आरपीएफ:गृह मंत्रालय के अधीन जाने की अफवाहें निराधार

    कानूनन तमाम रेलकर्मियों के साथ ही सभी आरपीएफ सदस्य भी हैं रेलकर्मी

    आरपीएफ सदस्यों को अफवाहों से निर्लिप्त रहकर रेलयात्रियों की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए

    स्पष्ट कानून की मौजूदगी में आरपीएफ को गृह मंत्रालय के अधीन करने का सरकार को कोई अधिकार नहीं

    संविधान की रक्षा करने की शपथ लेकर भी इसके विरुद्ध आचरण करती रही हैं अब तक सत्तारूढ़ रही सरकारें

    कैडर विशेष के अनैतिक दबाव में संविधान विरुद्ध आचरण करने को मजबूर हैं राजनीतिक पार्टियां और सरकारें

    सुरेश त्रिपाठी

    पिछले कुछ समय से अफवाह फैलाई जा रही है कि रेल मंत्रालय के रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) को सरकार द्वारा गृह मंत्रालय के अधीन करने पर विचार किया जा रहा है. इससे आरपीएफ के लगभग 75 हजार सदस्यगण असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और उनका मनोबल गिर रहा है. उल्लेखनीय है कि संघीय रेलों में ऐसा प्रयोग पूरे विश्व में विफल हो चुका है और भारतीय रेल के लिए भी डॉ. राकेश मोहन समिति की ऐसी सिफारिशों को पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सिरे से खारिज कर चुकी है. अतः रेल संपत्ति एवं यात्रियों के जान-माल की सुरक्षा हेतु भारत सरकार को तुरंत ऐसी षड्यंत्रकारी अफवाहों पर रोक लगानी चाहिए.

    विश्व की प्रायः सभी देशों की रेलें उन देशों के कानून के अनुसार अपराध और प्रबंधकीय लापरवाही के कारण बुकशुदा माल और रेल यात्रियों के जान-माल को हुई क्षति की पूर्ति करने के लिए उत्तरदायी हैं. अतः रेल संपत्ति और यात्रियों के जान-माल की क्षति को रोकने हेतु उन रेलों की अपनी पुलिस को सिविल पुलिस जैसे समस्त कानूनी अधिकार दिए गए हैं. भारतीय रेल भी कैरियर्स ऐक्ट 1865, कांट्रैक्ट ऐक्ट 1872 तथा रेलवे ऐक्ट 1989 की धारा 93 से 111 तथा 123 से 127 के अनुसार ऐसी क्षति की पूर्ति के लिए उत्तरदायी है. किंतु 1891 के पुलिस कमीशन की सिफारिशों के बावजूद संपूर्ण भारत की संघीय रेल की सुरक्षा हेतु गठित इसकी अपनी पुलिस को भारत की तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने सिविल पुलिस जैसी कानूनी शक्ति 1857 के सिपाही विद्रोह (म्युटिनी) के डर से नहीं दी थी.

    भारत की अंग्रेज सरकार ने 1861 में पुलिस ऐक्ट बनाकर सभी राज्य सरकारों से पूर्ण कानूनी शक्ति से संपन्न पुलिस बल का गठन करवाया और भारत की निजी (रियासती) रेलों की सुरक्षा हेतु राज्य सरकार की पुलिस को भाड़े पर लेने को कहा था. चूंकि राज्य सरकारें रेल संपत्ति एवं यात्रियों के जान-माल की अपराध से हुई क्षति की पूर्ति के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी नहीं हैं, अतः समस्त कानूनी शक्ति से संपन्न उनकी जीआरपी (राज्य सरकारों की रेल पुलिस अथवा राजकीय रेलवे पुलिस) और जिला पुलिस रेल के अपराधों तथा उनसे हुई क्षति को नहीं रोक पाईं. ऐसी क्षति की पूर्ति से निजी रेलों को हुए बहुत घाटे के कारण सन् 1900 में रेलवे कंपनी ने इसे सरकार को सौप दिया था.

    तब से भारतीय रेल की सुरक्षा में राज्य सरकारों की जीआरपी और जिला पुलिस भी लगी हुई हैं, जिन्हें सभी अपराधों में जांच और अभियोजन का पूर्ण अधिकार प्राप्त है, किंतु इनके क्षेत्राधिकार सीमित होने एवं राज्य सरकारों पर अपराधों से हुई क्षति की पूर्ति का उत्तरदायित्व नहीं होने के कारण देश के 29 राज्यों में विभाजित जीआरपी/जिला पुलिस के पास पीड़ित यात्रीगण अपनी रिपोर्ट दर्ज नहीं करा पाते हैं और अगर करा भी पाते हैं, तो न पुलिस अपराधियों को पकड़ पाती है, और न ही लूटी/चुराई गई संपत्ति बरामद कर पीड़ित को वापस दे पाती है. इससे रेल यात्री हतोत्साहित होते रहे हैं और अपराधियों का मनोबल बढ़ता रहा है.

    1947 में इंग्लैंड की सरकार ने सभी निजी रेलों का राष्ट्रीयकरण कर उनकी निजी पुलिस को ट्रांसपोर्ट ऐक्ट के तहत ‘ब्रिटिश ट्रांसपोर्ट पुलिस’ (बीटीपी) के नाम से एकीकृत कर उन्हें सिविल पुलिस के सभी कानूनी अधिकार दे दिए, जिससे ब्रिटिश रेलवे के अपराधों में भारी कमी आई. अन्य देशों की रेलों की अपनी पुलिस को भी ऐसे अधिकार देने से वहां भी अपराधों में गुणात्मक कमी आई. यह खबर पाकर भारत के रेलवे बोर्ड के तत्कालीन चीफ कमिश्नर कर्नल इमर्शन ने लंदन के तत्कालीन पुलिस चीफ मिस्टर जास्फर से पूछा कि भारतीय रेल में बढ़ते अपराधों को रोकने/नियंत्रित करने हेतु क्या किया जाए? उक्त सवाल के जवाब में लंदन के पुलिस चीफ ने जो कहा उसे 1966 में तत्कालीन रेल राज्यमंत्री डॉ. रामसुभग सिंह की अध्यक्षता में गठित हाई पॉवर कमेटी के पैरा 250 में उद्धृत किया गया है, जो कि निम्नलिखित हैः-

    “From what you say, it does seem to me that the right answer is to have your own Railway Police, but you must be certain that they have the same powers as the Civil Police, so that they can always be in a position to take necessary action whilst employed on or in the vicinity of your own property.”

    इसके बावजूद भारतीय रेलवे के अपने तत्कालीन ‘वाच एंड वार्ड विभाग’ को सिविल पुलिस जैसा कानूनी अधिकार नहीं दिया गया, क्योंकि ऐसा अधिकार इसको देने से रेलवे से राज्य सरकारों की जीआरपी वापस कर दी जाती तथा जीआरपी के सुपरविजन हेतु सृजित आईपी या आईपीएस अधिकारियों के सभी पद (वर्तमान में लगभग 175) भी रेलवे से समाप्त हो जाते.

    जीआरपी में उक्त 175 आईपीएस के पदों को बेरोकटोक बनाए या बचाए रखने तथा आरपीएफ संशोधन ऐक्ट, 1985 की धारा 19.2 में सिपाही से महानिदेशक (डीजी) तक के पदों पर आईपीएस अधिकारी सहित अन्य बाहरी लोगों की प्रतिनियुक्ति पर पूर्ण रोक लगाए जाने के बावजूद तत्कालीन डीजी/आरपीएफ ने आरपीएफ संशोधन ऐक्ट, 1985 की संशोधित धाराओं को मूल आरपीएफ ऐक्ट, 1957 में सम्मिलित कर 18 सितंबर 1985 से इसे लागू करने हेतु राजपत्र में प्रकाशित करते समय धारा 19 को पूर्णतः लुप्त कर आरपीएफ में आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति अवैध रूप से जारी रखी. इसके पहले उक्त डीजी/आरपीएफ ने 1985 के आरपीएफ बिल की धारा 19 के बाजू में लिखे निर्देश, कि यह धारा मूल आरपीएफ ऐक्ट, 1957 की धारा 22 होगी, को भी आपराधिक ढ़ंग से गायब करवा दिया था.

    मान्यताप्राप्त ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन के विरोध को रोकने के लिए उन्होंने संशोधित आरपीएफ ऐक्ट, 1985 की धारा 15(ए) (1)(बी) के नौ शब्दों, (is not recognized as part of the force or), जो आरपीएफ के सदस्यों को 1973 से मान्यताप्राप्त ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन का सदस्य बने रहने की अनुमति देते थे, को भी आपराधिक ढ़ंग से रेल मंत्रालय द्वारा जारी राजपत्र दिनांक 18 सितंबर 1985 में नहीं छापकर ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन की मान्यता यह झूठ लिखकर छीन ली कि धारा 15(ए) आरपीएफ सदस्यों को एसोसिएशन बनाने का अधिकार नहीं देती, जबकि 27 नवंबर 1997 को तत्कालीन विधि राज्यमंत्री रमाकांत डी. खलप ने सांसद वासुदेव आचार्य को लिखे अपने पत्र में कहा था कि “In fact Section 15A(1)(b) does not envisage need of any permission for a member of RPF to be a member of recognized RPF Association.”

    पूर्व रेलमंत्री नीतीश कुमार ने भी अपने पत्र दिनांक 14 अगस्त 1998 में सितंबर 1985 में कार्यरत डीजी/आरपीएफ को 1985 के संशोधित आरपीएफ ऐक्ट के उक्त प्रावधानों को जानबूझकर लुप्त करने का आरोप लगाते हुए अवैध रूप से ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन की छीनी हुई मान्यता देश के 50वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 15 अगस्त 1998 को वापस देने की घोषणा की थी. किंतु भारत सरकार के तत्कालीन विशेष गृह सचिव ने गृह सचिव से रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष को एक पत्र लिखवाकर ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन की मान्यता बहाल नहीं करने की इस कुतर्क के साथ सलाह दी कि इससे अन्य बलों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा.

    आईपीएस अधिकारीगण यदा-कदा समितियों से ऐसी सिफारिश करवाते और अफवाह फैलाते रहे हैं कि आरपीएफ को गृह मंत्रालय के अधीन करने पर विचार हो रहा है, जहां वे जैसा चाहेंगे वैसा कर लेंगे, जबकि विश्व के सभी देशों की रेलों की सुरक्षा रेल के अधीनस्थ समस्त कानूनी शक्तियों से संपन्न अपनी पुलिस ही करती है. इसलिए दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश सुश्री गीता मित्तल ने ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन की याचिका (सं. 3455/2016) पर सुनवाई करते हुए आईपीएस अधिकारियों की आरपीएफ में प्रतिनियुक्ति पर यह कहते या सवाल उठाते हुए रोक लगा दी कि यदि हर जगह यही लोग कब्जा कर लेंगे, तो अन्य अधिकारी कहां जाएंगे?

    रेलवेज और रेल से ढ़ोये जाने वाले माल एवं यात्री भारतीय संविधान की धारा 246 की 7वीं अनुसूची की केंद्रीय सूची की एंट्री 22 एवं एंट्री 30 के विषय हैं. अतः केंद्रीय सूची के उक्त विषयों के विरुद्ध होने वाले अपराधों को रोकने और न रोक पाने पर इससे हुई रेल संपत्ति तथा यात्रियों के जान-माल की क्षति की पूर्ति की जिम्मेदारी इस सूची की एंट्री 93 के अनुसार केंद्र सरकार के रेल मंत्रालय की है, न कि गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों की. अतः 1961 के पुलिस कमीशन के साथ-साथ उक्त हाई पावर्ड कमेटी तथा भारत सरकार के पूर्व विशेष सचिव (कैबिनेट सचिवालय) वी. बालाचंद्रन तथा अनेक अन्य ईमानदार, निस्वार्थी एवं सार्वजनिक हित की भावनाओं से ओतप्रोत आईपीएस अधिकारियों ने मीडिया में लेख लिखकर तथा कई समितियों  में खुलेआम बयान देकर रेल के सभी अपराधों को रोकने हेतु आरपीएफ को ही सिविल पुलिस के समान समस्त कानूनी अधिकार देने की जोरदार सिफारिश की है.

    परंतु ऐसा लगता है इन सब पर कुछ निहितस्वार्थी आईपीएस अधिकारी भारी पड़ रहे हैं और उन्होंने अब तक आरपीएफ को विधिक अधिकार से वंचित रखवाकर प्रतिदिन भारतीय रेल से यात्रा करने वाली भारत की लगभग 2.45 करोड़ जनता को रेल से असुरक्षित यात्रा करने को मजबूर कर रखा है. जानकारों का मानना है कि रेल में अपराध का शिकार हुए 90% यात्री पुलिस (जीआरपी) को अपनी एफआईआर भी नहीं देते, क्योंकि वे जानते हैं कि पुलिस कुछ नहीं करेगी. इस विषय में वी. बालाचन्द्रन द्वारा लिखा गया लेख देखा जा सकता है.

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 77 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा जारी 1961 के कार्य आवंटन नियमों द्वारा प्रत्येक मंत्रालय को विषय आवंटित किए गए हैं, जिसके अनुसार भी रेलवे के विषयों को गृह मंत्रालय के अधीन नहीं किया जा सकता है.

    रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) का गठन भारतीय संविधान की केंद्रीय सूची की एंट्री 22 एवं समवर्ती सूची की एंट्री 2 के तहत अधिनियमित आरपीएफ ऐक्ट, 1957 के तहत हुआ है, जिसकी धारा 10 तथा रेलवे ऐक्ट, 1989 की धारा 2(34) के अनुसार आरपीएफ के सदस्यगण सभी अर्थों में रेलकर्मी हैं. आरपीएफ ऐक्ट की धारा 11 के अनुसार आरपीएफ का काम रेल संपत्ति की सुरक्षा करना है, न कि कानून व्यवस्था बनाए रखना.

    अतः संसद ने 52वें संविधान (संशोधन) विधेयक, 1984 के क्लाज ‘सी‘ से सरकारी संपत्ति की रक्षा करने वाले आरपीएफ और इसके सदस्यों को हटा दिया था, क्योंकि इन्हें संविधान के अनुच्छेद 33 में नहीं रखा जा सकता है. अतः अन्य रेलकर्मियों की भांति आरपीएफ के सदस्यों को भी न तो गृह मंत्रालय के अधीन किया जा सकता है और न ही इनसे संगठन (एसोसिएशन) बनाने का मौलिक अधिकार छीना जा सकता है.

    यहां यह भी उल्लेखनीय है कि आईएएस एवं आईपीएस सहित समस्त अखिल भारतीय सेवाओं के सभी अधिकारियों को अपना संगठन बनाने का अधिकार प्राप्त है और सरकार ने उन्हें मान्यता भी प्रदान कर रखी है. परंतु आरपीएफ कर्मियों के संगठन पर इन सभी कैडर अधिकारियों को ऐतराज है, जबकि आरपीएफ का सार्वजनिक कानून-व्यवस्था से कोई सरोकार भी नहीं है. यह भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक भारी विसंगति है.

    उल्लेखनीय है कि जनवरी 2015 में वर्तमान केंद्रीय गृहमंत्री ने आरपीएफ एसोसिएशन की वार्षिक सर्वसाधारण सभा के मंच से यह खुली घोषणा की थी कि आरपीएफ को समस्त कानूनी अधिकारों से संपन्न किया जाएगा और इस संबंध में रेलमंत्री जो भी प्रस्ताव गृह मंत्रालय को भेजेंगे, उसे तत्काल स्वीकार किया जाएगा. परंतु बाद में वह आईपीएस के दबाव में आकर न सिर्फ अपनी बात या घोषणा से मुकर गए, बल्कि आरपीएफ के विरुद्ध हो रही साजिशों को रोकने में भी असफल रहे हैं. देश ने शायद इससे पहले कभी इतना कमजोर गृहमंत्री नहीं देखा था!

    इस महत्वपूर्ण विषय पर 12 अक्टूबर को ‘रेलवे समाचार’ ने जब रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) के सक्षम उच्च अधिकारियों से बात की, तो उनका कहना था कि न तो ऐसी कोई तैयारी हो रही है, और न ही आरपीएफ को गृह मंत्रालय के अधीन किए जाने की बात में कोई सच्चाई है. यह सब अफवाहें हैं, जो कि निराधार हैं, आरपीएफ सदस्यों को ऐसी अफवाहों से निर्लिप्त रहकर रेल संपत्ति एवं प्रतिदिन करीब तीन करोड़ रेलयात्रियों के जान-माल की सुरक्षा पर अपना सारा ध्यान केंद्रित रखना चाहिए. इसके अलावा उनका यह भी कहना था कि रेल संपत्ति, रेलयात्रियों और रेलवे से बुकशुदा माल की सुरक्षा हेतु जैसी व्यवस्था विश्व के अन्य देशों की रेलों में कायम है, वैसी ही व्यवस्था भारतीय रेल में भी कायम किए जाने के गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि अगले छह-सात महीनों के दरम्यान ऐसी तमाम विसंगतियों को ठीक कर लिया जाएगा.

    उपरोक्त तमाम कानूनी प्रावधानों के मद्देनजर यह तो स्पष्ट है कि रेल मंत्रालय के अधीन कार्यरत तमाम आरपीएफ सदस्य भी ‘रेलकर्मी’ हैं और आरपीएफ का गठन विशेष रूप से रेल संपत्ति एवं रेलयात्रियों के जान-माल की सुरक्षा हेतु किया गया है. तथापि, वर्ष 1986 में तत्कालीन रेलमंत्री को बरगलाकर संसद में उनसे न सिर्फ आरपीएफ को केंद्र की ‘आर्म्ड फोर्स’ बनाए जाने का बिल रखवाया गया, बल्कि उसे पास भी करा लिया गया, जबकि संवैधानिक नियमों के अनुसार यह विषय गृह मंत्रालय का था, इसे रेल मंत्रालय या रेलमंत्री द्वारा संसद में नहीं ले जाया जा सकता था. संसद, सांसदों, सरकारों, मंत्रियों, राजनीतिक पार्टियों और यहां तक कि न्यायपालिका द्वारा एक कैडर विशेष के अनैतिक दबाव में काम करने का यह ज्वलंत उदाहरण है.

    हाल ही में आरपीएफ एसोसिएशन द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट में जो याचिका दायर की गई थी, उसमें यदि अदालत चाहती तो दो-टूक निर्णय दे सकती थी, क्योंकि प्रतिनियुक्ति के मामले में आरपीएफ कानून बहुत स्पष्ट है. इसके बावजूद सरकार और अदालत एक खास कैडर के अदृश्य दबाव में रही तथा कानूनी दांव-पेंचों के चलते अदालत ने मामले को बड़ी बेंच को भेज दिया. इससे पहले भी आरपीएफ एसोसिएशन की मान्यता को लेकर सरकार और अदालत दोनों उक्त खास कैडर के दबाव में रहे थे तथा 14-15 सालों तक अदालत द्वारा इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया जा सका था. अंततः मामले को वापस ले लिया गया था और एसोसिएशन की मान्यता संसद के माध्यम से बहाल हुई थी. तात्पर्य यह है कि क्या उक्त सभी संवैधानिक संस्थाएं अपने कदाचरण के चलते एक खास कैडर के दबाव में अनैतिक और असंवैधानिक आचरण करने को मजबूर हैं?

    यह सारा झगड़ा सिर्फ आरपीएफ एसोसिएशन और उनकी मान्यता को लेकर है. अब जो मान्यता संसद के माध्यम से बहाल हुई है, उसे किसी खास कैडर की निहित स्वार्थता के चलते कैसे छीना जा सकता है? परंतु यह स्वार्थता लगातार आरपीएफ एसोसिएशन का पीछा कर रही है. इसके चलते एसोसिएशन को पिछले लगभग 20 सालों से लगातार सिर्फ अपने अस्तित्व की रक्षा करने में ही अपनी सारी ऊर्जा नष्ट करनी पड़ रही है, जिससे इसके गठन और इसकी मान्यता का सारा उद्देश्य ही लगभग चौपट हो गया है. इसके चलते आरपीएफ सदस्यों को न तो उचित सुविधाएं मिल पा रही हैं, न ही उनके अधिकारों की रक्षा हो पा रही है, और न ही उनकी सेवा संबंधी शिकायतों की कहीं कोई सुनवाई हो रही है. सभी राजनीतिक पार्टियां, सभी राजनीतिज्ञ, सभी सांसद और सरकारें एवं न्यायपालिका इत्यादि सभी उपरोक्त तमाम तथ्यों से बखूबी वाकिफ हैं, मगर ऐसा लगता है कि इनमें से किसी में भी इतना नैतिक साहस और आत्मबल नहीं बचा है कि वह एक खास कैडर के विरुद्ध जाकर सही और न्यायोचित कदम उठा सकें.

    संविधान की रक्षा के लिए संविधान की शपथ लेकर सत्तारूढ़ होने वाली सरकारें और उसके मंत्रीगण समस्त संवैधानिक स्थिति से बखूबी वाकिफ होने के बावजूद एक कैडर विशेष के दबाव में संवैधानिक संस्थाओं और मंत्रालयों को आपस में लड़ाने या लड़ाते रहने की तजवीज करते रहने के बजाय यदि वे इनके इस तरह के अंतर्विभागीय आपसी झगड़े स्पष्ट संवैधानिक स्थिति के मद्देनजर हमेशा के लिए निपटा दें, तो शायद यह संस्थाएं देश की प्रगति में अपना बेहतर योगदान दे सकती हैं. परंतु सरकारें और राजनीतिज्ञ ऐसा न करके देश और इसकी जनता के साथ संविधान के विरुद्ध अनैतिक एवं विश्वासघातात्मक आचरण कर रहे हैं. यह उचित नहीं है.

    अतः ‘रेलवे समाचार’ का मानना है कि भारतीय रेल में भी न सिर्फ विश्व की तमाम रेलों जैसी एकल सुरक्षा व्यवस्था कायम होनी चाहिए, बल्कि ब्रिटेन एवं चीन की तरह ही भारत में भी ट्रांसपोर्ट पुलिस जैसा अलग मंत्रालय भी गठित किया जाना चाहिए. इससे न सिर्फ रेलवे से गायब होने वाले बुकशुदा माल और यात्रियों के जान-माल की क्षति रोकने में भारी मदद मिलेगी, बल्कि इससे केंद्र सरकार को सालाना करोड़ों-अरबों रुपये की क्षति-पूर्ति नहीं देनी पड़ेगी. इस भारी बचत से देश का बड़े पैमाने पर बुनियादी विकास करना संभव हो सकेगा. हमारा यह भी मानना है कि आरपीएफ ऐक्ट के स्पष्ट प्रावधानों के मद्देनजर आरपीएफ में बाहरी प्रतिनियुक्तियों को अविलंब रोका जाना चाहिए. इसके लिए किसी भी पक्ष को किसी भी प्रकार की अदालती लड़ाई लड़ने की भी कतई कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि कानूनी प्रावधान बिलकुल स्पष्ट हैं. इसके साथ ही आरपीएफ एसोसिएशन को मान्यता के तहत प्रदत्त समस्त अधिकार बहाल किए जाने चाहिए, जिससे आरपीएफ कर्मियों की समस्याओं को यथासमय निपटाया जा सके.

सम्पादकीय