लंबे समय से जमे कैटरिंग अधिकारियों को हटाओ!!

    ‘बंदर न्याय’ के चलते कभी नहीं सुधरेगी रेलवे की खानपान या प्रशासनिक व्यवस्था

    फैक्ट फाइंडिंग/जांच के बिना अखबारी खबरों पर रेलमंत्री का संज्ञान कहां तक उचित?

    रेलवे की कामकाजी छवि सुधरने हेतु रेलमंत्री ‘रेलवे समाचार’ की खबरों का संज्ञान लें

    सुरेश त्रिपाठी

    28 मार्च को नई दिल्ली से निकली सियालदह राजधानी एक्सप्रेस में खानपान की गड़बड़ी की शिकायत हुई और कहा गया कि खराब खाने से कुछ यात्री बीमार भी पड़ गए. इससे मीडिया में बड़ा हंगामा हुआ और एक बार फिर रेलवे की खानपान सेवा पर सवाल उठाए गए. इससे पुनः रेलवे की भारी किरकरी हुई है. इस घटना की जांच और असली तथ्यों का पता लगाए बिना ही सिर्फ अखबारों में छपी खबरों के आधार पर रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने न सिर्फ संसद में बयान दिया, बल्कि संबंधित कैटरिंग कांट्रेक्टर का कांट्रेक्ट रद्द करने का नोटिस दिए जाने सहित उस पर 50 हजार का जुर्माना भी लगाए जाने की बात कही.

    रेलवे खानपान और आपूर्ति में भयानक गड़बड़ियां हैं. इनकी लगातार शिकायतें आती रहती हैं. ट्विटर, फेसबुक आदि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर रेलमंत्री ने शिकायतों का जो भानुमती का पिटारा खोल रखा है, उस पर आने वाली तत्संबंधी तमाम शिकायतों को देखकर यह कहा जा सकता है कि रेलमंत्री को शिकायतों के निपटारे से कोई मतलब नहीं है. उन्हें सिर्फ अपनी छवि साफ-सुथरी बनाए रखने के लिए सिर्फ ‘बंदर न्याय’ का दिखावा करते रहना है. जैसे एक बंदर को जंगल का सभापति बना दिया जाता है. उससे जब-जब कोई जानवर शिकायत करता है, तब-तब वह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर खूब उछलकूद करता है और शिकायतकर्ता जानवर को कोई न्याय नहीं मिलता या उसकी शिकायत पर कुछ नहीं होता, तो बंदर शिकायतकर्ता जानवर के पूछने पर कहता है कि ‘देखो, मेरी कोशिश में कोई कमी हो तो बताओ.’

    रेलवे में भी यही हो रहा है. जनता या रेलयात्रियों को शिकायत के तमाम प्लेटफार्म मुहैया करा दिए गए हैं. मगर वास्तव में क्या हो रहा है, अब इससे भी यह जनता अथवा करोड़ों रेलयात्री बखूबी वाकिफ हो चुके हैं. भारतीय रेल के लगभग सभी जीएम, डीआरएम और उनके ब्रांच अधिकारियों के ट्विटर हैंडल्स को एक नजर देख लिया जाए, वह आई हुई शिकायतों को सिर्फ अपने से नीचे वाले को अथवा समकक्ष वाले को ‘फॉरवर्ड’ (खिसका) कर रहे हैं. मगर उन शिकायतों के अंतिम निपटारा या अंतिम निष्कर्ष क्या होता है, यह कभी नहीं बताया जाता. उपरोक्त रेल अधिकारी रेलमंत्री के तमाम लोकलुभावन ट्विट्स को उनकी चापलूसी में लगातार फॉरवर्ड करते हुए नजर आते हैं, मगर यात्रियों/शिकायतकर्ताओं के वाजिब सवालों का कोई उचित जवाब नहीं देते. यात्री या शिकायतकर्ता द्वारा ज्यादा फॉलो करने पर इन अधिकारियों द्वारा कई बार उनको ब्लॉक भी कर दिया जाता है.

    रेलवे की खानपान व्यवस्था और आपूर्ति तभी सुधर सकती है, जब इसका कारगर इलाज किया जाएगा. कारगर इलाज यह है कि सबसे पहले रेलवे बोर्ड और आईआरसीटीसी में लंबे समय से खानपान संबंधी पदों पर बैठे जेजीएम अनिल गुप्ता जैसे अधिकारियों को तुरंत दरबदर किया जाए. गुप्ता जैसे भ्रष्ट अधिकारियों की खानपान की आपूर्ति करने वाले कैटरिंग कॉन्ट्रैक्टर्स के साथ बहुत पुरानी साठ-गांठ चली आ रही है. अब तो रेलमंत्री की मेहरबानी से सभी बेस किचन और पैंट्रीकारों का जिम्मा भी आईआरसीटीसी को सौंपा जा चुका है. गुप्ता जैसे तिकड़मी अधिकारियों की वजह से अब रेलवे में ऐसे-ऐसे खानपान ठेकेदारों की आमद हो चुकी है, जिनकी न सिर्फ आपराधिक पृष्ठभूमि रही है, बल्कि इसका खुलासा होने पर ऐसे खानपान ठेकेदारों पर कोई कार्रवाई भी नहीं की गई है.

    उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पहले मुंबई राजधानी में खानपान सेवा देने वाले कैटरिंग कांट्रेक्टर के करीब 8 वेंडरों को बिना स्वास्थ्य जांच अथवा पहचान पत्र के अवैध रूप से पैंट्रीकार में काम करते हुए पश्चिम रेलवे के दो विजिलेंस इंस्पेक्टरों ने अपनी जांच के दौरान पकड़ा था. दिल्ली से मुंबई की यात्रा के दौरान और गाड़ी के मुंबई सेंट्रल पहुंचने पर भी उक्त वेंडरों का कोई कुछ नहीं कर पाया और न ही पैंट्री कार कांट्रेक्टर के विरुद्ध किसी को कोई जुर्माना लगाने की हिम्मत हुई. उसने स्पष्ट रूप से चेकिंग स्टाफ को कह दिया कि वह उक्त 8 वेंडरों को लेकर जाकर जो करना चाहें कर सकते हैं, मगर वह उनका जुर्माना नहीं भरेगा. बताते हैं कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले इस पैंट्रीकार कांट्रेक्टर को एक रेल राज्यमंत्री का ही वरदहस्त प्राप्त है, जिसकी मेहरबानी की बदौलत वर्तमान में इस तथाकथित कैटरिंग कांट्रेक्टर को तमाम पैंट्रीकारों के ठेके मिल चुके हैं और इसकी सभी गाड़ियों में यात्रियों से 120/150 रुपए प्रति मील वसूले जा रहे हैं. क्या रेलमंत्री इस कैटरिंग कांट्रेक्टर की पृष्ठभूमि सहित इसकी गाड़ियों में हो रही ओवर चार्जिंग की जांच कराएंगे?

    रेलमंत्री ने शुरू-शुरू में रेलवे कैटरिंग सर्विस को लेकर बहुत बड़ी-बड़ी डींगें हांकी थीं, मगर आज भी स्थिति वही ढ़ाक के तीन पात वाली ही है. उनकी मोबाइल से ऑर्डर करके अपना मन-पसंद खाना मंगाने, पैंट्रीकारों में ताजा और स्वादिष्ट खाना मिलने आदि-आदि की घोषणाएं आज कहीं भी नजर नहीं आ रही हैं. यात्रियों को ऑन बोर्ड कैटरिंग सर्विस में कोई बदलाव हुआ नजर नहीं आ रहा है. उन्हें चाय के लिए आज भी 7 रु. की जगह 10 रु. देने पड़ रहे हैं या तीन रुपए के लिए उन्हें सड़े हुए दो बिस्किट्स का एक रुपया वाला पैकेट वेंडर द्वारा थमा दिया जा रहा है. 50/55 रु. की निर्धारित कीमत पर किसी भी यात्री को ईमानदारी से खाना नहीं मिल रहा है. यह सब अनिल गुप्ता जैसे भ्रष्ट और दसियों सालों से एक ही जगह बैठे खानपान अधिकारियों की मिलीभगत की वजह से हो रहा है. इसका संज्ञान प्रशासन को भी बहुत अच्छी तरह से है, मगर वह भी या तो कान में उंगली डालकर सो रहा है, या उन्हीं के साथ शामिल है.

    पहली बात यह है कि जब केंद्र सरकार सहित रेलमंत्री भी नियमानुसार, संवैधानिक एवं पारदर्शी तरीके से समस्त सरकारी कामकाज किए जाने की हमेशा दुहाई देते हैं, तब उपरोक्त घटना की तथ्यात्मक जांच और संबंधित को प्रतियुत्तर दिए जाने का मौका दिए जाने से पहले ही ऐसा कोई अन्यायपूर्ण एवं असंगत निर्णय कैसे ले सकते हैं? यदि रेलमंत्री को अखबारों में छपी खबरों के आधार पर ही निर्णय लेना है और इस तरह से अपनी लोकलुभावन छवि बनाए रखना है, तो सर्वप्रथम उन्हें ‘रेलवे समाचार’ में प्रकाशित होने वाली तमाम खबरों का संज्ञान लेना चाहिए. रेलमंत्री अपने अकर्मण्य एवं गैर-अनुभवी अथवा निहितस्वार्थी सलाहकारों के बजाय यदि ‘रेलवे समाचार’ जो कि विशेष रूप से रेलवे पर आधारित अखबार और वेबसाइट (www.railsamachar.com) है, में प्रकाशित खबरों और जन-सामान्य की शिकायतों का सही संज्ञान लेने लगें, तो निश्चित रूप से रेलवे की प्रशासनिक एवं कामकाजी छवि सुधर सकती है.

सम्पादकीय