मैंने रेलवे को वैकल्पिक ब्रिज बनाने का सुझाव दिया था -डॉ. अशोक त्रिपाठी

    अधिकारियों ने समय पर निर्णय लिया होता, तो 23 कीमती जानें बचाई जा सकती थीं

    ‘मैंने अंग्रेजी दैनिक को यह कभी नहीं कहा कि पूर्व रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने ध्यान नहीं दिया!’

    मुंबई : एल्फिंस्टन रोड रेलवे स्टेशन पर 28 सितंबर को सुबह भारी भीड़ के समय हुई भीषण और मर्मांतक दुर्घटना में 23 निरीह एवं निर्दोष उपनगरीय यात्रियों की असमय मौत से पहले कई जन-प्रतिनिधियों सहित रेलवे बोर्ड द्वारा गठित यात्री सुविधा समिति (पीएसी) के सदस्य डॉ. अशोक त्रिपाठी ने भी इसी साल अप्रैल में किए गए निरीक्षण के बाद मध्य एवं पश्चिम रेलवे के अधिकारियों को सुझाव दिया था कि परेल और एल्फिंस्टन रोड रेलवे स्टेशनों को जोड़ने वाले वर्तमान पैदल ऊपरी पुल (एफओबी) को न सिर्फ चौड़ा किया जाए, बल्कि उसकी जगह एक नया और वैकल्पिक पुल भी शीघ्र बनाया जाना चाहिए. मुंबई के साथ ही पूरे देश को दहला देने वाली उक्त भीषण दुर्घटना के बाद डॉ. त्रिपाठी ने एक खास बातचीत में ‘रेलवे समाचार’ को बताया कि यदि संबंधित अधिकारियों ने समयानुसार निर्णय लिया होता, तो 23 लोगों की कीमती जानें बचाई जा सकती थीं.

    डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि पीएसी सदस्यों द्वारा हर महीने किसी न किसी रेलवे स्टेशन का निरीक्षण किया जाता है. इसके तहत समिति द्वारा संबंधित रेलवे स्टेशनों पर रेल अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराई गई यात्रियों से संबंधित सुविधाओं की गुणवत्ता, उनकी प्रकृति और भावी जरूरतों का निरीक्षण करके सुझाव भी दिए जाते हैं. उन्होंने कहा कि हमारी प्राथमिकता यात्रियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने की होती है. इसके साथ ही उपलब्ध सुविधाओं में यात्रियों की सहूलियतों के अनुसार बदलाव और बढ़ोत्तरी कराए जाने पर भी जोर दिया जाता है. उन्होंने बताया कि इसी साल अप्रैल में पीएसी के दो अन्य सदस्यों के साथ परेल स्टेशन का निरीक्षण करने के दौरान मध्य रेलवे के परेल स्टेशन से पश्चिम रेलवे के एल्फिंस्टन रोड रेलवे स्टेशन को जोड़ने वाले पैदल ऊपरी पुल का निरीक्षण किया था.

    उन्होंने बताया कि उनका निरीक्षण कार्यक्रम सुबह की भीड़ के समय हुआ था. परेल स्टेशन का मुआयना करने के दौरान उन्हें यह महसूस हुआ कि यहां दादर छोर पर जो नया एफओबी बनाया गया है, उसका कोई औचित्य फिलहाल साबित नहीं हो रहा है, क्योंकि उस पुल का प्रयोग भीड़ के समय भी यात्रियों द्वारा नहीं किया जा रहा था. उन्होंने कहा कि प्लेटफार्म पर यात्री सुविधाओं का निरीक्षण करने के बाद जब वह अपने अन्य सदस्यों के साथ उक्त कॉमन ब्रिज पर ऊपर चढ़े तो यात्रियों के चलने से उन्हें ब्रिज में कंपन होता महसूस हुआ, जिससे उन्हें तुरंत पुराने फरीदाबाद रेलवे स्टेशन के पुल की याद आ गई और उन्होंने उक्त एफओबी पर चलते हुए ओर-छोर निरीक्षण किया. इससे पुल में कंपन होने की बात सही साबित हुई.

    डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि पुल में कंपन के साथ ही उन्होंने यह भी देखा कि पुल का रख-रखाव सही ढ़ंग से नहीं किया जा रहा है. पुल की सीढ़ियों में लगी लोहे की कई पट्टियां टूटी मिलीं. इसके अलावा पुल के ढ़ांचे में भी कई जगह जंग लगी नजर आई थी. उन्होंने कहा कि इन सभी कमियों के बारे में उक्त निरीक्षण के दौरान उपस्थित रहे अधिकारियों को इस सुझाव एवं निर्देश के साथ बताया और नोट भी कराया गया था कि उन्हें शीघ्र ठीक किया जाए. उन्होंने यह भी बताया कि निरीक्षण के समय उक्त पुल पर कुछ कार्य भी किया जा रहा था. उन्होंने कहा कि परेल स्टेशन के प्लेटफार्म से पुल पर जाने वाली सीढ़ियों की हालत अत्यंत खराब थी. लगभग नाराजगी जताते हुए उपस्थित अधिकारियों को तत्काल उन सीढ़ियों को दिखाया गया था. डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि उसी समय उन्होंने उक्त पुल के पास एक अन्य वैकल्पिक पुल अविलंब बनाए जाने का सुझाव दिया था.

    उन्होंने कहा कि हमने उसी समय उपस्थित अधिकारियों से दो चीजें प्राथमिकता के आधार पर करने के लिए कहा था. पहली यह कि यात्रियों की सहूलियत और मुक्त आवाजाही के लिए सर्वप्रथम पुल की सीढ़ियों को अविलंब चौड़ा कर दिया जाए. दूसरी यह कि उक्त पुल के बीच में एक डिवाइडर बना दिया जाए, जिससे आने-जाने के रास्ते अलग होने से यात्रियों में होने वाला टकराव बचेगा. उन्होंने यह भी बताया कि उक्त निरीक्षण की रिपोर्ट समिति के चेयरमैन को सौंपी गई थी. बाद में उस पर रेलवे बोर्ड की मीटिंग में भी विचार-विमर्श हुआ था. परंतु उसके बाद क्या हुआ, इस बारे में तो रेलवे बोर्ड के संबंधित अधिकारी ही बेहतर बता सकते हैं. उनका कहना था कि हम सिर्फ यही कह सकते हैं कि रिपोर्ट पर उचित संज्ञान नहीं लिया गया. उन्होंने कहा कि न सिर्फ रेलवे बोर्ड से बल्कि डीआरएम, मुंबई सेंट्रल, पश्चिम रेलवे से भी उन्होंने उक्त पुल के बारे में अविलंब उचित कदम उठाए जाने का निवेदन किया था.

    उन्होंने आगे कहा कि सिर्फ परेल-एल्फिंस्टन रोड रेलवे स्टेशनों के ही एफओबी बुरी हालत में नहीं हैं, बल्कि मध्य रेलवे की तरफ करी रोड, चिंचपोकली, सैंड्हर्स्ट रोड, मस्जिद रोड, दादर, माटुंगा, सायन, कुर्ला इत्यादि सहित पश्चिम रेलवे की ओर मरीन लाइंस, चर्नी रोड, ग्रांट रोड, मुंबई सेंट्रल, महालक्ष्मी, लोअर परेल, बोरीवली, गोरेगांव, वसई, नालासोपारा और विरार आदि स्टेशनों के पैदल ऊपरी पुलों की हालत अत्यंत खराब है. उन्होंने यह भी कहा कि यह सभी पुल अत्यंत संकरे होने के कारण कालबाह्य हो चुके हैं. उनका कहना था कि पूरे मुंबई उपनगरीय नेटवर्क के अंतर्गत आने वाले सभी रेलवे स्टेशनों पर काफी चौड़े और मजबूत पुलों के बनाए जाने की अविलंब आवश्यकता है.

    अंत में जब ‘रेलवे समाचार’ ने डॉ. त्रिपाठी से यह पूछा कि क्या उन्होंने परेल-एल्फिंस्टन रोड एफओबी के जर्जर होने और वहां अविलंब एक अन्य वैकल्पिक एफओबी बनाए जाने के बारे में मुंबई के एक अंग्रेजी दैनिक को दिए गए अपने साक्षात्कार में यह कहा था कि ‘आपने तत्कालीन रेलमंत्री सुरेश प्रभु को उक्त निरीक्षण से संबंधित अपनी रिपोर्ट सौंपकर तत्काल कुछ किए जाने का सुझाव दिया था, मगर श्री प्रभु ने आपकी बात पर ध्यान ही नहीं दिया.’ इस पर डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि ‘उन्होंने श्री सुरेश प्रभु का तो कहीं नाम ही नहीं लिया था. परंतु ऐसा लगता है कि संबंधित रिपोर्टर ने अपनी खबर को सनसनीखेज बनाने के उद्देश्य से हमारे मुंह में शब्द डालकर अपनी बात कह दी, जो कि न सिर्फ अनुचित है, बल्कि इसे पत्रकारिता के मापदंड के अनुरूप भी नहीं कहा जा सकता है.’

    सीआरबी का भी खेल बिगाड़ने हेतु सक्रिय हुए कुछ भ्रष्ट, कामचोर और अकर्मण्य अधिकारी

    बहरहाल, एल्फिंस्टन रोड रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने वाले एफओबी की सीढ़ियों पर दैवयोग से घटित हुई उक्त भीषण और अमानवीय दुर्घटना के बाद न सिर्फ सत्ता पक्ष ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी, बल्कि इस हादसे ने तमाम मुर्दा पड़ी विपक्षी पार्टियों को भी मुंह खोलने और अपनी मृतप्राय राजनीति को चमकाने का एक बढ़िया मौका उपलब्ध करा दिया. यदि सामान्य रूप से देखा जाए, तो इस हादसे के लिए रेलवे कतई जिम्मेदार नहीं है. समय से नए एफओबी का काम शुरू न करने के लिए तकनीकी रूप से रेलवे को अवश्य जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. परंतु इसके लिए राजनेता भी उतने ही जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने खतो-किताबत तो की, मगर काम करवाने का पीछा करना जरूरी नहीं समझा.

    पिछले तीन सालों के दौरान रेलवे में तीन रेलमंत्री हो गए, मगर सिवाय लफ्फाजी और मीडियाबाजी के अन्य कोई जमीनी कार्य नहीं हुआ. गाड़ियों की दुर्दशा, लेट-लतीफी बदस्तूर जारी है. अकर्मण्य, नाकाबिल और भ्रष्ट अधिकारी मौके की जगहों पर काबिज हैं, ज्स्ब्की भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे अधिकारियों के सामने कर्तव्यनिष्ठ, काबिल एवं ईमानदार अधिकारी लाचार और बेबस हैं! करीब बीस साल बाद भारतीय रेल को जमीन से जुड़ा एक अत्यंत काबिल, कर्तव्यनिष्ठ, सरल और ईमानदार सीआरबी मिला है, जो तमाम बिगड़ी हुई चीजों को ठीक करने के प्रयास में पहले ही दिन से लगा हुआ है, मगर कुछ भ्रष्ट, कामचोर और अकर्मण्य अधिकारी उसका भी खेल बिगाड़ने के लिए सक्रिय हो गए हैं. ऐसे में यदि कर्तव्यपरायण रेलकर्मी, रेलवे और रेलकर्मियों का भला चाहने वाले सीआरबी का साथ नहीं देंगे, तो भारतीय रेल का ईश्वर ही मालिक है, यानि इसका निजीकरण होना तय है.

सम्पादकीय