मिशन, विजन और मोटो के जबरदस्त अभाव से गुजर रही भारतीय रेल

    सरकारी तंत्र में केवल अपने फायदे के लिए काम कर रही है नौकरशाही

    अपने कारनामों को छुपाने के लिए बाबुओं ने अनर्गल कार्यों में उलझाया

    भारतीय रेल में चरितार्थ हो रही है ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाली कहावत

    सुरेश त्रिपाठी

    भारतीय रेल में पिछले तीन सालों के दौरान सर्वाधिक जोर रेलवे स्टेशनों और चलती ट्रेनों में यात्री सुविधाओं पर दिया गया है. तथापि, इन तमाम कोशिशों से रेल यात्री संतुष्ट नहीं हैं. इस दरम्यान जितना जोर रेलवे कैटरिंग पर दिया गया, शायद उतना किसी अन्य बात पर नहीं, फिर भी पिछले तीन सालों के दौरान रेलवे कैटरिंग में जिस तरह यात्रियों को उनके खाने में छिपकली, काक्रोच, मरी हुई मक्खियां, बाल, कंकड़ इत्यादि मिलने की शिकायतें मिली हैं, उतनी शिकायतें शायद पहले कभी नहीं मिली थीं. इसके अलावा इस दौरान जितनी रेल दुर्घटनाएं हुई हैं, उतनी शायद पहले कभी नहीं हुई थीं. तात्कालिक तौर पर ऐसी समस्याओं का निदान करने के लिए जिस स्तर पर सारे महकमे को लगा दिया जाता है, उस स्तर पर अपेक्षित परिणाम फिर भी नहीं मिल रहे हैं. इन्हीं कुछ बातों को लेकर रेलकर्मियों का क्या कहना है, इस पर ‘रेलवे समाचार’ ने उनकी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की है.

    उत्तर मध्य रेलवे के एक सुपरवाइजर स्तर के कर्मचारी का कहना है कि सरकारी तंत्र में नौकरशाही केवल अपने फायदे के लिए काम कर रही है और दुर्भाग्य यह है कि रेलवे के निजाम को रेलवे बोर्ड के बाबुओं ने अपने भ्रष्ट कारनामों को छुपाने के लिए अनर्गल कार्यों में उलझाया हुआ है. इस कर्मचारी का कहना है कि हटिया स्टेशन पर 2 अगस्त को उजागर हुआ यूटीएस फ्रॉड केवल एक लोकेशन तक ही सीमित नहीं है. भारतीय रेल में यह अनेकों जगहों पर मिल सकता है. इसके अलावा गुड्स, पार्सल, पीआरएस इत्यादि जगहों पर भी फ्रॉड धड़ल्ले से हो रहा है. लेकिन दोषी केवल तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों को ठहरा दिया जाता है. आखिर उस मंडल और जोन के संबंधित अधिकारियों को क्यों नहीं जिम्मेदार ठहराया जाता है?

    इस कर्मचारी ने पूरे आक्रोश के साथ कहा कि आप अभी का हाल देख लीजिए कि पहले सीवीसी की रिपोर्ट पर भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री और रेलमंत्री दोनों चुप्पी लगा गए, मगर अब सीएजी की रिपोर्ट पर पूरा अमला खानपान सेवाओं की चेकिंग पर लगा दिया गया है. परंतु रेलवे का निजाम यह नहीं समझ पा रहा है कि इसकी जड़ क्या है? कभी इस बात की जांच नहीं की गई कि सिर्फ दो-तीन फर्मों को ही कैटरिंग का ठेका क्यों दिया जाता है? उच्च स्तर के लगभग सभी लोग इस भ्रष्टाचार में संलिप्त हैं. आखिर रेलवे अपने मूल व्यवसाय ‘ट्रांसपोर्टेशन’ पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित क्यों नहीं हो रही है? सेफ्टी, सिक्योरिटी और पन्क्चुअलिटी का सिद्धांत कहां चला गया? इस कर्मचारी का स्पष्ट कहना है कि कैटरिंग रेलवे का मुख्य व्यवसाय नहीं है, इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए, लेकिन अगर यह समाप्त हो गया, तो अधिकारियों को मलाई कैसे मिलेगी?

    फील्ड में कर्मचारियों की कमी और काम में हो रही कोताही के लिए जिम्मेदार कौन है, इस सवाल पर उत्तर रेलवे के एक वरिष्ठ परिचालन कर्मचारी का कहना था कि इसकी वजह साफ है. अब अधिकारी बढ़ गए हैं और काम करने वाले घट गए हैं. इसमें अगर इंजीनियरिंग, मैकेनिकल, ऑपरेटिंग, कमर्शियल जैसे कुछ विभाग दिन-रात खट रहे हैं, तो कुछ विभाग सुकून और ऐशो-आराम की जिंदगी बिता रहे हैं. सबसे ज्यादा फ्रस्टेशन में ऑपरेटिंग और कमर्शियल विभाग के कर्मचारी और अधिकारी हैं. इनकी कोई नहीं सुनता है. फिर भी सारी अनियमितताओं को रोकने का ठेका इन्हीं के सिर पर रहता है. तथापि, यह लोग भी अपने ही विभाग के दुश्मन हैं. मैनपावर की अत्यधिक कमी है और जो निचले स्तर पर कुछ हैं भी, वे लोग अधिकारियों के बंगलों की रखवाली कर रहे हैं. रेलवे में स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. रेल दुर्घटनाएं तो कुछ भी नहीं हैं.

    उत्तर मध्य रेलवे, झांसी मंडल के एक वाणिज्य कर्मचारी का कहना है कि स्टेशन परिसर में अवैध वेंडिंग, अनधिकृत व्यक्तियों एवं गतिविधियों को रोकने की जिम्मेदारी आरपीएफ/जीआरपी की है, जिसकी रेलवे ऐक्ट में व्याख्या भी है, लेकिन उत्तर मध्य रेलवे जोन में इसका भी ठेका कामर्शियल विभाग ने ले रखा है. उसका कहना या भी था कि हालांकि यही स्थिति शायद पूरी भारतीय रेल में भी है. इस कर्मचारी का कहना है कि उत्तर मध्य रेलवे जोन के वाणिज्य अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र के रेलवे स्टेशनों पर अवैध वेंडिंग रोकने के लिए ड्राइव चला रहे हैं और सुरक्षा विभाग मजे से तमाशा देख रहा है, क्योंकि उनका काम तो वाणिज्य विभाग कर ही रहा है.

    उत्तर मध्य रेलवे, उत्तर रेलवे, उत्तर पश्चिम रेलवे और पश्चिम मध्य रेलवे के कई कर्मचारियों का कहना है कि ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाली कहावत भारतीय रेल में बखूबी चरितार्थ हो रही है. उनका कहना है कि अब सेफ्टी से संबंधित फुट-प्लेटिंग सीएमआई (चीफ कमर्शियल इंस्पेक्टर) से करवाई जा रही है, जिनको सेफ्टी की एबीसीडी भी मालूम नहीं है. अब ऐसे में रेलवे की सेफ्टी की क्या दशा होगी, यह सोचने वाली बात है. जबकि सीएमआई अपनी प्रॉपर ड्यूटी भी नहीं कर पा रहे हैं. इन सभी कर्मचारियों का कहना था कि ‘रेलवे समाचार’ को यह बात उच्च रेल प्रशासन के संज्ञान में लानी चाहिए.

    मध्य रेलवे एवं पश्चिम रेलवे के कई फील्ड कर्मचारियों का कहना था कि रेलवे स्टेशनों पर अवैध गतिविधियों के लिए आरपीएफ और जीआरपी समान रूप से जिम्मेदार हैं, परंतु प्रभारी निरीक्षक या उसके ऊपर के ओहदे पर कभी-भी कोई रिस्पांसिबिलिटी फिक्स करके कार्यवाही नहीं की जाती है. उनका कहना है कि दरअसल इन्हीं के माध्यम से ऊपर तक अवैध कमाई पहुंचाई जाती है. जब यह लोग असामाजिक तत्वों से रिश्ते बनाएंगे, तो रेलवे स्टेशनों पर कानून-व्यवस्था कैसे बेहतर हो सकती है?

    पिछले दिनों मुगलसराय स्टेशन पर कुछ स्थानीय छुटभैये नेताओं ने कथित साफ-सफाई के मुद्दे को लेकर डीआरएम/एडीआरएम सहित कई ब्रांच अधिकारियों के साथ बदसलूकी की थी. इस पर पूर्व मध्य रेलवे, मुगलसराय मंडल के कई कर्मचारियों का कहना था कि इन छुटभैये नेताओं को शह हमारे रेल अधिकारी ही देते हैं. न जाने कौन सा ऐसा डर है कि जीएम और डीआरएम जैसे उच्च अधिकारी भी इन छुटभैये नेताओं की धौंस में आ जाते हैं. उनका कहना था कि ये छुटभैये नेता या मंत्री अथवा विधायक बहुत करेंगे तो ज्यादा से ज्यादा उनका ट्रांसफर ही तो करा सकते हैं, फिर काम तो कहीं भी करना ही है, लेकिन इन रेल अधिकारियों की दादागिरी तो सिर्फ अपने मातहत कर्मचारियों पर ही चलती है. इसीलिए अब कर्मचारी भी ऐसी घटनाओं पर अपने अधिकारियों के पक्ष में नहीं खड़े होते हैं.

    भारतीय रेल के संभावित निजीकरण और अनर्गल, असंबद्ध एवं बेमानी यात्री किराया और रिफंड पद्धति पर वर्तमान रेलवे निजाम की नीतियों पर तमाम रेलकर्मियों ने एक-स्वर से इस बात को स्वीकार किया और कहा कि सरकार की मंशा भारतीय रेल को टुकड़ों में बांटने और निजीकरण करने की है. उनका कहना था कि ‘फ्लेक्सी फेयर स्कीम’ रेलवे बोर्ड और रेलवे निजाम के बौद्धिक दिवालियापन की हद है. गुड्स ट्रैफिक में लगातार कमी आ रही है, मगर इसके आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है. जबकि कोल ब्लॉक का पट्टा देकर कोयले की ढुलाई से भी भारतीय रेल हाथ धो बैठी है. अब रेलवे द्वारा देश की जरूरत के हिसाब से कोयले की सप्लाई नहीं की जा पा रही है, बल्कि अब अधिकारी इसे अपने फायदे के हिसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं.

    कर्मचारियों का कहना है कि गुड्स शेड्स की हालत बदतर हो गई है. जहां से रेलवे को सालाना करोड़ों रुपए का रेवेन्यु प्राप्त होता है, वहां बरसात में पहुंचने का कोई सही-सलामत रास्ता तक नहीं है, जबकि स्टेशनों पर तथाकथित यात्री सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपए का अपव्यय किया जा रहा है. मगर जो लोग रेलवे को सालाना करोड़ों रुपए का रेवेन्यु देते हैं, उनके लिए गुड्स शेड तक पहुंचने का कोई सही मार्ग नहीं बनाया जाता है. आज कड़ी प्रतिस्पर्धा के कठिन समय में सड़क मार्ग से प्रतियोगी ग्राहकों को घर बैठे माल की डिलीवरी/हैंडलिंग मुहैया कराई जा रही है, वहीं रेलवे आज भी इस मुगालते में जी रही है कि इस क्षेत्र में अभी-भी उसकी मोनोपोली है. राजधानी/शताब्दी/दूरंतो इत्यादि कथित प्रीमियम ट्रेनों से रेलवे कितना कमा लेगी? अब इस ग्रुप के यात्री भी हवाई मार्ग से यात्रा करने जा रहे हैं. जबकि यहां न तो ट्रेन की सेफ्टी, सिक्योरिटी और पन्क्चुअलिटी सुधर रही है और न ही करप्शन में कोई कमी आई है. इस वक्त रेलवे में मिशन, विजन और मोटो का जबरदस्त अभाव है.

    उत्तर मध्य रेलवे के एक अन्य कर्मचारी का कहना था कि स्टेशन अधीक्षक, फतेहपुर के विरूद्ध माल व्यापारियों द्वारा लंबे समय से लगातार शिकायतें की जा रही थीं कि वह साइडिंग में रेक को जानबूझकर ऐसी जगह प्लेस कराते हैं जहां पर व्यापारियों को माल उतारने में भारी असुविधा होती है. लेकिन जांच के नाम पर अब तक केवल खानापूरी ही की गई है. जबकि रेलमंत्री महोदय गुड्स ट्रैफिक को बढ़ाने की बात कर रहे हैं. ऐसे करप्ट तंत्र से रेलमंत्री रेवेन्यु कैसे जनरेट कर पाएंगे? यह एक मामूली सा उदाहरण है. ऐसे उदाहरण भारतीय रेल के लगभग सभी गुड्स शेड्स में मिल जाएंगे. परंतु स्थानीय रेल अधिकारियों को इसकी कोई चिंता नहीं है, क्योंकि उन्हें तो विभिन्न स्रोतों से अपना निर्धारित कमीशन अपने चैम्बर्स में बैठे-बिठाए प्राप्त हो ही रहा है.

सम्पादकीय