चार साल में मामले का निपटारा नहीं, रिटायर्ड अधिकारी का घोर उत्पीड़न

    प्रधानमंत्री के निर्देशों का पालन भी सुनिश्चित नहीं कर पा रहा रेल मंत्रालय

    रेलमंत्री को नहीं है रेलवे की ऐसी तमाम अंदरूनी समस्याओं की कोई चिंता

    जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध क्या पीएमओ कोई कारगर कदम उठाएगा?

    सुरेश त्रिपाठी

    एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिन-रात मेहनत करके देश के विकास और प्रशासनिक सुधार के लिए लगातार प्रयासरत हैं, तो दूसरी तरफ रेलमंत्री सुरेश प्रभु रेल मंत्रालय के बाबुओं की कार्य-संस्कृति में सुधार करने और आतंरिक अनुशासन कायम करने के बजाय सिर्फ उदघाटनों और ऊपरी चमक-दमक में समय गवां रहे हैं. जबकि रेलवे न सिर्फ सर्वाधिक अदालती मामलों में आगे है, बल्कि भ्रष्टाचार में भी यह सभी केंद्रीय विभागों में सबसे टॉप पर है. इसके अलावा अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ उनके सेवा संबंधी मामलों में न्याय नहीं हो रहा है. परंतु रेलमंत्री को रेलवे की ऐसी तमाम अंदरूनी समस्याओं की कोई चिंता नहीं है.

    ‘रेलवे समाचार’ के संज्ञान में एक ऐसे सेवानिवृत्त रेल अधिकारी का मामला आया है, जो पिछले चार सालों से न्याय के लिए भटक रहा है. इस अधिकारी को अब तक न तो उसके सेवानिवृत्ति संबंधी लाभ (डीसीआरजी, पेंशन आदि) मिले हैं, न ही न्याय मिल पाया है, बल्कि जांच के नाम पर लगातार चार सालों से उसका उत्पीड़न किया जा रहा है. सरकारी बाबू उससे सीधे मुंह बात तक नहीं कर रहे हैं. ‘रेलवे समाचार’ को भेजे गए विस्तृत विवरण में उत्तर रेलवे के जगाधरी वर्कशॉप से बतौर मंडल कार्मिक अधिकारी (डीपीओ) सेवानिवृत्त हुए सतीश कालरा ने बताया है कि उन्हें एक विभागीय चयन के मामले में सेवानिवृत्ति से कुछ दिन पहले अनावश्यक रूप से विजिलेंस जांच में अटका दिया गया.

    प्राप्त विवरण के अनुसार सेवानिवृत्त डीपीओ सतीश कालरा को उक्त मामले में 12 जून 2013 को आरोप-पत्र (चार्जशीट) दिया गया था. इसका प्रत्युत्तर श्री कालरा ने 10 जुलाई 2013 को दे दिया था. परंतु इस मामले की जांच के लिए जांच अधिकारी के रूप में आरसीएफ, कपुरथला के रिटायर्ड जीएम प्रमोद कुमार की नियुक्ति करने में उत्तर रेलवे विजिलेंस को लगभग तीन साल का समय लग गया. जांच अधिकारी प्रमोद कुमार की नियुक्ति मार्च 2016 में की गई. तथापि उन्होंने 4 अप्रैल 2016 को अपनी जांच प्रक्रिया शुरू करके 26 अगस्त 2016 को अपनी रिपोर्ट विभाग को सौंप दी थी. अपनी जांच में प्रमोद कुमार ने श्री कालरा को सभी आरोपों में निर्दोष पाया था और उनकी सम्पूर्ण निर्दोषिता को साबित करते हुए उन्होंने अपनी यह जांच रिपोर्ट दी थी.

    तथापि, जीएम/उ.रे. ने जांच अधिकारी की रिपोर्ट को अमान्य करते हुए श्री कालरा को दोषी बता दिया. यहां यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि यदि जांच अधिकारी की रिपोर्ट को अंततः अमान्य ही करना है, तो इसके लिए रेलवे का पैसा और समय क्यों बरबाद किया जाता है? तथापि, श्री कालरा ने पुनः विस्तृत स्पष्टीकरण देते हुए जीएम को एक ज्ञापन 27 जनवरी 2017 को सौंपा. उनके द्वारा यह ज्ञापन सौंपे हुए अब चार महीनों से भी ज्यादा समय गुजर चुका है, फिर भी उनके साथ न्याय नहीं हुआ है. इस प्रकार श्री कालरा को न्याय के लिए दर-दर भटकते चार साल पूरे हो चुके हैं, तथापि उन्हें अब तक न तो उनके साथ न्याय हुआ है, न ही उन्हें कोई पेंशनरी लाभ मिल पाए हैं, न ही पेंशन का रिवीजन किया जा सका है, और न ही अब तक उनकी डीसीआरजी रिलीज की गई है.

    जबकि पिछले तीन सालों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विभिन्न मंचों से ऐसे तमाम मामलों का छह महीनों के अंदर अंतिम निपटारा किए जाने की घोषणा कर चुके हैं. ऐसा लगता है कि सरकारी बाबुओं के कान तक प्रधानमंत्री की आवाज शायद अब तक नहीं पहुंच पाई है. कैबिनेट सेक्रेटरी, सॉलिसिटर जनरल और डीओपीटी से भी ऐसे निर्देश जारी हुए हैं कि अदालती मामलों सहित विभागीय तौर पर चल रहे सभी मामलों पर तुरंत संज्ञान लिया जाए तथा उनका अंतिम निपटारा निर्धारित समय के अंदर किया जाए. इसके अलावा सीवीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार भी ऐसे सभी विजिलेंस मामलों में 90 दिन के अंदर जांच पूरी करके पूरे मामले का अंतिम निपटारा 180 दिन (6 महीने) में किए जाने का नियमतः प्रावधान है.

    इसके बावजूद यदि सरकारी बाबू एक-एक मामले को निपटाने में चार से छह साल लगा रहे हैं, तो निश्चित रूप से यह कहना पड़ेगा कि उनके अंदर न सिर्फ घोर काहिली आ गई है, बल्कि उनकी इस अक्षम्य लापरवाही को देखने-सुनने वाला भी कोई नहीं है. इसके लिए वह लोग भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जितने कि ये बाबू हैं. क्या इस घोर लापरवाही के लिए संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करते हुए श्री कालरा को शीघ्र न्याय दिलाने हेतु प्रधानमंत्री और रेलमंत्री कोई निश्चित कदम उठाएंगे?

सम्पादकीय