मंडल प्रशासन ने यूनियन के दबाव में आवधिक ट्रांसफर को मजाक बना दिया

    यूनियन के दबाव में अधिकारियों द्वारा किया गया सुपरवाइजर का नियम विरुद्ध फेवर

    ‘यूनियन पदाधिकारी और रेल अधिकारी’ गठजोड़ के चलते व्याप्त है रेलवे में भ्रष्टाचार

    तोड़ा जाना आवश्यक है ‘भ्रष्ट यूनियन पदाधिकारी एवं भ्रष्ट अधिकारी’ का यह गठजोड़

    भावनगर : यह तो सर्वविदित है कि रेलवे के मान्यताप्राप्त संगठनों की ठेकेदारी सबार्डिनेट सुपरवाइजर्स के पास है और उनके द्वारा निचले स्तर के सभी फील्ड कर्मचारियों की गोलबंदी करने पर ही मान्यताप्राप्त रेल संगठनों का सारा अस्तित्व निर्भर करता है. सुपरवाइजर्स को मिला यूनियनों का यह संरक्षण भी भारतीय रेल में गहरे तक समाए हुए भ्रष्टाचार का एक और बड़ा कारण है. यह भी सही है कि मान्यताप्राप्त संगठन अधिकारियों की गलतियों और कमजोरियों का फायदा उठाते हैं. उनकी इन्हीं गलतियों/कमजोरियों का लाभ उठाकर वह उन्हें नियम विरुद्ध काम करने को मजबूर करते हैं. यदि समय रहते ‘भ्रष्ट यूनियन पदाधिकारी एवं भ्रष्ट अधिकारी’ का यह गठजोड़ नहीं तोड़ा जाता है, तो रेलवे से न कभी भ्रष्टाचार खत्म होगा और न ही कभी नियमानुसार कार्य-संस्कृति को बढ़ावा मिल पाएगा.

    उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में पश्चिम रेलवे के भावनगर मंडल प्रशासन ने यूनियन के दबाव में अक्षय देसाई नामक एक सुपरवाइजर (एसएसई/सीएंडडब्ल्यू) के आवधिक (पीरियोडिकल) ट्रांसफर को मजाक बना दिया है और यूनियन के दबाव में मात्र 15 महीनों के भीतर उसे पुनः वेरावल से भावनगर वापस ले आया गया है. हालांकि इस दरम्यान भी उसको भावनगर वापस लाने के लिए दो बार आदेश जारी किए गए थे, मगर विरोधी यूनियन के विरोध और ‘रेलवे समाचार’ में खबर प्रकाशित होने के कारण तब मंडल प्रशासन ने उसके तत्संबंधी आदेश को लंबित कर दिया था. विरोधी यूनियन के तमाम विरोध के बावजूद अक्षय देसाई ने ट्रांसफर अवधि में भी भावनगर का अपना रेलवे आवास विस्तारित अवधि समाप्त होने पर भी न तो खाली किया, और न ही प्रशासन ने उससे बाजार दर पर पेनल रेंट वसूल किया. जबकि भावनगर में रेलवे आवास के लिए अन्य रेलकर्मी काफी लंबे समय से इंतजार में हैं.

    ज्ञातव्य है कि एसएसई/सीएंडडब्ल्यू अक्षय देसाई का आवधिक तबादला 26 मई 2016 को भावनगर परा टर्मिनस से वेरावल के लिए किया गया था. यूनियन के दबाव में मंडल प्रशासन ने उसका यह तबादला रद्द करते हुए उसकी पोस्टिंग पुनः भावनगर परा में ही किए जाने का आदेश (कार्यालय आदेश सं. ईएम/04/2017, दि. 04.01.2017) जारी किया था. इसके खिलाफ विरोधी यूनियन द्वारा किए गए कड़े विरोध के कारण प्रशासन ने उक्त आदेश को एक और कार्यालय आदेश (सं. ईएम/51/2017, दि. 13.03.2017) जारी करते हुए लंबित कर दिया था. अब मंडल प्रशासन ने दि. 13.03.2017 के उक्त आदेश को एक और कार्यालय आदेश (सं. ईएम/226/2017, दि. 24.10.2017) जारी करके पूरी बेशर्मी के साथ लागू कर दिया है और अक्षय देसाई को वेरावल से भावनगर पुनः वापस ले आया गया है. संबंधित अधिकारियों की यूनियन पदाधिकारियों के साथ मिलीभगत अथवा यूनियन के दबाव में की जा रही इस तरह की सांठ-गांठ से ईमानदारी से काम करने वाले तमाम रेलकर्मी आहात हुए हैं.

    मंडल के कई कर्मचारियों का कहना है कि सभी नियम-परंपरा को ताक पर रखकर इस तरह से एक कर्मचारी का खुला फेवर किया जा रहा है और रेल प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है. जबकि अन्य कर्मचारियों का छोटी-छोटी विसंगतियों के लिए भारी नुकसान होने पर भी प्रशासन और यूनियन को कोई फर्क नहीं पड़ता है और न ही उनकी कोई सुनने वाला होता है. उनका कहना है कि भावनगर के रेलवे आवास की विस्तारित अवधि समाप्त होने पर भी प्रशासन ने उसे खाली नहीं करवाया. यही नहीं, विस्तारित अवधि खत्म होने के बाद भी अक्षय देसाई से न तो पेनल रेंट वसूला गया और न ही आवास खाली करवाया गया. देसाई का इतना अधिक फेवर क्यों किया गया, इस बारे में ‘रेलवे समाचार’ द्वारा पूछे जाने पर मंडल के संबंधित अधिकारी कुछ भी बताने को तैयार नहीं हैं.

    इसके अलावा कर्मचारियों का यह भी कहना है कि एसएसई अक्षय देसाई की जगह जिस एसएसई अरविंद कुमार का ट्रांसफर वेरावल से भावनगर परा किया गया था, उसे अब भावनगर से पोरबंदर भेजा गया है. ऐसे में उसे ट्रांसफर अलाउंस दिया जाएगा. इस तरह से रेलवे रेवेन्यु को अधिकारियों द्वारा जानबूझकर और सिर्फ यूनियन का फेवर करने के लिए नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जबकि अरविंद कुमार की पोस्टिंग भी अक्षय देसाई की तर्ज पर पुनः उसके पूर्व स्थान वेरावल में भी की जा सकती थी. ऐसे में किसी को ट्रांसफर अलाउंस देने की जरूरत नहीं होती. कर्मचारियों का कहना है कि अक्षय देसाई जैसे तमाम एसएसई अपना पूरा सेवाकाल एक ही डिपो में पूरा कर रहे हैं. यही वजह है कि उनका लोकल नेटवर्क मजबूत हुआ है और यूनियनों का सहयोग मिला होने के कारण रेलवे में भारी भ्रष्टाचार गहरे तक समाया हुआ है.

    इस संदर्भ में मंडल रेल प्रबंधक, भावनगर मंडल सुश्री रूपा श्रीनावासन से जब ‘रेलवे समाचार’ ने बात की और उन्हें पूरे मामले से अवगत कराते हुए पूछा कि उनके मातहत अधिकारी यूनियन के दबाव में क्यों काम कर रहे हैं और एक कर्मचारी को इतना अधिक फेवर क्यों किया जा रहा है? मंडल के सभी कर्मचारियों पर आवधिक तबादले का नियम लागू क्यों नहीं है? इस पर उन्होंने कहा कि पूरे मामले का अध्ययन करना पड़ेगा और इस पर वह संबंधित अधिकारी सीनियर डीपीओ से बात करेंगी, तभी कुछ कह सकेंगी. बहरहाल, रेल कर्मचारियों का, और ‘रेलवे समाचार’ का भी, यह मानना है कि रेल अधिकारियों को बिना किसी के दबाव में आए नियमानुसार अपना काम करना चाहिए. इसके साथ ही जब तक सीवीसी की गाइडलाइन्स लागू नहीं की जाएंगी, तब तक कर्मचारियों एवं अधिकारियों की ट्रांसफर/पोस्टिंग में हो रही जोड़तोड़ और भ्रष्टाचार को रोक पाना संभव नहीं है.

सम्पादकीय