भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सुरेश प्रभु की रेल

    सरकार को जुमलेबाजी और हवाहवाई भाषणबाजी से हटकर कुछ ठोस कदम उठाना होगा

    सुरेश त्रिपाठी

    भारतीय रेल में न सिर्फ भ्रष्टाचार बढ़ा है, बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में रेलवे शीर्ष पर पहुंच गई है. यह सच्चाई केंद्रीय सतर्कता आयोग की भ्रष्टाचार संबंधी वार्षिक रिपोर्ट से उजागर हुई है. जहां केंद्र सरकार लगातार भ्रष्टाचार को समाप्त करने और ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के जुमले से भ्रष्टाचार के प्रति सजग रहने का आहवान कर रही है, वहीं उसके लगभग सभी विभागों में इस दरम्यान भ्रष्टाचार का शिष्टाचार चरम पर पहुंच रहा है. जबकि उसकी रेलवे उसके एक तथाकथित ईमानदार मंत्री के मार्गदर्शन पर भ्रष्टाचार के मामले में शीर्ष पर बनी हुई है. रेलवे में चरम पर पहुंचे भ्रष्टाचार का एक ज्वलंत उदाहरण रेलवे बोर्ड में मेंबर ट्रैक्शन के पद पर एक अत्यंत विवादस्पद और भ्रष्ट अधिकारी की नियुक्ति भी है.

    केंद्रीय सर्तकता आयोग (सीवीसी) ने अपनी एक वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि केंद्र सरकार के विभिन्न सरकारी विभागों के खिलाफ मिली भ्रष्टाचार की शिकायतों में पिछले वर्ष 2015 की तुलना में वर्ष 2016 में 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई है और रेलवे भ्रष्टाचार की इस सूची में शीर्ष पर है. सीवीसी ने कहा कि पिछले वित्तवर्ष के दौरान रेलवे से जुड़ी 11 हजार से अधिक शिकायतें मिलीं हैं. रेलवे में गत वर्ष भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की वास्तविक संख्या सीवीसी ने 11,200 बताई है. सीवीसी द्वारा हाल में संसद में रखी गई वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार आयोग को वर्ष 2016 में कुल 49,847 शिकायतें मिलीं, जो कि वर्ष 2015 की 29,838 शिकायतों से करीब 67% अधिक हैं.

    सीवीसी की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आयोग को राज्य सरकारों तथा अन्य संगठनों में कार्यरत लोकसेवकों के खिलाफ भी बड़ी संख्या में शिकायतें मिलीं, जो या तो आयोग के क्षेत्राधिकार में नहीं आतीं या प्रशासनिक प्रकृति की हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2015 में मिली शिकायतों की संख्या वर्ष 2014 में मिली कुल 62,363 शिकायतों से 50 प्रतिशत से भी कम रही है. सीवीसी को वर्ष 2013 और 2012 में कथित भ्रष्टाचार के लिए क्रमश: 31,432 और 37,039 शिकायतें मिलीं थीं.

    सीवीसी ने उपरोक्त जानकारी देते हुए कहा कि इस तरह की सबसे ज्यादा शिकायतें रेलवे कर्मचारियों के खिलाफ मिली हैं. इनमें से 8,852 शिकायतों को अब तक निपटा लिया गया है, जबकि 2,348 शिकायतें अब भी लंबित हैं. इसके अलावा रेलवे कर्मचारियों के खिलाफ 1,054 अन्य शिकायतें भी छह महीने से अधिक समय से लंबित हैं. हालांकि सीवीसी की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सरकार के तहत आने वाले कर्मचारियों के खिलाफ शिकायतों की संख्या में कमी आई है. वर्ष 2016 में 969 शिकायतें मिलीं थीं, जबकि वर्ष 2015 में यह संख्या 5,139 थी.

    यदि केंद्र सरकार वास्तव में अपने तमाम महकमों से भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहती है और वह यदि वास्तव में इसके प्रति गंभीर है, तो उसे सिर्फ जुमलेबाजी और हवाहवाई भाषणबाजी से हटकर कुछ ठोस कदम उठाना होगा. उसे रेलवे जैसे सार्वजनिक जीवन से जुड़े महकमे को किसी सक्षम मंत्री के हाथों में सौंपना होगा, जो न सिर्फ अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी को बनाए रखने के लिए अपने पास कोई अधिकार न रखने की नाटकबाजी छोड़कर वास्तविक कामकाज पर ध्यान दे सके और सुरेश प्रभु जैसे मंत्रियों को ऐसे मंत्रालय सौंपे जाने चाहिए, जहां उन्हें अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी को बनाए रखने के लिए कोई बुनियादी कामकाज न करना पड़े.

सम्पादकीय