आरक्षण: दलितों को दलित बनाए रखने की साजिश-4

    जातिवादी लोकसेवकों एवं राजनेताओं की बंधक बन रही कार्यपालिका

    संविधान की न्यायपूर्ण रक्षा करने में अक्षम साबित हो रहे हैं राष्ट्रपति और राज्यपाल

    जातिवादी ब्लैकमेलिंग की शिकार दो वर्गों में विभाजित लोक प्रशासन और कार्यपालिका

    कर्तव्य-विमुख होकर जातिवादियों की गिरफ्त में हैं राष्ट्रीय अजा/अजजा आयोग

    आरक्षण के मुद्दे पर पूरे देश में मचा हुआ है हाहाकार और सन्निकट है जातिगत संघर्ष

    सुरेश त्रिपाठी

    पदोन्नति में आरक्षण के संबंध में ‘समता आंदोलन समिति’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पारासर नारायण शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अपने पत्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ ‘कार्यपालिका’ जातिवादी लोकसेवकों एवं राजनेताओं के हाथों की बंधक बनती जा रही है. उन्होंने लिखा है कि यह जातिवादी लोकसेवक और राजनेता अपने व्यक्तिगत स्वार्थ में केंद्र सरकार को कठपुतली की तरह नचा रहे हैं. इनके सामने संविधान के रक्षक राष्ट्रपति और राज्यपाल इसकी रक्षा करने में अक्षम साबित हो रहे हैं. इनके अविधिक संगठनों के सामने सभी सरकारें कांप रही हैं. दो वर्गों में विभाजित लोक प्रशासन, कार्यपालिका- जातिवादी ब्लैकमेलिंग की शिकार हो रही है. वहीं इस मुद्दे पर पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है और जातिगत संघर्ष सन्निकट है.

    फोटो परिचय : वड़ोदरा में एक जन-समूह को संबोधित करते हुए ‘समता आंदोलन समिति’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पारासर नारायण शर्मा एवं उनके साथी.

    श्री शर्मा ने लिखा है कि कार्यपालिका जातिवादी लोकसेवकों एवं राजनेताओं के हाथों में बंधक बनती जा रही है. लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ कार्यपालिका भी पदोन्नति में आरक्षण की अविधिक, अन्यायपूर्ण और अंसवैधानिक व्यवस्था के आगे बेबस और लाचार है. कार्यपालिका भी 45,500 जातिवादियों के हाथों में बंधक है. इसके कुछ उदाहरण देखें-

    (क) जातिवादी सांसद केंद्र सरकार को कठपुतली की तरह नचाते हैं- लोकसभा में अजा/अजजा के अधिकांश सांसद अपना अलग समूह बनाकर पदोन्नति में आरक्षण के अविधिक, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक प्रावधान के लिए लगातार केंद्र सरकार पर दवाब बनाते रहते हैं. पार्टी लाइन से अलग हटकर जातिवादी राजनीति में लिप्त रहते हैं और अपनी पार्टी को भी दवाब में लेकर जातिवादी राजनीति करने को मजबूर करते हैं. पदोन्नति में आरक्षण जैसे प्रावधानों के जरिए वह प्रत्येक उन साजिशों की रचना करते हैं, जिनसे अजा/अजजा के आरक्षण का लाभ केवल 5% जनसंख्या में ही घूमता रहे और 95% जनसंख्या दलित एवं पिछड़ी ही बनी रहे, ताकि उनकी दुर्दशा पर वे अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते रहें. यदि कोई सरकार राष्ट्रहित में पदोन्नति में आरक्षण बंद करके आरक्षण का लाभ अजा/अजजा के वास्तविक वंचित वर्ग तक पहुंचाने का प्रयास करती है, तो ये जातिवादी सांसद सरकार गिराने तक की धमकियां देने लगते हैं. राष्ट्रवादी, विकासवादी और मजबूत प्रधानमंत्री भी इन जातिवादी सांसदों के आगे घुटने टेकते हुए दिखाई देते हैं. जातिवादी सांसद कितना ही अविधिक, असंवैधानिक या विघटनकारी काम करते रहें, किसी सरकार या मंत्री अथवा अधिकारी की इनके विरूद्ध बोलने तक का साहस नहीं है. पूरी सरकार जातिवादी सांसदों के आगे कठपुतली बन जाती है.

    (ख) राष्ट्रपति या राज्यपाल भी संविधान की रक्षा करने में अक्षम साबित हो रहे हैं. पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित कितना ही अविधिक, अन्यायपूर्ण या असंवैधानिक संविधान संशोधन या कानून क्यों न हो, देश के महामहिम राष्ट्रपति एवं राज्यपाल भी अपनी संविधान सुरक्षा की शपथ को भूलकर उस पर हस्ताक्षर करने को मजबूर हो जाते हैं. राष्ट्रपति और राज्यपाल को सलाह देने वाला पूरा कानूनी लवाजमा संविधान सुरक्षा के हक में एक शब्द भी नहीं बोल पाता है. आश्चर्य की बात यह भी है कि जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी संविधान संशोधन या कानून को असंवैधानिक घोषित किया जाता है, तो उनको पारित कराने में लिप्त केंद्र सरकार, राज्य सरकार, राष्ट्रपति, राज्यपाल, एटार्नी जनरल या एडवोकेट जनरल में से कोई भी त्यागपत्र नहीं देते. बेबस जनता किसी की जिम्मेदारी तय नहीं कर पाती, क्योंकि भारतीय कानून या संविधान में संविधान से खिलवाड़ करने वाले संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को दंडित करने का कोई प्रावधान या अधिकार देश के सर्वसामान्य नागरिकों को नहीं दिया गया है.

    (ग) अजा/अजजा लोकसेवकों के अविधिक संगठनों की देशद्रोही गतिविधियों से सभी सरकारें कांपती हैं. यह सर्वविदित तथ्य है कि सरकारी कर्मचारियों द्वारा जाति आधारित या धर्म आधारित संगठन बनाया जाना ‘कंडक्ट रूल्स’ के विरूद्ध है. यह भी सर्वविदित है कि केंद्र सरकार के लगभग सभी विभागों में अजा/अजजा कर्मचारियों द्वारा जातिगत संगठन बनाकर खुले तौर पर अविधिक गतिविधियां की जा रही हैं, जातिगत वैमनस्य फैलाया जा रहा है, प्रशासनिक अधिकारियों को जातिगत आधार पर दबाव में लेकर नियमानुसार काम करने से रोका जा रहा है. जो अधिकारी ईमानदारी और निष्ठा से नियमों का पालन करना चाहता है, उसे साजिश के तहत अजा/अजजा के आयोगों के सदस्यों से फटकार लगवाई जाती है या उनकी व्यक्तिगत पेशी करवाकर उन्हें अपमानित करवाया जाता है. लोक प्रशासन में जातिगत बिखराव लाकर भय और आतंक का माहौल बनाया जाता है. भाईचारे और सदभाव बढ़ाने के प्रत्येक प्रयास को विफल किया जाता है. ऐसे अविधिक जातिवादी संगठनों के विरूद्ध कार्यवाही करने की कार्यपालिका में हिम्मत ही नहीं है. इसके विपरीत अनेक उच्च अधिकारी केवल अपना समय व्यतीत करने के फेर में ऐसे अविधिक जातिवादी संगठनों को अनेक सुविधाएं दे रहे हैं. इनके साथ बैठकें करते हैं. इनके दवाब में नियमविरूद्ध आदेश जारी कर रहे हैं. उन्हें अलग ऑफिस, टेबल, फोन, एसी इत्यादि की सभी सुविधाएं मुहैया करा रहे हैं. अनेक जगह फंड भी देते हैं. ऐसे अविधिक संगठनों की गतिविधियां चलाने के लिए विशेष आकस्मिक अवकाश भी दिए जा रहे हैं.

    (घ) दो वर्गों में विभाजित लोक प्रशासन, कार्यपालिका जातिवादी ब्लैकमेलिंग की शिकार हो रही है. पदोन्नति में आरक्षण के अविधिक, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक प्रावधानों के कारण केंद्र एवं राज्यों का पूरा लोक प्रशासन दो वर्गों में विभाजित हो गया है- जातिवादी और राष्ट्रवादी. जातिवादी लोकसेवकों का साथ उन्हीं के वर्ग के कुछ जातिवादी बड़े अधिकारी भी देते हैं, जिससे राष्ट्रवादी लोकसेवकों के साथ इस आधार पर प्रतिशोधात्मक कार्यवाही की जाती है कि इनके पुरखों ने पांच हजार वर्ष पहले तथाकथित अत्याचार किए थे. ये बड़े अधिकारी जातिवादी कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों से मिलकर सरकारों को अस्थिर करने की साजिशें भी रचते रहते हैं और स्वयं की स्वार्थ-सिद्धि के लिए सरकारों को ब्लैकमेल भी करते रहते हैं.

    (च) इस मुद्दे पर पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है और जातिगत संघर्ष सन्निकट है. पदोन्नति में आरक्षण की अविधिक, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक व्यवस्था के कारण पूरे देश में कैटस, हाईकोर्ट्स और सर्वोच्च न्यायालय में सैंकड़ों याचिकाएं लंबित हैं. लाखों लोकसेवक न्यायालयों के चक्कर लगा रहे हैं. करोडों रुपये की बर्बादी हो रही है. पूरे देश में समता आंदोलन, सपाक्स, जनरल केटेगरी वेलफेयर फेडरेशन, सर्वहित संघ, अहिंसा, एसजेएचएस आदि संगठनों के साथ जुड़कर करोड़ों राष्ट्रवादी नागरिक अपने अधिकारों और न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं. सड़कों पर आंदोलन और धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं. अजा/अजजा कर्मचारियों के संगठन भी अपनी अविधिक लूट को जारी रखने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं. पूरे देश के लोक प्रशासन में जातिगत कटुता बढ़ती जा रही है. आमने-सामने की स्थिति हो रही है. न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया प्रजातंत्र के इन चारों स्तम्भों के प्रति नागरिकों की आस्था और विश्वास घटता जा रहा है तथा देश जातिगत संघर्ष की ओर बढ़ रहा है.

    (छ) राष्ट्रीय अजा/अजजा आयोग भी कर्तव्य-विमुख होकर जातिवादियों की गिरफ्त में हैं. पदोन्नति में आरक्षण की वर्तमान अविधिक, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक व्यवस्था के कारण राष्ट्रीय अजा/अजजा आयोग भी अपने संवैधानिक कर्तव्यों की पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं. राष्ट्रीय अजा/अजजा आयोगों का संवैधानिक कर्तव्य है कि वे अजा/अजजा के कल्याणार्थ चलाई जा रही सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगरानी रखें. अजा/अजजा के शीघ्र व्यापक उत्थान के लिए सरकार को सुझाव दें. उनके शोषण के कारणों का निवारण करें. लेकिन दुर्भाग्य से इन आयोगों की वार्षिक रिपोर्ट्स और गतिविधियां देखने से ज्ञात होता है कि इन आयोगों के सदस्यों या अध्यक्षों का अजा/अजजा के कल्याण का कोई दृष्टिकोण (विजन) ही नहीं है. जातिवादी लोकसेवकों एवं राजनेताओं के दवाब में आकर इन आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य भी अजा/अजजा की 95% जनसंख्या को दीर्घ समय तक पिछड़ा, वंचित और दलित बनाए रखने की साजिश का हिस्सा बनकर पदोन्नति में आरक्षण की अन्यायपूर्ण व्यवस्था को चालू रखने की वकालत करते रहते हैं. जातिगत सौहार्द बढ़ाने के बजाय वैमनस्यता को बढ़ावा दे रहे हैं. संवैधानिक पद का दुरूपयोग करते हुए संविधान विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहते हैं. ऐसी ही गतिविधियों में लिप्त रहने के कारण राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष पी. एल. पूनिया के विरूद्ध संवैधानिक प्रावधानों के अधीन राष्ट्रपति के समक्ष साक्ष्य सहित याचिका प्रस्तुत करके उन्हें पद से बर्खास्त करने की प्रार्थना की गई थी, लेकिन आज तक उस याचिका के निस्तारण की सूचना याचिकाकर्ता को नहीं दी गई है. क्रमशः

सम्पादकीय