निरस्त/खारिज कर दिया था, उसी लिस्ट से प्रतिवादियों (सीआरबी एवं सेक्रेटरी/रे.बो.) द्वारा ग्रुप ‘ए’ सीधी भर्ती अधिकारियों को दरकिनार करते हुए तीन प्रमोटी अधिकारियों - पूर्व रेलवे के सत्येंद्र चौधरी, चंचल अधिकारी एवं दक्षिण रेलवे के एन. सुधीर कुमार - को जेएजी में पदोन्नत कर दिया गया है. इस पर रेलवे की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुंदजी ने कहा कि यह स्थाई नहीं, बल्कि तदर्थ (एडहाक) प्रमोशन है. उन्होंने यह भी कहा कि जहां तक वादी की बात है, तो उसे छोड़ा नहीं गया है, बल्कि उसको भी एडहाक पदोन्नति दी गई है. यहां कोई नासमझ आदमी भी यह बखूबी समझ सकता है कि रेलवे बोर्ड द्वारा न सिर्फ तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है, बल्कि रेलवे बोर्ड द्वारा अपने गलत एवं बदनीयतीपूर्ण निर्णयों और अदालत के आदेश को दरकिनार करके तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते हुए अदालत को गुमराह किया जा रहा है.

    दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने वादी के वकील एम. पी. दीक्षित की दलील को मानते हुए स्पष्ट रूप से स्वीकार किया और अपने लिखित आदेश में कहा कि ‘ओ. ए. नं. 460/2015 के अंतर्गत दि. 03.05.1016 को इस ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए आदेश का व्यापक संदर्भ (जनरल एप्लीकेशन) है. अतः अदालत इस बात को पूरी तरह स्पष्ट करती है कि संदर्भित सीनियरिटी लिस्ट से सीधी भर्ती ग्रुप ‘ए’ अधिकारी को दरकिनार करके किसी भी प्रमोटी अधिकारी, यहां तक कि एडहाक भी, को तब तक कोई प्रमोशन नहीं किया जा सकता है, जब तक कि डीओपीटी की सलाह से पालिसी सुनिश्चित नहीं कर ली जाती है, अन्यथा यह इस ट्रिब्यूनल के आदेश का उल्लंघन होगा, जो कि अदालत की अवमानना माना जाएगा.’ अदालत के इस आदेश से अब यह स्पष्ट संदेश मिल गया है कि रेलवे के किसी भी विभाग के किसी भी प्रमोटी अधिकारी को फिलहाल कोई प्रमोशन नहीं मिल पाएगा. यहां भी रेलवे की तरफ से अभी यही कहने की कोशिश की जा रही थी कि सिर्फ एसएंडटी में.., तब तक अदालत ने कहा कि ‘सभी विभागों पर यह आदेश लागू होता है.’

    उल्लेखनीय है कि इस अवमानना मामले के ही एक अंतरिम आदेश में अदालत ने किसी भी प्रमोटी अधिकारी को बिना भारतीय रेल स्थापना नियमावली (आईआरईएम) में बदलाव किए प्रमोशन देने से प्रतिबंधित किया था और रेलवे के पैनलिस्ट वकील एस. के. रवि ने भी सेक्रेटरी/रे.बो. को एक पत्र (यहां नीचे देखें वह पत्र) लिखकर पूर्व मध्य रेलवे के प्रिंसिपल सीपीओ (पीसीपीओ) को भी अदालत के इस आदेश से अवगत करा दिया था. यह पत्र सेक्रेटरी रेलवे बोर्ड को भी फैक्स किया गया था. इस पत्र में उन्होंने पीसीपीओ को स्पष्ट बताया है कि प्रमोटी अधिकारियों को जेएजी में प्रमोशन नहीं देना है. इसके अलावा डीजीएम/लॉ/पू.म.रे. ने भी दि. 07.11.2017 के अपने नोट में स्पष्ट कर दिया था कि प्रमोटी अधिकारियों को जेएजी में एडहाक प्रमोशन बिना आईआरईएम में बदलाव किए नहीं दिया जाना है. परंतु जब यह नोटिंग ‘प्रमोटी’ डिप्टी सीपीओ/गजटेड/हाजीपुर, पू.म.रे. मुख्यालय के पास पहुंची, तो इन महाशय ने अदालत के आदेश को ट्विस्ट करके उसमें अपनी तरफ से एक लाइन यह भी जोड़ दी कि यूपीएससी से सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों को भी प्रमोशन नहीं दिया जाना है.

    इसके बावजूद पीसीपीओ/पू.म.रे. और रेलवे के वकील ने डीजीएम/लॉ की नोटिंग को दरकिनार करते हुए अदालत के साथ दगाबाजी और प्रमोटियों की खैरख्वाही करने वाले इस ‘प्रमोटी डिप्टी सीपीओ/गजटेड’ की खुराफात को हरी झंडी दे दी. इससे जेएजी में पद रिक्त होने के बाद भी एसएंडटी विभाग के सीधी भर्ती वाले वर्ष 2009 और 2010 बैच के ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की पदोन्नति रुक गई. ऐसा ही भेदभाव आईआरएसईई के वर्ष 2008 बैच के अधिकारियों के साथ भी किया जा रहा है. अर्थात जेएजी में रिक्त पद होने के बावजूद आईआरएसईई को प्रोमोशन नहीं दिया जा रहा है. यह अदालत के आदेश का खुला उल्लंघन है.

    हद तो तब हो गई, जब एक सीधी भर्ती आईआरटीएस आधिकारी अखिलेश कुमार पांडेय, जो कि पूर्व रेलवे में जेएजी (एडहाक) में कार्यरत थे और ट्रांसफर के बाद कुछ महीनों पहले पूर्व मध्य रेलवे में आए थे तथा उन्हें जल्दी ही कंफर्म जेएजी दिया जाना था. तथापि, उन्हें पू.म.रे. में आने पर जेएजी में स्पष्ट रिक्ति होने के बावजूद डिमोट करके सोनपुर डिवीजन में डीसीएम बना दिया गया. इससे जाहिर है कि एक ‘प्रमोटी’ डिप्टी सीपीओ/गजटेड, पीसीपीओ/पू.म.रे. सहित पूरे रेल प्रशासन को अपने इशारे पर नचा रहा है और इसमें सीधी भर्ती से आए युवा ग्रुप ‘ए’ अधिकारी पिस रहे हैं. रेलवे बोर्ड को इस बात का पर्याप्त संज्ञान लेकर इस खुराफाती प्रमोटी डिप्टी सीपीओ/गजटेड सहित पीसीपीओ/पू.म.रे. की भी जिम्मेदारी तय करते हुए समुचित विभागीय कार्रवाई करनी चाहिए.

    यहां पुनः उल्लेखनीय है कि अदालत ने अपने आदेश में आईआरईएम में बदलाव किए बिना किसी भी प्रमोटी अधिकारी को प्रमोशन दिए जाने से स्पष्ट मना किया था. गुरूवार, 16 नवंबर की सुनवाई के दौरान कैट/पटना ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इस ट्रिब्यूनल द्वारा आदेश दिए जाने के बाद 18 महीने बीत गए हैं और हाई कोर्ट, पटना के आदेश को भी 6 महीने से ज्यादा हो गए हैं, जबकि एसएलपी में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्टे नहीं दिया है, तो क्या रेल प्रशासन सो रहा है? इस पर रेलवे के वकील ने अदालत के समक्ष कहा कि रेलवे बोर्ड ने इस मामले को डीओपीटी को अग्रसारित कर दिया है. इस पर मामला वास्तव में डीओपीटी को किस तारीख में भेजा गया है, यह देखने/जानने के लिए अदालत ने रेलवे के वकील से उक्त संदर्भ पत्र अदालत के सामने प्रस्तुत करने को कहा.

    इस पर रेलवे के वकील बगलें झांकने लगे और अंततः अपनी अभिज्ञता जता दी. तब अदालत ने कड़े लहजे में कहा कि ‘यदि रेल प्रशासन इसी तरह अदालत को गुमराह करता रहा, तो वर्तमान सीआरबी और सेक्रेटरी/रे.बो. दोनों को ‘पर्सनल हियरिंग’ के साथ दो दिन तक यहां अदालत के कटघरे में खड़ा कर दिया जायगा.’ इस पर रेलवे के वकील की अनुनय-विनय के बाद शांत होते हुए अदालत ने कहा कि ‘उन्हें यह अंतिम मौका दिया जा रहा है और वह अपने मुअक्किलों को सख्ती से इस बारे में सूचित करें कि यदि चार हप्तों के अंदर आईआरईएम में बदलाव करके आदेश पर अमल किए जाने की ‘कंप्लायंस रिपोर्ट’ अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई, तो अदालत इस पर अत्यंत कठोर कदम उठाने को मजबूर होगी.’ मामले की अगली सुनवाई 21 दिसंबर 2017 को होगी.

    इस मामले में 16 नवंबर की तारीख में सेक्रेटरी रेलवे बोर्ड ने अपना हलफनामा दाखिल करके अदालत से बिना शर्त माफी मांगते हुए कहा है कि अदालत के आदेश पर सलाह के लिए मामला डीओपीटी को भेजा गया है. परंतु रेलवे बोर्ड के विश्वसनीय सूत्रों ने ‘रेलवे समाचार’ को बताया कि यह सही है कि रेलमंत्री ने करीब दो सप्ताह पहले यह मामला डीओपीटी को भेजे जाने की बात फाइल पर रिकॉर्ड की थी, मगर वास्तव में उक्त फाइल अब तक डीओपीटी को नहीं भेजी गई है, सेक्रेटरी/रे.बो. ने अदालत को दिए हलफनामे में झूठा बयान दिया है.

    सूत्रों का कहना है कि इस मामले को रेलवे बोर्ड के कुछ दुष्ट अधिकारी अब तक इसलिए दबाए बैठे हैं, जिससे कि सीआरबी और सेक्रेटरी/रे.बो. की अदालत में फजीहत हो. सूत्रों का यह भी कहना है कि ‘पूर्व एवं वर्तमान सीआरबी दोनों ने फाइल पर इस मामले में कैट/पटना के आदेश, जिसे पटना हाई कोर्ट ने भी माना है, को लागू करने की संस्तुति पहले ही दे दी है, परंतु सत्ता के दलालों के दबाव में रेलमंत्री इसे डीओपीटी इसलिए भेजना चाहते हैं, जिससे कि इसमें ज्यादा से ज्यादा देरी की जा सके और इस देरी का लाभ प्रमोटी अधिकारियों को दिया जा सके. इसीलिए बार-बार अदालत को गुमराह किया जा रहा है.’

    इस संदर्भ में रेलवे बोर्ड के सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि कैट/पटना का उक्त आदेश डीओपीटी के दिशा-निर्देश (ओ.एम.) पर ही आधारित है और जब उसके आधार पर ही कैट/पटना एवं पटना हाई कोर्ट ने पदोन्नतियों में घोटाले को मानकर अपना निर्णय दिया है, तथा रेलवे बोर्ड इससे पहले इस मामले में कानून मंत्रालय की राय भी ले चुका है, तब इस मामले को डीओपीटी की ओपिनियन के लिए भेजने का क्या औचित्य रह गया है? इससे साफ जाहिर है कि मामले को लटकाने के लिए सत्ता के दलालों के दबाव में डीओपीटी को भेजा जा रहा है.

    सूत्रों का यह भी कहना है कि सीआरबी का भी यही मानना है कि जब डीओपीटी का ही नियम लागू करना है, तो उसे मामला भेजे जाने की क्या जरूरत है. इसीलिए उन्होंने लीगल डिपार्टमेंट से राय लेकर ही संस्तुति के लिए उक्त फाइल रेलमंत्री के पास भेजी थी. सूत्रों का कहना है कि लीगल डिपार्टमेंट ने अपनी ओपिनियन में कहा है कि अदालत का आदेश एकदम स्पष्ट है, इसमें कहीं कोई विसंगति, गड़बड़ी, उलझन अथवा विभ्रम की स्थिति नहीं है.

    इसके अलावा सूत्रों का यह भी कहना है कि जब रेलमंत्री ने फाइल पर लिख दिया है कि डीओपीटी की ओपिनियन ले ली जाए, तब उक्त फाइल अब तक उसे क्यों नहीं भेजी गई है? जबकि डीओपीटी सूत्रों का कहना है कि पहली नजर में मामले को यहां भेजे जाने की कोई जरूरत नहीं है और यदि रेल मंत्रालय इसे भेजता भी है, तो वह एक हप्ते के अंदर मामले पर अपना पक्ष रेल मंत्रालय को भेज देंगे. डीओपीटी सूत्रों का यह भी कहना है कि डीओपीटी की ही यह गाइड लाइन है कि यदि उसके किसी निर्देश पर किसी मंत्रालय या अदालत की अलग राय है, तभी कोई मामला उसकी ओपिनियन के लिए उसके पास भेजा जाना चाहिए, अन्यथा उसके निर्देश के आलोक में अदालत के आदेश को लागू करने की जिम्मेदारी संबंधित मंत्रालय की ही है.

    सूत्रों का कहना है कि इन तमाम तथ्यों के प्रकाश में स्पष्ट रूप से यह जाहिर हो रहा है कि रेलमंत्री पर सत्ता के दलालों का दबाव है, इसीलिए वह मामले को लटकाने के दृष्टिकोण से इसे डीओपीटी को भेजना चाहते हैं. उनका यह भी मानना है कि इस सब में सीआरबी और सेक्रेटरी/रे.बो. की बुरी तरह से फजीहत हो रही है. ऐसे में यदि अदालत ने अपने कठोर रवैये पर अमल किया, तो इन्हीं दोनों को जेल जाना पड़ेगा, रेलमंत्री का कुछ नहीं बिगड़ेगा, वह तो कह देंगे कि जब नियम-निर्देश स्पष्ट थे, तो सीआरबी और सेक्रेटरी को अदालत का आदेश लागू कर देना चाहिए था.

    इस मामले में ‘रेलवे समाचार’ ने कई वरिष्ठ रेल अधिकारियों से भी उनकी राय ली है. इन अधिकारियों का मानना है कि इस स्थिति में अब रेलमंत्री को भी अदालत की अवमानना के मामले में पार्टी बनाया जाना चाहिए, तभी सीआरबी एवं सेक्रेटरी के साथ ही मंत्री की भी जवाबदेही अदालत द्वारा तय की जा सकती है. उनका कहना है कि रेलमंत्री को भी चाहिए कि वह रेलवे बोर्ड के संबंधित अधिकारियों से दरयाफ्त करें कि उनकी संस्तुति के बाद अब तक उक्त फाइल डीओपीटी को क्यों नहीं भेजी गई है? क्योंकि ऐसा लगता है कि इस मामले में रेलवे के संबंधित अधिकारी सीआरबी एवं सेक्रेटरी सहित मंत्री की भी फजीहत करवाने पर तुले हुए हैं.

    यहां पाठकों की सुविधा और पूरे मामले को अच्छी तरह से समझने के लिए वादी आर. के. कुशवाहा द्वारा अदालत के समक्ष 16 नवंबर को फाइल की गई सप्लीमेंट्री पेटीशन भी प्रस्तुत है-

    THE CENTRAL ADMINISTRATIVE TRIBUNAL, PATNA BENCH : AT PATNA
    CCPA NO. 70 OF 2017, (IN OA NO.460 of 2015)

    R. K. KUSHWAHA  ...APPLICANT   VERSUS   A. K. MITTAL & OTHERS ...RESPONDENTS

    SUBJECT: SUPPLEMENTARY PETITION

    Dated 11.12.2014, 16.03.2016, 18.05.2017, 04.08.2017, 26.09.2017, 30.10.2017, 06.11.2017, 02.11.2017, 07.11.2017, 08.11.2017 and 14.11.2017

    1. That the instant CCPA has been filed against non-compliance to the order passed by this Tribunal as contained in Annexure C/1 which has been upheld by the Hon’ble High Court, Patna against which the private respondents have filed SLP before Hon’ble Supreme Court of India but no stay has been granted. In this regard it is very relevant to submit here that the alleged contemnors including Railway administration have neither filed any Writ before the Hon’ble High Court, Patna nor any SLP before Hon’ble Supreme Court of India, therefore they are duty bound to implement the order of this Tribunal passed in OA No.460 of 2015.

    2. That this Hon’ble Tribunal has been pleased to quash and set aside the seniority list dated 12.12.2014 issued in favour of the Promotee officers in the said OA No.460 of 2015 but inspite of the above the Zonal Railway has granted promotions in favour of the promotee officers on the basis of same seniority list which has already been quashed which can be seen from the order of promotion dated 26.09.2017 in favour of promote officers namely Sri Satyendra Chaudhary and Chanchal Adhikari whose names are at serial No.53 and 54 of the seniority list dated 12.12.2014, thus it is clear case of willful violation of the order passed by this Tribunal.

    3. That after knowing the said facts, this Hon’ble Tribunal has been pleased to take it very seriously and that being the reason one order has been passed on 02.11.2017 directing the Railway Board to explain "why the order passed by this Tribunal and upheld by the Hon’ble High Court is still not complied with. Let the compliance report be furnished by 15 days as no stay has been granted by the Hon’ble Supreme Court in the SLP."

    4. That recently another promote officer of 2013-14 batch namely Sri N. Sudhir Kumar has also been promoted in the Junior Administrative Grade vide order dated 30.10.2017 under Southern Railway, how when the seniority list of promotes has already been quashed?

    5. That apart from the above, it is further submitted that this Hon’ble Tribunal earlier on 04.08.2017 has also taken such type of contemptuous acts of respondents seriously in the case of another Group-A Direct Recruit namely Sri Goverdhan Kumar in which also this Tribunal has been pleased to direct the Respondents to act on the basis of the order passed in OA No.460 of 2015 upheld by Hon’ble High Court, Patna. This Hon’ble Tribunal further observed that "Mr Ravi is impressed to advise his client to act in accordance with law when the order of this Tribunal has been upheld by the Hon’ble High Court that the relevant rules and promotions have been quashed."

    6. That it is very relevant to submit here that the after the aforesaid orders as contained in Annexure P/3 and P/6 passed by this Tribunal, Mr S. K. Ravi, learned Counsel for the alleged contemnors has sent one letter dated 06.11.2017 for ensuring compliance to the order passed by this Hon’ble Tribunal in OA No.460 of 2015 which can be seen from the note of Law officer dated 07.11.2017.

    7. That it is very relevant to submit here that one Direct Recruit Group-A officer of 2009 Batch namely Sri Akhilesh Kumar Pandey has got promotion to the post of Senior Divisional Safety Officer in Junior Administrative Officer in short JAG on Ad-Hoc in Eastern Railway vide order dated 18.05.2017 who came in East Central Railway on 18.10.2017 on the same capacity of JAG and 04 regular posts of JAG in Traffic/Commercial department are also vacant here but instead of granting him regular promotion in JAG, the Principal Chief Personnel Officer, East Central Railway, namely Sri Shailendra Kumar has approved the proposal on 08.11.2017 placed by Dy. CPO (Gazetted) wherein the said Principal CPO has pass order that "The judgment delivered by the Hon’ble CAT in the aforesaid case has not attained finality as it is pending in the Apex Court. Thus it is clear that promotion of Group-A either DR or Promotee cannot be given at present." and that being the reason the said Principal CPO has issued an order on 14.11.2017 demoting/reverting said Sri Akhilesh Kumar Pandey from the post of JAG to Senior Scale i.e from the post of Sr DSO to DCM which is a serious contempt and such misdeeds of the administration is totally contemptuous in view of the order of this Hon’ble Tribunal passed in OA No.460 of 2015 and also on 04.08.2017 and 02.11.2017 passed in CCPA No. 70 of 2017.

    8. That it is submitted that once this Tribunal has not restrained the promotion of Group-A Direct Recruitees in the cadre of JAG, then how the Principal CPO has restrained which clear case of contempt in view of order dated 02.11.2017.

    It is, therefore, prayed that your Lordships may graciously be pleased to initiate contempt proceeding against all contemnors including present Chairman, Railway Board, New-Delhi and Principal CPO/ECR, Hajipur in the ends of justice, equity and to secure the majesty of the law.

सम्पादकीय