मालगाड़ियों से ‘भोलू’ को उतरने की तैयारी, ईओटीटी करेगा गाड़ियों की गार्डिंग

    गार्ड वैन की जगह एक हजार मालगाड़ियों में ईओटीटी उपकरण लगाएगा रेल प्रशासन

    रेलवे बोर्ड द्वारा ईओटीटी उपकरण खरीदने पर खर्च किए जाएंगे लगभग 100 करोड़ रु.

    नई दिल्ली : भारतीय रेल द्वारा अपनी मालगाड़ियों को भी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन की तर्ज पर अब बिना गार्ड के ही चलाने की योजना बनाई जा रही है. इसके लिए भारतीय रेल ने सर्वप्रथम अपनी 1000 मालगाड़ियों के लिए इंड ऑफ ट्रेन टेलिमेटरी (ईओटीटी) उपरकण खरीदने की तैयारी की है. उल्लेखनीय है कि ईओटीटी एक ऐसा उपकरण है, जिसका एक हिस्सा इंजन में ड्राइवर के पास तो दूसरा हिस्सा ट्रेन के अंतिम कोच में लगा होता है. इस तरह गार्ड रहित ट्रेन में इस उपकरण से ड्राइवर को पता चलता रहता है कि ट्रेन के कोच अलग नहीं हुए हैं.

    रेल अधिकारियों के अनुसार ईओटीटी एक ऐसा सिस्टम है कि यदि ट्रेन में कहीं से भी कोच अलग (डिपार्ट) होते हैं, तो इस उपकरण के माध्यम से उनके बारे में ड्राइवर को तुरंत पता चल जाता है. फिलहाल गार्ड द्वारा यह देखा जाता है कि ट्रेन के कोच यदि कहीं से अलग हुए हैं, तो वह ड्राइवर को संचार माध्यम से इसकी जानकारी देता है. लेकिन जब यही काम ईओटीटी उपकरण करने लगेगा, तो गार्ड की जरूरत नहीं रह जाएगी.

    रेलवे बोर्ड के एक अधिकारी के अनुसार ईओटीटी उपकरण लगाने से गार्ड पर होने वाला भारतीय रेल का खर्च बचेगा. अधिकारी ने बताया कि वर्तमान में ऐसे 1000 ईओटीटी उपकरण खरीदे की योजना बनाई गई है. फिलहाल इन्हें 1000 ट्रेनों में लगाया जाएगा. इसके लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू हो गई है. एक अनुमान के अनुसार यह उपकरण खरीदने पर रेलवे को लगभग 100 करोड़ रुपए खर्च होंगे. अधिकारी के अनुसार मालगाड़ियों में ईओटीटी उपकरण के सफल प्रयोग के बाद इन्हें मेल/एक्स. गाड़ियों में भी लगाया जाएगा.

    उल्लेखनीय है कि इस संदर्भ में रेलवे बोर्ड ने मुंबई की उपनगरीय लोकल ट्रेनों से भी गार्ड को हटाने संबंधी एक नोटिफिकेशन गत वर्ष जारी किया था. इस संदर्भ में दि.08.03.2016 को ‘रेलवे समाचार’ ने ‘भोलू’ गार्ड को ब्रेक वैन से उतारने और भूलने जा रहा रेल प्रशासन’ शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकशित की थी. इस रिपोर्ट में ‘रेलवे समाचार’ ने उपनगरीय लोकल ट्रेन में गार्ड की अनुपयोगिता सहित लंबी दूरी की मेल/एक्स. एवं मालगाड़ियों में गार्डों की उपयोगिता को निरर्थक बताया था. हालांकि गार्डों और मान्यताप्राप्त रेल संगठनों के विरोध के चलते रेल प्रशासन और रेलवे बोर्ड अपने उक्त नोटिफिकेशन पर अब तक अमल नहीं कर पाया है. परंतु अब डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कारपोरेशन द्वारा इसकी पहल किए जाने से रेलवे बोर्ड को भी इसकी उपयोगिता और अपने निरर्थक खर्च को बचाने की सूझ रही है, तो यह सराहनीय कदम है.

    ज्ञातव्य है कि रेल प्रशासन द्वारा गार्ड की व्यवस्था खत्म करने की प्रक्रिया करीब 25-26 साल पहले तब शुरू हो चुकी थी, जब सन 1991-92 में मुंबई सबर्बन में पहली 12 डिब्बे की लोकल की शुरूआत हुई थी. मध्य रेलवे के तत्कालीन महाप्रबंधक के आदेश पर 12 डिब्बे की लोकल में दोनों छोरों की कैब में मोटरमैन रखे जाने का प्रस्ताव भी रखा गया था और उसके अनुरूप डिटेल भी बनाए गए थे. परंतु तब रेलवे के मान्यताप्राप्त श्रमिक संगठनों ने इसका यह कहकर विरोध किया था कि ‘मोटरमैन लोअर ग्रेड के गार्ड का काम पीछे बैठकर नहीं करेगा.’

    इसी तरह विगत करीब 25-26 वर्षों से लगभग प्रतिदिन गार्ड ब्रेक वैन लगाए बिना ही तमाम मालगाड़ियां चलाई जा रही हैं. जहां नियमानुसार ऑटोमेटिक सेक्शन में बिना ब्रेक वैन के कोई भी गाड़ी चलाने की अनुमति नहीं है, वहां भी धड़ल्ले से गार्ड ब्रेक वैन के बिना ही गाड़ियां वर्षों से चलाई जा रही हैं. यार्डों में कई-कई ब्रेक वैन स्पेयर खड़े होने के बावजूद उन्हें मालगाड़ियों में नहीं जोड़ा जाता है. चालक इस बारे में अपने कर्मचारी संगठनों से भी कहते रहे हैं. श्रमिक संगठन भी प्रशासन से इसके लिए आपत्ति जाहिर करते रहे हैं. गार्ड ब्रेक वैनों की हालत काफी जर्जर रहती है. उनका रख-रखाव सही तरह से नहीं किया जाता है.

    काम न करना पड़े और कोई जिम्मेदारी भी न निभानी पड़े, इसके लिए गार्ड जहां मालगाड़ी में उनका का वैन नहीं लगा होता है, वहां वह आगे इंजन की पिछली केबिन, जो कार्यरत नहीं रहती, में बैठकर अथवा सोकर अपनी ड्यूटी कर रहे हैं. ऐसे में यह माना जाता है कि यदि वह अपने वैन में बैठेंगे, तो उसकी दुरावस्था को झेलना पड़ेगा. गाड़ी के झटके सहने होंगे, सारी गाड़ी के संरक्षित संचालन पर भी नजर रखना होगा तथा रात्रि में यार्ड या लूप लाइन में अकेले खड़े रहने पर असुरक्षा का सामना भी करना होगा. जबिक इंजन में बैठने से उन्हें इन सब बातों से एकदम छुटकारा मिल जाता है और अपनी ड्यूटी, माइलेज, अवोरटाइम सब बन जाता है.

    मान्यताप्राप्त श्रमिक संगठनों ने भी कभी इस ओर सोचने का प्रयत्न या तो किया ही नहीं, या वे अपने आराम फरमाते और कामचोरी करते हुए तनख्वाह कमाने वाले साथियों/सदस्यों को नाराज नहीं करना चाहते थे, या फिर प्रशासनिक सोच में वे भी गार्डों की इस कामचोरी पर अपनी मूक सहमति जता रहे थे? चाहे जो भी हुआ हो, मगर इतने वर्षों में बिना गार्ड के सुरक्षित और संरक्षित गाड़ी संचालन करके रेलवे ने यह साबित कर दिया है कि अब गार्ड की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है. इसके अलावा विदेशी रेलों में भी गार्ड का कोई प्रावधान नहीं है, जहां हमारे यहां से कई गुना ज्यादा लंबी मालगाड़ियां चलाई जा रही हैं.

    रेलवे में मेडिकल विभाग की ही तरह वास्तव में गार्ड कैडर भी वर्तमान में सफेद हाथी साबित हो चुका है. बल्कि रेल प्रशासन ने बहुत ही सुनियोजित तरीके से एक लंबे अर्से में इस तथ्य को बखूबी साबित भी कर दिया है. जबकि इस दरम्यान गार्ड और रेलवे के मान्यताप्राप्त श्रमिक संगठन रेल प्रशासन की इस दूरंदेशी को समझ नहीं पाए और सोते रहे. इंजन में पीछे बैठकर मात्र वी.जी. के दो पेपर एक डिपो से दूसरे डिपो में हैंडओवर का कार्य तो अब ऑनलाइन भी किया जा सकता है. डिब्बे चेक करने का जो काम गार्ड करता है, वही कार्य टीएनसी तथा आरपीएफ वाले भी करते हैं.

    आज पूरी की पूरी गाड़ियां एक छोर से दूसरे छोर तक चल रही हैं. उनमें शंटिंग की आवश्यकता ही नहीं है. गाड़ियों की लंबाई इतनी बढ़ गई है कि घुमाव पर पूरी गाड़ी का अवलोकन भी संभव नहीं है, ऐसे में गार्ड की तैनाती का कोई औचित्य ही नहीं रह गया है. यह तो स्पष्ट है कि अपने कैडर को हाशिए पर जाने से न तो गार्डों ने कभी कुछ विचार किया, और न ही मान्यताप्राप्त श्रमिक संगठनों ने इसे रोकने हेतु कभी कोई कदम उठाए. रेलवे में शुरू किए गए गार्ड रहित पायलेट प्रोजेक्ट के अपेक्षानुरूप परिणाम सामने आए हैं. ऐसे में रेल प्रशासन ने अब ‘भोलू’ को भूल जाने और उसे गार्ड ब्रेक वैन से नीचे उतारने की पूरी तैयारी कर ली है.

सम्पादकीय