..तो इसलिए नहीं हो पा रही है महाप्रबंधकों की पोस्टिंग !!

    ‘स्टोरकीपर’ ठीक कर रहे हैं एक नॉन-एम्पैनल्ड अधिकारी की एसीआर

    ‘स्टोरकीपर’ को आरडीए के साथ ही सीआरबी का अतिरिक्त चार्ज भी चाहिए

    निकम्मे, नाकाबिल नौकरशाहों को पनाह देने की बन रही है सरकार की छवि

    कदाचारी नौकरशाहों के ‘प्लेसमेंट’ में हो रहा है पार्टीगत संस्थाओं का योगदान?

    सुरेश त्रिपाठी

    कहते हैं कि जब किसी शेर को कोई सवा-शेर मिल जाता है, तब वह अपनी हैसियत यानि औकात में आ जाता है, अन्यथा वह अपनी मनमानी करता रहता है और उसे टोकने की हिमाकत कोई नहीं कर पाता. पुनर्नियुक्त सीआरबी उर्फ ‘स्टोरकीपर’ के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. हालांकि उच्च अधिकारियों की ट्रांसफर/पोस्टिंग के मामले में वह रेल मंत्रालय के तीनों मंत्रियों को अपने ठेंगे पर रखते हैं, इस मामले में मंत्रियों की संस्तुतियों को वह कोई तवज्जो नहीं देते हैं, मगर जब कोई अधिकारी अपने काम के लिए पीएमओ के किसी बड़े अधिकारी से अथवा केंद्र में सत्ताधारी पार्टी की मातृ-संस्था की किसी बड़ी हस्ती से अपनी सिफारिश ले आता है, तो उसका वह काम स्टोरकीपर द्वारा न सिर्फ नाक के बल खड़े होकर किया जाता है, बल्कि उसके बदले में अपना भी स्वार्थ साध लिया जाता है.

    रेलवे बोर्ड के विश्वसनीय सूत्रों से ‘रेलवे समाचार’ को मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2016-17 के जीएम पैनल में एम्पैनल्ड रहे और वर्ष 2017-18 के जीएम पैनल से जानबूझकर अथवा साजिशन बाहर (नॉन-एम्पैनल्ड) किए गए एक वरिष्ठ अधिकारी की एसीआर सत्ताधारी पार्टी की मातृ-संस्था के एक उच्च पदाधिकारी की सिफारिश पर स्टोरकीपर द्वारा ठीक की जा रही है. इसीलिए एसीसी से जीएम पैनल अप्रूवल के एक महीने बाद भी वर्तमान में खाली पड़े पांच महाप्रबंधकों के पदों पर पोस्टिंग नहीं हो पा रही है, जबकि चालू वर्ष 2017-18 का जीएम पैनल एसीसी से अप्रूव होकर 12 जुलाई 2017 को आ गया था. उल्लेखनीय है कि जीएम के उक्त पदों में से कुछ पद तो करीब साढ़े छह महीने से रिक्त पड़े हैं.

    चेयरमैन/आरडीए बनाए जाने सहित सीआरबी का भी अतिरिक्त चार्ज मांग रहे हैं स्टोरकीपर?

    इसके अलावा सूत्रों का यह भी कहना है कि स्टोरकीपर महोदय उक्त अधिकारी की एसीआर इस शर्त पर ठीक करने के लिए तैयार हुए हैं कि उन्हें रेलवे डेवलपमेंट अथॉरिटी (आरडीए) का चेयरमैन बनाने के साथ ही सीआरबी का भी अतिरिक्त चार्ज उन्हें ही देकर रखा जाए. सूत्रों ने बताया कि मातृ-संस्था के जिस उच्च पदाधिकारी ने संबंधित अधिकारी की एसीआर ठीक करने की सिफारिश की है, उसके सामने स्टोरकीपर महोदय ने यही शर्त रखी है. सूत्रों ने बताया कि इसके लिए वह लगभग रोज शाम को मातृ-संस्था के दिल्ली कार्यालय में ‘हवन’ करने पहुंच जाते हैं और इस बहाने दोनों चार्ज दिलवाने का स्मरण भी उक्त पदाधिकारी को करवा देते हैं.

    सूत्रों ने बताया कि मातृ-संस्था के उक्त पदाधिकारी को एक अन्य करीबी अधिकारी से यह कहते सुना गया है कि ‘आपका सीआरबी तो बहुत लालची है, अब उसे एक काम करने के बदले दोहरा चार्ज चाहिए. अब वह आरडीए का चेयरमैन बनाए जाने के साथ ही चेयरमैन, रेलवे बोर्ड का भी अतिरिक्त चार्ज मांग रहे हैं.’ बताते हैं कि इस पर संबंधित करीबी अधिकारी ने उक्त पदाधिकारी से कहा कि ‘जब अपने पुरखों के सुकर्मों की बदौलत ‘यह’ सीआरबी बने थे, तब इन्होंने रेलवे का बंटाधार कर दिया था, मगर जब से इन्हें इनके पुरखों के अतिरिक्त सुकर्मों के कारण पुनः दो साल के लिए बतौर सीआरबी पुनर्नियुक्त कर दिया गया है, तब से इन्होंने तीनों मंत्रियों सहित रेलवे के तमाम उच्च और काबिल अधिकारियों को बेइज्जत करने के साथ ही रेलवे की पूरी व्यवस्था को चौपट करके रख दिया है. अब यदि इन्हें आरडीए का चेयरमैन बनाया जाता है और साथ ही सीआरबी का भी अतिरिक्त चार्ज इन्हें ही सौंप दिया जाता है, तो दोनों संस्थाओं का पूरा सत्यानाश होने से कोई नहीं रोक पाएगा.’

    दावा कमजोर न हो, इसलिए किया कैट में केस

    ‘रेलवे समाचार’ को सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार संबंधित अधिकारी ने मातृ-संस्था के उक्त पदाधिकारी से अपनी एसीआर ठीक कराने की सिफारिश के साथ ही, देर से ही सही, मगर कैट में भी अपना मामला दायर कर दिया है. सूत्रों का कहना है कि इस अधिकारी का मानना है यदि सिफारिश से काम बन गया तो ठीक है, अन्यथा कैट से तो उसे न्याय अवश्य मिलेगा. ऐसे में सूत्रों का कहना है कि अब जब स्टोरकीपर महोदय द्वारा दोहरे लालच में ही सही, उक्त अधिकारी की एसीआर ठीक करने की तैयारी दर्शाई गई है, तब एक बार फिर से जीएम पैनल एसीसी के पास संस्तुति के लिए भेजा जाएगा, उसकी पुनर्संस्तुती के बाद ही अब नए महाप्रबंधकों की पोस्टिंग हो पाएगी, जिसमें अब और ज्यादा देरी होने की पूरी संभावना है. सूत्रों ने यह भी बताया कि वरिष्ठता के आधार पर उक्त अधिकारी की वर्तमान में खाली पड़े महाप्रबंधक के पदों में से एक पद पर यदि अभी नहीं की जाती है, तो उसका दावा कमजोर पड़ सकता है. कैट में आज (गुरुवार, 10 अगस्त) उक्त मामले की सुनवाई होने वाली है, जहां उसे जीएम पोस्टिंग पर स्टे मिलने की पूरी संभावना है.

    जनमानस में खराब हो रही है सरकार की छवि

    उपरोक्त प्रकरण के मद्देनजर सूत्रों का यह भी कहना था कि अब जिन-जिन अधिकारियों की एसीआर किन्हीं कारणों से खराब हुई है, या उक्त अधिकारी की ही तरह जानबूझकर खराब की गई है, वह भी अपनी एसीआर ठीक कराने के लिए पार्टीगत संस्थाओं के किसी बड़े पदाधिकारी को पकड़ सकते हैं. वरिष्ठ आईआरटीएस अधिकारी ए. पी. सिंह के लिए भी इसमें एक गहरा संदेश छिपा हुआ है, जिनकी एसीआर पूर्व कुटिल एवं कम्जर्फ सीआरबी अरुणेंद्र कुमार द्वारा और बाद में उनके कहने पर पूर्व जीएम/द.पू.म.रे. नवीन टंडन द्वारा मेंबर इलेक्ट्रिकल बनने के लालच में खराब की गई थी. सूत्रों का कहना है कि कमाऊ पदों पर ट्रांसफर/पोस्टिंग के लिए तो तमाम अधिकारी पार्टीगत संस्थाओं के माध्यम का इस्तेमाल कर ही रहे हैं. अतः ‘एमटीआर’ जैसे कदाचारी नौकरशाहों के ‘प्लेसमेंट’ में सत्ताधारी पार्टी से जुड़ी कुछ संस्थाओं का महत्वपूर्ण योगदान हो रहा है. इससे सरकार की छवि खराब हो रही है.

    तथापि, रेलवे बोर्ड सहित जोनल रेलों के कुछ उच्च अधिकारी उनका नाम न उजागर करने की शर्त पर ‘रेलवे समाचार’ के पूछने पर यह स्वीकार करते हैं कि जिस प्रकार एक नाकाबिल और ‘कलर ब्लाइंड’ अधिकारी को सीआरबी तथा एक अन्य कदाचारी अधिकारी को बोर्ड मेंबर बनाकर वर्तमान सरकार ने रेलवे की नौकरशाही के समक्ष एक गलत उदाहरण प्रस्तुत किया है, उससे सरकार के प्रति रेलवे की नौकरशाही का मिजाज सही नहीं है. यही वजह है कि रेलवे के तमाम महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट न सिर्फ अधूरे हैं, बल्कि गलत दिशा में जा रहे हैं. इसके अलावा नाकाबिल सीआरबी और अन्मनस्क अथवा अकर्मण्य बोर्ड मेंबर्स द्वारा जिस तरह मंत्रियों को अनर्गल कार्यों में उलझाए रखा गया है, उससे जनमानस में सरकार की छवि खराब हो रही है. उनका कहना है कि भले ही प्रधानमंत्री द्वारा संसद में और अन्य मंचों से भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं, मगर वास्तविकता में सरकार की असली छवि भ्रष्ट, निकम्मे, नाकाबिल और चापलूस नौकरशाहों को पनाह देने की बन रही है.

    अपने पांव में खुद ही कुल्हाड़ी मारना

    इसी परिप्रेक्ष्य में पूर्वोत्तर रेलवे के एक अधिकारी, जिसके साथ हाल ही में बड़ा अन्याय हुआ था, ने जीएम और सीओएम के झांसे में आकर कैट से अपना केस वापस ले लिया है और नई जगह पर ज्वाइन करके अपने साथ हुए अन्याय को भविष्य में अन्य अधिकारियों तक विस्तारित कर दिया है. जबकि उसका केस बहुत मजबूत था, जिसके चलते अदालत एवं एससी/एसटी आयोग के सामने रेल प्रशासन को मुंह की खानी पड़ती. कैट ने उक्त अधिकारी के साथ हुए अन्याय का निराकरण करने के लिए जीएम को पंद्रह दिन का समय दिया था. इसका मतलब यह था कि कैट ने उक्त अधिकारी के साथ हुए अन्याय के प्रति कड़ा रुख अपनाने का संकेत दिया था. उक्त आदेश के मद्देनजर जीएम और सीओएम ने उससे यह कहकर अपनी मासूमियत भरी बेचारगी दर्शाई कि ‘गलती तो हो गई है, परंतु यदि वह नई जगह ज्वाइन कर लेगा, तो जल्दी ही उसे उचित पोस्टिंग दे दी जाएगी.’ जीएम और सीओएम की इस कथित बेचारगी या चापलूसी का शिकार होकर उक्त अधिकारी ने न सिर्फ नई जगह ज्वाइन कर लिया, बल्कि अपना केस भी वापस ले लिया. इसी को कहते हैं अपने पांव में खुद ही कुल्हाड़ी मार लेना.

सम्पादकीय