अघोषित-अंजान लक्ष्य की ओर अग्रसर भारतीय रेल!

    रेलवे बोर्ड, जोनल मुख्यालयों एवं मंडलों में अधिकारियों की संख्या घटाकर आधी की जाए

    प्रधानमंत्री की नजर में अपने अंक बढ़ाए रखने के लिए फर्जी कामकाज कर रहे हैं रेलमंत्री

    रेल मंत्रालय का प्रभार सांसद आर.सी.पी. सिंह को सौंपा जाए -रेल अधिकारियों का सुझाव

    सुरेश त्रिपाठी

    ‘कॉश, रेलमंत्री भी टाटा समूह से कुछ सीख पाते!’ शीर्षक से 21 जुलाई 2017 को प्रकाशित लेख और डीआरएम को ज्यादा अधिकार संपन्न बनाए जाने तथा जोनल मुख्यालयों को समाप्त किए जाने संबंधी एक पूर्व अधिकारी के सुझाव के संदर्भ में कई पूर्व वरिष्ठ रेल अधिकारियों की जबरदस्त प्रतिक्रियाएं ‘रेलवे समाचार’ को प्राप्त हुई हैं. उक्त लेख में ज्यादातर बात रेलवे में अधिकारियों की बढ़ी हुई और कर्मचारियों की घटी हुई संख्या पर की गई थी और यह कहा गया था कि टाटा समूह ने अपने करीब पंद्रह सौ अधिकारियों की बनिस्बत कर्मचारियों को तरजीह दी, क्योंकि उक्त अधिकारी टाटा समूह पर ज्यादा बड़ा बोझ बन गए थे. इसी तर्ज पर रेलवे में भी अधिकारियों की संख्या ज्यादा होने पर टाटा समूह का फार्मूला इस्तेमाल किए जाने की चर्चा उक्त लेख में दी गई थी.

    इस पर सबसे पहली प्रतिक्रिया सेवानिवृत्त वरिष्ठ इंजीनियरिंग अधिकारी राजेंद्र प्रसाद सक्सेना की आई. श्री सक्सेना का मानना है कि सभी जोनल मुख्यालयों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और डीआरएम को ज्यादा अधिकार संपन्न बनाकर उन्हें सीधे रेलवे बोर्ड को रिपोर्ट करने के लिए कहा जाना चाहिए. श्री सक्सेना ने आगे कहा कि जोनल मुख्यालयों की भूमिका ज्यादातर मंडल रेल प्रबंधकों के कामकाज में अड़ंगा लगाने की ही होती है और वह मंडलों के कामकाज में सिर्फ कमियां खोजने की ही उठापटक में लगे रहते हैं. उनका कहना है कि वर्तमान में इंटरनेट एवं वीडियो कम्युनिकेशन बहुत तेज गति से हो रहा है, ऐसे में मिडल मैनेजमेंट की आवश्यकता समाप्त हो गई है. उन्होंने कहा कि डीआरएम को ज्यादा अधिकार दिए जाएं, जिससे वह अपनी जिम्मेदारी पर मंडलों में ज्यादा कार्यों को अंजाम दे सकेंगे.

    पूर्वोत्तर रेलवे से सेवानिवृत्त महाप्रबंधक राजीव मिश्रा का कहना है कि मुख्यालय स्तर पर प्रत्येक विभाग में वर्तमान चार-पांच एसएजी अधिकारियों की संख्या को घटाकर दो या अधिकतम तीन एसएजी अधिकारियों तक सीमित किया जाना चाहिए. इसके साथ ही मंडल स्तर पर भी सभी विभागों में जेएजी पदों को कम किया जाना चाहिए. श्री मिश्रा का यह भी सुझाव है कि मुख्यालय और मंडल स्तर पर सीनियर स्केल के सभी पदों को अविलंब समाप्त कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह पद अब जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड अथवा सिलेक्शन ग्रेड (जेएजी या एसजी) में ऑपरेट हो रहे हैं.

    श्री मिश्रा का सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि रेलवे बोर्ड स्तर पर एडीशनल मेंबर्स, एडवाइजर्स, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स, डायरेक्टर्स और जॉइंट डायरेक्टर्स इत्यादि सहित सेक्शन ऑफिसर्स, चीफ ऑफिस सुपरिंटेंडेंड्स और बोर्ड मेंबर्स के पीपीएस/पीएस आदि तमाम पदों को वर्तमान से सीधा आधे पर लाया जाना चाहिए. इसके पीछे उनका तर्क यह है कि इस प्रकार युवा अधिकारियों की पदोन्नतियों की संभावना तेज होगी, जिससे बेहतर उत्पादकता प्राप्त होगी और प्रक्रियागत अवरोधों में व्यापक कमी आएगी. उनका यह भी मानना है कि पिछले तीन वर्षों के औसत पर ग्रुप ‘ए’ के पदों पर भर्ती को घटाकर फौरन आधा किया जाना चाहिए.

    एक तरफ जहां दक्षिण पूर्व रेलवे, खड़गपुर मंडल के एक वरिष्ठ मंडल यांत्रिक अभियंता का कहना है कि वर्तमान कुल एसएजी के 20% पदों को तुरंत सरेंडर कर दिया जाना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम मध्य रेलवे के एक विभाग प्रमुख ने स्पष्ट रूप से राजेंद्र प्रसाद सक्सेना के उपरोक्त सुझावों पर अपनी असहमति प्रकट की है. हालांकि उनका यह अवश्य कहना है कि डीआरएम का कार्यकाल दो के बजाय तीन वर्ष का होना चाहिए, परंतु डीआरएम के अधिकार बढ़ाकर उन्हें सीधे रेलवे बोर्ड को रिपोर्ट करने की अनुमति दिए जाने और सभी जोनल मुख्यालयों को समाप्त किए जाने के विचार को वह अपरिपक्व मानते हैं. उनका कहना है कि मुख्यालयों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है. तथापि वह कर्मचारियों के इस सुझाव से अवश्य अपना इत्तिफाक रखते हैं कि जोनल मुख्यालयों की संख्या को घटाए जाने पर अवश्य विचार किया जाना चाहिए.

    वहीं विषय परिवर्तन करते हुए रेलवे बोर्ड से सेवानिवृत्त मेंबर इंजीनियरिंग एस. के. विज का कहना है कि सिर्फ दो रेल मार्गों के अपग्रेडेशन के लिए 18 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाने से कोई बहुत बड़ा लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकेगा. इस विषय को आगे बढ़ाते हुए मध्य रेलवे के एक विद्वान चीफ इंजीनियर का कहना है कि पूर्व रेलमंत्री नीतीश कुमार ने 17 हजार करोड़ रुपए के जिस विशेष रेल संरक्षा कोष (एसआरएसएफ) से ट्रैक अपग्रेडेशन एवं ब्रिज रेनोवेशन का महत्वपूर्ण कार्य किया था, उसे लालू प्रसाद यादव ने अपने रेलमंत्रित्व काल में एक्सेल लोड बढ़ाकर चौपट कर दिया. उनका कहना है कि वर्तमान में भारतीय रेल का कोई भी कॉरिडोर ऐसा नहीं है, जिस पर 120 किमी. प्रतिघंटा से ज्यादा की गति पर कोई ट्रेन दौड़ाई जा सके. पूरी भारतीय रेल का बुनियादी ढ़ांचा बुरी तरह चरमराया हुआ है. यात्री एवं मालगाड़ियों की गति बढ़ाना एक सतत प्रक्रिया है, जिसके लिए बुनियादी ढ़ांचे को भी उसके साथ ही लगातार अपग्रेड करना होता है, परंतु यह कार्य पिछले दस सालों में नहीं किया है. ऐसे में गाड़ियों की गति बढ़ाए जाने अथवा हाई स्पीड ट्रेनें चलाए जाने की बात बेमानी है.

    भारतीय रेल के लगभग सभी वरिष्ठ एवं कनिष्ठ अधिकारियों का एक स्वर से मानना है कि भारतीय रेल पूरी तरह से निजीकरण की राह पर है. स्टेशनों का निजीकरण या निजी हाथों में सौंपे जाने का काम शुरू हो चुका है, जहां रेलवे के पास सिर्फ ट्रेन ऑपरेशन और सिग्नलिंग व्यवस्था ही शेष रह जाएगी, बाकी सभी गतिविधियां निजी हाथों में होंगी. उनका कहना है कि हालांकि प्रधानमंत्री बार-बार इस बात को दोहरा रहे हैं कि रेलवे का निजीकरण नहीं होगा, मगर उसी स्वर में वह यह भी दोहरा रहे हैं कि यदि निजी निवेश रेलवे में आ रहा है तो इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, मगर वह यह नहीं बता रहे हैं कि उनका यह कथित निजी निवेश किन शर्तों पर आ रहा है? उनका कहना है कि प्रधानमंत्री की यह दोधारी बात रेलकर्मियों के साथ ही देश के किसी भी आदमी की गले नहीं उतर रही है.

    उनका कहना है कि सरकार ने मान्यताप्राप्त श्रमिक संगठनों के शीर्ष नेतृत्व को हटा दिए जाने का भय दिखाकर उनके मुंह बंद कर दिए हैं. इससे रेलवे के करीब चौदह लाख कर्मचारियों सहित लगभग 50 लाख केंद्रीय सरकारी कर्मचारी और अधिकारी स्वयं को असहाय महसूस कर रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि एचआरए के मुद्दे पर सरकार ने जिस तरह इन मान्यताप्राप्त संगठनों को ठगा है, उससे केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के यह सभी संगठन कर्मचारियों के सामने मुंह दिखाने लायक नहीं रह गए हैं. कर्मचारी यह मान रहे हैं कि मान्यताप्राप्त संगठनों ने उनके साथ धोखा किया, जबकि संगठनों को यह मलाल है कि सरकार ने उनके साथ छल करके कर्मचारियों के सामने उन्हें नीचा दिखाया है.

    बहरहाल, उपरोक्त तमाम विचारों के मद्देनजर अघोषित-अंजान लक्ष्य की ओर बढ़ रही भारतीय रेल की जर्जर हो रही वर्तमान स्थिति को बखूबी समझा जा सकता है. ऐसे में अधिकांश रेल अधिकारियों और कर्मचारियों का मानना है कि भारतीय रेल के वर्तमान निजाम यानि तीनों मंत्रियों को तत्काल हटा दिया जाना चाहिए. उनका कहना है कि रेलमंत्री सिर्फ प्रधानमंत्री की नजर में अपने अंक बढ़ाए रखने के लिए फर्जी कामकाज कर रहे हैं. उनके अलावा जहां एक रेल राज्यमंत्री दो नावों में सवार होकर किसी पर भी अपना संतुलन नहीं बना पा रहे हैं, वही दूसरे रेल राज्यमंत्री की रेल मंत्रालय में कोई गणना ही नहीं है. इनके लिए रेल अधिकारियों का एक बढ़िया और मौके का सुझाव यह है कि रेलमंत्री सुरेश प्रभु को उनके मूल स्वभावानुसार नीति आयोग अथवा वित्त मंत्रालय में अंकों की गणना के लिए बैठाया जाए और रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा को टेलिकॉम मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार दे दिया जाए, जबकि रेल राज्यमंत्री राजेन गोहेन को रेल मंत्रालय में बनाए रखा जा सकता है.

    हालांकि इस मौके पर इन अधिकारियों ने दूर की कौड़ी दर्शाते हुए यह भी सुझाव दिया कि अब जब नीतीश कुमार एनडीए में शामिल हो चुके हैं, तब ऐसे में यदि रेल मंत्रालय उनकी पार्टी को दिया जाता है और उनके राज्यसभा सांसद एवं उनके पूर्व प्रिंसिपल सेक्रेटरी रहे आर. सी. पी. सिंह को यदि रेलमंत्री बना दिया जाए, तो शायद भारतीय रेल की बदतर और बदनाम हो रही स्थिति को संभाला और सुधारा जा सकता है. इसके पीछे उनका तर्क यह है कि रेलमंत्री रहे नीतीश कुमार के साथ रेल मंत्रालय में काम कर चुके आर. सी. पी. सिंह को रेलवे बोर्ड के बाबुओं की तिकड़म और उनकी राजनीति के बारे में गहरा अनुभव है. इसके अलावा वह एक पूर्व नौकरशाह भी हैं, ऐसे में वह रेलवे की बिगड़ी और भ्रष्ट हो चुकी नौकरशाही को बेहतर तरीके से सही रास्ते पर लाने में कामयाब हो सकते हैं. बहरहाल, अब देखना यह है कि निकट भविष्य में प्रधानमंत्री द्वारा किए जाने वाले मंत्रिमंडल पुनर्गठन के समय क्या निर्णय लिया जाता है, इस पर सभी की निगाहें लगी हुई हैं.

सम्पादकीय