कॉश, रेलमंत्री भी टाटा समूह से कुछ सीख पाते!

    बड़ी संख्या में ‘सफेद हाथी’ पालने की जरूरत क्या है?

    प्रधानमंत्री, इफरात अधिकारियों पर मेहरबान क्यों हैं?

    सरकरी संस्थानों के बंद होने या उनका निजीकरण होने का सबसे बड़ा कारण है सरकारी संस्थानों में वास्तविक कार्य न करने वालों, यानि अधिकारी वर्ग की जरूरत से ज्यादा अधिकता होना. संसार के सारे तंत्र, जो प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकने वाले हैं, श्रमिकों द्वारा ही तैयार किए जाते हैं. न दिखने वाला भाग यानि प्लानिंग है, जो कि कुछ ही लोगों या एक-दो व्यक्तियों द्वारा या विश्व के किसी कोने में चल रहे सफल प्रयोग से अथवा किसी ग्रुप के द्वारा प्लानिंग की सेवाएं लेने पर ही सफलता मिल जाती है. वैसे भी सभी रेल अधिकारी ‘वर्क स्टडी’ के नाम पर देश-विदेश घूमते ही हैं. वे अनेकों बड़ी कंपनियों द्वारा प्लानिंग की सेवाएं आज भी लेते हैं, तो फिर क्या जरूरत है कि इतने सफेद हाथी पाले जाएं?

    ‘रेलवे समाचार’ पहले में भी लिख चुका है कि रेलवे में हाथ बांधे खड़े हुए दिशा-निर्देश देने वालों की कमी नहीं है, बल्कि वास्तविक कार्य करने वाले मजदूरों की ज्यादा आवश्यकता है. कल तक जहां 100 किमी. के सेक्शन में एक अधिकारी हुआ करता था, वहां आज उतने में ही चार-चार अधिकारी और उनके चार-चार सहायक अधिकारी हो गए हैं. यदि मजदूर होगा, तभी कार्य होगा. वातानुकूलित कक्ष में बैठकर रेल नहीं चल सकती. यदि रेल कर्मचारी से कार्य नहीं करवाया जा रहा है, तो वही कार्य ठेकेदार का कर्मचारी कर रहा है. परंतु यह निश्चित है कि कार्य तो कर्मचारी ही कर रहा है, अधिकारी नहीं.

    अब जहां तक यह कहा जाता है कि रेल कर्मचारी कार्य नहीं करता, तो यह सफेद झूठ बोल-बोलकर रेल को खोखला करके बेचने पर आमादा समाज के नासूरों का गिरोह यह नहीं समझ रहा है कि वह जिस डाल पर बैठा है, उसी को काटने का घातक प्रयास कर रहा है. यदि रेलवे का निजीकरण होता है, जो कि काफी हद तक हो भी चुका है, तो उस गिरोह के सदस्य अवश्य ही बाहर कर दिए जाएंगे, जबकि संभवतः रेल कर्मचारी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है.

    घड़ी की सुई की तरह चलने वाला रेल विभाग चेम्बर में बैठकर सरकारी कम्प्यूटर, लैपटॉप और सरकारी नेट का उपयोग करके कार्य के घंटों में ताश खेलकर, ऑन लाइन शेयर ट्रेडिंग करके, फेसबुक पर चैटिंग करके या पोर्न फिल्में देखकर नहीं चल रहा है, बल्कि तेज बारिश में भीगते हुए, कड़ाके की ठंड में ठिठुरते हुए और भीषण गर्मी की आग झेलते हुए इंसान के रूप में राक्षसों जैसा श्रम करने वाले श्रमिक की दम पर रेलवे आज भी अपनी दक्षता कायम किए हुए है.

    यदि मुंबई मंडल को ही उदाहरण के तौर पर देखें, तो क्षेत्रफल की दृष्टि से यह मंडल पहले जितना ही है. यदि कहीं नई लाइन डाली गई है, तो उसी अनुरूप में लोनावाला-पुणे सेक्शन इससे कट गया है. परंतु पिछले कुछ सालों में ही इस मंडल में अधिकारी वर्ग करीब 8 से 10 गुना बढ़ गया है. जबकि अधिकारियों की अपेक्षा बड़ी मात्रा में कर्मचारी कम हुए हैं. यदि रेल ट्रैफिक बढ़ा है, इसीलिए अधिकारी बढ़े हैं, यह बात तर्कसंगत इसलिए नहीं हो सकती है, क्योंकि केवल गणना देखने के लिए अधिकारियों की संख्या में वृद्धि होना पूर्णतः अतार्किक है. सारा रेडी रेकनर तो वास्तव में कर्मचारी ही बनाकर प्रस्तुत करता है, जबकि संचालन बढ़ने से निश्चित ही कर्मचारी बढ़ने चाहिए थे. बिना कर्मचारियों के बढ़े काम होना ही नहीं है.

    अतः यदि कर्मचारी बढ़े हैं, तो वह ठेकेदार के कर्मचारी के रूप में बढ़े हैं, जो कि किसी भी तरह की जिम्मेदारी से मुक्त हैं. वहीं रेल कर्मचारी यदि नौकरी करता है, तो वह अपने कार्य के प्रति उत्तरदायी भी होता है. आज अवसादग्रस्त, हीनभावना का शिकार और बीमार होकर तथा रन-ओवर होने से दिन-प्रतिदिन रेल कर्मचारियों की मृत्यु दर बढ़ रही है, क्योंकि श्रम की अधिकता, नौकरी का भय, परिवार की असुरक्षा का हर समय तनाव उन्हें काल-कवलित कर रहा है. यदि हम व्यसन को इसका जिम्मेदार मानते हैं, तो यहां यह जान लेना आवश्यक है कि वर्तमान भौतिकता के बावजूद रेलकर्मियों में व्यसन की भारी कमी आई है, क्योंकि अब वह अपने परिवार के प्रति उत्तरदायित्व की भावना के चलते कोई व्यसन करने के बारे में सोचता भी नहीं है.

    जबकि अधिकारी वर्ग में व्यसन की आदत स्टेटस सिम्बल बन गई है. आए दिन ठेकेदारों से फोकट की बड़ी-बड़ी पार्टियां ली जाती हैं. ठेकेदार उन्हें अन्य कई प्रकार की निजी सेवाएं भी उपलब्ध करवाता है. अपनी तनख्वाह के पैसे से परिवार चलाने वाला अधिकारी आज की व्यवस्था का ‘बेचारा’ आदमी बनका रह गया है. प्रतिमाह 1.5 लाख से 5 लाख तनख्वाह के अलावा प्रतिमाह अपनी सुविधा के रूप में रेलवे को लाखों का चूना लगाने के बाद भी पेट न भरने की स्थिति में ठेकेदारों की अनुकम्पा पर पलने वाले रेलवे के तथाकथित कर्णधार रेल का बेड़ा गर्क करने में लगे हुए हैं, यह एक कटु सत्य है. यह भी सत्य है कि जो जहां है, वहां अपनी तरह से रेलवे को लूट रहा है. जितने ज्यादा बिचौलिए होंगे, उतना ज्यादा क्वालिटी कंट्रोल कम होगा. यह भी उतना ही सत्य है.

    अपनी कुर्सी बचाने की कवायद में रेल अधिकारियों ने यह साबित कर दिया है कि रेल कर्मचारी उनसे ज्यादा कुशल हैं. जैसे कि एक चालक डीजल और इलेक्ट्रिक दोनों ट्रैक्शन पर करीब 18 तरह के भिन्न-भिन्न लोको, ईएमयू, डीएमयू, मेमू आदि सहित अन्य कई तरह की मशीनों-इंजनों को चलाता है, उनके तरीके जानता है, उनके गुण-दोष सुधारने का काम एक ही कर्मचारी यानी चालक कर सकता है. परंतु इस एक चालक को मैनेज करने के लिए हर जगह क्रू-कंट्रोलर, लोको इंस्पेक्टर के अलावा मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल दो-दो विभागों के कई-कई अधिकारी रखे गए हैं.

    जबकि रेल परिचालन से जुड़े स्टेशन मास्टर एवं गार्ड का कैडर कंट्रोल ऑपरेटिंग विभाग विभाग के पास है और उनकी कंट्रोलिंग सीनियर डीओएम द्वारा की जाती है. ऐसे में चालक का कैडर इलेक्ट्रिकल का सीनियर डीईई (ऑपरेशन) तथा मैकेनिकल का सीनियर डीएमई (ऑपरेशन) और उनके कई सहायकों यथा डीईई, डीएमई, एईई, एएमई के द्वारा क्यों कंट्रोल किया जाता है? इतने अधिकारियों का क्या औचित्य है? सच यह है कि चालक का भारतीय रेल में कोई विभाग ही नहीं है. वह न तो इलेक्ट्रिकल में आता है, न ही मैकेनिकल में, और न ही वह ऑपरेटिंग विभाग का सदस्य है.

    भारतीय रेल में चालक वर्ग का वास्तव में कोई माई-बाप नहीं है, वह अनाथों की तरह आपने आपको आश्रय की खोज में ऑपरेटिंग विभाग, क्योंकि वह ट्रेन संचालन से जुड़ा है, का सदस्य जबरन मानकर अपने विभाग के सामने ‘परिचालन’ लिखता है. यदि वह परिचालन विभाग का सदस्य है, तो सीनियर डीओएम को उसका कैडर कंट्रोल करना चाहिए. यदि ऐसा नहीं है, तो उसको उसका वास्तविक विभाग कौन सा है, यह तत्काल बताया जाना चाहिए. ताज्जुब इस बात का है कि कर्मचारी की छंटनी के लिए बारीक से बारीक चीजों पर नजर घुमाने वाले रेलवे बोर्ड के काबिल अधिकारियों की गिद्ध-दृष्टि से यह महत्वपूर्ण वर्ग वंचित क्यों रह गया है?

    यदि रेलवे को बचाना है, तो टाटा समूह से सबक लिया जाना चाहिए, जिसने विगत दिनों में अपने 1500 अधिकारियों को पदमुक्त करके उनको दिए जाने वाले वेतन की एवज में कई सौ कर्मचारी भर्ती करके अपने समूह को सफलता की ऊंचाइयों पर ले जाने का सफल प्रयास किया तथा भारतीय बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है. पूरे भारत के श्रमिकों पर नजर घुमाने वाले वर्तमान प्रधानमंत्री और रेलमंत्री रेलवे के इफरात अधिकारियों पर इतने मेहरबान क्यों हैं? यह एक बड़ा प्रश्न है.

सम्पादकीय