खतौली दुर्घटना के लिए जिम्मेदार एडीआरएम के विरुद्ध नहीं हुई कोई कार्रवाई?

    करीब 15 वर्षों से खूंटा गाड़कर दिल्ली मंडल में ही जमे हुए हैं आर.सी.गुप्ता

    विरोध के बावजूद ‘स्टोरकीपर’ ने दिया था आर. सी. गुप्ता को दूसरा विस्तार

    भ्रष्ट करतूतों के चलते दोयम दर्जे के रहे हैं मंडल के तमाम इंजीनियरिंग कार्य

    मेंबर्स की पोस्टिंग संबंधी सिफारिशों पर आंख बंद कर भरोसा न करें मंत्री/सीआरबी

    नई दिल्ली : खतौली-मंसूरपुर स्टेशनों के बीच 19 अगस्त को हुई जिस भीषण रेल दुर्घटना के कारण अधिकृत रूप से जो 23 निरीह और निर्दोष रेलयात्री असमय मौत का शिकार हुए और सैकड़ों अन्य घायल हुए थे, उसके लिए वास्तव में दिल्ली मंडल के एडीआरएम/टेक्निकल आर. सी. गुप्ता पूरी तरह से जिम्मेदार रहे हैं. परंतु उनके खिलाफ आज तक कोई भी विभागीय कार्रवाई नहीं की गई है. इससे दिल्ली मंडल सहित उत्तर रेलवे के समस्त अधिकारियों में भारी रोष व्याप्त है. जबकि इस दुर्घटना के कारण उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक आर. के. कुलश्रेष्ठ और मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) एम. एन. सिंह सहित तत्कालीन मेंबर इंजीनियरिंग, रेलवे बोर्ड ए. के. मित्तल को भी जबरन छुट्टी पर जाने का दंड भुगतना पड़ा.

    उल्लेखनीय है कि उत्तर रेलवे, दिल्ली मंडल के दिल्ली-सहारनपुर ब्रॉड गेज विद्युतीकृत खंड के सिंगल लाइन सेक्शन में खतौली-मंसूरपुर स्टेशनों के बीच किमी. संख्या 101/3-4 के पास 19 अगस्त को 17.47 बजे गाड़ी संख्या 18477, पुरी-हरिद्वार कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस की भयानक दुर्घटना में न सिर्फ पूरी ट्रेन डिरेल हुई थी, बल्कि उसके कई डिब्बे एक-दूसरे पर चढ़कर बुरी तरह चकनाचूर भी हुए थे. घोषित रूप से इस घटना में 23 यात्री असमय काल-कवलित और सैकड़ों घायल हुए, मगर जिस तरह यह पूरी गाड़ी चकनाचूर हुई, उसे देखते हुए और कई प्रत्यक्षदर्शियों तथा राहत कार्य में लगे कुछ रेल अधिकारियों ने ‘रेलवे समाचार’ के साथ अंतरंग बातचीत में स्वीकार किया था कि इस दुर्घटना में वास्तव में 200 से ज्यादा यात्री हताहत और सैकड़ों की संख्या में घायल हुए थे, जिसकी वास्तविक जानकारी बाहर नहीं जाने दी गई थी.

    ‘रेलवे समाचार’ को अपने विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार एडीआरएम/टी आर. सी. गुप्ता पिछले करीब 15-16 सालों से दिल्ली मंडल में ही खूंटा गाड़कर जमे हुए हैं. यहां उनकी पोस्टिंग पूर्व महाभ्रष्ट सीआरबी अरुणेंद्र कुमार ने अपनी सेवानिवृत्ति से कुछ दिन पहले इसलिए की थी कि जिससे रिटायरमेंट के बाद वह न सिर्फ उन्हें घरेलू कामकाज के लिए कार्यरत रेलकर्मी उपलब्ध करा सकें, बल्कि अपनी अवैध कमाई का कुछ हिस्सा भी उन्हें बदस्तूर पहुंचाते रहें. सूत्रों का कहना है कि जून 2017 में श्री गुप्ता का कार्यकाल समाप्त होने से पहले तत्कालीन डीआरएम ने तत्कालीन सीआरबी उर्फ ‘स्टोरकीपर’ ए. के. मितल से इस बात की सिफारिश की थी कि आर. सी गुप्ता का कार्यकाल न बढ़ाया जाए. परंतु उनके निवर्तमान होते ही ‘स्टोरकीपर’ ने जून में श्री गुप्ता को दिसंबर 2017 तक सेवा विस्तार देते हुए उन्हें दूसरा कार्यकाल दे दिया था.

    सूत्रों का यह भी कहना है कि चूंकि श्री गुप्ता कथित रूप से दिल्ली मंडल के तमाम इंजीनियरिंग कार्यों में भारी भ्रष्टाचार में लिप्त थे और हमेशा सिर्फ टेंडर्स के आवंटन में ही लगे रहते थे, जिससे उन्हें मोटा कमीशन प्राप्त हो रहा था, जबकि उनकी इन भ्रष्ट करतूतों से मंडल की इंजीनियरिंग ब्रांच के समस्त अधिकारी और कर्मचारी अत्यंत परेशान थे तथा इस संबंध में उनकी कई शिकायतें डीआरएम को मिल चुकी थीं. अतः तत्कालीन डीआरएम ने श्री गुप्ता से समस्त टेंडर वर्क हटाकर अन्य एडीआरएम को सौंप दिया था. बताते हैं कि इस बात के लिए श्री गुप्ता ने जब ‘स्टोरकीपर’ से शिकायत की थी, तब ‘स्टोरकीपर’ ने तत्कालीन डीआरएम से एक मौके पर श्री गुप्ता से टेंडर वर्क छीने जाने का उलाहना देते हुए उन्हें कुछ टेंडर वर्क पुनः सौंपने को कहा था. हालांकि सूत्रों का यह भी कहना है कि वर्तमान डीआरएम एम. एन. सिंह ने भी श्री गुप्ता को दूसरा कार्यकाल दिए जाने का विरोध किया था, परंतु उनके इस विरोध की कोई परवाह किए बिना ‘स्टोरकीपर’ ने श्री गुप्ता को एक्सटेंशन दे दिया था.

    दिल्ली मंडल के कई अधिकारियों ने उनका नाम न उजागर किए जाने की शर्त पर ‘रेलवे समाचार’ को बताया कि न सिर्फ खतौली की रेल दुर्घटना के लिए, बल्कि उससे पहले और बाद में हुई दिल्ली मंडल की सभी रेल दुर्घटनाओं और डिरेलमेंट्स के लिए एडीआरएम/टी आर. सी. गुप्ता ही पूरी तरह से जिम्मेदार हैं, क्योंकि टेंडर वर्क सहित समस्त इंजीनियरिंग कार्यों और मंडल में संरक्षा के इंचार्ज भी वही हैं. ऐसे में मंडल के अंतर्गत प्रत्येक दुर्घटना और संरक्षा कार्यों में हुई भारी चूक के लिए श्री गुप्ता के खिलाफ कारगर कार्रवाई करने के बजाय डीआरएम और जीएम को जिम्मेदार ठहराकर छुट्टी पर भेजा जाना सरासर अन्याय था. उनका यह भी कहना था कि श्री गुप्ता की लापरवाही के कारण जहां जीएम और डीआरएम को जबरन छुट्टी पर जाना पड़ा, वहीं न सिर्फ कई अधिकारियों एवं कर्मचारियों का निलंबन हुआ, बल्कि 13 फील्ड कर्मचारियों को नौकरी से भी बर्खास्त किया गया. जबकि खतौली सहित मंडल की तमाम दुर्घटनाओं और ट्रैक की दुर्दशा तथा सभी प्रकार के घटिया इंजीनियरिंग कार्यों के लिए जिम्मेदार रहे श्री गुप्ता के खिलाफ आज तक कोई भी कार्रवाई नहीं की गई है. इससे मंडल के सभी कर्मचारियों और अधिकारियों का मनोबल क्षीण हुआ है.

    इन अधिकारियों का यह भी कहना था कि एडीआरएम/टी आर. सी. गुप्ता के अब तक के कार्यकाल में जितने भी टेंडर्स का आवंटन हुआ है, उनकी गहराई से सीबीआई जांच करवाई जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि इसके साथ ही श्री गुप्ता को फौरन उत्तर रेलवे से बाहर ट्रांसफर किया जाना चाहिए, क्योंकि जब तक उन्हें उत्तर रेलवे से बाहर नहीं भेजा जाएगा, तब तक उनके तमाम गलत कार्यों की स्वतंत्र जांच संभव नहीं हो पाएगी. उन्होंने कहा कि इसके अलावा इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि दो-दो डीआरएम द्वारा विरोध किए जाने के बावजूद पूर्व सीआरबी ने श्री गुप्ता को किस आधार पर दूसरे कार्यकाल का विस्तार दिया? इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि श्री गुप्ता ने अरुणेंद्र कुमार सहित ऐसे कितने पूर्व अधिकारियों को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद उनके घरों पर कार्यरत रेलकर्मी उपलब्ध कराए?

    अपने बिरादर को दिल्ली मंडल में एडीआरएम बनवाने की जुगाड़ में हैं एमटीआर

    उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में ‘रेलवे समाचार’ को अपने सूत्रों से यह भी ज्ञात हुआ है कि अब मेंबर ट्रैक्शन, रेलवे बोर्ड (एमटीआर) अपने एक चहेते बिरादर राजेश कुमार सिंह, आईआरएसईई 1991 बैच, को किसी भी तरह दिल्ली लाने के बहाने दिल्ली मंडल में एडीआरएम बनवाने की जुगाड़ में हैं. विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि सेंट्रल हॉस्पिटल, उत्तर रेलवे के घोटाले में तत्कालीन डिप्टी सीईई/सी/निर्माण, उत्तर रेलवे रहे राजेश कुमार सिंह का 30% शेयर था, जिसमें खुद कदाचारी वर्तमान एमटीआर की भी संलिप्तता थी, जब वह निर्माण संगठन/उ.रे. के सीईई/सी हुआ करते थे. हालांकि इस शेयर होने वाली बात की पुष्टि नहीं हो पाई है. तथापि, यह सही है कि उक्त घोटाले की सभी फाइलें सीबीआई ने तभी अपने कब्जे में ले ली थीं. सूत्रों का कहना है कि इस मामले की सीबीआई जांच को दबाकर ही ‘कदाचारी महोदय’ एमटीआर बनने में सफल हुए हैं.

    इसके अलावा एमटीआर सहित इस घोटाले में शामिल रहे सभी लोगों ने अपने-अपने प्रभाव से उक्त सीबीआई जांच को दबा रखा है. अब रेल प्रशासन को यह देखना होगा कि रेलवे से भ्रष्टाचार को खत्म करने की रेलमंत्री और सीआरबी की मुहिम को पलीता लगाने पर ऐसे कितने अन्य कदाचारी आमादा हैं? सूत्रों का यह भी कहना है कि उपरोक्त मामले में अब तक बरी नहीं होने के कारण ही रेलवे बोर्ड ने राजेश कुमार सिंह को करीब 9-10 महीने पहले एसएजी प्रमोशन पर उत्तर रेलवे से दूर पूर्व तट रेलवे, भुवनेश्वर भेजा था.

    जानकारों का कहना है कि एमटीआर अपने आसपास हमेशा अपने जैसे ही कदाचारियों का जमावड़ा बनाए रखना पसंद करते हैं और धीरे-धीरे ऐसे तमाम अधिकारियों की पोस्टिंग उनकी मनचाही जगहों पर कर रहे हैं, जिनकी विश्वसनीयता सिरे से संदिग्ध रही है. प्रिंसिपल सीईई/म.रे. के पद पर हाल ही में की गई पोस्टिंग इस बात का साक्षात् प्रमाण है, जबकि उक्त पद पर मुंबई में ही अतिरिक्त चल रहे कई अधिकारी पोस्टिंग के इंतजार में थे. अतः उनकी पोस्टिंग संबंधी कतिपय सिफारिशों पर रेलमंत्री एवं सीआरबी को बहुत सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए.

सम्पादकीय