रेलवे इंस्टिट्यूट्स और रेलवे ग्राउंड्स की कमाई से रेलवे को नहीं मिलती एक दमड़ी

    कुछ भ्रष्ट/कामचोर रेलकर्मियों के कब्जे में हैं सभी रेलवे इंस्टिट्यूट्स और रेलवे ग्राउंड्स

    ऐसी सभी रेल संपत्तियों को अविलंब अपने कब्जे में ले रेल प्रशासन, रेलकर्मियों की मांग

    अहमदाबाद : भारतीय रेल ने अपने रेलकर्मियों के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य एवं मनोरंजन के लिए अपने 17 जोनों के सभी 68 मंडलों में लगभग सभी बड़े रेलवे स्टेशनों के आसपास रेलवे इंस्टिट्यूट, सामुदायिक भवन और खेल के मैदान बनाए हुए हैं. परंतु इन व्यवस्थाओं के स्थापित करने का उपरोक्त उद्देश्य अब चौपट हो चुका है, क्योंकि रेल प्रशासन ने इन सभी व्यवस्थाओं को कुछ भ्रष्ट और कामचोर रेलकर्मियों को सौंपकर अपनी जिम्मेदारी तथा कर्तव्य से छुट्टी पा ली है. इसके परिणामस्वरूप ऐसे लगभग सभी रेलवे इंस्टिट्यूट्स और रेलवे ग्राउंड्स न सिर्फ अवैध कमाई और जुआ, शराबखोरी जैसी अन्य तमाम असामाजिक गतिविधियों के केंद्र बन गए हैं, बल्कि इन्हें बाहरी लोगों को शादी-ब्याह और पार्टी-समारोहों इत्यादि के लिए लाखों रुपए के भाड़े पर देकर करोड़ों रुपए की सालाना अवैध कमाई की जा रही है. कई इंस्टिट्यूट्स में तो कैटरिंग एवं साज-सज्जा ठेकेदारों का स्थाई कब्जा हो चुका है.

    इसी तरह पश्चिम रेलवे, अहमदाबाद मंडल के अंतर्गत साबरमती एवं कांकरिया में भी रेलवे के दो राष्ट्रीय स्तर के क्रिकेट मैदान हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार मंडल प्रशासन ने सीनियर रेलवे इंस्टिट्यूट, कांकरिया के मैदान को विकसित करने और इसके रख-रखाव के लिए करीब 70 लाख रुपए की राशि हाल ही में खर्च की है, लेकिन यह खेल का मैदान रेल कर्मचारियों और उनके बच्चों के उपयोग में नहीं आता है. अथवा यह भी कहा जा सकता है कि उनका वहां जाना या प्रवेश करना प्रतिबंधित है.

    कर्मचारियों का कहना है कि इसका उपयोग पूरी तरह से वाणिज्यिक आधार पर किया जा रहा है. उनका कहना है कि उक्त रेलवे ग्राउंड की बुकिंग में भी सालाना लाखों रुपए का घपला किया जा रहा है. यह टूर्नामेंट और पार्टियों के लिए कारपोरेट तथा निजी पार्टियों को अनुबंध पर दिया जाता है, जो कि देर रात तक डीजे बजाते हैं और हैलोजन लाइट का उपयोग करते हैं, जिससे रेलवे कॉलोनी में रहने वाले रेलकर्मियों के लिए यह किसी मुसीबत से कम नहीं है. यहां आसपास रनिंग स्टाफ भी रहता है, जिसके आराम में अक्सर भारी खलल पड़ती है. इस तरह रेलवे सेफ्टी के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है.

    कर्मचारियों का कहना है कि कांकरिया इंस्टीटयूट के पदाधिकारी और कुछ कमिटी मेंबर अक्सर यहां मद्यपान और जुआ खेलने जैसी गैरकानूनी एवं असामाजिक गतिविधियां भी करते हैं, जो कि कॉलोनी निवासियों के लिए सबसे बड़ी परेशानी का कारण हैं. इसके अलावा क्रिकेट कोचिंग के नाम पर भी यहां लाखों रुपए की आय होती है, मगर इस तरह के कोचिंग कैंपों में रेलकर्मियों के बच्चों की तुलना में बाहरी लोगों को ज्यादा वरीयता दी जाती है.

    उनका कहना है कि संस्थान के प्रमुख पदाधिकारी अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए संस्थान की सदस्य संख्या बढ़ने नहीं दे रहे हैं. उन्होंने बताया कि जहां साबरमती स्थित रेलवे ग्राउंड की सदस्यता लगभग 1000 है, वहीं कांकरिया रेलवे ग्राउंड की सदस्यता मुश्किल से 200 के आसपास होगी. कर्मचारियों का कहना था कि पूरा साल बीत जाने के बाद भी संस्थान की कार्यकारिणी की एक भी सामान्य बैठक आयोजित नहीं की जाती है. संस्थान के लिए क्या, कब और कैसे किया जाएगा, यह सब कुछ केवल 3-4 लोग ही मिलकर तय कर लेते हैं.

    कर्मचारियों ने बताया कि रेलवे इंस्टिट्यूट्स की स्थापना के पवित्र उद्देश्य को रेलवे के ही कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों के सिंडिकेट ने अपने निजी स्वार्थ की खातिर चौपट कर दिया है. उन्होंने इन अमूल्य रेल संपत्तियों का पूरी तरह से व्यावसायीकरण कर दिया है. उनका कहना है कि यह वेशकीमती रेलवे ग्राउंड्स रेलवे की संपत्ति हैं, यहां बिजली, पानी, जमीन और रख-रखाव इत्यादि का पूरा इंफ्रास्टक्चर रेलवे का है. अतः इनसे होने वाली आय पर सिर्फ रेलवे का ही अधिकार होना चाहिए.

    कर्मचारियों ने बताया कि वास्तविकता में इस सब पर काबिज सिंडिकेट न तो रेलवे को कभी इनसे होने वाली किसी भी आय-व्यय का हिसाब देता है, न तो नए सदस्य बनाए जाते हैं, और न ही दूसरे लोग चुने जाते हैं. उनका कहना था कि ऐसी सभी वेशकीमती रेल संपत्तियों पर कुछ भ्रष्ट लोगों ने वर्षों से अपना एकाधिकार जमा रखा है, जबकि नियमानुसार सभी स्थानीय रहिवासी रेलकर्मी इन संस्थाओं के सदस्य बन सकते हैं, मगर जानबूझकर उन्हें सदस्यता नहीं दी जाती है, क्योंकि पहले से जमे लोगों को अपना एकाधिकार छिन जाने का डर होता है. उन्होंने मांग की है कि ऐसी सभी रेल संपत्तियों को रेल प्रशासन द्वारा अविलंब अपने कब्जे में लिया जाना चाहिए और इनके माध्यम से होने वाली आय रेल राजस्व के खाते में जमा कराई जानी चाहिए.

सम्पादकीय