रेलवे की मूलभूत नीतियों से रेलमंत्री का कोई सरोकार नहीं

    रेलवे के वर्तमान निजाम में सेफ्टी, सिक्योरिटी और पंक्चुअलिटी से अनभिज्ञ रेलकर्मी

    यार्डो, कारखानों और डिपुओं में उपलब्ध नहीं हैं पर्याप्त एवं गुणवत्तापूर्ण स्पेयर पार्ट्स

    अपर्याप्त स्टाफ के चलते, खुशी से नहीं, भारी दबाव में काम करने को मजबूर रेलकर्मी

    उचित रखरखाव नहीं, उपेक्षित एवं हिचकोले खाता ट्रैक, सिर्फ ट्वीटर पर हो रहा है कार्य

    ‘कलर ब्लाइंड’ सीआरबी और ‘सोशल मीडिया ओरिएंटेड’ रेलमंत्री को अविलंब हटाया जाए

    सुरेश त्रिपाठी

    भारतीय रेल में एक और भीषण एवं अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना घटित हो गई. शनिवार, 19 अगस्त की शाम को करीब 5.50 बजे दिल्ली मंडल, उत्तर रेलवे के अंतर्गत खतौली-मुजफ्फरनगर के बीच गाड़ी सं. 18477, पुरी-हरिद्वार कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस के 14 डिब्बे डिरेल हो गए. दुर्घटना की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां कुछ डिब्बे एक-दूसरे के ऊपर चढ़ गए, वहीं कुछ डिब्बे पटरी के पास बनी झुग्गियों में घुस गए. जबकि डिब्बों के ऊपर पुरुष एवं महिला यात्री लटकते हुए नजर आए. एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड हुए डिब्बों को गैस कटर से काटकर यात्रियों को बाहर निकाला गया. दुर्घटना के करीब पांच घंटे बाद भी राहत एवं बचाव कार्य जारी था, लाइन को क्लियर नहीं लिया जा सका था. 23 निरीह और निर्दोष यात्रियों की मौत हो चुकी थी, जबकि सैकड़ों यात्री अंग-भंग-अपंग होकर बुरी तरह घायल हुए हैं.

    देश में घटने वाली प्रत्येक महत्वपूर्ण घटना पर तुरंत माननीय प्रधानमंत्री द्वारा ट्वीटर पर उसकी खबर ली जाती है, मगर गोरखपुर में हुई 67 नौनिहालों की असमय मौत की घटना पर प्रधानमंत्री ने ट्वीटर पर फौरन कुछ नहीं कहा. दूसरी तरफ हमारे माननीय रेलमंत्री ने दुर्घटना के तुरंत बाद ट्वीटर पर ही इसकी जांच और मुआवजा राशि की घोषणा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री करते हुए हमेशा की तरह रश्म-अदायगी कर दी. यहां इस बात का स्मरण करवाना जरूरी है कि अमेरिका और वियतनाम के बीच हुए युद्ध में वियतनाम की ऐतिहासिक जीत इसलिए हुई थी, क्योंकि उसके पास देशभक्त और समर्पित मानव-संसाधन था, जबकि उसके सामने अमेरिका न सिर्फ बहुत बड़ी हस्ती था, बल्कि अत्यंत उच्चकोटि की उन्नत युद्ध तकनीक से भी लैस था.

    जबकि हमारे रेलमंत्री न सिर्फ साफ-सफाई और टुटपुंजिया उदघाटनों जैसे अनावश्यक कार्यों में न सिर्फ खुद व्यस्त हैं, बल्कि रेलवे के तमाम लवाजमे को भी अपने पीछे इन्हीं अनुत्पादक कार्यों में व्यस्त रखा है, जो कि वास्तव में उनके स्तर के कार्य भी नहीं हैं. एक तरफ वह 11,500 हजार करोड़ रुपये खर्च करके मुंबई-दिल्ली और लगभग 6,500 करोड़ खर्च करके दिल्ली-हावड़ा राजधानी एक्सप्रेस गाड़ियों का रनिंग टाइम कम करने की योजना बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ पूरी भारतीय रेल में कोई भी गाड़ी पूर्व निर्धारित समय पर अपने गंतव्य पर नहीं पहुंच रही है. इस तरह वह भारतीय रेल की आधारभूत एवं बुनियादी आवश्यकता को नजरअंदाज कर रहे हैं.

    माननीय रेलमंत्री ने रेलवे का चार्ज संभालते ही दनादन तमाम समितियां बना डालीं थीं. इन सभी समितियों सहित इनसे पहले की भी तमाम समितियों की हजारों रिपोर्टें रेलवे बोर्ड की अलमारियों में पड़ी धूल फांक रही हैं. इनमें अनुभवी उद्योगपति रतन टाटा और सुप्रसिद्ध अणु-वैज्ञानिक अनिल काकोड़कर की रिपोर्टें भी शामिल हैं, जिनकी अध्यक्षता में स्वयं वर्तमान रेलमंत्री ने ही समितियों का गठन किया था. मगर उनके द्वारा तथाकथित अर्थशास्त्री डॉ. बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में गठित की गई एक अन्य समिति की रिपोर्ट पर वह अवश्य अमल करते नजर आ रहे हैं, जिसमें भारतीय रेल को निजी हाथों में कैसे सौंपा जाए, इसकी सिफारिश की गई है. प्रधानमंत्री भले ही विभिन्न मंचों से बार-बार यह बात कह रहे हैं कि रेलवे का निजीकरण नहीं किया जाएगा, मगर साथ ही वह यह भी कह रहे हैं कि यदि रेल में पैसा आता है, तो क्या फर्क पड़ता है.

    भारतीय रेल के प्रत्येक विभाग में फील्ड से लेकर कार्यालयों तक स्टाफ की भारी कमी है. रेलवे भर्ती कक्ष (आरआरसी) के भ्रष्टाचारपूर्ण माध्यम से जो उच्च शिक्षित कर्मचारी पिछले कुछ सालों में भर्ती किए गए हैं, वह अपना निर्धारित कार्य नहीं कर रहे हैं. उन्होंने अपने-अपने माध्यम से काम न करने के रास्ते तलाश भी लिए हैं. परिणाम पुनः वही ‘ढ़ाक के तीन पात’ वाला सबके सामने है. इसके अलावा यह भी एक कटु-सच्चाई है कि भारतीय रेल के तमाम यार्डो, कारखानों और डिपुओं में न तो पर्याप्त मटीरियल उपलब्ध हो रहा है, और न ही पर्याप्त एवं गुणवत्तापूर्ण स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता एवं आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है. भारतीय रेल का लगभग संपूर्ण ट्रैक और करीब सभी संपत्तियां उपेक्षा का भयंकर शिकार हैं, उनकी उचित देखभाल और रखरखाव नहीं हो पा रहा है.

    ‘जले में खाज’ यह पैदा कर दिया गया है कि रोलिंग स्टॉक के दो-दो बाप बना दिए गए हैं. भारतीय रेल में विभागवाद को खत्म करने का यह अत्यंत मूर्खतापूर्ण कार्य करने की सलाह रेलमंत्री को देने वाला कौन है, यह भी सबको पता है. पिछले तीन सालों के दौरान भारतीय रेल में शायद ही कोई आधारभूत एवं बुनियादी कार्य हुआ है. इस दरम्यान जितने भी ऐसे कार्यों का ढिंढोरा पीटा गया है, वह सब ट्वीटर पर, ई-बुक बनाकर और सारे महकमे को प्रचार में लगाकर ही सारी तथाकथित उपलब्धियां हासिल हुई हैं. यह भी एक सच है कि भारतीय रेल के लगभग आधे अधिकारी निकम्मे और नाकाबिल हैं. और जो आधे सक्षम, काबिल एवं कार्य के प्रति समर्पित हैं, उनमें से ज्यादातर प्रतिनियुक्तियों पर अन्य मंत्रालयों, सार्वजनिक उपक्रमों में चले गए हैं, जबकि बचे हुए ऐसे एक तिहाई अधिकारियों को काम नहीं करने दिया जाता है. अन्य ऐसे एक तिहाई अधिकारियों को गैर-महत्वपूर्ण पदों पर बैठाकर दरकिनार कर दिया गया है. इस तरह मंडल-जोनल मुख्यालयों से लेकर रेलवे बोर्ड तक सभी महत्वपूर्ण पदों पर अक्षम, नाकाबिल, कदाचारी और अवसरवादी अधिकारियों का कब्जा होने का दुष्परिणाम भारतीय रेल को भुगतना पड़ रहा है.

    हमारे कंजी आंखों वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट रेलमंत्री को भारतीय रेल की स्थापित और मूलभूत नीतियों से कोई सरोकार नहीं है. वह समझते हैं कि जिस तरफ कागज पर आंकड़े दौड़ाए जाते हैं, उसी तरह सोशल मीडिया पर भारतीय रेल को भी दौड़ाया जा सकता है. तीन साल पहले तक ‘सर्वप्रथम सेफ्टी, सिक्योरिटी एंड पंक्चुअलिटी’ भारतीय रेल का बोध वाक्य हुआ करता था. मगर पिछले तीन सालों के दरम्यान रेलकर्मियों का शायद ही इस वाक्य से पाला पड़ा हो. रेलकर्मियों को तो शायद अब यह भी याद नहीं रह गया है कि सेफ्टी, सिक्योरिटी और पंक्चुअलिटी होती क्या बला है? उन्हें तो प्रधानमंत्री के नाम पर चौतरफा ‘रेल स्वच्छ - देश स्वच्छ’ अभियान में झोंक रखा गया है.

    जहां तक अधिकारियों की बात है, तो वह पहले की ही भांति तथाकथित प्रशिक्षण के नाम पर 25-30 के समूह में लगातार विदेश भ्रमण करने और आलीशान सैलूनों में बैठकर कथित निरीक्षण के नाम पर देव-दर्शनों में व्यस्त हैं. विदेश भ्रमण करके लौटने पर यह अपने लिए अपने कार्य-क्षेत्र से बाहर (इंटर रेलवे) भी नितांत खाली सैलून मंगवाने में भी कोई गुरेज इसलिए नहीं करते हैं, क्योंकि इनकी इन तमाम मनमानियों पर अंकुश लगाने वाला सिस्टम अपना काम मुश्तैदी से नहीं कर रहा है. इनके शिष्टाचार में सैकड़ों कर्मचारी इनके आगे-पीछे लगे हुए हैं. 10-15 कर्मचारी प्रत्येक डीआरएम और जीएम के बंगलों में कार्यरत हैं. प्रत्येक 5-7 कर्मचारी ब्रांच अफसरों से लेकर सुपरवाइजरों तक के घरों में लगे हुए हैं. पूरी भारतीय रेल में लगभग दो लाख रेलकर्मी यूनियनों के पदाधिकारी होने के नाम पर रेलवे का ढ़ेले भर का भी काम नहीं कर रहे हैं.

    इस तरह प्रतिमाह अरबों रुपये का नुकसान रेलवे को अंदर से ही हो रहा है. यदि इस मानव संसाधन को इसके वास्तविक कार्य में कार्यरत किया जाए, तो भी, और यदि इसे काट-छांटकर अरबों रुपया बचाया जाए, तो भी, प्रतिमाह बचने वाली इतनी बड़ी धनराशि से भारतीय रेल का अकल्पित और असीमित विकास-विस्तार किया जा सकता है. परंतु यहां तो रेलमंत्री और सरकार का पूरा ध्यान सिर्फ अपनी नाक बचाने के लिए बुलेट ट्रेन बनाने तथा कुछ मार्गों पर असीमित राशि खर्च करके कथित हाई स्पीड गाड़ियां चलाने में लगा हुआ है. तथापि, न तो वह उक्त काम सही ढ़ंग से कर पा रहे हैं और न ही खानपान और समयपालन को सुधार पा रहे हैं. एक तरफ रेल यात्रियों के खाने में छिपकली और काक्रोच मिल रहे हैं, तो दूसरी तरफ 12951/12953 मुंबई राजधानी एवं अगस्तक्रांति एक्सप्रेस गाड़ियों में हुई चोरी और मेल/एक्सप्रेस गाड़ियों में हत्या-बलात्कार, डकैती-जहरखुरानी की घटनाएं आंख खोलने वाली हैं.

    रेलमंत्री से हमारा यह विनम्र निवेदन है कि भारतीय रेल के सामान्य कोचों में जो सामान्य यात्री यात्रा करता है, जो ट्वीटर चलाना नहीं जानता है, ट्वीटर पर उन्हें अपनी जरूरत नहीं बता सकता है, और जिसे यात्रा की बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध नहीं हो रही है, वह भी पैसा देकर और टिकट खरीदकर ही यात्रा करता है, इसलिए सबसे पहले उसकी मुसीबत पर ध्यान दिया जाए. अधिकारियों की संख्या को सीधे घटाकर आधा कर दिया जाए. क्योंकि इनकी ही कोताही के कारण दक्षिण रेलवे में कुछ समय पहले हुई एक अन्य भीषण रेल दुर्घटना के बाद रेल संरक्षा आयुक्त (सीआरएस), दक्षिण क्षेत्र, ने रेल प्रशासन को अविलंब सैकड़ों किलोमीटर ट्रैक बदलने का आदेश दिया था, मगर यह काम आज तक नहीं किया गया है.

    अब जहां तक सवाल इस बात का है कि ऐसी भीषण रेल दुर्घटनाओं को होने से कैसे रोका जा सकता है? तो इसका सही और सटीक जवाब यही है कि यार्डो, कारखानों और डिपुओं में पर्याप्त मानव संसाधन तथा आवश्यक एवं गुणवत्तापूर्ण रॉ-मटीरियल (कच्चा माल) की उपलब्धता और आपूर्ति सुनिश्चित की जाए. इसके साथ ही पूरे प्रशासनिक तंत्र को जवाबदेह और पूरी व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाया जाए. प्रत्येक अधिकारी-कर्मचारी की उसके कार्य एवं उत्पादकता के प्रति जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाए. कलर ब्लाइंड सीआरबी को अविलंब हटाया जाए. घोषित कदाचारी और संदिग्ध विश्वसनीयता वाले अधिकारियों-कर्मचारियों को संवेदनशील प्राइम पोस्टों से न सिर्फ दूर रखा जाए, बल्कि उन्हें आगे बढ़ने (डीआरएम/जीएम/रे.बो.मेंबर बनने) से रोका जाए. स्वयं-केंद्रित, मंत्रमुग्ध-प्रचारमुग्ध और कोई भी बात पूरी सुने-समझे बिना ही सिर हिलाने लगने वाले रेलमंत्री को बदलकर किसी समझदार और काबिल जनसेवक को रेलमंत्री का कार्यभार सौंपा जाए.

    अंत में, हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस दुर्घटना में मारे गए निरीह-निर्दोष रेलयात्रियों की पवित्र आत्मा को शांति मिले और उनके जीवित बचे परिजनों को उनकी कमी को बरदास्त करने की क्षमता प्रदान करे तथा गंभीर रूप से घायल यात्री जल्दी से जल्दी स्वस्थ हों.

सम्पादकीय