यदि संरक्षित और सुरक्षित रेल संचालन करना है तो..

    प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित की जाए जवाबदेही और उत्तरदायित्व

    रेलवे में व्याप्त बीमारी की जड़ है नौकरशाही का सुसंगठित भ्रष्टाचार

    सही इलाज नहीं होगा, न तो बीमारी ठीक होगी, न ही रेल पटरी पर रहेगी

    संरक्षा नियमों और जी एंड एसआर को नजरअंदाज करके दौड़ाई जा रही है रेल

    अधिकारियों की जवाबदेही तय किए बिना व्यवस्थागत खामियां दूर करना संभव नहीं

    सुरेश त्रिपाठी

    विगत में पूर्व रेलमंत्री पवन कुमार बंसल का इस्तीफा दो शीर्ष रेल अधिकारियों की आपसी प्रतिस्पर्धा का नतीजा था. हाल ही में सुरेश प्रभु को भी एक नाकाबिल सीआरबी के कारण इस्तीफा देकर रेलमंत्री पद से जाना पड़ा. यदि ऐसा ही चलता रहा, तो अभी न जाने और कितने रेलमंत्रियों की बलि चढ़ेगी? किसी रेलमंत्री के इस्तीफा देने से रेल दुर्घटनाएं रुक जाएंगी? यदि ऐसा होता तो गृहमंत्री के इस्तीफा देते ही आतंकवाद भी खत्म हो जाना चाहिए. अस्पताल के किसी डॉक्टर या इंचार्ज के इस्तीफा देने से यदि बीमार लोग ठीक होने लगते, पर्यावरण मंत्री के इस्तीफे से यदि बरसात होने लगती, उद्योग मंत्री के इस्तीफे से यदि बीमार उद्योग सुधर जाते, तो प्रधानमंत्री के इस्तीफा देने से तो देश की तमाम समस्याएं अपने आप ही हल हो जानी चाहिए!

    परंतु सच्चाई यह है कि इस सबसे कुछ होने वाला नहीं है. मुर्दे के बाल काट देने से मुर्दा हल्का नहीं हो जाता, हमें वास्तविकता को समझना होगा. जब तक हम बीमारी की जड़ में जाकर उसका सही इलाज नहीं करेंगे, तब तक न बीमारी ठीक होगी और न ही रेल पटरी पर रहेगी. बीमारी की जड़ नौकरशाही में व्याप्त सुसंगठित भ्रष्टाचार है. एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी, यानि गड़बड़ कहीं है और दोषी किसी और को ठहराकर कुटिल नौकरशाही खुद पर गौरवान्वित हो रही है. परंतु सोचने वाली बात यह है कि हाथ काट देने से क्या पैर का रोग दूर हो जाएगा? अतः जब तक लापरवाह नौकरशाही की जवाबदेही और उत्तरदायित्व सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक किसी भी व्यवस्थागत रोग को दूर कर पाना संभव नहीं है.

    इसी तरह जब तक दुर्घटना के वास्तविक कारणों और उनके ठोस निदान नहीं ढूंढ़े जाएंगे, और उन कारणों को जड़-मूल से समाप्त करने का बीड़ा नहीं उठाया जाएगा, तब तक चाहे रेलमंत्री, या प्रधानमंत्री इस्तीफा देते रहें, रेल तो गिरेगी ही. आज यदि अध्ययन किया जाए, तो रेलवे की ही रूल बुक जी एंड एसआर, जिसे रेल कर्मचारी/अधिकारी ‘रेल गीता’ भी कहते हैं, तथा संबंधित विभागों के मैन्युअल्स के हिसाब से भी यदि चाहें भी तो 70% रेल नहीं चल सकती है. सच्चाई यह है कि सारे नियमों को ताक पर रखकर और सभी संरक्षा नियमों को नजरअंदाज करके रेल दौड़ाई जा रही है.

    जब कोई कर्मचारी नियम की दुहाई देकर गाड़ी चलाने से मना करता है, यानि रेल और राष्ट्र के हित में कार्य करता है, तो उसे कार्य में व्यवधान डालने वाला या अड़ीबाज कर्मचारी कहकर उसको आका के दरबार में बुला लिया जाता है और उसको इतनी यातना दी जाती है कि अन्य सैकड़ों कर्मचारियों की भी रूह कांप उठती है. ऐसे में कर्मचारी चुपचाप गलत आदेशों का पालन करते हुए काम करते रहते हैं.

    जैसे एक कौआ मारकर खेत में टांग दिया जाता है, जिससे अन्य कौए डरकर खेत में नहीं आते. ठीक उसी तरह नियम की दुहाई देने वाले रेलकर्मी को ‘कौआ’ बना दिया जाता है. इसका गणित यह है कि ऐसे में 90% गाड़ियां अपनी संरक्षा कमियों के बावजूद भगवान भरोसे गंतव्य पर पहुंच जाती हैं. यदि 10% गाड़ियां कहीं दुर्घटनाग्रस्त हो भी गईं, तो उसे मानवीय भूल पर थोपकर अथवा उपरोक्त वर्णित नियम की किताबों की दुहाई देकर संबंधित रेलकर्मी को दोषी बताते हुए अपने-अपने पापों को छिपाने में नौकरशाही कामयाब हो जाती है. इसके बावजूद भी यदि नौकरशाही का मन नहीं भरता, तब शुरू होता है दुर्घटना की आड़ में रेल राजस्व को फूंकने का प्लान. रेल दुर्घटनाएं भी रेलवे की नौकरशाही के लिए अपनी जेबें भरने का एक साधन बनी हुई हैं, जिससे नए-नए प्लान बनाकर रेलवे को दोनों हाथों से लूटा जा सके.

    सुरक्षित रेल संचालन के लिए अत्यावश्यक है ट्रैक का फिट होना और ट्रैक फिट होने के लिए आवश्यक है कि..

    1. मैन्युअल में निर्दिष्ट विशेष पत्थर की ही गिट्टी प्रयोग में लाई जाए.

    2. मैन्युअल में निर्दिष्ट गहराई तक कुशन डाला जाए, जो कि अक्सर नहीं किया जाता है.

    3. एमबीसी स्लीपर तथा रेल के बीच में लगने वाले रबर के पैड तथा लाइनर प्रत्येक स्लीपर पर लगे होने चाहिए और पीरियोडिकली बदले जाने चाहिए.

    4. गिट्टी प्रॉपर ऐंगल में कटी हो, न कि कहीं के भी पत्थर लाकर भर दिए जाएं. अक्सर नीचे के कुशन, जो ऊपर से दिखता नहीं है, में बिना मानक के पत्थर प्रयुक्त किए जाते हैं.

    5. स्लीपर और रेल फिट करने के लिए प्रयुक्त चाभी तथा रेल के बीच लगने वाला लाइनर हर चाभी के साथ लगा होना अनिवार्य होता है, अन्यथा स्लीपर में गड्ढे पड़ जाते हैं. बाहर से ठीक दिखने वाला स्लीपर वास्तव में अंदर से अपना मानक खो चुका होता है, जो रेल फ्रैक्चर का कारण बनता है. इसी से डिरेलमेंट होते हैं.

    6. सभी तरह के क्रॉस-ओवर की पुनर्समीक्षा होनी चाहिए. यह किसी भी जगह 30 किमी. प्रति घंटे से कम न हों. परंतु इसमें इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस फिटनेस का स्टैंडर्ड मैन्युअल के मुताबिक हो, न कि ऑपरेटिंग विभाग अपनी मनमानी से इसे तय करे.

    7. कहीं-कहीं यह भी देखा गया है कि इंजीनियरिंग विभाग की ओर से फिट न देने के बावजूद ऑपरेटिंग विभाग ने क्रॉस-ओवर की ज्यादा स्पीड निर्धारित कर दी. इसके कारण कई डिरेलमेंट हो गए. इसका प्रत्यक्ष प्रमाण कल्याण स्टेशन के पास का क्रॉस-ओवर है, जहां लगातार गाड़ियां पटरी से उतरी हैं.

    8. यार्डों, लोको शेड, कारशेड की लाइनों की मरम्मत का भी ध्यान रखना बेहद अनिवार्य है. देखा गया है कि चूंकि यहां कम स्पीड से गाड़ियों का आवागमन होता है, इसलिए यहां रखरखाव की परवाह ज्यादा नहीं की जाती है. उदाहरण के तौर पर कुर्ला कारशेड में आज भी 90 पौंड की 1954-56 की बनी रेलें उपयोग में लाई जा रही हैं, जिनका उपयोग भारतीय रेल में वर्षों पहले बंद किया जा चुका है.

    9. अनमैन्ड लेवल क्रासिंग को सब-वे अथवा फ्लाईओवर बनाकर तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए. यदि यह दोनों विकल्प संभव न हों, तो तत्काल प्रभाव से वहां गेटमैन नियुक्त किए जाएं.

    10. यह कैसा संवेदनहीन और अमानवीय विचार है कि गेटमैन की तनख्वाह देकर उनके बच्चों का पेट पालना और रोजगार को बढ़ावा देना रेलवे को असहनीय है, परंतु करोड़ों की आर्थिक और हजारों मानवीय प्राणों की क्षति रेलवे को सहर्ष स्वीकार है?

    11. रेल खंड में गाड़ियों का घनत्व (सेक्शनल कैपेसिटी) बढ़ाने के नाम पर यदि इसी तरह भुलावे वाले सिग्नल (कन्फयूजिंग सिग्नल) लगते रहे, तो दुनिया के किसी भी अत्याधुनिक सिस्टम के इस्तेमाल से रेलवे में होने वाली ‘स्पैड’ की घटनाओं को खत्म नहीं किया जा सकता. यदि सुरक्षित रेल संचालन करना है, तो सिग्नल सुस्पष्ट जगह पर लगाए जाएं. पहाड़ी या लगातार घुमाव वाली जगहों पर वार्नर अथवा को-ऐक्टिंग सिग्नल लगाए जाने चाहिए, जिनमें एक परमिसिबल सिग्नल हो. जैसे ‘एडिशनल डिस्टेंस सिग्नल’ एक अच्छा प्रयास हो सकता है.

    12. ऑटोमेटिक सेक्शन में प्रत्येक सिग्नल 800 मीटर से एक किमी. की दूरी पर और सुस्पष्ट जगह पर स्थापित होना चाहिए. उससे कम दूरी पर सिग्नल न लगाए जाएं, क्योंकि तब ये सिग्नल चालक को कन्फ्यूज करते हैं और इससे राजस्व की बरबादी होती है.

    13. स्टेशन सीमा में होम सिग्नल से एडवांस सिग्नल के बीच स्टार्टर सिग्नल के अलावा कोई अन्य सिग्नल न लगाए जाएं. होम सिग्नल ही सीधे प्लेटफार्म निर्धारित करें और उसमें डायवर्जन के साथ-साथ प्लेटफार्म नंबर भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होना चाहिए.

    14. क्रॉस-ओवर के पास से सिग्नलों का जाल हटा दिया जाए. इससे दुर्घटनाओं में कमी आ जाएगी. प्रत्येक डायवर्जन सिग्नल क्रॉस-ओवर से करीब 100 मीटर पहले हो तथा क्रॉस-ओवर खत्म होने के बाद कम से कम 25 से 40 मीटर दूर प्रॉपर लाइन का सिग्नल हो. इससे कोई कन्फ्यूजन नहीं होगा. मुंबई मंडल के ऑटो सेक्शन में ऐसा कहीं भी नहीं किया गया है.

    15. प्लेटफार्मों के बीच में लगे सभी सिग्नल हटा दिए जाएं, क्योंकि उनकी ऊंचाई कम होती है और प्लेटफार्म पर लटके अनेक बोर्ड, तरह-तरह के बल्ब तथा सामान से लदी गाड़ियां (पार्सल) उन सिग्नलों को देखने में अवरोध पैदा करती हैं.

    16. पहाड़ी रास्तों और घाट सेक्शनों से लंबी-लंबी मालगाड़ियां न गुजारी जाएं, यानि टनेज कम रखा जाए, क्योंकि अत्यंत बढ़ा हुआ ट्रैक्टिव एफर्ट धीरे-धीरे पहाड़ी के पत्थरों को ढीला कर देता है, जिससे लैंड स्लाइडिंग जैसी दुर्घटनाएं होती हैं. इससे जान-माल की भारी क्षति होती है और रेलवे को करोड़ों का नुकसान भुगतना पड़ता है.

    17. फ्रेट कॉरिडोर के चल रहे कार्य की जगह वर्किंग लाइन तथा गतिपूर्ण कार्य के बीच स्पष्ट दिखने वाला पार्टिशन लगाया जाए, जो अनेक जगह पर नहीं लगाया गया है. यही दुर्घटना का कारण बनता है.

    18. बड़े यार्डों में सीएंडडब्ल्यू डिपो पुनः चालू किए जाएं तथा कोई भी गाड़ी सघन परीक्षण के बिना अथवा इनवैलीड बीपीसी के रवाना न की जाए. सीएंडडब्ल्यू की मोबाइल टीम भी हो, जो स्टेबल लोड का परीक्षण करके उसे फिट सर्टिफिकेट दे सके. रेलवे ने सीएंडडब्ल्यू डिपो खत्म कर अरबों रुपयों का नुकसान उठाया है.

    19. आज बीपीसी की वैलिडिटी हजारों किमी. की होती है. अतः रनिंग व्हीकल के लिए इतनी बड़ी जोखिम लेना उचित नहीं है. इसके बावजूद बीपीसी इनवैलिड हो जाते हैं, फिर भी गाड़ियां चलाई जा रही हैं. इस तथ्य पर अविलंब पुनर्विचार होना चाहिए.

    20. बरसात के समय अक्सर सिग्नलों में खराबी आती है. खराबी आने पर यदि सिग्नल (मोस्ट रिस्ट्रिक्टेड एस्पेक्ट) लाल हो जाए, तब तो ठीक है, पर बांबिंग करना या मल्टीकलर डिस्प्ले करना अथवा प्वाइंट के सही ऑपरेट न होने पर भी सिग्नल आ जाना आदि कमियां नजरअंदाज नहीं की जा सकती हैं. अक्सर डिरेलमेंट तथा ऐक्सीडेंट का यही कारण भी रहा है. इस पर गहन विचार किए जाने की आवश्यकता है.

    21. जहां बात मानवीय भूल की आती है, वहां सबसे पहले लोको पायलट पर ही ध्यान जाता है. रेलवे बोर्ड के एक निर्देश में कहा गया है कि ऐसे अधिकांश मामले ओवर ऑवर्स के कारण नहीं, बल्कि डिटेल टेस्ट के बाद ड्यूटी आने पर हुए हैं. इस बात को नकारा नहीं जा सकता. इसके लिए रेलवे ने लोको पायलट्स के परिवारों के साथ भी अलग-अलग मंडलों में बैठक करके उनकी पत्नियों को दोषी मानते हुए बिना सिर-पैर की बातें करके और बिना मांगे सलाह देकर रेलवे ने समाज में अपनी कथित सहृदयता का परिचय देने का निरर्थक प्रयास किया. परंतु जब लोको पायलट की पत्नियों ने संबंधित रेल अधिकारियों से विनम्रतापूर्वक कुछ मानवीय प्रश्न किए, तो वे चुप्पी साधकर वहां से भाग खड़े हुए और उनकी दरियादिली का यह तथाकथित मानवीय प्रयास हवा हो गया.

    22. अधिकारियों को यह समझ में नहीं आता है कि लोको पायलट भी लोको में लगी मशीनों की तरह कंटीन्युअस रोटेटिंग मशीन न होकर एक इंसान ही होता है. उसका भी परिवार होता है, वह खुद भी बीमार होता है और उसके परिवार में भी बीमारी-अजारी होती है, वह भी एक समाजिक प्राणी होता है. अतः उसको बीमारी में छुट्टी की भी आवश्यकता होती है. परंतु आज भी भारतीय रेल में तकरीबन 40% लोको पायलट्स की कमी के चलते उनको न तो सिक लीव मिलती है, और न ही बीमारी अथवा आपातकालीन स्थिति में डॉक्टर उन्हें सिक में रखते हैं. रेलवे अस्पताल के डॉक्टरों का सिर्फ यही कहना होता है कि डीआरएम ने लेटर भेजा है. यानि लोको पायलट्स के मामले में रेलवे के डॉक्टर चपरासी जैसा कार्य करते हैं.

    23. जब कोई कर्मचारी खुद की, बीवी-बच्चों की या माता-पिता की बीमारी में ड्यूटी पर आएगा, तो उससे गलती होना स्वाभाविक है. अतः संरक्षा कोटि की रिक्तियों को सर्वप्रथम मुख्य वरीयता के आधार पर भरा जाना चाहिए. संरक्षा कोटि से ‘ओवरटाइम’ शब्द हमेशा के लिए निकाल दिया जाना चाहिए. शताब्दी, दूरंतो आदि के हाल्ट गिनीज बुक में नाम डालने के लिए नहीं, बल्कि यह सोचकर बनाए जाएं, कि उसे कोई इंसान ही चलाने वाला है, जो हमारे जैसा ही है, जिसे बरसात, ठंड में डेढ़-दो घंटे के अंतराल में पेशाब भी लगती होगी, जो इंसान होने के कारण रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लगातार काम करने के कारण नींद से भी परेशान होता होगा.

    24. चालकों का लिंक ऐसा बनाया जाए कि लगभग हर पांच घंटे में लोको स्टाफ बदला जाए. 110-140 किमी. प्रति घंटे की गति से भागने वाली गाड़ी के पथ का लगातार निरीक्षण और कंट्रोलिंग इत्यादि कोई खेल नहीं है, बल्कि एक ऐसी टीम बनाई जाए, जो एक माह तक डिटेल-टू-डिटेल चालक के साथ काम करे, तत्पश्चात उसके बारे में निर्णय लिया जाए. इससे शायद कुछ नियम मानवीय आधार पर बनाए जा सकेंगे.

    25. किसी भी स्थिति में चालक को अनभिज्ञ सेक्शन, जहां का उसे लर्निंग रोड न हो, में न भेजा जाए. अक्सर ऐसा देखा गया है कि फ़ॉल्स मैसेज देकर या लोको इंस्पेक्टर को भेजकर अथवा डरा-धमकाकर चालकों से ऐसी जगहों पर बलात कार्य कराया जाता है. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अधिकारी जानते हैं कि कोई भी चालक अपनी नौकरी गंवाने या जान जाने का जोखिम नहीं लेगा. इसी आधार पर 99% गाड़ियां चलाई जा रही हैं. यदि एक भी स्पैड, डिरेलमेंट या ऐक्सीडेंट हो जाता है, तो चालक को दोषी ठहराकर अधिकारी अपनी गलती तो छुपा लेते हैं. परंतु क्या राष्ट्रीय संपत्ति की क्षति और इंसानी जानों की हानि की कोई कीमत नहीं है?

    26. इनवैलिड बीपीसी पर गाड़ी चलवाना तुरंत बंद किया जाए. इसे खेल न समझा जाए. चालक और गार्ड से परीक्षण की खानापूर्ति करवाकर बलात गाड़ी चलवाना और दुर्घटना होने पर उनके ऊपर ही दोष मढ़कर मामले को रफादफा करना भी देशद्रोह है. प्रत्येक उस कार्य, जो ट्रेन रनिंग के लिए सुरक्षित नहीं है, को देशद्रोह की श्रेणी में डाला जाना चाहिए. जी एंड एसआर से गाड़ी को किसी भी तरह चलवा लेने के एसआर तुरंत निकलवा दिए जाने चाहिए. हमेशा एक सा ही नियम लागू होना चाहिए, यही देश हित में होगा. अत्यंत आपातकालीन स्थिति, यथा ऐक्सीडेंट, डिरेलमेंट आदि की विषम परिस्थिति में हर असंभव परिचालन करवाया जा सकता है, परंतु उसके लिए मंडल अधिकारियों की पूरी टीम को जिम्मेदारी लेनी चाहिए. हर अधिकारी भली-भांति यह जानता है कि चालक किसी भी विषम परिस्थिति में सफलतापूर्वक गाड़ी चलाने में सक्षम होता है.

    27. भारतीय रेल का ऐसा एक भी इंजन नहीं है, जिसकी हेडलाइट में 240 मीटर की दूरी तक भी स्पष्ट देखा जा सके, जबकि यह नियम 150 वर्ष पूर्व का है. यदि नई टेक्नोलॉजी की दुहाई दी जाए, तो अब एक किमी दूर तक दिखना चाहिए. ऐसी स्थिति में इंजनों की हेडलाइट, वाइपर, कैब, सिटिंग, सेंडर इत्यादि सभी व्यवस्थाएं हमेशा दुरुस्त होनी चाहिए. जबकि इन पर कभी ध्यान ही नहीं दिया जाता है. रनिंग रूम्स की दुर्दशा को सुधारना अत्यंत आवश्यक है. मुंबई मंडल के रनिंग रूम, बोर्ड के तमाम निर्देशों के बावजूद भैंस के तबेले जैसे हैं. कहीं भी कुक नहीं है. पेटीवाले, कॉल बॉय, बेयरर जली-फुंकी रोटियां खिला रहे हैं. जब रेलवे को चालकों की परफार्मेंस एकदम दुरुस्त चाहिए, तो फिर व्यवस्था भी वैसी ही करनी होगी.

    28. डिरेलमेंट, ऐक्सीडेंट रोकने के लिए आवश्यक है कि सभी यार्डों में शंटिंग प्रॉपर तरीके से की जाए. लगभग सभी यार्डों से असिस्टेंट लोको पायलट को हटा लिया गया है. मध्य रेलवे, मुंबई मंडल में भी ऐसा ही प्रयास किया जा रहा है. जबकि मालगाड़ियां हनुमान की पूंछ की तरह लगातार लंबी होती जा रही हैं. स्टाफ की कमी के चलते लगभग हर यार्ड में भगवान भरोसे शंटिंग कार्य हो रहा है. यदि किसी ने नियम की बात की, तो अन्य लोगों की दुहाई देकर या डराकर उससे भी गलत कार्य करवाया जाता है. और जब कभी कुछ गलत होता है, तो किसी न किसी कर्मचारी को दोषी करार देकर अधिकारी वर्ग द्वारा अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है.

    29. मुंबई मंडल, मध्य रेल के ऑटोमैटिक सेक्शन के सिग्नलों की पुनर्समीक्षा होना अत्यंत आवश्यक है. वर्तमान में मुंबई मंडल के स्वचालित खंड में लगे 40 प्रतिशत सिग्नल अनावश्यक हैं. ये अनावश्यक सिग्नल भी हादसों की वजह हैं. ‘रेलवे समाचार’ इस विषय में पहले भी विस्तार से लिख चुका है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गाड़ियों की लंबाई बढ़ने के कारण 400 मीटर तथा उससे भी कम दूरी पर लगे सिग्नल अवरोध की तरह हैं. सही तथा स्पष्ट जगह सिग्नल न लगे होने के कारण हादसे होते रहते है. यह विषय अनावश्यक व्यय का भी कारण है. अतः रेल प्रशासन अपनी हठ त्यागकर इस पर पुनर्विचार करे. निश्चित ही इसके अच्छे परिणाम आएंगे.

    30. यदि रेल प्रशासन ऐक्सीडेंट या स्पैड की वास्तविकता की गंभीरतापूर्वक जांच करेगा, तो अधिकांश मामलों में इसके पीछे पंक्चुअलिटी का कारण छिपा मिलेगा. ट्रैफिक मूव करने के लिए कई-कई घंटे तक लूपिंग करके गाड़ियां चलाई जाती हैं. यह निश्चित है कि सैद्धांतिक रूप से इसे कोई भी अधिकारी स्वीकार नहीं करेगा, परंतु वास्तविकता को छिपाया भी नहीं जा सकता है.

    31. सच्चाई यह है कि कोई भी अधिकारी अपने सिर विलंब लेना नहीं चाहता. भारी जोखिम लेकर गाड़ियां भगाई जाती हैं. 99 बार सब ठीक रहता है, तब किसी को पता नहीं चलता, यदि एक बार भी कुछ गलत हो जाता है, तो हंगामा मच जाता है. इसे भी मानवीय भूल करार देकर सब कुछ रफादफा कर दिया जाता है.

    32. समयपालन के दबाव में जब चालक बेतहाशा गाड़ी भगाकर समय पर गंतव्य पर पहुंचने की जोखिम लेता है, तभी अधिकतर स्पैड होते हैं. भारतीय रेल में रोजाना झूठे एलसी, टीएन नंबर देकर न जाने कितनी गाड़ियां गलत तरीके से चलवाई जा रही हैं. ओवर ऑवर्स कार्य कराना भी खतरे को आमंत्रित करना है. जहां मानसिक एवं शारीरिक रूप से थका हुआ व्यक्ति समर्पण से नहीं, बल्कि भय से कार्य करता है. वहीं खतरे की संभावना बनी रहती है. इसका तात्पर्य यह नहीं है कि पंक्चुअलिटी मेनटेन न की जाए. समयपालन तो प्रत्येक रेलकर्मी का पहला कर्तव्य है. परंतु जब खतरे की संभावना हो, तो सर्वप्रथम रेल संपत्ति और यात्रियों के जान-माल की सुरक्षा की जानी चाहिए और समयपालन को दूसरे स्थान पर रखा जाना चाहिए.

    अंत में यदि संरक्षित और सुरक्षित रेल संचालन करना है और स्पैड की घटनाएं भी बचानी हैं तथा रेल दुर्घटनाएं भी खत्म करनी हैं, भारतीय रेल के कीमती राजस्व का अपव्यय भी रोकना है तथा जान की जोखिम को भी कम करना है, तो जेएजी एवं इससे ऊपर के अधिकारी वर्ग को अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए. तभी सब कुछ ठीक होगा. ऐसा हम किसी द्वेष भावना से नहीं, बल्कि उपरोक्त तमाम वास्तविकताओं के आधार पर कह रहे हैं.

सम्पादकीय