दो साल से कम कार्यकाल वाले अधिकारियों को हटाने का बताना होगा उचित कारण

    ‘रेलवे समाचार’ की खबर का जीएम/पूर्वोत्तर रेलवे ने लिया संज्ञान, जारी किए कड़े निर्देश

    प्रत्येक कार्यकारी अधिकारी को अपनी सीमा और दायित्व का बोध होना आवश्यक है

    गोरखपुर ब्यूरो : मुख्य परिचालन प्रबंधक सह मुख्य वाणिज्य प्रबंधक, पूर्वोत्तर रेलवे द्वारा 14 जून 2017 को वाणिज्य एवं परिचालन विभाग के 11 अधिकारियों को उनका न्यूनतम कार्यकाल पूरा हुए बिना ही अनावश्यक रूप से हटाए जाने पर ‘रेलवे समाचार’ द्वारा 15 जून 2017 को ‘पूर्वोत्तर रेलवे : ताश के पत्तों की तरह फेंटे गए ट्रैफिक/कमर्शियल अधिकारी’ शीर्षक से प्रकाशित खबर का महाप्रबंधक, पूर्वोत्तर रेलवे एस. पी. त्रिवेदी द्वारा सम-सामयिक और उचित संज्ञान लिया गया है. इस संबंध में महाप्रबंधक एस. पी. त्रिवेदी ने सभी विभाग प्रमुखों सहित सभी विभागीय प्लेसमेंट कमेटियों को एक कड़ा गोपनीय पत्र जारी करके कड़े निर्देश दिए हैं. जो कि इस प्रकार हैं-

    Sub. : Proceedings of Placement Committees

    Cases coming to me for transfer and posting of officers are seen to be dealt rather casually. Even the basic information i.e. whether the officer proposed to be transferred has completed minimum two years on his current post is not mentioned.

    Placement Committees should undertake their job more seriously, particularly to the fact that an officer proposed to be transferred is not subjected to repeated shifting in a short time.

    To ensure this, the Committee must take in to account the time spent by the officer on his last post, specifically mentioning whether it is less than two years or so. All the cases where the period is less than two years must be put up to GM for his approvel specifically mentioning this fact and the justification to shift him within two years.

    महाप्रबंधक, पूर्वोत्तर रेलवे श्री त्रिवेदी के इस पत्र से स्पष्ट है कि 14 जून को ट्रांसफर किए गए 11 अधिकारियों के मामले में विभाग प्रमुख, जो कि दोनों विभागों में एक ही हैं, सहित विभागीय प्लेसमेंट कमेटी द्वारा महाप्रबंधक को अंधेरे में रखा गया और अपनी मनमानी की गई. उल्लेखनीय है कि महाप्रबंधक द्वारा जो निर्देश उक्त पत्र में दिए गए हैं, वह सब प्लेसमेंट कमेटियों के एजेंडा में पहले से ही शामिल हैं. तथापि विभाग प्रमुखों द्वारा प्लेसमेंट कमेटियों से अपनी मनमर्जी के मुताबिक अधिकारियों के ट्रांसफर की सिफारिशें कराई जाती रही हैं और इस प्रकार उनका उत्पीड़न किया जाता रहा है. परंतु अब उक्त पत्र के परिप्रेक्ष्य में विभागीय प्लेसमेंट कमेटियों को किसी अधिकारी को दो साल से पहले उसके ट्रांसफर पर उचित औचित्य और कारण बताते हुए उसकी पूर्व संस्तुति महाप्रबंधक से लेनी होगी, यह सुनिश्चित किया गया है. जानकारों का कहना है कि यह स्थिति सिर्फ पूर्वोत्तर रेलवे तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि सभी जोनल रेलों में लागू होनी चाहिए, जिससे दो साल के न्यूनतम कार्यकाल के बिना किसी अधिकारी को उसके पद से हटाकर उसका उत्पीड़न नहीं किया जा सके.

    प्राप्त जानकारी के अनुसार असमय ट्रांसफर किए गए उक्त 11 अधिकारियों में से एक धीरेंद्र कुमार के पक्ष में भारतीय रेल दलित मजदूर एसोसिएशन ने 21 जून को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रेलमंत्री तथा अन्य सभी संबंधितों को एक पत्र भेजकर 4 से 7 जुलाई को वाराणसी मंडल सहित समस्त पूर्वोत्तर रेलवे में रोड शो, धरना-प्रदर्शन और सामूहिक उपवास करके सीओएम/सीसीएम रवि वलूरी की मनमानी का विरोध करने की तैयारी की है. इसके अलावा पता चला है कि धीरेंद्र कुमार की पत्नी ने भी सभी संबंधित प्राधिकारियों को एक पत्र भेजकर उनके पति का अकारण उत्पीड़न किए जाने की बात कही है. इसके साथ ही धीरेंद्र कुमार ने भी कैट में अपने अकारण और असमय ट्रांसफर के खिलाफ एक याचिका दायर की है. ज्ञातव्य है कि सीनियर डीसीएम, वाराणसी मंडल के पद से धीरेंद्र कुमार को तीन महीने से भी कम समय में हटा दिया गया है, जबकि चार साल में उनके छह तबादले किए जा चुके हैं.

    ‘रेलवे समाचार’ का मानना है कि पूर्वोत्तर रेलवे में सीसीएम का अतिरिक्त कार्यभार देख रहे सीओएम रवि वलूरी को नैतिक रूप से भी उक्त ट्रांसफर नहीं करने चाहिए थे. इसके अलावा यदि उन्होंने ऐसी मंशा जाहिर की थी, तो भी विभागीय प्लेसमेंट कमेटी को उनकी मंशा मानने से स्पष्ट इंकार करना चाहिए था और उन्हें यह बताया जाना चाहिए था कि निकट भविष्य में जब नए सीसीएम की पोस्टिंग होगी, तब वह अपने हिसाब से अधिकारियों को नियोजित करेंगे, कार्यकारी सीसीएम होने के नाते और नैतिक तौर पर भी उन्हें किसी अधिकारी को फिलहाल शिफ्ट करने की जरूरत नहीं है.

    यही बात महाप्रबंधक पर भी लागू होती है, क्योंकि वह भी पूर्वोत्तर रेलवे का अतिरिक्त पदभार देख रहे हैं, उन्हें भी प्लेसमेंट कमेटी की संस्तुतियों को यह कहते हुए वापस कर देना चाहिए था कि जब स्थाई महाप्रबंधक की नियुक्ति होगी, तब वह अपने मुताबिक अधिकारियों का प्लेसमेंट करेंगे, क्योंकि उनसे उचित आउटपुट लेने की जिम्मेदारी उन्हीं की है. यहां यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जब किसी भी कार्यकारी को कोई नीतिगत निर्णय लेने का नैतिक अधिकार नहीं होता है, तब उसी नैतिकता में मातहत अधिकारियों और कर्मचारियों की ट्रांसफर/पोस्टिंग भी समाहित होती है. कार्यकारी का मतलब सिर्फ व्यवस्था बनाए रखना और दैनंदिन कामकाज को निपटाना होता है, न कि कोई उलटफेर करना. ऐसे में प्रत्येक कार्यकारी को अपनी सीमा और दायित्व का बोध होना आवश्यक है.

सम्पादकीय