तदर्थ नीतियों से भारतीय रेल का कोई भला नहीं होगा

    एल्फिंस्टन हादसा: सेना को ब्रिज निर्माण कार्य देकर रेलमंत्री ने गलत संदेश दिया

    रेलमंत्री के निर्णय को सभी विपक्षी पार्टियों सहित यात्री संगठनों ने सही नहीं माना

    निहित राजनीतिक स्वार्थ और सस्ती लोकप्रियता के हवाले है रेलमंत्री का तौर-तरीका

    रेलवे ब्रिज इंजीनियर यदि इतने ही निकम्मे और नाकाबिल हैं, तो उन्हें घर भेजा जाए

    कोच रिप्लेसमेंट, विद्युतीकरण, आवधिक तबादलों, भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करें रेलमंत्री

    सुरेश त्रिपाठी

    रेलमंत्री पीयूष गोयल ने 31 अक्टूबर को अचानक रक्षामंत्री सुश्री निर्मला सीतारामन के साथ पश्चिम रेलवे के एल्फिंस्टन रोड रेलवे स्टेशन पर पहुंचकर वहां का पादचारी पुल सेना द्वारा बनाए जाने की घोषणा करके पूरी मुंबई को चौंका दिया. इस मौके पर उनके साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस सहित मुंबई भाजपा अध्यक्ष आशीष शेलार एवं अन्य मंत्रीगण और सेना की इंजीनियरिंग कोर के कई उच्च अधिकारी भी उपस्थित थे. हालांकि श्री गोयल का यह अचानक दौरा नहीं था, क्योंकि उनके साथ महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री, मंत्री और भाजपा के तमाम पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता भी थे, इसलिए उनका यह कार्यक्रम निश्चित रूप से पूर्व नियोजित था. मगर इसकी जरा सी भी भनक अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं तथा यात्री संगठनों और मुंबई के लोगों को कतई नहीं थी.

    रेलमंत्री श्री गोयल ने इस मौके पर यह भी घोषित किया कि एल्फिंस्टन रोड स्टेशन के पादचारी पुल सहित मध्य रेलवे के करी रोड और आम्बिवली रेलवे स्टेशनों के पादचारी पुलों का निर्माण भी सेना द्वारा किया जाएगा और यह तीनों पुल अगले साल जनवरी 2018 तक यानि तीन महीनों में सेना द्वारा बनाकर रेलवे को सौंप दिए जाएंगे. रेलमंत्री श्री गोयल 30 सितंबर को एल्फिंस्टन रोड स्टेशन के पादचारी पुल (एफओबी) पर हुए हादसे, जिसमें 23 दैनिक उपनगरीय यात्रियों की असमय मौत हो गई थी और सैकड़ों यात्री प्रभावित हुए थे, को लेकर निश्चित रूप से अत्यंत गंभीर हैं और शीघ्रातिशीघ्र कुछ ऐसा करिश्मा कर दिखाना चाहते हैं कि जिससे लोगों को लगे कि वह अब तक के सर्वाधिक सक्षम रेलमंत्री हैं. मगर उन्होंने वास्तव में ऐसा कदम उठाया है कि जिससे पूरी मुंबई के लोग भौंचक्के रह गए हैं.

    महाराष्ट्र की सभी विपक्षी पार्टियों सहित मुंबई के लगभग सभी यात्री संगठनों ने रेलवे के काम में सेना को बूलाए जाने के रेलमंत्री के निर्णय की कटु आलोचना की है. इस विषय में मध्य रेलवे की जोनल परामर्शदात्री समिति के वरिष्ठ एवं सबसे मुखर सदस्य और रेल यात्री परिषद के प्रमुख पदाधिकारी सुभाष एच. गुप्ता ने अपने ट्वीटर हैंडल पर रेलमंत्री की सीधी आलोचना करने के बजाय घुमाकर लिखा है कि ‘एल्फिंस्टन रोड स्टेशन के एफओबी का निर्माण अब मिलिट्री द्वारा किया जाएगा. रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग की काबिलियत, कार्य-क्षमता और निष्क्रिय प्रशासनिक व्यवस्था पर यह एक करारा थप्पड़ है.’ इसी प्रकार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के मुंबई प्रमुख ने भी सेना के अनावश्यक इस्तेमाल पर रेलमंत्री की कड़ी आलोचना की है. महाराष्ट्र सरकार में शामिल शिवसेना को तो वैसे भी ऐसे अवसरों की ही तलाश रहती है. उसने भी रेलमंत्री के इस निरर्थक और सस्ती लोकप्रियता पाने वाले निर्णय की भर्त्सना की है. कांग्रेस के संजय निरुपम ने कहा कि रेलमंत्री को सस्ती लोकप्रियता कमाने की बहुत जल्दी है, मगर इसके लिए वह रेलवे को सक्षम बनाने के बजाय इसको मजाक का विषय बनाने पर तुले हुए हैं.

    रेलवे इंजीनियरिंग विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ‘रेलवे समाचार’ से इस संबंध में अपनी उद्विग्न प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि ‘रेलमंत्री पीयूष गोयल ने जब से रेल मंत्रालय का पदभार संभाला है, तभी से वह रेल अधिकारियों की सार्वजनिक रूप से बेइज्जती करने और उन्हें नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं गंवा रहे हैं.’ इस अधिकारी का कहना था कि ‘रेलवे के काम में सेना को शामिल करके उन्होंने एक बार पुनः यही प्रयास किया है.’ उनका कहना है कि ‘रेलवे और सेना के काम करने के तौर-तरीकों में काफी अंतर होता है. रेलवे को कोई भी निर्माण कार्य करने से पहले सर्वे, नियोजन, टेंडर इत्यादि की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. रेलवे के प्रत्येक कार्य का ऑडिट होता है, जबकि सेना के तमाम कार्यों के साथ ऐसा नहीं है.’ उन्होंने कहा कि ‘यदि रेलमंत्री पीयूष गोयल को ऐसा लगता है कि रेलवे के इंजीनियर अत्यंत निकम्मे और नाकाबिल हैं, तो उन्हें चाहिए कि रेलवे का इंजीनियरिंग विभाग पूरी तरह से बंद कर दें और रेलवे की पटरी बिछाने सहित इसके तमाम निर्माण कार्यों की आउटसोर्सिंग करके इसे सेना को ही सौंप दें, इससे रेलवे का बहुत बड़ा बोझ कम हो जाएगा.’

    उल्लेखनीय है कि एल्फिंस्टन रोड हादसे के बाद मुंबई में बुलाई गई एक बैठक के दौरान भी रेलमंत्री ने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन और चर्चगेट-बोरीवली के बीच संभावित एलिवेटेड कॉरिडोर की लागत में भारी अंतर को लेकर रेल अधिकारियों की निष्ठा के प्रति अपनी आशंका जाहिर करते हुए कुछ इस तरह की कटु टिप्पणी की थी कि ‘बुलेट ट्रेन के निर्माण में प्रति किमी. 200 करोड़ और एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण में प्रति किमी. 400 करोड़ की लागत देखकर उन्हें इस बात का अंदाजा हो रहा है कि रेलवे में भ्रष्टाचार किस हद तक समाया हुआ है.’ उनका यह कथन मुंबई के दैनिक अंग्रेजी अखबारों में प्रकाशित हुआ था, जिससे रेल अधिकारी अत्यंत शर्मशार हुए थे. ज्ञातव्य है कि मुंबई परिक्षेत्र के कई रेलवे स्टेशनों पर करीब 40 एफओबी का निर्माण किया जाना है, जिसकी प्रक्रिया चल रही है, मगर रेलवे की इस लंबी प्रक्रिया में इनके निर्माण में समय लग रहा है.

    इसके अलावा रेलमंत्री ने एल्फिंस्टन रोड पर जिस पादचारी पुल को बनाने का काम सेना को सौंपा है, वह चर्चगेट छोर पर बनाया जाएगा. इससे जिस पुल पर हादसा हुआ था, और जो वहां की वास्तविक समस्या है, उसका समाधान नहीं हो सकता है, क्योंकि यह समाधान तभी संभव होगा, जब एक चौड़ा पुल उसी स्थान पर या उसके बगल में बनाया जाएगा. तभी परेल, मध्य रेलवे की ओर से पश्चिम रेलवे एल्फिंस्टन रोड की तरफ यात्रियों की निकासी आसान हो सकेगी. यहां यह भी ध्यान रखने की बात है कि परेल टर्मिनस बनने और चालू होने के बाद यहां से यात्रियों की निकासी की समस्या और भी गंभीर होने वाली है. राजनीतिज्ञ अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों और सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में भावी गंभीरता का आकलन नहीं करना चाहते हैं. यही वजह है कि छत्रपति शिवाजी महराज टर्मिनस के विस्तार सहित कुर्ला, दादर के बाद अब परेल टर्मिनस बनाकर ‘संकरे में समाधान’ करने का प्रयास किया जा रहा है. इसके लिए मध्य रेलवे की ऐतिहासिक धरोहर ‘परेल वर्कशॉप’ को भी बंद करने का निर्णय ले लिया गया है. जबकि इस समस्या का समाधान दादर के आसपास रेलवे की हजारों एकड़ लीज पर दी गई जमीन, जिनकी लीज वर्षों पहले समाप्त हो चुकी है, को वापस लेकर और कुछ रेलवे कालोनियों को शिफ्ट करके मध्य एवं पश्चिम रेलवे की बेहतर कनेक्टिविटी के साथ दादर में ही किया जा सकता था.

    इसके अलावा कल्याण और ठाकुर्ली में रेलवे की सैकड़ों एकड़ जमीन उपलब्ध होने के बावजूद वहां रेल सेवाओं का विस्तार इसलिए नहीं किया जा रहा है, क्योंकि इससे मुंबई के नेताओं को लगता है कि ठाणे-कल्याण क्षेत्र के नेताओं का राजनीतिक हित-साधन हो जाएगा. इसी राजनीतिक स्वार्थ के चलते भू-माफिया और बिल्डर लॉबी का हित-साधन करने के लिए ठाणे-मुलुंड के बीच मात्र तीन किमी. के अंतर पर इन दोनों स्टेशनों के मध्य एक और स्टेशन बनाने का प्रयास किया जा रहा है. पिछले लगभग 20 वर्षों के दरम्यान मुंबई में ऐसे कई नए रेलवे स्टेशनों का प्रादुर्भाव हो चुका है, जिनसे सिर्फ भू-माफिया और बिल्डर लॉबी के साथ स्थानीय राजनीतिज्ञों का ही हित-साधन हुआ है, जबकि इनका तनिक भी लाभ रेलवे को नहीं मिल पाया है. यदि केंद्र सरकार की लागत पर रेलवे के विस्तार से मुंबई और राज्य को आर्थिक फायदा मिल रहा है, तो उसका एक हिस्सा रेलवे के विकास और विस्तार के लिए क्यों नहीं मिलना चाहिए?

    बहरहाल, रेलमंत्री पीयूष गोयल के इस निर्णय पर इतना जरुर कहा जा सकता है कि उन्होंने सेना की इंजीनियरिंग कोर को रेल पुल निर्माण का काम देकर रेलवे के सैकड़ों ब्रिज इंजीनियरों की बेइज्जती की है. सेना निश्चित तौर पर काफी मजबूत और जल्दी काम करती है, मगर उसके और रेलवे के काम में बहुत बड़ा अंतर है. हर जगह सेना को बुलाना ठीक नहीं है, इससे उसके उद्देश्य से उसका भटकाव होता है. इसके अलावा यदि रेलवे के तमाम ब्रिज इंजीनियर इतने ही निकम्मे और नाकाबिल हैं, तो उन्हें हर महीने लाखों का वेतन-भत्ता देकर क्यों पाला जा रहा है? यदि रेलमंत्री में इतना ही दुर्दम्य साहस है, तो वह सर्वप्रथम सभी रेलवे ब्रिज इंजीनियरों को बर्खास्त करके घर भेज दें और रेलवे का बोझ कम करें. इसी प्रकार एकाउंट्स विभाग को सेंट्रल ऑडिट या सीएजी को सौंप दें, ‘कलर ब्लाइंड’ स्टोर्स विभाग को सभी विभागों के साथ मर्ज कर दें, रेलवे को चौपट करने वाली सर्विस 'आरबीएसएस' को डीओपीटी के साथ मर्ज करने की हिम्मत दिखाएं. कहने का तात्पर्य यह है कि इस विषय पर ऐसा ही बहुत कुछ कहा जा सकता है, मगर देश के राजनीतिज्ञों में इच्छाशक्ति की कमी है, यह सिर्फ सिर के बाल काटकर मुर्दे को हल्का करने वाला काम करना चाहते हैं, जिससे इनकी सस्ती और उथली राजनीति चलती रहे. यह एक कड़वी सच्चाई है, मगर सच है.

    रेलमंत्री को सिर्फ तीन स्टेशनों पर एफओबी बनाने की बड़ी जल्दी है, मगर कल्याण यार्ड की रिमॉडलिंग का काम पूरा हो जाने की मध्य रेलवे के एक नाकाबिल अधिकारी ने जो दिसंबर 2017 तक की मियाद दी है, उस पर अब तक कोई काम नहीं हो पाया है. क्या रेलमंत्री संबंधित अधिकारी से यह दरयाफ्त करने की जहमत उठाएंगे कि जब अब तक कल्याण यार्ड के रिमॉडलिंग की कोई पक्की योजना बनकर तैयार नहीं है, वित्त मंत्रालय से बजट नहीं आया है, कल्याण-डोम्बिवली महानगर पालिका के साथ उक्त कार्य को लेकर रेल अधिकारियों की अब तक एक भी समन्वय बैठक नहीं हो पाई है, किसी भी प्रकार की कोई पुख्ता तैयारी नहीं हुई है, तब उसने उन्हें दिसंबर के अंत तक उक्त कार्य के पूरा हो जाने की गारंटी किस आधार पर दी थी? कहने का मतलब यह है कि रेलमंत्री को 10 साल से घटाकर चार साल में यानि वर्ष 2021 तक भारतीय रेल के संपूर्ण विद्युतीकरण, अगले दो सालों में आईसीएफ निर्मित सभी यात्री कोचों को हटाकर एलएचबी कोचों को लाने जैसी घोषित बड़ी योजनाओं और रेलवे से भ्रष्टाचार का समूल नाश करने के लिए सीवीसी की गाइडलाइंस को लागू करके सभी रेल कर्मचारियों एवं अधिकारियों का प्रत्येक चार साल में स्थान परिवर्तन सहित आवधिक तबादलों और संरक्षा श्रेणी के सुपरवाइजरों को मान्यताप्राप्त संगठनों के पदों से हटाने के ठंडे बस्ते में डाल दिए गए रेलवे बोर्ड के निर्णय को लागू करने तथा जीएम/डीआरएम के पदों पर यूनियनों की पसंद को दरकिनार करके काबिल एवं कार्यक्षम अधिकारियों को बैठाने जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्यों पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करना चाहिए, तभी भारतीय रेल का कुछ भला हो सकता है.

सम्पादकीय