वार्षिक रेल सप्ताह और पुरस्कारों का औचित्य

    पुरस्कारों की प्रॉपर स्क्रुटनी का कोई बेहतर मैकेनिज्म विकसित किया जाए

    सुरेश त्रिपाठी

    इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि उत्कृष्ट एवं सराहनीय कार्य-निष्पादन करने वाले कार्मिकों को न सिर्फ पुरस्कृत किया जाना चाहिए, बल्कि ऐसा किया जाना उनके उत्साहवर्धन तथा कार्य के प्रति उनके समर्पण एवं संस्था के प्रति उनकी निष्ठा बनाए रखने के लिए जरूरी भी है. सरकारी एवं निजी क्षेत्र में यह परंपरा बनी हुई है. रेलवे के संदर्भ में 16 अप्रैल, सन 1853 को भारत में रेलवे की स्थापना के उपलक्ष्य में 16 से 21 अप्रैल तक प्रति वर्ष ‘रेल सप्ताह’ मनाकर और इस दरम्यान राष्ट्रीय स्तर पर रेलमंत्री पुरस्कार एवं जोनल स्तर पर रेल अधिकारियों और कर्मचारियों को महाप्रबंधक पुरस्कार प्रदान कर यहां भी ऐसा किया जा रहा है. अब इसमें मुख्यालय स्तर पर विभाग प्रमुख पुरस्कार एवं मंडल स्तर पर मंडल रेल प्रबंधक पुरस्कार सहित शाखा अधिकारी पुरस्कार भी जुड़ गए हैं. यानि रेलवे में पुरस्कारों की भरमार हो चुकी है.

    हालांकि इन पुरस्कारों को दिए जाने का उद्देश्य पर्याप्त रूप से पवित्र है. परंतु रेलवे में यह पुरस्कार अपनी गरिमा और औचित्य गवां रहे हैं, क्योंकि अब इन पुरस्कारों को देने में भेदभाव, पूर्वाग्रह, बिरादरीवाद तो हो ही रहा है, बल्कि अब यह सामंतशाही का भी प्रतीक बन गए हैं. अधिकांश मामलों में यह पुरस्कार वास्तव में वास्तविक हकदार को नहीं मिल रहे हैं. जहां एक ओर किसी दुश्चरित्र अधिकारी द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार अपनी मातहत किसी महिला अधिकारी को सिर्फ उसके साथ निजी सहयोग करने के लिए दिए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ कई अधिकारियों द्वारा अपने कुछ मातहतों को यह पुरस्कार सिर्फ उसकी चापलूसी और निजी सेवा करने के लिए प्रदान किए जाते हैं. महाप्रबंधक के ड्राइवर और चपरासी को पुरस्कृत करना इसलिए शायद जरूरी होता है कि ड्राइवर उन्हें सड़क पर किसी दुर्घटना का सामना नहीं करवाएगा, जबकि चपरासी से उन्हें कड़क सैल्यूट और निरीह बने रहकर बेहतर सेवा की अपेक्षा होती है. अधिकारियों के घरों/बंगलों पर काम करने वाले कर्मचारी भी पुरस्कृत होते हैं.

    यहां तक कि जहां राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों में ऐसे प्रत्येक अधिकारी एवं कर्मचारी को यह पुरस्कार क्यों और किसलिए दिया जा रहा है, इसका सच्चा-झूठा पूरा उल्लेख एक पुस्तिका में दर्ज किया जाता है और यह पुस्तिका सर्वसामान्य के लिए उपलब्ध होती है. जबकि महाप्रबंधक, मंडल रेल प्रबंधक, विभाग प्रमुख एवं शाखा अधिकारी स्तर के पुरस्कारों में इस बात का कोई सच्चा-झूठा भी उल्लेख नहीं मिलता है, अथवा यह जानकारी सर्वसामान्य के लिए उपलब्ध नहीं होती है, कि उक्त पुरस्कार किसलिए और क्यों संबंधित मातहत कर्मचारी यह अधिकारी को दिया जा रहा है? इससे सर्वसामान्य रेल अधिकारियों और कर्मचारियों में इस बात का बड़ा रोष भी व्याप्त है. उनमें इस बात का भी असंतोष होता है कि वास्तविक हकदार को यह पुरस्कार इसलिए नहीं मिल पाते हैं, क्योंकि या तो उक्त कर्मचारी या अधिकारी को अपने बॉस की चापलूसी करनी नहीं आती है, या वह उसके करीब नहीं होता है, अथवा उसके पास बॉस से उसकी दमदार पैरवी करने वाला कोई नहीं होता. परिणामस्वरूप यह पुरस्कार अपने नजदीकी मातहतों को ही प्रदान करके खानापूरी और कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है.

    इस संदर्भ में कुछ उदाहरण नितांत आवश्यक हैं. उत्तर रेलवे, दिल्ली मंडल के निवर्तमान मंडल रेल प्रबंधक अरुण अरोरा ने हाल ही में बीते 62वें रेल पुरस्कार सप्ताह में महाप्रबंधक से एक बार नहीं, बल्कि दो बार सीनियर डीसीएम/एफएम मनोज कुमार शर्मा के लिए राष्ट्रीय स्तर के रेलमंत्री पुरस्कार की सिफारिश की थी. श्री अरोरा ने श्री शर्मा के ‘सिटेशन’ में लिखा था कि ‘मनोज कुमार शर्मा एक अत्यंत समर्पित, निष्ठावान एवं प्रतिभाशाली अधिकारी हैं. इन्होंने दिल्ली मंडल के मालभाड़ा एवं पार्सल हैंडलिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. इनके नेतृत्व और इनके व्यक्तिगत दृढ़ प्रयास के कारण दिल्ली मंडल में मात्र पांच माह के रिकॉर्ड समय में सबसे अधिक 472 टेंडर प्रकाशित और फाइनल किए गए. यह भारतीय रेलों पर किसी भी मंडल द्वारा इतने अल्प समय में किया गया एक रिकॉर्ड नंबर है. इनके इस प्रयास से 876 करोड़ रुपए के राजस्व की प्राप्ति होगी, जो कि अपने आपमें एक रिकॉर्ड है.’

    फोटो परिचय : उत्तर रेलवे मुख्यालय में आयोजित 62वें रेल सप्ताह समारोह के दौरान सीनियर डीसीएम/एफएम, दिल्ली मंडल मनोज कुमार शर्मा को एकदम अंतिम क्षणों में बुलाकर महाप्रबंधक/उ.रे. आर. के. कुलश्रेष्ठ द्वारा महाप्रबंधक पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया.

    डीआरएम श्री अरोरा ने आगे लिखा है कि ‘पीआरएस के बाद वाणिज्य कार्य-प्रणाली में एक मुख्य ब्रेक थ्रू के रूप में पार्सल के लिए श्री शर्मा ने व्यक्तिगत रुचि लेकर सफलतापुर्वक एक पार्सल मोबाइल ऐप विकसित किया है, जो कि ग्राहकों/उपभोक्ताओं को पार्सल से संबंधित सभी प्रकार की जानकारी एक ही जगह उपलब्ध कराता है. यह पार्सल ऐप (इनिशिएटिव दिल्ली डिवीजन/एन.आर.) किसी भी एंड्राएड मोबाइल फोन पर आसानी से डाउनलोड किया जा सकता है. मंडल में ट्रैक्टर्स, कारों और चीनी का नया ट्रैफिक लाने में श्री शर्मा का बड़ा भारी योगदान रहा है, जो कि पहले सड़क मार्ग से जा रहा था. इसके अलावा श्री शर्मा ने सतर्कता मामलों का तीव्र गति से और प्रभावी निपटान सुनिश्चित किया है. इनके असाधारण कार्य-निष्पादन, बेहतरीन पहल और सामंजस्यपूर्ण कार्य-प्रणाली तथा इन्नोवेशन एवं प्रशंसनीय प्रयासों के लिए इनके नाम की सिफारिश रेलमंत्री पुरस्कार के लिए की जाती है.’

    डीआरएम द्वारा प्रस्तुत किए गए उपरोक्त ‘सिटेशन’ और बेहतरीन कार्य-निष्पादन एवं आउटपुट के बावजूद श्री शर्मा को इस बार भी रेलमंत्री पुरस्कार से इसलिए वंचित कर दिया गया, क्योंकि उत्तर रेलवे के विवादास्पद मुख्य वाणिज्य प्रबंधक को यह पुरस्कार अपनी खास चहेती और एकांत सहयोगी रही एक महिला अधिकारी को दिलवाना था और दिलवा भी दिया. परंतु इसके बाद उठे विवाद और उनके आपसी संबंधों को लेकर रेलवे बोर्ड को उनके विरुद्ध की गई लिखित शिकायत के चलते यह पुरस्कार प्राप्त करने से पहले ही रेलवे बोर्ड के कहने पर महाप्रबंधक द्वारा उक्त महिला अधिकारी का ट्रांसफर ऑपरेटिंग के एक साइड लाइन पद पर कर दिया गया. यह ट्रांसफर ही इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि उनके बीच कुछ भी सामान्य नहीं था.

    इससे पहले श्री शर्मा को रेलमंत्री पुरस्कार से तब वंचित कर दिया गया था, जब उन्होंने मुरादाबाद मंडल के सीनियर डीसीएम रहते हुए 70 हजार रुपए से भी कम की लागत पर इंटरनेट नेटवर्किंग के माध्यम से अपने सीनियर डीसीएम कार्यालय सहित मुरादाबाद रेलवे सटेशन के पीआरएस, स्टेशन परिसर और सभी जनरल टिकट बुकिंग कार्यालयों की सीसीटीवी नेटवर्किंग करवाई थी. जबकि इतने ही क्षेत्र के लिए तब तक रेलवे द्वारा 15 से 18 लाख रुपए खर्च किए जा रहे थे. इसी के बाद सम्पूर्ण भारतीय रेल में ‘मुरादाबाद मॉडल’ को अपनाए जाने के लिए रेलवे बोर्ड ने एक विशेष नोटिफिकेशन जारी किया था. तथापि तत्कालीन दुष्ट एवं भ्रष्ट सीसीएम ने भी रेलमंत्री पुरस्कार से उनका नाम काट दिया था. यहां देखने वाली बात यह है कि इस सब में महाप्रबंधक की क्या भूमिका है? महाप्रबंधक स्तर पर इसे क्यों नहीं देखा गया और एक भ्रष्ट एवं दुश्चरित्र विभाग प्रमुख की कानाफूसी पर महाप्रबंधक भरोसा कैसे कर सकते हैं? ऐसे में यहां महाप्रबंधक/उ.रे. आर. के. कुलश्रेष्ठ के स्वविवेक की सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने मनोज कुमार शर्मा द्वारा व्यवस्था के परिमार्जन में किए गए योगदान को शिद्दत के साथ महसूस किया और रेल सप्ताह पुरस्कार वितरण समारोह के दिन एकदम अंतिम क्षणों में उन्होंने श्री शर्मा को विशेष रूप से बुलाकर महाप्रबंधक पुरस्कार देकर सम्मानित किया.

    फोटो परिचय : किसी पद पर पोस्टिंग के मात्र छह महीनों के अंदर बिना कोई काम किए यदि राष्ट्रीय स्तर का रेलमंत्री पुरस्कार रेलमंत्री के हाथों मिल जाए तथा पुरस्कार ग्रहण करते समय यदि रेलमंत्री और चेयरमैन, रेलवे बोर्ड सहित रेलवे के सर्वोच्च अधिकारी पुरस्कार ग्रहण करने वाले की खूबसूरती को ही एकटक निहारते रह जाएं, तो मुफ्त में पुरस्कार पाने की यह बेलिहाज खुशी इसी तरह किसी के भी चेहरे पर झलक उठती है.

    पश्चिम रेलवे, मुंबई मंडल की एक महिला अधिकारी को भी इसी तरह इस बार रेलमंत्री अवार्ड दिया गया है. जबकि उसे मंडल में पदस्थ हुए मात्र छह महीने ही हुए थे. भारतीय रेल में शायद यह पहला मामला होगा, जहां मात्र छह महीने के कामकाज पर किसी ब्रांच अधिकारी को रेलमंत्री पुरस्कार से नवाजा गया है. इसके अलावा इस महिला अधिकारी को किस कार्य विशेष के लिए यह पुरस्कार प्रदान किया गया है, इस बारे में किसी को भी कोई जानकारी नहीं है. इस महिला अधिकारी ने ऐसा कौन सा कार्य उक्त छह महीनों के कार्यकाल में किया, कि जिससे रेलवे को करोड़ों का राजस्व प्राप्त हुआ? अथवा इसने इस दरम्यान ऐसा कौन सा बहुत बड़ा इन्नोवेशन का कार्य किया कि जिससे रेलवे अथवा मंडल की कार्य-प्रणाली में कोई आमूलचूल परिवर्तन आ गया, जिससे रेलवे को पर्याप्त लाभ मिला? जबकि मंडल के लगभग सभी कर्मचारियों को मालूम है कि यह महिला अधिकारी एक तिनका भर भी काम नहीं करती है. मंडल का सारा कामकाज इसके मातहत अधिकारियों के हवाले है.

    इसी तरह बताते हैं कि महाप्रबंधक, उत्तर रेलवे के एक ड्राइवर के बेटे को रेलमंत्री अवार्ड दिलवा दिया गया, जो कि पिछले करीब 10-12 वर्षों से पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बतौर टिकट चेकिंग स्टाफ नियुक्त है और सीसीएम सहित स्टेशन डायरेक्टर तथा स्टेशन पर कार्यरत सभी संबंधित भ्रष्टों का न सिर्फ पूरा ख्याल रखता है, बल्कि उनकी तमाम निजी सेवाओं में सदैव तत्पर रहता है. ऐसे ही कई मामले अन्य जोनल रेलों सहित राष्ट्रीय स्तर पर भी हुए हैं. इसके अलावा पुरस्कार पाने के लिए एक योग्यता यह भी होती है कि संबंधित कर्मचारी को गत दो वर्षों में पुरस्कार नहीं मिला होना चाहिए, जो कि न्यायोचित नहीं लगती है. किसी कर्मचारी ने यदि बेहतर कार्य किया और उसे महाप्रबंधक पुरस्कार मिला है, और अगले वर्ष पुनः उसने बेहतर कार्य किया, लेकिन उसे पुरस्कार नहीं मिलेगा, क्योंकि उसे पिछले वर्ष पुरस्कार मिल चुका है. अर्थात इसका मतलब यह हुआ कि एक बार पुरस्कार पाने के बाद दो वर्ष तक उस कर्मचारी को बेहतर कार्य नहीं करना चाहिए. इसके कारण ऐसे कर्मचारियों को भी पुरस्कार दिया जाता है, जो एक तरह से निकम्मे और कामचोर होते हैं.

    सालाना रेल सप्ताह के दौरान जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को यह पुरस्कार प्राप्त होते हैं, उनमें से वह तो अपना सिर उठाकर चलते हैं, जो कि वास्तव में इसके हकदार होते हैं, मगर वह अपना सिर झुककर चलने के लिए मजबूर होते हैं, जिन्हें वास्तव में बिना किसी खास कामकाज अथवा योगदान के ही यह पुरस्कार सिर्फ उनकी चापलूसी, चमचागीरी, खास सेवा, निजी सेवा और बिरदारीगत भेदभाव के चलते मिले होते हैं. यह वार्षिक पुरस्कार अधिकांश रेल अधिकारियों और कर्मचारियों में असंतोष पैदा कर रहे हैं. अतः या तो इन्हें पूरी तरह बंद कर दिया जाना चाहिए, या फिर इनकी स्क्रुटनी का कोई बेहतर मैकेनिज्म विकसित किया जाना चाहिए, जिससे इन्हें पाने वाला इन पर और अपने आप पर भी गर्व महसूस कर सके और सिर उठाकर चल सके तथा न पाने वाला इन्हें पाने के लिए बेहतर कार्य-निष्पादन हेतु प्रोत्साहित हो सके.

सम्पादकीय