प्रकाशित खबर में कोई सच्चाई नहीं है -आर. के. बहुगुणा, सीएमडी/रेलटेल

    ‘रेलवे समाचार’ को मिला ‘रेलटेल कारपोरेशन’ का कानूनी नोटिस

    ‘रेलवे समाचार’ की वेबसाइट www.railsamachar.com पर 15 जुलाई 2017 को ‘सीएमडी/रेलटेल आर. के. बहुगुणा को एक्सटेंशन दिए जाने की संभावना?’ और 1 से 15 जुलाई 2017 के अंक में ‘सीएमडी की एक्सटेंशन की संभावना से असंतुष्ट हैं रेलटेल के अधिकारी’ शीर्षक से प्रकाशित खबर पर रेलटेल कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (आरसीआईएल) और इसके सीएमडी आर. के. बहुगुणा की तरफ से ‘सिंघानिया एंड पार्टनर्स - सॉलिसिटर्स एंड एडवोकेट्स’ द्वारा ‘रेलवे समाचार’ के संपादक को सोमवार, 31 जुलाई 2017 को एक कानूनी नोटिस प्राप्त हुआ है.

    उक्त कानूनी नोटिस में रेलटेल के सीएमडी आर. के. बहुगुणा का कहना है कि उपरोक्त शीर्षक से प्रकाशित खबर न सिर्फ पूरी तरह से गलत है, बल्कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है. उनका कहना है कि उक्त खबर से उनकी और रेलटेल की छवि को खराब करने तथा उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने की कोशिश की गई है. उक्त खबर न सिर्फ मानहानिकारक है, बल्कि अपमानजनक भी है. श्री बहुगुणा का कहना है कि उक्त खबर में जो तथ्य दिए गए हैं, उनमें कोई सच्चाई नहीं है, बल्कि पूरी खबर न सिर्फ रेलटेल के कर्मचारियों, बल्कि जनता के सामने भी उनकी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाने और उन्हें अपमानित करने वाली है. उन्होंने कहा है कि उक्त खबर में उन पर जो भी आरोप लगाए गए हैं, वह उनसे इंकार करते हैं.

    श्री बहुगुणा का कहना है कि किसी भी तरह के कथित भ्रष्टाचार में उनकी कोई संलिप्तता नहीं रही है. उनका कहना है कि जो भी विवाद है, वह अदालत के विचाराधीन है. ऐसे में अदालत का कोई अंतिम निर्णय आने से पहले किसी प्रकार के निष्कर्ष या निर्णय पर पहुंचना उचित नहीं है. उनका कहना है कि नियुक्ति एवं पदोन्नति से संबंधित आरोप न सिर्फ पूरी तरह से गलत और आधारहीन हैं, बल्कि इस तरह उनकी छवि एवं प्रतिष्ठा को धूमिल करने का प्रयास किया गया है. उन्होंने किसी भी तरह का कमीशन लिए जाने से इंकार किया है और कहा है कि उक्त खबर में उनके विरुद्ध बिना किसी पुख्ता प्रमाण के यह आधारहीन और मानहानिकारक आरोप लगाया गया है.

    उनका कहना है कि उक्त खबर को पढ़ने से सर्वसामान्य के मन में उनके प्रति गलत धारणा बन सकती है. खबर में लगाए गए आधारहीन आरोपों से उनकी और रेलटेल की छवि खराब हुई है और उनके बिजनेस एवं ऑक्यूपेशन को धक्का लगा है. उनका कहना है कि ‘रेलटेल’ भारतीय रेल के अंतर्गत एक ‘मिनी रत्न पीएसयू’ है, जो कि पूरे देश में अपने ग्राहकों को बैंडविड्थ सर्विसेस, आईएसपी एवं टेलिकॉम सेवाएं मुहैया कराता है. पूरे देश में रेलटेल का बहुत व्यापक ऑप्टिकल फाइबर केबल नेटवर्क है. इसमें सीएमडी सहित अत्यंत कुशल, उच्च शिक्षित और प्रतिष्ठित कर्मचारी एवं अधिकारी कार्यरत हैं. उन्होंने लंबे समय से इसमें कार्यरत रहकर बड़ी मेहनत और समर्पण के साथ इस संगठन को खड़ा किया है. उनकी इसी मेहनत एवं समर्पण की बदौलत रेलटेल को कई अवार्ड्स प्राप्त हुए हैं. उनकी यह प्रतिष्ठा न सिर्फ संगठन के कर्मचारियों एवं अधिकारियों में व्याप्त है, बल्कि सर्वसामान्य जनता के बीच भी है.

    संपादक का प्रतिवेदन

    उपरोक्त खबर के संदर्भ में संपादक के तौर पर मेरा कहना यह है कि ‘रेलटेल’ के बारे में श्री बहुगुणा ने जो कहा है, वह विवादरहित है, क्योंकि खबर न तो रेलटेल के बारे में थी और न ही रेलटेल की प्रतिष्ठा को जानबूझकर किसी प्रकार की ठेस पहुंचाने की कोई कोशिश की गई है, बल्कि खबर में यह भी कहा गया है कि ‘रेलटेल’ ने श्री बहुगुणा के नेतृत्व में पर्याप्त प्रगति की है. जहां तक पर्याप्त सबूतों और प्रमाणों की बात है, तो वह ‘रेलवे समाचार’ के पास मौजूद हैं. पूरी खबर ईमेल पर आई है, जो कि अपने आपमें एक पर्याप्त सबूत है. इसके अलावा सीवीओ/रेलटेल एवं रेलवे बोर्ड विजिलेंस के बीच हुआ तमाम पत्राचार भी उपलब्ध है. इसके साथ ही सीबीआई द्वारा शिलांग, मेघालय में रेलटेल के चार लोगों के विरुद्ध जो मामला दर्ज किया गया है, खबर में उसका पूरा प्रमाण दिया गया है.

    इस सबके अलावा खबर प्रकाशित किए जाने से पहले हमने श्री बहुगुणा का पक्ष लेने का भी पूरा प्रयास किया था. उन्होंने मोबाइल पर जब कोई रिस्पांस नहीं दिया, तब हमने उनकी अथवा रेलटेल की जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) सुश्री सुचित्रा प्रधान से संपर्क किया. सुश्री प्रधान ने सभी बातों से अनभिज्ञता प्रकट की. उक्त खबर में इन दोनों बातों का पूरा उल्लेख किया गया है. ‘रेलवे समाचार’ द्वारा बिना किसी पूर्वाग्रह के उक्त खबर प्रकाशित की गई. इसमें जानबूझकर अथवा अनजाने में भी श्री बहुगुणा या रेलटेल की मानहानि करने अथवा उनकी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाने का कोई उद्देश्य निहित नहीं था. इसके बावजूद यदि श्री बहुगुणा और रेलटेल को ऐसा लगता है, तो उसके लिए ‘रेलवे समाचार’ को वास्तव में खेद है.

    - सुरेश त्रिपाठी, संपादक

सम्पादकीय