सबको अपने सामने चाहिए जीएम और डीआरएम!

    मंत्रियों से ज्यादा रेल अधिकारियों पर हावी हैं पार्टी कार्यकर्ता और स्थानीय नेता

    सुरेश त्रिपाठी

    भारतीय जनता पार्टी की मुगलसराय की महिला विधायक साधना सिंह और उनके जिलाध्यक्ष राणाप्रताप सिंह के साथ गरमागरम बहस का एक वीडियो 4 जून को सोशल मीडिया में बहुत वायरल हुआ. संभवतः साफ-सफाई का निरीक्षण करने मुगलसराय रेलवे स्टेशन पहुंची भाजपा की महिला विधायक साधना सिंह को निरीक्षण के दौरान अपने सामने मंडल रेल प्रबंधक ही चाहिए थे. उन्हें अन्य अधिकारियों की दरकार नहीं थी. उनके साथ इस मौके पर बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं सहित जिलाध्यक्ष राणाप्रताप सिंह भी मौजूद थे.

    वीडियो से स्पष्ट है और जैसा कि मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) किशोर कुमार को कहते हुए भी सुना जा सकता है कि उन्होंने अपने सभी संबंधित शाखा अधिकारियों को उनके स्वागत और इंतजाम के लिए भेज दिया था. मगर विधायक साधना सिंह एकदम गुस्से से उबलते हुए वीडियो में कहते सुनाई दे रही हैं कि ‘अधिकारियों को भेज दिया था, तो क्या हुआ, आप क्यों नहीं आए, हम यहां आपका दो घंटे से इंतजार कर रही हैं.’ इस पर विधायक महोदया को शांति के साथ बात करने के लिए कहते हुए डीआरएम किशोर कुमार ने उन्हें समझाने का प्रयास किया और कहा कि मैडम, बताएं क्या समस्या है?

    इस पर विधायक साधना सिंह गुस्से में उबलते हुए पुनः कहने लगीं कि ‘मुझे आपके अधिकारियों से नहीं आपसे बात करनी है.’ वह कहते हुए भी सुनाई दे रही हैं कि ‘पूरे देश में हम झाड़ू लगा रहे हैं, सफाई कर रहे हैं, इसका मतलब यह है कि केंद्र की सरकार बेवकूफ है, जो देश भर में झाड़ू लगा रही है.’ इस बीच बोलने का प्रयास कर रहे जिलाध्यक्ष राणाप्रताप सिंह की तरफ हाथ से थोड़ी देर चुप रहने का इशारा करते हुए डीआरएम ने कहा कि मैडम बोल रही हैं, उन्हें बोलने दीजिए. बस इतनी बात पर विधायक महोदया तो पीछे रह गईं, मगर किसी उजड्ड नेता की तरह राणाप्रताप सिंह ने गुस्से से चिल्लाते हुए डीआरएम से कहा कि ‘हाथ नीचे करके बात करें और मैडम जो कह रही हैं वह सुनें, वरना बहुत बुरा होगा.’

    इस पर डीआरएम ने पुनः उनकी तरफ हाथ उठाकर इशारे से उन्हें चुप रहने को कहा. इतने में राणाप्रताप सिंह अपने पैजामे से बाहर हो गए और विधायक साधना सिंह सहित बाकी लोग पीछे रह गए तथा वह डीआरएम की लगभग बेइज्जती करते हुए उन पर उबल पड़े. इसके बाद कई रेल अधिकारियों सहित आरपीएफ एवं बाकी कार्यकर्ता तथा खुद विधायक साधना सिंह, राणाप्रताप सिंह को संभालने में लग गए. इसके बाद वह लोग जिस काम के उद्देश्य से वहां आए थे, वह सब पीछे रह गया. पूरा माहौल जिलाध्यक्ष राणाप्रताप सिंह की धींगामस्ती के हवाले चला गया.

    हालांकि पूर्व सरकारों के समय भी रेलमंत्रियों की पार्टी के कुछ कार्यकर्ता और छुटभैये नेता तथा एकाध स्थानीय विधायक भी यदाकदा रेल अधिकारियों के साथ बदसलूकी करते रहे हैं. परंतु वर्तमान में जिस तरह कुछ भाजपाई विधायकों, सांसदों और उनके तमाम कार्यकर्ताओं का दिमाग आसमान में उड़ रहा है तथा वह सार्वजनिक तौर पर जैसा अशोभनीय व्यवहार रेल अधिकारियों के साथ कर रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था. इसका एक उदाहरण गत दिनों पश्चिम रेलवे, मुंबई सेंट्रल मंडल की एक महिला अधिकारी के साथ उसकी सहयोगी पार्टी के स्थानीय विधायक द्वारा किए गए बदसलूकीपूर्ण व्यवहार के रूप में पहले ही देखने को मिल चुका है, जिसका दंड उक्त निर्दोष महिला अधिकारी को अपने अपमानजनक तबादले के रूप में भुगतना पड़ा था. इसके अलावा इसकी एक-एक झांकी मुरादाबाद और झांसी मंडल में भी देखी जा चुकी है.

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि कुछ रेल अधिकारी निकम्मे हो सकते हैं, और हैं भी, मगर इसका मतलब यह नहीं हो सकता है कि उनके साथ नेताओं-विधायकों सहित उनके तमाम छुटभैये कार्यकर्ता भी सार्वजनिक रूप से बदसलूकी करें. यह कृत्य न तो नेताओं-विधायकों को और न ही अधिकारियों को शोभा देता है. ऐसे कृत्यों से सर्वप्रथम नेताओं-विधायकों की ही गरिमा नष्ट होती है. जबकि उनके किसी भी तरह के व्यवहार से अधिकारियों को कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उन्हें बखूबी मालूम है कि सरकार के जाते ही यही नेता-विधायक अपनी दुम दबाकर न सिर्फ अपने दड़बे में दुबक जाएंगे, बल्कि उनके पीछे-पीछे अपनी वही दुम हिलाते हुए भी नजर आएंगे. जबकि उनका ज्यादा से ज्यादा तबादला ही करवाएंगे, इससे ज्यादा वह उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं.

    केंद्र में भाजपा की सरकार है, मगर यह सरकार भी पूर्व की तमाम सरकारों से किसी भी तरह अलग नजर नहीं आ रही है. प्रधानमंत्री द्वारा ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ और ‘भ्रष्टाचार को कदापि बर्दास्त नहीं किया जाएगा’ के नारों के बावजूद चौतरफा भ्रष्टाचार का बोलबाला है तथा छोटे पैमाने पर बड़े घोटाले किए जा रहे हैं. तथाकथित ईमानदार और सदाचारी रेलमंत्री होने के बावजूद रेलवे में भ्रष्टाचार न सिर्फ चरम पर है, बल्कि सरकारी (सीवीसी) आंकड़ों के अनुसार ही इसमें रेलवे टॉप पर है. भाजपा जिस तरह की राजनीतिक शुचिता की बात करती है, उसमें वह व्यवहारिक रूप में खरी नहीं उतरती. इसमें भी न सिर्फ तमाम अपराधिक-असामाजिक तत्वों, उजड्डों, चोर-चापलूसों, दलालों तथा भ्रष्टाचारियों की भरमार है, बल्कि ऐसे कई लोगों को तमाम मंत्रालयों की सार्वजानिक समितियों में नामांकित भी किया गया है. रेल मंत्रालय की यात्री सुविधा समिति (पीएसी) और यात्री सेवा समिति (पीएससी) सहित जोनल रेलवे उपभोगकर्ता सलाहकार समितियों (जेडआरयूसीसी) में रेलवे में रहकर भारी भ्रष्टाचार में लिप्त रहे कुछ पूर्व रेलकर्मियों (भोपाल और मुरादाबाद मंडल इसकी बानगी हैं) के साथ ही थोक के भाव में ऐसे लोगों को नामांकित किया गया है, जिनका रेलवे से कभी कोई संबंध ही नहीं रहा.

    जिन पूर्व रेलकर्मियों को इन समितियों में नामांकित किया गया है, उन्हें उनके भ्रष्टाचार के कारण ही रेलवे से या तो बर्खास्त किया गया था, या फिर उन्होंने प्रशासनिक दबाव में स्वयं स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी. ऐसे पूर्व रेलकर्मी, जिनकी जीएम, डीआरएम और ब्रांच अफसरों के सामने कभी खड़े रहने की भी हैसियत नहीं थी, वह आज पीएसी/पीएससी में नामांकित होकर आज उन्हीं अफसरों पर अपना रौब गांठ रहे हैं. यह विधि की विडंबना ही तो है. अतः जिस तरह स्वच्छता, विकास, गाय, लव जिहाद, धर्मांतरण, राम-जन्मभूमि, भारत-पाकिस्तान और तथाकथित राष्ट्रवाद इत्यादि मुद्दों पर राजनीतिक शुचिता की अत्यंत आवश्यकता है, वहीं पार्टी को अपने राज्य एवं जिला स्तरीय नेताओं-विधायकों और कार्यकर्ताओं की झुंडशाही पर लगाम लगाते हुए उन्हें व्यवहारिकता की तमीज सिखाने की भी जरूरत है. वरना उनका यह उन्माद पार्टी और सरकार दोनों के लिए भविष्य में बहुत नुकसानदेह साबित होने वाला है.

सम्पादकीय