‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको लालू ने ठगा नहीं’

    लालू ने किया था रेलवे में अरबों रुपये का अधिकारी पदोन्नति घोटाला

    स्वयंभू बन गए लालू यादव ने स्थापित सरकारी नियमों को ताक पर रखा

    लालू प्रसाद यादव के निहितस्वार्थों ने अधिकारी एकता पर करारी चोट की

    सभी जांच एजेंसियों के साक्ष्यों से साबित हुआ अधिकारी पदोन्नति घोटाला

    गोयल के साथ रेलवे में घोटालों पर विवेक सहाय को भी घेरे में ले सीबीआई

    सुरेश त्रिपाठी

    यह सर्वविदित है कि सत्ता के शिखर पर पहुंचकर राजनेता अहंकारी और निरंकुश हो जाते हैं, परंतु जमीन से उठकर रेल सिंहासन पर विराजमान होने वाला कोई फटीचर आदमी यदि किसी जटिल महाघोटाले को अंजाम दे, तो दुर्भाग्य है इस देश की गरीब आवाम का, जिसने ऐसे व्यक्तित्व को अपना सिरमौर बनाया. क्षेत्र और जाति की बिसात पर देश की सबसे मजबूत और ऐतिहासिक संस्था (रेलवे) का मालिक बनकर निजी स्वार्थ के वास्ते पूरी रेल व्यवस्था को चरमरा देने जैसा कु-कृत्य सिर्फ लालू प्रसाद यादव ही कर सकते थे. ‘रेलवे समाचार’ लगातार रेलवे में हुए अधिकारी पदोन्नति महाघोटाले पर दस्तावेजी सबूतों के साथ विस्तृत जानकारी देता आ रहा है. इस अंक में लालू प्रसाद यादव के रेलमंत्रित्व काल में हुए कारनामों को परत-दर-परत उघाड़ने की कोशिश की गई है.

    तत्त्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में हुए अरबों रूपयों के इस ग्रुप ‘ए’ अधिकारी पदोन्नति घोटाने का घटनाक्रम इस प्रकार है-

    बाजपेयी सरकार का ऑप्टिमाइजेशन का नियम :

    1. वर्ष 2001 में बाजपेयी सरकार द्वारा ऑप्टिमाइजेशन रूल (बेहतरीन नियम) के तहत सभी मंत्रालयों को प्रतिवर्ष कुल कैडर के 2% पदों को खत्म करने का आदेश दिया गया. रेल मंत्रालय सहित सभी केंद्रीय मंत्रालयों ने इस नियम का पालन करते हुए वर्ष 2002 से होने वाली सभी ग्रेडों (ए, बी, सी एवं डी) की नई भर्तियों में प्रतिवर्ष 2% पदों को खत्म करके बचे हुए रिक्त पदों पर नई भर्तियां शुरू शुरू कर दीं.

    2. बाजपेयी सरकार के द्वारा ऑप्टिमाइजेशन रूल को यूपीए सरकार ने भी वर्ष 2009 तक जारी रखा. इस प्रकार यह नियम वर्ष 2001 से 2009 तक, अर्थात भर्ती वर्ष 2002 से 2010 के बीच तकरीबन 9 वर्षों तक सभी केंद्रीय मंत्रालयों पर लागू रहा.

    3. रेलवे ने वर्ष 2001 में रेलवे की 8 संगठित सेवाओं (आर्गनाइज्ड सर्विसेज) में ग्रुप ‘ए’ के जूनियर टाइम स्केल (जेटीएस) पदों को 720 निर्धारित किया. इस प्रकार वर्ष 2001 से यूपीएससी द्वारा 180 पदों पर सीधी भर्ती की गई तथा 180 पदों को रेलवे के आंतरिक ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों से प्रति वर्ष भरा जाने लगा.

    लालू प्रसाद यादव के कारनामे :

    4. वर्ष 2004 में लालू प्रसाद यादव रेलमंत्री बने. उनके रेलमंत्री बनने के साथ ही वर्ष 2005 में रेलवे के ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के रिक्रूटमेंट रूल्स (भर्ती वाले नियमों) में छेड़छाड़ कर आंतरिक या विभागीय ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को ग्रुप ‘ए’ में वार्षिक पदोन्नति के पदों को 180 से बढ़ाकर 255 कर दिया गया.

    यह सर्वज्ञात है कि रेलवे की ग्रुप ‘ए’ सेवाओं के रिक्रूटमेंट रूल्स में गजटेड नोटिफिकेशन द्वारा ही बदलाव किया जा सकता है तथा यह गजटेड नोटिफिकेशन कैबिनेट की मंजुरी और राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद ही निर्गत होता है. भारतीय रेलवे स्थापना कोड (आईआरईसी) भी यह स्पष्ट करता है कि रेलवे को अपने सिर्फ ग्रुप ‘सी’ और ग्रुप ‘डी’ कर्मचारियों के भर्ती नियमों में ही पूर्ण एकाधिकार प्राप्त है. परंतु ग्रुप ‘ए’ के लिए ऐसी स्वायत्तता रेलवे को नहीं मिली है. इसके बावजूद लालू प्रसाद यादव ने अपनी मनमानी करते हुए प्रमोटी कोटे को 180 से बढ़ाकर 255 कर दिया.

    रेलवे द्वारा यह बढ़ोत्तरी तब की गई, जब सभी केंद्रीय मंत्रालयों में ऑप्टिमाइजेशन का नियम जारी था. रेलवे भी प्रमोटी ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को छोड़कर अन्य सभी ग्रुप ‘सी’ और ‘डी’ में रेल कर्मचारियों भारी कटौती कर रही थी. इस प्रकार तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने अपने पद का दुरूपयोग करते हुए प्रमोटी ग्रुप ‘बी’ कोटे के वार्षिक ग्रुप ‘ए’ पदों को बढ़ा दिया था.

    5. वर्ष 2006 में लालू प्रसाद यादव ने दुबारा प्रमोटी अधिकारियों के लिए ग्रुप ‘ए’ के वार्षिक जूनियर टाइम स्केल (जेटीएस) के पदों को 255 से बढ़ाकर 318 कर दिया. इस बार लालू प्रसाद यादव ने ग्रुप ‘ए’ के जेटीएस कैडर को ही बढ़ा दिया और इसके लिए यूपीएससी से सीधी भर्ती तथा प्रमोटी अधिकारियों के बीच तय अनुपात में बदलाव की मंजूरी भी दे दी. यह तय कोटा कुल जेटीएस कैडर में 3:1 होता है. परंतु लालू प्रसाद यादव ने इस अनुपात को 3:1 से बढ़ाकर 4:1 कर दिया और फिर अगले साल पुनः इसे 4:1 से घटाकर 3:1 कर दिया. इस प्रकार नियमों में जोड़-तोड़ कर प्रमोटी अधिकारियों के लिए ग्रुप ‘ए’ के पदों की बढ़ोत्तरी की गई, जो पूर्णरूपेण असंवैधानिक है.

    जबकि यह सर्वविदित है कि रेलवे सहित किसी भी केंद्रीय मंत्रालय के ग्रुप ‘ए’ के पदों की बढ़ोत्तरी सिर्फ कैडर रिस्ट्रक्चरिंग के माध्यम से ही की जाती है और इसका अधिकार सिर्फ केंद्रीय कैबिनेट को है. इसके लिए ऑफिस नोटिंग डीओपीटी के माध्यम से वित्त मंत्रालय को भेजी जाती है तथा उसकी सहमति के बाद कैबिनेट की मंजूरी ली जाती है.

    6. वर्ष 2007 में लालू प्रसाद यादव ने पुन: प्रमोटी कोटे के वार्षिक ग्रुप ‘ए’ में भर्ती के पदों को 318 से बढ़ाकर 411 कर दिया. इस बढ़ोत्तरी में लालू प्रसाद यादव ने गलत गणना के तहत लीव रिजर्व पदों को रिक्त दिखाकर सभी पदों पर प्रमोटी अधिकारियों की पदोन्नति कर दी थी.

    आज यह भी सर्वज्ञात है कि सभी केंद्रीय मंत्रालयों में ग्रुप ‘ए’ के अतिरिक्त लीव रिजर्व पदों का प्रावधान है, जिसमें प्रोबेशनरी रिजर्व, डेपुटेशन रिजर्व, स्टडी रिजर्व इत्यादि प्रमुख हैं. अन्य केंद्रीय मंत्रालयों की तरह रेलवे को लीव रिजर्व के अतिरिक्त पद आवंटित हैं. परंतु प्रश्न यह उठता है कि लीव रिजर्व के सभी पद एक ही साथ एक ही समय में रिक्त कैसे हो सकते हैं? इस प्रकार सभी पदों के रिक्त होने की ऐसी घटना रेलवे के इतिहास में कभी नहीं हुई है. रेलवे द्वारा डेपुटेशन और स्टडी लीव न्यूनतम पांच वर्ष की ग्रुप ‘ए’ सेवा के पश्चात् ही दी जाती है. इन पांच वर्षों के दौरान ग्रुप ‘ए’ अधिकारी जेटीएस से एसटीएस (सीनियर टाइम स्केल) में पदोन्नत हो जाता है. ऐसे में लीव रिजर्व में रिक्त पद तो हो ही नहीं सकते हैं. परंतु प्रमोटी अधिकारियों को ग्रुप ‘ए’ पदों की सौगात देने के चक्कर में लालू प्रसाद यादव ने लीव रिजर्व पदों को रिक्त दिखा दिया, जो कि रेलवे जैसे एक महत्वपूर्ण केंद्रीय मंत्रालय के लिए अत्यंत अशोभनीय है.

    7. इस प्रकार लालू प्रसाद यादव ने अपने तीन वर्षों के कार्यकाल के दौरान असंवैधानिक तरीके से प्रत्येक वर्ष प्रमोटी अधिकारियों का ग्रुप ‘ए’ कोटा 180 से बढ़ाकर 411 कर दिया, जिससे एक तरफ अब तक रेल राजस्व को अरबों रुपये की चपत लग चुकी है, तो दूसरी तरफ तब उन्हें भी करोड़ों रुपये का अदृश्य लाभ प्राप्त हुआ था, क्योंकि बिना निजी लाभ के आज तक लालू प्रसाद यादव ने कोई काम नहीं किया है.

    8. वर्ष 2008-09 में लालू प्रसाद यादव ने एक बार फिर प्रमोटी अधिकारियों को लाभ देने के चक्कर में सर्विस नियमों की गलत गणना करवाई. यह पूरा खेल रेलवे में छठवें वेतन आयोग की सिफारिश पर अमल करते समय किया गया. रेलवे अपने प्रमोटी ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को ग्रुप ‘ए’ में पदोन्नति के समय ‘कैनोटेशन ऑफ पे’ के आधार पर अधिकतम पांच वर्ष की ‘एंटी-डेटिंग सीनियरिटी’ देती है. इस नियम का लाभ उन सभी प्रमोटी अधिकारियों को मिलता है, जिनका मूल वेतन यूपीएससी से सीधी भर्ती हुए पांच साल की सेवा देने वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के मूल वेतन से अधिक हो.

    छठवां वेतन आयोग, जो वर्ष 2006 में लागू हुआ था, में केंद्रीय सरकारी कर्मियों के मूल वेतन को दो भागों में बांटा गया था, पे + ग्रेड पे. इन्हीं दोनों भागों को जोड़कर ही मूल वेतन की गणना की जाती है. ऐसे में रेलवे द्वारा गलत गणना के तहत 26,320 की जगह 18,950 को निर्धारित कर दिया गया तथा ऐसे सभी प्रमोटी ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को ग्रुप ‘ए’ में पदोन्नति के दौरान सीधे-सीधे पांच वर्षों की एंटी-डेटिंग सीनियरिटी दी जाने लगी, जिसका मूल वेतन 18,950 या उससे अधिक था. ऐसा करना किसी भी केंद्रीय मंत्रालय के लिए अत्यंत निंदनीय है.

    ग्रुप ‘सी’ कर्मचारियों को रेलवे में दी गई सीधे ग्रुप ‘ए’ की वरीयता :

    9. ऊपर बताए गए चार प्रकार से नियमों में फेर-बदलकर और गलत गणना के आधार पर प्रमोटी ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को भारी संख्या में ग्रुप ‘ए’ अधिकारी बना दिया गया. ऐसा भ्रष्टाचारपूर्ण करतब सिर्फ लालू प्रसाद यादव जैसे पढ़े-लिखे गंवार राजनीतिक नेतृत्व में ही हो सकता था. रेलवे में ग्रुप ‘ए’ में प्रमोशन का नियम अन्य केंद्रीय मंत्रालयों से अलग है. रेलवे में ग्रुप ‘बी’ के पदों पर यूपीएससी या स्टेट पीएससी से सीधी भर्ती नहीं की जाती है. रेलवे के आंतरिक (विभागीय) ग्रुप ‘सी’ कर्मचारियों को ही प्रमोशन देकर ग्रुप ‘बी’ अधिकारी पदों पर नियुक्त किया जाता है. तत्पश्चात वरीयता के आधार पर ग्रुप ‘ए’ पदों पर उनको पदोन्नति दी जाती है. इस तरह रेलवे का कोई भी कर्मचारी बिना किसी न्यूनतम शैक्षिक योग्यता के ही ग्रुप ‘ए’ अधिकारी बन सकता है. यह एक बहुत बड़ी धांधली है, जिसे रेलवे में विधिक रूप से किया जा रहा है.

    इसलिए रेलवे द्वारा वर्ष 2004 से 2009 के बीच एक साजिश के तहत प्रमोटी अधिकारियों के लिए भारी संख्या में ग्रुप ‘ए’ के पदों का सृजन किया गया और अयोग्य कर्मचारियों को भी ग्रुप ‘ए’ पदों की सौगात भेंट की गई, जिसका परिणाम यह हुआ है कि बहुत सारे अयोग्य प्रमोटी अधिकारियों को ग्रुप ‘ए’ की वरीयता सीधे-सीधे ग्रुप ‘सी’ सर्विस से दे दी गई. उदाहरण स्वरूप एस. एस. रायाप्पा हैं, जो दि. 29.10.2009 को ग्रुप ‘सी’ कर्मचारी के पद पर कार्य कर रहे थे. परंतु नियमों में छेड़छाड़ और गलत गणना की वजह से एस. एस. रायाप्पा को ग्रुप ‘ए’ की वरीयता दि. 30.10.2009 को मिल गई. अर्थात एस. एस. रायाप्पा ग्रुप ‘सी’ कर्मचारी से सीधे ग्रुप ‘ए’ अधिकारी बन गए तथा ग्रुप ‘ए’ पद का लाभ दि. 30.10.2009 से उठाने लगे.

    लालू प्रसाद यादव ने संवैधानिक संस्था यूपीएससी को किया बाईपास :

    10. यूपीएससी द्वारा सभी केंद्रीय मंत्रालयों के लिए ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों का चयन किया जाता है. ये सभी अधिकारी न्यूनतम शैक्षिक योग्यता के साथ काफी कड़ी मेहनत और परिश्रम करके सीधे ग्रुप ‘ए’ में चयनित होते हैं. परंतु रेलवे के ग्रुप ‘सी’ कर्मचारियों को ग्रुप ‘ए’ पदों का यह तोहफा देने का अत्यंत अशोभनीय करिश्मा लालू प्रसाद यादव जैसे पढ़े-लिखे गंवार और घोषित भ्रष्ट राजनीतिज्ञ द्वारा ही किया जा सकता था, जो कि संवैधानिक संस्थाओं, यूपीएससी या स्टेट पीएससी, के उद्देश्यों पर करारी चोट है.

    ज्ञातव्य है कि लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में ही ‘रेलवे समाचार’ ने उनके तमाम भ्रष्टाचार को उजागर किया था. उनके निर्देश पर रेलमंत्री सेल से सभी जोनल महाप्रबंधकों को ग्रुप ‘डी’ में भर्ती किए जाने के लिए सैकड़ों लोगों की सूची भेजी जाती थी. इसके साथ ही रेलवे में नौकरी देने के नाम पर उन्होंने लोगों की जमीनें तो अपने कुनबे के नाम लिखवाई ही, बल्कि अपने कार्यकाल में उन्होंने आरआरबी एवं जीएम कोटे से हजारों लोगों को रेलवे में नौकरी देकर भारी भ्रष्टाचार और रेलवे का बिहारीकरण किया था. उनके इन घोटालों की जानकारी आरटीआई के जरिए रेलवे बोर्ड और विभिन्न जोनल रेलों से प्राप्त की गई थी. उसी आधार पर दिल्ली हाई कोर्ट में ‘रेलवे समाचर’ द्वारा दायर की गई रिट पिटीशन के चलते तुनकमिजाज रेलमंत्री ममता बनर्जी तत्कालीन सीआरबी विवेक सहाय उर्फ ‘विषधर’ को सेवा-विस्तार नहीं दे पाई थीं, क्योंकि ‘विषधर’ ने ही लालू के सबसे ज्यादा लोगों की भर्ती की थी. अब सीबीआई को पी. के. गोयल के साथ ही विवेक सहाय से भी रेलवे में लालू यादव के घोटालों के बारे में पूछताछ करनी चाहिए.

    आरटीआई से प्राप्त जानकारी ने किया पदोन्नति घोटाले का खुलासा :

    11. रेलवे बोर्ड से आरटीआई के तहत प्राप्त जानकारी से पता चला कि रेलवे द्वारा ग्रुप ‘ए’ पदों में बढ़ोत्तरी के समय डीओपीटी, वित्त मंत्रालय और कैबिनेट से इसके लिए आवश्यक मंजूरी नहीं ली गई थी, जबकि ग्रुप ‘ए’ पदों में बढ़ोत्तरी, कैडर रिस्ट्रक्चरिंग करके कैबिनेट की मंजूरी लेने के बाद ही की जा सकती है.

    12. आरटीआई से प्राप्त जानकारी से यह भी पता चला कि ऑप्टिमाइजेशन पालिसी लागू करने के पश्चात् भी रेलवे ने ग्रुप ‘ए’ के पदों में कोई कमी नहीं की. अर्थात 9 वर्षों तक चलने वाली ऑप्टिमाइजेशन पालिसी से रेलवे के कुल ग्रुप ‘ए’ कैडर में 2% सालाना की कटौती के हिसाब से कुल 18% की कटौती की जानी थी. परंतु रेलवे ने यूपीएससी से सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ पदों में 18% की कमी कर दी और इन 18% रिक्त ग्रुप ‘ए’ के पदों को प्रमोटी कोटे में जोड़कर सभी ग्रुप ‘ए’ पदों पर रेलवे के प्रमोटी अधिकारियों को पदोन्नत कर दिया गया. यह न सिर्फ पूरी व्यवस्था के चीटिंग थी, बल्कि इस प्रकार सभी संवैधानिक संस्थाओं की आँखों में धूल झोंकी गई और रेल राजस्व को अरबों रुपये का चूना लगाने के साथ भारी भ्रष्टाचार किया गया.

    विभिन्न संस्थाओं द्वारा रेलवे पर लगाया गया आरोप :

    13. पटना हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि रेलवे द्वारा प्रमोटी अधिकारियों को अनुचित फायदा दिया गया है.

    14. सातवें वेतन आयोग ने भी रेलवे बोर्ड से कमेटी बनाकर इस पूरे प्रकरण पर रिर्पोट मांगी है.

    15. कार्मिक मंत्रालय (डीओपीटी) ने भी रेलवे से 50:50 नियम के उल्लंघन पर जवाब तलब किया है.

    16. स्वतंत्र डेलॉयट कमेटी ने भी अपनी रिर्पोट में कहा है कि रेलवे ने वर्ष 2006 से 2012 के दौरान 1714 ग्रुप ‘ए’ रिक्तियों की जगह 4367 ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की भर्ती की तथा इन सभी अतिरिक्त पदों को खत्म करने के बजाय उन्हें ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी अधिकारियों को दे दिया गया.

    मोदी सरकार द्वारा समस्या से निजात :

    17. चूंकि यह पूरा पदोन्नति घोटाला एक सरकारी तंत्र द्वारा बड़े सुनियोजित तरीके से किया गया है तथा नियमों में फेरबदल रेलवे बोर्ड के तत्कालीन अधिकारियों ने निजी लाभ के तहत किया है. अत: वर्तमान सरकार अपनी तरफ से स्वतः संज्ञान लेकर बीते वर्षों में अपनाए गए गलत नियम को सुधार नहीं सकती है. इसलिए वर्तमान सरकार इस बात को सुनिश्चित करे कि विभिन्न न्यायालयों से ऐसे मामलों पर जो अंतिम निर्णय हुए हैं, या होंगे, उन्हें रेलवे स्वीकार करके लागू करे.

    उल्लेखनीय है कि इस पूरे महाघोटाले पर पर्दा डालने के लिए वर्तमान सीआरबी ने अपना विरोधाभाषी ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ देकर कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास किया था. जिसे ‘रेलवे समाचार’ ने विस्तार से प्रकाशित किया था. यही नहीं, ऐसे मामलों में रेलवे की तरफ से अभी-भी विभिन्न अदालतों में हास्यास्पद हलफनामे दिए जा रहे हैं. इस पूरे पदोन्नति मुद्दे पर डांट-फटकार सुनकर रेलवे के वकील अदालतों के सामने शर्मसार हो रहे हैं. इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (इरपोफ) भी कुछ प्रमोटी बैचों को लाभ देने और अपनी झूठी शान को बचाने के चक्कर में आने वाली प्रमोटी पीढ़ियों के भविष्य को अंधकारमय कर रहा है.

    आरबीएसएस की कुटिल चालों में फंसकर रेलवे बोर्ड और इरपोफ नेतृत्व आज प्रमोटी अधिकारियों को कोई जवाब नहीं दे पा रहा है. इस पूरे घटनाक्रम के मद्देनजर इरपोफ संगठन फूट के कगार पर है. प्रमोटी अधिकारियों द्वारा भी आरबीएसएस की तर्ज पर अलग से सिर्फ ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों का संगठन बनाने की तैयारी की जा रही है, क्योंकि इरपोफ के वर्तमान सभी जोनल पदाधिकारी जेएजी यानि ग्रुप ‘ए’ पा चुके हैं तथा केंद्रीय नेतृत्व को अब सिर्फ सेलेक्शन ग्रेड और एसएजी की ही ज्यादा चिंता रहती है. अर्थात इरपोफ की सारी ऊर्जा अपने जोनल पदाधिकारियों के भविष्य को ज्यादा से ज्यादा उज्ज्वल बनाने पर खर्च होती है.

    अब इरपोफ का केंद्रीय नेतृत्व भी जूनियर स्केल प्रमोटी अधिकारियों के भविष्य निर्माण की बात नहीं करता है. जबकि बहुत सारे ग्रुप ‘बी’ अधिकारी आज भी 10-15 सालों की सेवा के बाद भी 4800 ग्रेड-पे पर काम कर रहे हैं और उनके साथ का ग्रुप ‘सी’ कर्मचारी एमएसीपी का लाभ लेकर 5400 ग्रेड-पे पा रहा है. जूनियर स्केल पर स्टेगनेशन हो चुका है. 10 से 15 साल तक काम करने के बाद भी सीनियर स्केल नहीं पा मिल रहा है. ऐसी घटनाएं बहुत मार्मिक हैं तथा इरपोफ इस पर कन्नी काटता नजर आ रहा है.

    ऐसी परिस्थिति में ‘रेलवे समाचार’ का का भी मानना है कि मृतप्राय होने से अच्छा है कि बागी होकर ग्रुप ‘बी’ आरबीएसएस संगठन की तर्ज पर अलग ग्रुप ‘बी’ इरपोफ का सृजन किया जाए, जो वास्तव में प्रमोटी अधिकारियों के उत्थान की बात करे, अथवा वर्तमान इरपोफ से ग्रुप ‘ए’ पाए हुए सभी प्रमोटी अधिकारियों को बाहर किया जाए. हालांकि ऐसी मांग पहले भी इरपोफ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की कई बैठकों में होती रही है, मगर चूंकि लगभग सभी जोनल प्रमोटी संगठनों सहित इरपोफ की केंद्रीय कार्यकारिणी में भी ग्रुप ‘ए’ पाए प्रमोटी अधिकारी ही हावी रहे हैं, इसलिए कभी उक्त मांग पर कोई तवज्जो नहीं दी गई.

सम्पादकीय