रेलवे बोर्ड को भारी पड़ सकती है कोर्ट की अवमानना

    रेलमंत्री पर दबाव के चलते नहीं हो रहा है अदालत के निर्णय पर अमल

    पहले सुरेश प्रभु थे और अब पीयूष गोयल हैं, सत्ता के दलालों के दबाव में?

    सीआरबी एवं सेक्रेटरी/रे.बो. पर लटक रही है व्यक्तिगत फजीहत की तलवार

    सुरेश त्रिपाठी

    भारतीय रेल में ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों की पदोन्नति में हुए करोड़ों-अरबों रुपये के घोटाले पर आर. के. कुशवाहा बनाम भारत सरकार (द्वारा सीआरबी एवं सेक्रेटरी/रे.बो.) के मामले में कैट/पटना द्वारा दिए गए निर्णय पर पटना हाई कोर्ट ने भी 12 मई 2017 को अपनी अंतिम मोहर लगा दी थी. पटना हाई कोर्ट के उक्त निर्णय पर आज तक रेलवे बोर्ड ने कोई अमल नहीं किया है. इस पर केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) पटना में श्री कुशवाहा द्वारा दायर किया गया अदालत की अवमानना का मामला चेयरमैन, रेलवे बोर्ड (सीआरबी) एवं सेक्रेटरी, रेलवे बोर्ड के गले की फांस बनता जा रहा है. पिछली तारीख में भी अदालत ने उसके निर्णय पर अमल नहीं किए जाने के लिए सख्त नाराजगी जताई थी. अब यदि रेलवे बोर्ड ने फिर भी उक्त निर्णय पर अमल की ‘कंप्लायंस रिपोर्ट’ दाखिल नहीं की, तो सीआरबी एवं सेक्रेटरी/रे.बो. को गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है.

    कैट/पटना में उपरोक्त निर्णय को लागू नहीं किए जाने के विरुद्ध श्री कुशवाहा द्वारा दायर अदालत की अवमानना के मामले में अदालत बहुत सख्त हो गई है. उल्लेखनीय है कि पिछली 29 अक्टूबर की तारीख में अदालत ने सीआरबी और सेक्रेटरी/रे.बो. को तत्काल हाजिर होने का आदेश दिया था. तब रेलवे बोर्ड की तरफ से कोर्ट में उपस्थित वकीलों और अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए थे. किसी तरह कोर्ट को राजी करके अगली तारीख में समुचित कार्रवाई के साथ उपस्थित होने के आश्वासन के बाद मामले को टाला जा सका था. अब 2 नवंबर की तारीख में भी रेलवे बोर्ड की तरफ से पुनः कोई उचित कार्रवाई अथवा निर्णय पर पुख्ता अमल के साथ हाजिर न होने पर कोर्ट ने अपना रुख और कड़ा कर दिया है. कोर्ट ने यहां तक कहा कि यदि अगली तारीख, यानि 16 नवंबर को, तक निर्णय पर पुख्ता अमल की ‘कंप्लायंस रिपोर्ट’ अदालत में दाखिल नहीं की गई, तो सीआरबी और सेक्रेटरी/रे.बो. दोनों को दो दिन तक कोर्ट के अंदर खड़ा किया जाएगा. कोर्ट ने 2 नवंबर को जब यह बात कही थी, तब वहां पूर्व मध्य रेलवे के सीपीओ, डीजीएम/लॉ और डीआरएम एवं सीनियर डीपीओ/सोनपुर भी उपस्थित थे, जो कि किसी अन्य मामले में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज कराने आए थे.

    अवमानना याचिका दायर करने वाले आर. के. कुशवाहा के विद्वान वकील एम. पी. दीक्षित द्वारा अदालत के सामने जब यह तथ्य लाया गया कि कैट एवं पटना हाई कोर्ट के निर्णय और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थगनादेश नहीं दिए जाने तथा यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले को अब तक एडमिट भी नहीं किए जाने के बावजूद रेलवे बोर्ड लगातार ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को अवैध रूप से पदोन्नति दे रहा है. इस पर अदालत ने गहरी नाराजगी जताते हुए सख्त लहजे में कहा कि रेलवे बोर्ड को इस बात को भी अपने जवाब में स्पष्ट करना होगा. अदालत ने कहा कि ‘यदि निर्णय पर अमल किए जाने की ‘कंप्लायंस रिपोर्ट’ अगली तारीख (16 नवंबर) को कोर्ट के समक्ष दाखिल नहीं की जाती है, तो सीआरबी एवं सेक्रेटरी/रे.बो. को व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा.’ अदालत ने कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए अपने आदेश में यह भी कहा है कि ‘चार हप्ते में इसका लिखित जवाब दाखिल किया जाए कि इस ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए निर्णय पर अमल क्यों नहीं किया गया है?’ इसके साथ ही अदालत ने आदेश में यह भी कहा है कि ‘रेलवे बोर्ड अपने जवाब में इस बात का भी स्पष्टीकरण दे कि इस ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए आदेश, जिसे माननीय हाई कोर्ट ने भी माना है, पर अब तक अमल क्यों नहीं किया गया? रेलवे बोर्ड 15 दिन में अदालत के समक्ष ‘कंप्लायंस रिपोर्ट’ दाखिल करे, क्योंकि एसएलपी पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई भी स्टे नहीं दिया है.’

    ज्ञातव्य है कि हाई कोर्ट के उक्त निर्णय को प्रभात रंजन सिंह, महासचिव, पदोन्नत अधिकारी संघ, पूर्व मध्य रेलवे द्वारा एक एसएलपी (नं. 22444/2017) दायर करके सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. तथापि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा विगत दो तारीखों में उक्त एसएलपी पर न तो पटना हाई कोर्ट के निर्णय पर कोई स्थगनादेश दिया गया है और न ही अब तक उसे एडमिट किया गया है. अब विगत 3 नवंबर की तारीख में सुप्रीम कोर्ट ने 10 सप्ताह का समय देते हुए सभी पक्षों को अपना लिखित पक्ष कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया था.

    उधर सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में दायर एसएलपी (नं. 22444/2017) पर 3 नवंबर की तारीख को बिना कोई सुनवाई किए 10 हप्तों का समय देते हुए सभी संबंधित पक्षों से अपना लिखित जवाब दाखिल करने को कहा है. उल्लेखनीय है कि रेलवे बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में अब तक कोई जवाब दाखिल नहीं किया है, और जैसे हालात दिख रहे हैं, उससे जाहिर है कि रेलवे बोर्ड को अदालत में अपना जवाब दाखिल करने में भी कोई रुचि नहीं है. इसका तात्पर्य यह लगाया जा रहा है कि रेलवे बोर्ड भी यह मानता है कि पटना कैट एवं पटना हाई कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय वाजिब है, मगर उसकी मजबूरी यह है कि कुछ दलाल टाइप पदाधिकारियों की कुटिल कोशिशों के चलते रेलमंत्री पर उक्त वाजिब निर्णय को लागू करने में हरसंभव देरी करने के लिए केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों का दबाव बताया जा रहा है.

    इसके अलावा यह भी ज्ञातव्य है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उक्त एसएलपी को ऐसे दिनों में सुनवाई के लिए रखा जा रहा है, जिन दिनों में या तो मामले को सिरे से खारिज कर दिया जाता है, अथवा एडमिट करने की अनुमति दी जाती है. इस तथ्य से भी रेलवे बोर्ड वाकिफ है. इसीलिए ऐसा लगता है कि रेलवे बोर्ड भी यही चाहता है कि सुप्रीम कोर्ट ही कोई अंतिम निर्णय दे दे अथवा मामले को खारिज कर दे, तो उसे मंत्री को समझाने और पटना कैट एवं पटना हाई कोर्ट के निर्णय पर अमल करने में उसे आसानी हो जाएगी. तथापि, कैट पटना के समक्ष चल रहे अवमानना के मामले में सीआरबी एवं सेक्रेटरी/रे.बो. पर व्यक्तिगत उपस्थिति और फजीहत की तलवार लटक रही है, जिसका निर्णय भी जल्दी ही हो जाएगा.

सम्पादकीय