‘स्पेड’ के मामलों को समाप्त करने के प्रति गम्भीर नहीं है रेल प्रशासन

    ‘स्पेड मिशन-जीरो’ की काउंसलिंग के बावजूद क्या रुक जाएंगे स्पेड के मामले?

    पर्याप्त स्टाफ की कमी के चलते 20-20 घंटे लगातार ड्यूटी कर रहा रनिंग स्टाफ

    अंडर रेस्ट या अस्वस्थ होने पर भी स्टाफ को नहीं दिया जा रहा है अतिरिक्त रेस्ट

    ड्राइव करते लोको पाइलट के दिमाग को ‘कंट्रोल’ करते हैं एसी चेम्बर में बैठे अधिकारी

    मुंबई : आजकल मुंबई मंडल, मध्य रेलवे में लोकल ट्रेनों के मोटरमैनों और मेल-एक्स. ड्राइवर्स (लोको पाइलट्स) के लिए ‘स्पेड मिशन-जीरो’ की कॉउंसलिंग चल रही है. अतः रेल प्रशासन द्वारा सभी लोकल ट्रेन ड्राइवर्स को इस ‘सिग्नल पासिंग ऐट डेंजर’ (स्पेड) के ‘जीरो’ लक्ष्य को पाने के लिए प्रयास करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं. परंतु मोटरमैनों एवं ट्रेन ड्राइवर्स के लिए निम्न परिस्तिथियां इसमें बाधक बन रही हैं, जिस पर रेल प्रशासन को गम्भीरता से विचार करना चाहिए.

    1. यदि कोई रनिंग स्टाफ कॉल लगने पर अपने आपको अंडर रेस्ट बताता है, या कुछ अस्वस्थ महसूस करता है और 2-3 घंटे के अतरिक्त रेस्ट की डिमांड करता है, वह भी तब जबकि उसके आगे वाला क्रू रेस्ट अप है, तो उसके शरीर की मांग और जरूरत के मुताबिक 2-3 घंटे का अतरिक्त रेस्ट न देकर बुक ऑफ के नाम पर पूरे दिन उसको संबंधित अधिकारी के चेम्बर के बाहर की गैलरी के चक्कर कटवाकर उसे परेशान किया जाता है, ताकि दुबारा कोई अन्य रनिंग स्टाफ अंडर रेस्ट अथवा अस्वस्थ होने पर भी मना न कर सके. लेकिन उनके लिंक बनाने वाले ऐसे लोग हैं, जिन्होंने कभी लाइन पर काम ही नहीं किया हैं. इसके लिए रनिंग स्टाफ़ की मांग है कि 30+16 के पीआर डाले जाएं, जो कि कानूनन सही हैं.

    2. आज के समय में एकल परिवार की व्यवस्था में क्रू को मुख्यालय से बाहर लगातार 72 घंटों तक उसके परिवार से दूर रखना, उसकी पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से उसको तनावपूर्ण बनाए रखना, जबकि रेलवे बोर्ड ने 36 घंटे मुख्यालय वापसी के लिए मोनिटरिंग करने का आदेश दिया हुआ है. परन्तु इसको अमल में नहीं लाया जा रहा है. यह वजह रनिंग स्टाफ के लिए तनाव का सबसे बड़ा कारण है.

    3. रनिंग स्टाफ की वैकेंसी को भरा न जाना, और लीव/ट्रेनिंग रिजर्व के 30% अतरिक्त कोटे के नियम को तो भुला ही दिया गया है, जिसकी वजह से रनिंग स्टाफ़ को समय पर रेस्ट/छुट्टी नहीं मिल पाती है और परिवार या समाज का काम उसी मुख्यालय रेस्ट में शॉर्टकट तरीके से उन्हें पूरा करना पड़ता है. वह ऐसा करते भी हैं, क्योंकि सामाजिक प्राणी हैं. इन परिस्तिथियों में उन्हें अंडर रेस्ट काम करना पड़ता है. लेकिन प्रशासन के रिकार्ड में रेस्ट अप हैं, तभी तो कभी-कभी स्पेड की समीक्षा आती है कि मुख्यालय से ऑन ड्यूटी के तीन घंटे बाद ही स्पेड हो गया. यह इसी तरह के तनाव के पैदा होने का कारण बनते हैं, जो रिकार्ड में नहीं लिए जाते.

    4. गाड़ी को लोको पायलट कंट्रोल करता है, लेकिन आज के समय उन्हें प्रशासन द्वारा एसी चेम्बर में बैठकर रेगुलेट किया जा रहा है. यदि हम कोई रोड व्हीकल चला रहे हैं और चौराहे पर लाल सिगनल दिखाई देता है, तो गाड़ी रोकने के लिए हमारा माइंड कमांड देता है, हमारे हाथ-पैर अपने आप ऐक्शन में आकर गाड़ी सही जगह रोक लेते हैं. वहां क्या हम चौराहे की दूरी नापकर ब्रेक लगाते हैं, या स्पीडोमीटर में स्पीड देखकर? फिर हर व्हीकल का अपना-अपना अलग-अलग बिहेवियर होता है, चाहे वह रोड व्हीकल हो, या रेल. उसकी कंट्रोलिंग हम व्हीकल के बिहेवियर के अनुसार अलग-अलग तरीके से करते हैं. ऐसे में रनिंग स्टाफ को उसके विवेक और दिमाग का इस्तेमाल करने देने के बजाय उसको एसी चेम्बर में बैठकर प्रशासन द्वारा नियंत्रित करने का क्या औचित्य है?

    5. मालगाड़ी को 8-9 घंटे की ड्यूटी हो जाने के वावजूद भी थ्रू किया जाता है. यह भी तनाव का एक सबसे बड़ा कारण है और रनिंग स्टाफ के लिए एक बड़ी परेशानी तथा अनरेस्ट को जन्म देना है.

    6. एनआरटी होने की स्थिति में समय पर स्पेयर के लिए गाड़ी न देना, जिसकी वजह से 20-20 घंटे लगातार ड्यूटी का होना भी रनिंग स्टाफ के लिए एक बड़ी समस्या है. इसके बाद रनिंग रूम से 6+2 में कॉल लगा देना, जिसमें लोको पायलट को फ्रेश होने, खाने आदि की व्यवस्था को लेकर शरीर के आराम के लिए 3से 4 घंटे मिले, जबकि उसने ड्यूटी 20 घंटे की. इन तमाम परिस्तिथियों में रनिंग स्टाफ से रोबोट की तरह काम नहीं लिया जा रहा है, जो कि स्पेड का कारण बन रहा है. रेल प्रशासन को इस पर अविलंब विचार करना चाहिए.

    7. वर्तमान में सीएलआई के पदों पर कुछ इस तरह के लोग सेलेक्ट हो रहे हैं, जिन्होंने सहायक चालक (एएलपी) से लेकर लोको पाइलट (एलपी) होने तक सुपरवाइजरों या अधिकारियों के आसपास चक्कर लगाकर (गणेश परिक्रमा करके) अपनी नौकरी की है और एक्सीलेंट सीआर लेकर चीफ लोको इन्स्पेक्टर (सीएलआई) बन गए हैं, ज्यादातर यही लोग रनिंग स्टाफ और अधिकारियों के सलाहकार भी बने हुए हैं. ऐसे लोग सिर्फ किसी तरह अपनी नौकरी चला रहे हैं. ऐसे में ये लोग रेलवे का और रनिंग स्टाफ़ का भला कैसे कर सकते हैं? और उन्हें लोको हैंडलिंग का तजुर्बा कैसे दे सकते हैं, जिनके प्रमोशन इफेक्ट कराने में डबल ड्राइवर लगाए गए, क्योंकि एमपी पकड़ने में उनकी सांस फूल रही थी.

    8. दूसरी तरफ ऐसे बहुत से अच्छे सुपरवाइजर भी हैं, जिनके पास काबिलियत और प्रेक्टिकल अनुभव दोनों है, मगर उनके नेचर में चापलूसी नहीं है, और हो भी नहीं सकती, इसलिए वह रनिंग स्टाफ के अधिकारियों के सलाहकार नहीं हो सकते, जिससे अच्छी प्लानिंग के माहौल से रेलवे और कर्मचारियों को लाभ पहुंच सके.

    9. यह तथाकथित उच्च कोटि के सलाहकार लोग इंजनो के लुकआउट ग्लास तो ढंग से साफ करवा नहीं सकते हैं, जिस पर हजारों यात्रियों की सुरक्षा निर्भर होती है. तथापि, अपनी चापलूसी की बदौलत मलाई खा रहे हैं.

    10. प्रशासन सभी कार्य-स्थलों पर पीने का शुध्द पानी तक तो उपलब्ध नहीं करवा पा रहा है, सही रेस्ट नहीं दिया जा रहा है, जबकि लोको कैब में कैमरा लगाने  की तैयारी कर रहा है. इसके बजाय चालकों के बैठने की सीट को आरामदायक और सुविधाजनक बना दिया जाए, जिससे वे अपने काम को और बेहतर ढंग से अंजाम दे सकें तथा ज्यादा अच्छी तरह से ध्यान लगाकर काम कर सकें.

    रनिंग स्टाफ़ की एक व्यथा और है, वह यह कि उन्हें ज्यादा टेंशन देने का नाम दिया गया है ‘स्पेड मिशन-जीरो’ जबकि प्रशासन के कारनामे देख ठठाकर हंसने का मन करता है ! जैसे-

    1. ईको फ़्रेंडली कैब के नाम पर  ए-9 और एसए-9 की लोकेशन ही पता नहीं चलती.

    2. पीवीईएफ और पीवीसीडी की लोकेशन ही आज तक कन्फर्म नहीं हो पाई है कि इसे कहां लगाया जाए? जिस शेड की जहां मर्जी चिपका दिया. कई बार इन स्विचों तक ड्राइवर का पैर ही नहीं पहुंचता, और यदि किसी तरह पहुंचा भी दिया, तो उसका घुटना छिलना निश्चित होता है.

    3. स्पीडोमीटर, वीसीडी यूनिट का या तो भगवान मालिक है, या अधिकारी.

    4. हेड लाइट का फोकस का जिक्र करना तो अपराध की श्रेणी में आता है.

    5. बड़ोदा के पैसेंजर लोको का संचालन किसी पुरानी भूतिया हवेली की या किसी हॉरर फिल्म की याद करवा देता है, 20 किमी. की स्पीड होते ही इसमें हॉरर फिल्म की आवाज शुरू हो जाती है, जो 110 किमी. की गति तक बरकरार रहती है. ऐसा लगता है जैसे इंजन का अंतर्मन रो रहा है.

    6. साउंड प्रूफ का हाल तो पूछिए ही मत ! जब ब्लोअर चलता है, तो स्टीम इंजन भी शरमा जाए.

    7. सिटिंग व्यवस्था के क्या कहने सीट पर बैठे-बैठे ब्रेक डांस और झूले की सहज अनुभूति होती है. स्लिप डिस्क जैसी बीमारी का खुला आमंत्रण देता है यह ‘ईको फ्रेंडली लोको’!

    8. आजकल कुछ इंजनों में एसी का प्रावधान किया गया है, जो सिर्फ रेलवे बोर्ड के आंकड़े मेनटेन करने के काम आते हैं. शायद उन्हें कार्यरत न रहने देने की कसम दिलाई गई है. और बात करते हैं स्पेड की! शायद ये आंकड़े  बनाने के लिए ही है.

    प्रशासन या तो उपरोक्त तमाम समस्याओं का निराकरण नहीं करना चाहता, या कर नहीं पा रहा है, फंड की कमी है, या कुछ और, यह तो सिर्फ वही बता सकता है, मगर हैरानी तब होती है जब कोई डिवीजनल या जोनल अधिकारी इंजन पर आता है और ड्राइवर से पूछता है कि ‘कोई समस्या हो, तो बताओ.’ हालांकि ऐसा नहीं है कि उन्हें समस्या का पता नहीं होता, सब पता होता है, मगर वह ड्राइवर से पूछकर उस पर अहसान करते हैं, मगर कोई ऐक्शन नहीं लेते. ऐसा भी कहा जा सकता है कि वह ड्राइवर की व्यथा को सुनकर मन ही मन खुश होते हैं. अभी मानसून की सावधानी आने वाली है, काउंसिलिंग होगी, पर सैंड नहीं भरी जाएगी, सैंडर काम नहीं करेगा, वाइपर सब कुछ करेगा, मगर जिस काम के लिए उसे लगाया गया है, वही नहीं करेगा.

    रनिंग स्टाफ को चाहिए कि वह यह सब कमियां अपने सीनियर के पास नोट जरूर करवाए. इसके सबके बाद उम्मीद करनी चाहिए कि अब ‘व्हील स्लिप’ नहीं होगा तथा गाड़ी ‘स्टक अप’ नहीं होगी. रनिंग स्टाफ के कुछ वरिष्ठ कर्मचारियों का कहना है कि यदि प्रशासन लोको पायलट को शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ्य होने का अनुकूल वातावरण मुहैया कराए, तो निश्चित रूप से स्पेड का ‘जीरो मिशन’ कामयाब हो सकता है. उनका कहना है कि प्रशासन को उपरोक्त परिस्तिथियों पर अवश्य गहन विचार करना चाहिए. रनिंग स्टाफ का यह भी कहना है कि हम सब मिलकर प्रशासन के इस ‘स्पेड मिशन-जीरो’ को सफल बनाने का पूरा प्रयास करेंगे.

सम्पादकीय