अपनी कथित स्वच्छ छवि चमकाने हेतु दो अधिकारियों की बलि चढ़ाना चाहते हैं प्रभु?

    दो वरिष्ठ रेल अधिकारियों के प्रॉसिक्यूशन के पीछे क्या है रेलमंत्री सुरेश प्रभु का उद्देश्य?

    सीवीसी एडवाइस के विरुद्ध अनुमति देकर रेलमंत्री ने अपने अधिकार का दायरा पार किया

    ‘अकारण’ दंडित किए जाने को लेकर दोनों अधिकारियों ने लगाई कैबिनेट सेक्रेटरी से गुहार

    सीबीआई को सीधे पत्र लिखने के लिए जिम्मेदार सीएमडी/आईआरसीटीसी हैं कड़े दंड के पात्र

    घोटाले और प्रॉसिक्यूशन के मुद्दे पर रेलमंत्री और रेलवे बोर्ड जरूरी नहीं समझते हैं जवाब देना

    सुरेश त्रिपाठी

    केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) द्वारा तथाकथित ‘रेल नीर घोटाले’ पर दो बार दी गई सकारात्मक एडवाइस और दोनों संबंधित वरिष्ठ रेल अधिकारियों - संदीप साइलस एवं एम. एस. चालिया - को दी गई क्लीन चिट के बावजूद रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने सीबीआई को उक्त दोनों अधिकारियों के विरुद्ध प्रॉसिक्यूशन की अनुमति दे दी है. रेलमंत्री का यह कदम न सिर्फ अपने आपमें आश्चर्यजनक है, बल्कि संवैधानिकता के विरुद्ध भी है. इस मामले में न सिर्फ सीवीसी ने उक्त दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को क्लीन चिट दी है, बल्कि रेलवे बोर्ड विजिलेंस ने भी इन अधिकारियों की कथित रेल नीर घोटाले में किसी प्रकार की संलिप्तता से इंकार किया है. इस संदर्भ में रेलवे बोर्ड विजिलेंस की रिपोर्ट की पुष्टि सीवीसी ने भी की है. रिपोर्ट में यहां तक कहा गया है कि ऐसा कोई घोटाला हुआ ही नहीं है. इस मामले में सीधे सीबीआई को चिट्ठी लिखकर सीएमडी/आईआरसीटीसी ने न सिर्फ रेलवे बोर्ड को अंधेरे में रखा, बल्कि सीबीआई को भी उसकी गरिमा बचाने लायक नहीं रखा है.

    बताते हैं कि इस मामले की फाइल रेलमंत्री के पास कुल मिलाकर लगभग 9 महीनों तक पेंडिंग रही और अचानक 15 मार्च 2017 को उन्होंने सीधे सीबीआई को उक्त दोनों अधिकारियों को प्रोसिक्यूट करने के अनुमति दे दी. इस बात का उल्लेख करते हुए संदीप साइलस ने मामले में सकारात्मक हस्तक्षेप करने का निवेदन करते हुए छह पेज की एक लंबी चिट्ठी कैबिनेट सेक्रेटरी पी. के. सिन्हा को लिखी है. श्री साइलस ने लिखा है कि वह 1983 बैच के वरिष्ठ आईआरटीएस अधिकारी हैं. उन्हें ‘अकारण’ दंडित होना पड़ रहा है, बिना अपराध उनके घर और दफ्तर में छापा डाला गया तथा उन्हें छह महीनों तक निलंबित भी रहना पड़ा तथा बिना किसी दोष के उन्हें 14 दिन के लिए जेल जाकर हत्या, डकैती और सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के आरोपी घोर अपराधियों के बीच रहना पड़ा, जबकि सीवीसी और रेलवे बोर्ड विजिलेंस ने क्रमशः अपनी पहली ही एडवाइस और पहली ही रिपोर्ट में उन्हें संबंधित मामले में निर्दोष पाया था.

    तथाकथित ‘रेल नीर घोटाले’ की विजिलेंस रिपोर्ट का विस्तृत परीक्षण किए जाने के बाद सीवीसी ने कहा था कि यह मामला किसी भी प्रकार की विभागीय कार्रवाई के लिए फिट नहीं है. ऐसे में उक्त दोनों अधिकारियों के विरुद्ध किसी प्रकार की आपराधिक कार्रवाई (क्रिमिनल प्रॉसिक्यूशन) की अनुमति दिए जाने का कोई औचित्य ही नहीं है. सीवीसी ने अपनी एडवाइस में कहा है कि ‘वह रेलवे बोर्ड से सहमत है कि इस पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत प्रॉसिक्यूशन का कोई मामला नहीं बनता है.’ रेलवे बोर्ड विजिलेंस और सीवीसी दोनों ने इस बात को रिकॉर्ड पर लिया है कि ‘प्रॉसिक्यूशन की अनुमति देने लायक कोई मामला नहीं बनता है.’ इसके बावजूद रेलमंत्री द्वारा अचानक इस मामले में उक्त दोनों वरिष्ठ रेल अधिकारियों के खिलाफ प्रॉसिक्यूशन की अनुमति दे दिए जाने से रेलवे के सभी अधिकारी भौंचक्के रह गए हैं.

    100 में से 100 नंबर, फिर भी फेल ! वाह प्रभु, बड़ा अजब है आपका खेल !!

    उल्लेखनीय है कि केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों से संबंधित भ्रष्टाचार के मामलों में सीबीआई से ऊपर सीवीसी सुप्रीम अथॉरिटी है, फिर भले ही उसकी एडवाइस ‘सिफारिशी प्रकृति’ की होती है. जबकि सीबीआई भी सीवीसी के मातहत है. उपरोक्त मामले में सीवीसी द्वारा संदीप साइलस और एम. एस. चालिया को ‘कम्पलीट क्लीन चिट’ दिए जाने के बाद भी रेलमंत्री सुरेश प्रभु, जो कि इस मामले में डिसिप्लिनरी अथॉरिटी (डीए) हैं, ने बिना अपने विवेक का पर्याप्त इस्तेमाल किए ही टिप्पणी के लिए संबंधित फाइल सीबीआई को वापस भेजकर दोनों अधिकारियों के विरुद्ध प्रॉसिक्यूशन की अनुमति भी दे दी. एक प्रकार से यह सीवीसी के अधिकारों का हनन और मंत्री पद के अधिकारों से बाहर जाने का मामला बन गया है, जो कि ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ जैसा मामला है. अब तक किसी भी मंत्री ने ऐसा असंवैधानिक कदम कभी नहीं उठाया था.

    स्थापित नियमों के अनुसार प्रॉसिक्यूशन की अनुमति दिए जाने से पहले संबंधित अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध उसकी अपराधिक गतिविधियों का प्रथम दृष्टया प्रमाण (प्राइमा फेसी एविडेंस) होना आवश्यक है. जबकि उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई किए जाने के लिए ऐसी महत्वपूर्ण संभावनाओं का होना जरूरी है, जो कि प्रथम दृष्टया संबंधित मामले में उसके संलिप्त होने की संभावना व्यक्त करती हों. उपरोक्त मामले में उक्त दोनों वरिष्ठ रेल अधिकारियों के विरुद्ध उक्त दोनों प्रकार के प्रमाण विभागीय विजिलेंस जांच में नहीं पाए गए हैं. सीवीसी ने भी इसकी लिखित पुष्टि दो बार की है.

    अनुशासनिक अधिकारी (रेलमंत्री) ने नहीं किया अपने विवेक का इस्तेमाल

    इस पर जानकारों का कहना है कि अनुशासनिक अधिकारी (डीए), जो कि प्रस्तुत मामले में रेलमंत्री सुरेश प्रभु हैं, को ऐसे मामलों में सर्वप्रथम अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए, यदि किसी कारण वश उनका अपना विवेक काम नहीं करता है, तो उन्हें अपने सक्षम सलाहकारों की सलाह लेनी चाहिए. परंतु जानकारों का यह भी कहना है कि वर्तमान रेलमंत्री के पास सक्षम सलाहकारों का घोर आभाव है, और जो हैं, वह अधकचरे एवं गैर-अनुभवी हैं. ऐसे में उनसे उनक बेहतर स्वविवेक की उम्मीद की जाती है. ऐसी स्थिति में वह प्रस्तुत मामले में रेलवे बोर्ड के विधि सलाहकार से सलाह ले सकते थे, जिससे वह अपने अधिकार के दायरे को क्रॉस करने और फजीहत से बच सकते थे.

    एक अंग्रेजी दैनिक द्वारा इस मामले में ईमेल के जरिए भेजे गए सवालों का रेलमंत्री और रेलवे बोर्ड दोनों ने यह कहकर कोई भी जवाब देने से इंकार कर दिया कि ‘वह इस पर कोई कमेंट नहीं करना चाहते हैं.’ यह कमेंट वह क्यों नहीं करना चाहते हैं, यह भी नहीं बताया गया है. ऐसा क्यों? जानकारों का मानना है कि एक तरफ रेलमंत्री अपने अधिकार की सीमा से बाहर जाकर सीवीसी जैसी संवैधानिक संस्था के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ जवाब देने से बच रहे हैं. यही वह शुरू से हर मामले में करते आ रहे हैं. उनका कहना है कि आखिर इन दोनों सर्वथा बेकसूर वरिष्ठ रेल अधिकारियों की सीबीआई के सामने बलि चढ़ाकर (प्रॉसिक्यूशन की अनुमति देकर) वह अपना कौन सा राजनीतिक हितसाधन करना कहते हैं?

    सीएमडी/आईआरसीटीसी डॉ. ए. के. मनोचा ने अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया

    ज्ञातव्य है कि तथाकथित ‘रेल नीर घोटाला’ अक्टूबर 2015 में तब सामने आया था, जब आईआरसीटीसी के सीएमडी डॉ. ए. के. मनोचा ने अपनी सीमाओं का उल्लंघन करते हुए सीधे सीबीआई को एक चिट्ठी लिखकर इस मामले में भ्रष्टाचार होने की गलत जानकारी दी थी. इसके लिए रेलमंत्री और रेलवे बोर्ड द्वारा उनके खिलाफ बर्खास्तगी जैसी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए थी. परंतु डॉ. मनोचा जैसे भ्रष्टों को तो रेलमंत्री सुरेश प्रभु खुद शुरू से अपने गले लगाए हुए घूमते रहे हैं. ऐसे में वह स्वयं के पाक-साफ होने का ढिंढोरा कैसे पीट सकते हैं? शायद यही वजह रही है कि रेलवे बोर्ड और सीवीसी द्वारा डॉ. मनोचा के खिलाफ अब तक कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया, जबकि सीवीसी ने उन्हें कई मामलों में अपने पद का भारी दुरुपयोग करने का दोषी पाया है. इसके सबूत ‘रेलवे समाचार’ के पास मौजूद हैं.

    इस मामले में कुटिल शकुनी की भूमिका निभाने वाले डॉ. ए. के. मनोचा की उक्त लिखित शिकायत वास्तव में मुंबई क्षेत्र के सीसीएम/प.रे. और मुंबई सेंट्रल मंडल के खिलाफ थी, जो कि रेल नीर के महंगा होने के कारण निजी क्षेत्र के अन्य ब्रांड्स के पानी को अधिक महत्व दे रहे थे. परंतु इस शिकायत की आंच तत्कालीन सीसीएम/प.रे. पर नहीं आई, क्योंकि तब तक बताते हैं कि उन्होंने इसका जस्टिफिकेशन आईआरसीटीसी और रेलवे बोर्ड को भेज दिया था. अब जब रेलवे बोर्ड या उत्तर रेलवे के कुछ निहितस्वार्थी अधिकारियों, जिनके निशाने पर एक ठेकेदार विशेष सहित उक्त दोनों अधिकारी थे, को लगा कि यह पूरा मामला तो टायं-टायं फिस्स हो रहा है, तो उन्होंने इसे उत्तर रेलवे की तरफ मोड़ दिया और उक्त दोनों अधिकारियों को अकारण बलि का बकरा बना दिया गया. जबकि इन अधिकारियों में से एम. एस. चालिया जनवरी 2013 से मई 2014 और संदीप साइलस मई 2014 से अप्रैल 2015 तक ही सीसीएम/कैटरिंग/उ.रे. के पद पर रहे थे. इसके अलावा अलग-अलग समय में संबंधित पद पर रहे इन दो अधिकारियों को एक साथ एक ही मामले में किसी जांच एजेंसी द्वारा जिम्मेदार ठहराए जाने का शायद यह पहला मूर्खतापूर्ण मामला है.

    उत्तर रेलवे ने शिकायती पीरियड में रेल नीर की सर्वाधिक खपत की थी

    आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2013-14 के दौरान आईआरसीटीसी के नांगलोई (दिल्ली) स्थित रेल नीर प्लांट की कुल उत्पादन क्षमता का 103% इस्तेमाल किया गया था. इस दौरान आईआरसीटीसी ने कुल 3,60,66,288 बोतल रेल नीर का उत्पादन और आपूर्ति किया, जबकि इसी दौरान उत्तर रेलवे ने कुल 3,63,00,000 बोतल रेल नीर की खपत की थी. इसके अलावा वर्ष 2010-11 से लेकर वर्ष 2014-15 के लगातार पांच वर्षों में भी उत्तर रेलवे ने रेल नीर की सर्वाधिक खपत की थी. इन पांच वर्षों के दरम्यान भी सबसे बेहतर उपयोग उसी पीरियड (जनवरी 2013 से दिसंबर 2014) का है, जिसकी गलत शिकायत आईआरसीटीसी के सीएमडी डॉ. मनोचा ने की थी, जबकि रेल नीर की अनिवार्यता जनवरी 2014 से लागू की गई थी. यही नहीं, उपरोक्त संपूर्ण रेल नीर का प्रॉपर भुगतान भी आईआरसीटीसी को प्राप्त हो चुका था. डॉ. मनोचा की शिकायत में 19.50 करोड़ रुपए के नुकसान की बात विजिलेंस जांच में गलत अथवा अपुष्ट पाई गई है. उल्लेखनीय है कि नए ठेकेदारों के लिए रेल नीर ही बेचे जाने की अनिवार्यता (मैन्डेटरी क्लॉज़) जनवरी 2014 से लागू की गई थी, जिसके तहत सीसीएम की पूर्व अनुमति से नए ठेकेदारों द्वारा अन्य अप्रूव्ड ब्रांड्स के पानी की आपूर्ति स्टेशनों और पैंट्रीकारों में की जा सकती थी. इससे पहले रेल नीर की शार्ट सप्लाई की स्थिति में ठेकेदारों को अन्य ब्रांड्स के पानी की आपूर्ति के लिए किसी भी प्रकार की अनुमति की आवश्यकता नहीं थी.

    प्रस्तुत मामले में रेल नीर की कम खपत किए जाने का ही कथित आरोप उक्त दोनों रेल अधिकारियों पर है, जबकि वास्तव में ठेकेदारों के साथ मिलीभगत करके रेल नीर की शार्ट सप्लाई का आरोप खुद आईआरसीटीसी के ही कुछ अधिकारियों और सप्लायरों पर लगाया गया था. तथापि उपलब्ध प्रमाणिक आंकड़े आईआरसीटीसी और इसके सीएमडी की संदिग्ध गतिविधियों सहित सीबीआई की जांच को भी गलत ठहराते हैं. यही तमाम तथ्य रेलवे बोर्ड और उत्तर रेलवे विजिलेंस की जांच में भी सही पाए गए थे और उक्त तथ्यों की पुष्टि सीवीसी ने भी की है. सर्वप्रथम तो यह सरकारी क्षेत्र के आईआरसीटीसी (रेल नीर) और पैकेज्ड पीने के पानी की आपूर्ति करने वाली निजी क्षेत्र की तमाम कंपनियों को समान आधार पर व्यवसाय करने की सुविधा न देकर निजी क्षेत्र के साथ अन्याय करने का मामला है. इस पर कानूनन किसी ने अब तक विचार नहीं किया, जबकि इस मामले को कुछ कंपनियों ने अदालत में चुनौती दे रखी है.

    दिशा-निर्देशों का अनुपालन करते हुए रेलवे बोर्ड ने डीओपीटी से परामर्श नहीं किया

    ज्ञातव्य है कि संदीप साइलस और एम. एस. चालिया के विरुद्ध दर्ज सीबीआई केस (सं. आरसी/डीएआई/2015/ए/0032) के संदर्भ में दि. 20.04.2017 को सीवीसी ने एडवाइजर विजिलेंस, रेलवे बोर्ड, सुनील माथुर के नाम एक ऑफिस मेमोरंडम (सं. 1517/रेलवे/27.342347) जारी करके कहा है कि ‘उक्त मामले में दी गई प्रॉसिक्यूशन की अनुमति की एक कॉपी रिकॉर्ड हेतु आयोग को भेजी जाए. इसके साथ ही रेलवे बोर्ड यह भी स्पष्ट करे कि क्या उसने इस मामले में डीओपीटी द्वारा जारी किए गए ऑफिस मेमोरंडम्स सं. 134/2/85-एवीडी-1, दि. 15/17.10.1986 और सं. 399-33/2006-एवीडी-3, दि. 06.11.2006 एवं दि. 20.12.2006 में दिए गए दिशा-निर्देशों का अनुपालन करते हुए रेलवे बोर्ड ने डीओपीटी से परामर्श किया है या नहीं, यदि कम्पीटेंट अथॉरिटी सीवीसी की एडवाइस को स्वीकार नहीं करना चाहती है, तो क्या रेलवे बोर्ड भी इस मामले में ऐसा ही मानता है?’ यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इससे पहले सीवीसी ने पत्र सं. 1517/रेलवे/27.313474, दि. 02.05.2016 में प्रॉसिक्यूशन के विरुद्ध अपनी बहुत स्पष्ट एडवाइस अदालत के समक्ष प्रस्तुत की है. सीवीसी के उक्त दोनों पत्र यहां देखे जा सकते हैं.

    रेलवे बोर्ड के विश्वसनीय सूत्रों ने ‘रेलवे समाचार’ को बताया कि ‘रेलमंत्री सुरेश प्रभु का मानना है कि उपरोक्त मामले में रेलवे की छवि खराब हुई है, इसलिए उन्होंने दोनों अधिकारियों के खिलाफ प्रॉसिक्यूशन की अनुमति दी है.’ जबकि जानकारों का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामले में सुरेश प्रभु के नेतृत्व में उनकी भारतीय रेल टॉप पर है, तब क्या उनकी या रेलवे की छवि खराब नहीं हो रही है? उनका कहना है कि मेंबर ट्रैक्शन के पद पर एक कदाचारी अधिकारी की नियुक्ति करके भी उनकी/रेलवे की छवि खराब नहीं हुई है? भारतीय रेल में चौतरफा भ्रष्टाचार का बोलबाला है, तब उनकी छवि खराब नहीं हो रही है? सूत्रों का कहना है कि मंत्री अपने विवेक का इस्तेमाल करने के बजाय यदि थानेदार से पूछेगा कि इनके खिलाफ क्या कुछ है, तो थानेदार तो यही कहेगा कि हां है, वह क्यों इंकार करेगा? जबकि उसका तो उद्देश्य ही लोगों को गिरफ्तार करके उनकी जामातलाशी लेकर उनकी प्रताड़ना, उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार करना ही होता है.

    मंत्री को सीवीसी की एडवाइस को बाईपास करने का कोई अधिकार नहीं है

    स्थापित नियमों की जानकारी रखने वाले जानकारों का मानना है कि जब सीवीसी ने एक नहीं, बल्कि दो-दो बार अपनी एडवाइस दी है कि दोनों अधिकारियों के विरुद्ध कोई केस नहीं बनता है, तब मंत्री को सीवीसी की एडवाइस को बाईपास करने का कोई अधिकार नहीं है. फिर इसके पीछे मंत्री का उद्देश्य क्या हो सकता है? यह पूछे जाने पर उनका कहना था कि यही तो उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर सुरेश प्रभु का इसके पीछे उद्देश्य क्या हो सकता है? उनका यह भी कहना है कि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस मामले के पीछे किसी ऐसे अधिकारी का भी हाथ हो सकता है, जो कि इन दोनों अधिकारियों को अधर में लटकाकर इनसे आगे निकलना चाहता हो. प्राप्त जानकारी के अनुसार रेलवे बोर्ड ने स्पेशल सीबीआई कोर्ट को लिखकर दिया है कि दोनों अधिकारियों के खिलाफ न तो कोई केस बनता है, और न ही इस बारे में उसे कोई सबूत प्राप्त हुए हैं. इसी के बाद कोर्ट के आदेश से सीबीआई ने तमाम जब्त सामान दोनों अधिकारियों को वापस लौटा दिया था.

    शिकायत भेजने से पहले सीएमडी/आईआरसीटीसी ने पूरे मामले पर रेलमंत्री से की थी चर्चा

    रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस तथाकथित घोटाले की लिखित शिकायत सीबीआई को भेजने से पहले सीएमडी/आईआरसीटीसी डॉ. मनोचा ने यह पूरा मामला रेलमंत्री के संज्ञान में लाकर इस पर उनसे गहन चर्चा की थी. सूत्रों का कहना है कि तब रेलमंत्री ने उनके गृहनगर और कार्यक्षेत्र (मुंबई) में हो रहे इतने बड़े घोटाले को सीबीआई के माध्यम से उजागर करके अपनी कथित ईमानदार छवि में चार-चांद लगाने की कल्पना की थी. सूत्रों ने बताया कि बाद में जब पूरे मामले पर विभागीय विजिलेंस जांच और उस पर सीवीसी की पुष्टि से पानी फिरता नजर आया, तो रेलमंत्री सुरेश प्रभु को लगा कि इससे उनकी तथाकथित स्वच्छ छवि पर भारी आंच आ सकती है, इसलिए उन्होंने न सिर्फ अपने वैधानिक अधिकार से बाहर जाकर सीवीसी की एडवाइस को दरकिनार करके उक्त दोनों अधिकारियों के प्रॉसिक्यूशन की अनुमति दे दी है, यानि अपनी कथित स्वच्छ छवि की बलि चढ़ाने की ठान ली, बल्कि इससे पहले उन्होंने ही सीबीआई को फोन करके उक्त दोनों अधिकारियों की तुरंत गिरफ्तारी भी करवाई थी. तभी सीबीआई ने दोनों अधिकारियों को दिनभर अपने मुख्यालय में बैठाए रखकर देर रात को उन्हें अधिकारिक तौर पर गिरफ्तार किया था.

    बहरहाल, जो भी हो, इस मामले में प्रॉसिक्यूशन की अनुमति देकर रेलमंत्री और रेलवे बोर्ड का रवैया यही लगता है कि अदालत यह तय करे कि ‘गिल्टी’ कौन है? यदि दोनों अधिकारी अदालत से बाइज्जत बरी हो जाते हैं, तो वह उन्हें पुनः उनकी पदस्थापना कर देंगे. मगर तब तक जो मान-अपमान हो चुका होगा और अब तक उक्त दोनों बेकसूर अधिकारियों की जो फजीहत हो चुकी है, उसकी भरपाई कौन करेगा? इसके अलावा यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि मंत्री और संबंधित बोर्ड अधिकारियों को अपने पदाधिकार के तहत निर्णय लेने का जो अधिकार मिला हुआ है, यदि वह इसका उपयोग करके न्याय नहीं करते हैं, तो उनकी जिम्मेदारी कौन तय करेगा? विजिलेंस की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट, जिसकी पुष्टि सीवीसी ने भी की है, में दोनों अधिकारियों - संदीप साइलस एवं एम. एस. चालिया - को बेकसूर पाया गया है और स्पष्ट कहा गया है कि प्रॉसिक्यूशन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. इसकी कानूनी वैधता का क्या होगा? इसके अलावा रेलवे बोर्ड विजिलेंस और सीवीसी ने अपनी उक्त रिपोर्ट में यह भी कहा है कि पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर की आपूर्ति और बिल पास करने में कुछ गड़बड़ियां हो सकती हैं, इसके लिए उन्होंने उत्तर रेलवे विजिलेंस से संबंधित अधिकारियों की भूमिका एवं जिम्मेदारी सहित इस मामले की और गहराई से जांच करने को कहा है.

सम्पादकीय