गैर-जिम्मेदारी और उत्तरदायित्वविहीनता का सर्वोत्तम उदाहरण हैं रेलवे अस्पताल

    पूर्व मध्य रेलवे : डॉक्टरों की लापरवाही से रेलकर्मी की बेटी की असमय मौत

    धनबाद रेलवे अस्पताल ने यात्री को परिचितों के भरोसे मौत के मुंह में ढ़केला

    रेलवे डॉक्टरों/स्टाफ की हद दर्जे की अमानवीयता के परिचायक हैं दोनों मामले

    पटना : रेलवे अस्पतालों में डॉक्टरों और अस्पताल स्टाफ की लापरवाही से आए दिन किसी न किसी रेलकर्मी अथवा उनके परिजनों की असमय मौत होती रहती है. इस तरह जहां भारतीय रेल समपारों पर, रेल पटरियों के आरपार बने अवैध रास्तों पर, प्लेटफार्म से पटरियां लांघने पर, दुर्घटनाओं के जरिये और मेल/एक्स. एवं लोकल ट्रेनों से गिराकर भारत की जनसंख्या को कम करने में अपना महती योगदान दे रही है, वहीं रेलवे अस्पतालों में रेलकर्मियों और उनके परिजनों को भी असमय मौत के घाट पर पहुंचाकर इसमें पर्याप्त इजाफा कर रही है. तथापि, रेल प्रशासन रेलवे के डॉक्टरों और अस्पताल स्टाफ की इन लापरवाहियों के खिलाफ उनकी कोई जिम्मेदारी या उत्तरदायित्व सुनिश्चित नहीं करता है, जिससे उनमें रेलवे अस्पतालों में हो रही इन असामयिक मौतों के प्रति किसी प्रकार की जिम्मेदारी अथवा उत्तरदायित्व का बोध नहीं रह गया है.

    प्राप्त जानकारी के अनुसार मंगलवार, 7 नवंबर को ईस्ट सेंट्रल रेलवे कर्मचारी यूनियन (ईसीआरकेयू) की मुख्यालय शाखा के अध्यक्ष दीनानाथ प्रसाद (चीफ ओएस, एसएंडटी, सीएसटीई ऑफिस, हाजीपुर) की बेटी का पेट की पथरी का आपरेशन पटना स्थित तथाकथित सुपरस्पेशलिटी केंद्रीय रेलवे हॉस्पिटल में हुआ था, लेकिन उसी दिन शाम को उनकी बेटी की अचानक हालत खराब हो गई. इस दौरान रेलवे अस्पताल में करीब दो घंटे तक कोई सीनियर डॉक्टर उपलब्ध नहीं था, जिसके चलते उनकी बेटी की असमय मृत्यु हो गई. इसके विरोध में शनिवार, 11 नवंबर को ईसीआरकेयू के सैकड़ों कार्यकर्ताओं एवं पदाधिकारियों ने अस्पताल प्रशासन और संबंधित डॉक्टरों के खिलाफ केंद्रीय रेलवे अस्पताल, पटना के सामने एक विशाल मोर्चा निकालकर प्रदर्शन किया.

    फोटो परिचय : केंद्रीय रेलवे अस्पताल, पटना के सामने विशाल मोर्चा निकालकर अस्पताल प्रशासन और डॉक्टरों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे ईस्ट सेंट्रल रेलवे कर्मचारी यूनियन के सैकड़ों कार्यकर्ता/रेल कर्मचारी.

    इसी प्रकार गाड़ी संख्या 12311 कालका मेल से कोलकाता से रायबरेली के लिए यात्रा कर रहे एक यात्री प्रेम शंकर शुक्ला (पीएनआर नं. 620-5028757, एस-6/28) ने रविवार, 12 नवंबर की सुबह करीब 4 बजे ‘रेलवे समाचार’ को फोन करके बताया कि उन्हें बहुत ज्यादा लूज मोशन हो रहे हैं और पेट में भयंकर दर्द है. उन्होंने बताया कि पिछले स्टेशन पर उन्होंने कुछ खाया था, जिसकी वजह से उनकी यह हालत हुई है. हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने टीटीई को भी इसकी जानकारी दी है और उसने कहा है कि आने वाले स्टेशन आसनसोल को इसकी सूचना दे दी गई है, वहां आवश्यक मेडिकल सहायता मिल जाएगी. जब तक ‘रेलवे समाचार’ द्वारा कोई बंदोबस्त किया जाता, तब तक गाड़ी आसनसोल पहुंच चुकी थी. टीटीई की सूचना पर वहां मेडिकल टीम पहले ही पहुंच चुकी थी. प्रभावित यात्री शुक्ला को मेडिकल टीम ने जरुरी दवाएं दीं और गाड़ी आगे के लिए निकल गई.

    मगर यात्री प्रेम शंकर शुक्ला को उक्त दवाओं से कोई लाभ नहीं हुआ. परिणामस्वरूप उनकी हालत और भी ज्यादा खराब हो गई. इस दरम्यान ‘रेलवे समाचार’ ने गाड़ी के अगले पड़ाव धनबाद स्टेशन के अपने लोगों को यात्री के बारे में जानकारी देकर गाड़ी पहुंचने पर उसकी खबर लेने को कह दिया था. जब गाड़ी धनबाद पहुंची, तब वहां लोग पहले से मौजूद थे. उन्होंने देखा कि यात्री की हालत बहुत ज्यादा खराब है, तब उन्होंने उसे उतारकर रेलवे अस्पताल पहुंचाने का बंदोबस्त किया. इस बारे में ‘रेलवे समाचार’ ने डीआरएम/धनबाद मनोज कुमार अखौरी को भी तत्काल उनके मोबाइल पर सूचित किया था. रेलवे अस्पताल में यात्री को दोपहर तक दो बोतल ग्लूकोज चढ़ाया गया, कुछ दवाएं भी दी गईं, मगर उसकी हालत सुधरने के बजाय और ज्यादा खराब होती जा रही थी.

    इस बीच धनबाद में रहने वाले उसके कुछ परिचित भी अस्पताल पहुंच चुके थे. तब तक अस्पताल की ड्यूटी नर्स द्वारा यात्री को एक अन्य स्थानीय सरकारी अस्पताल को रेफर करने की तैयारी कर ली गई थी. उसने अस्पताल पहुंचे परिचितों से कहा कि यदि वह चाहें तो अपने आदमी को किसी निजी अस्पताल में ले जा सकते हैं. यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि अस्पताल स्टाफ द्वारा किसी परिचित के भरोसे किसी ऐसे यात्री को नहीं छोड़ा जा सकता है, जिसका कोई सगा-संबंधी उसके पास नहीं था. यह रेलवे अस्पताल की जिम्मेदारी थी कि यदि मरीज यात्री की हालत में सुधार नहीं हो रहा था, तो स्टाफ द्वारा या तो सीनियर डॉक्टर्स को फौरन सूचित किया जाता और उन्हें अस्पताल बुलाया जाता, अथवा अपनी जिम्मेदारी पर पूरी मेडिकल सुरक्षा के साथ किसी उपयुक्त अस्पताल को भेजा जाता और उसके पूर्णतः स्वस्थ होने पर ही मुक्त किया जाना चाहिए था.

    परंतु ऐसा न करके उक्त यात्री मरीज को भगवान भरोसे परिचितों को सौंप दिया गया. परिचितों ने पहले उसे स्थानीय पाटलिपुत्र नर्सिंग होम में भर्ती कराया. वहां भी देर शाम तक यात्री की तवियत में कोई खास सुधार नहीं हुआ और उसकी हालत बिगड़ती ही जा रही थी. अंततः वहां के डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए और यात्री को मरणासन्न अवस्था में दुर्गापुर के मिशन हॉस्पिटल के लिए रात करीब 10 बजे रेफर कर दिया. इस दरम्यान उसके परिचितों से हजारों रुपये की वसूली हो गई. करीब 20-25 किमी. जाने पर यात्री की हालत जब बहुत ज्यादा बिगड़ गई, तब एंबुलेंस के कम्पाउण्डर की सलाह पर उसे निकटतम के. एम. मेमोरियल हास्पिटल, बोकारो के आईसीयू में रात करीब 12 बजे भर्ती कराया गया. वहां डॉक्टरों के अथक परिश्रम से यात्री की जान बचाई जा सकी.

    इस प्रकार रेलवे अस्पतालों के डॉक्टरों और उनके स्टाफ द्वारा न सिर्फ रेलकर्मियों और उनके परिजनों की जान ली जा रही है, बल्कि मौका पड़ने पर वह यात्रियों की भी जान लेने से नहीं चूक रहे हैं. उपरोक्त दोनों मामले न सिर्फ हद दर्जे की अमानवीयता के परिचायक हैं, बल्कि गैर-जिम्मेदारी और उत्तरदायित्वविहीनता का सर्वोत्तम उदाहरण भी हैं. रेल प्रशासन को चाहिए कि जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी इन ‘बूचड़खानों’ को बंद करके रेलकर्मियों, उनके परिजनों और यदाकदा यात्रियों की भी जान बचाने का कोई बेहतर प्रबंध करे. इसके साथ ही पटना के केंद्रीय रेलवे अस्पताल सहित मंडल रेलवे अस्पताल, धनबाद के संबंधित डॉक्टरों एवं ड्यूटी स्टाफ के खिलाफ विभागीय जांच करके उनके विरुद्ध उचित प्रशासनिक कार्रवाई की जानी चाहिए.

सम्पादकीय