एयर इंडिया ने पेश किया अनुकरणीय उदाहरण

    ‘गांव भर की भौजाई’ बन चुकी भारतीय रेल !!

    भारतीय रेल को कब आएगी अपनी और अपने स्टाफ की गरिमा की सुधि?

    सुरेश त्रिपाठी

    देश के यात्री यातायात के क्षेत्र में सर्वथा पहली बार किसी यातायात कंपनी द्वारा अपने किसी उद्दंड यात्री की यात्रा पर प्रतिबंध लगाया गया है. इस मामले में एयर इंडिया की सराहनीय पहल और अन्य छह एयर लाइनों का उसके समर्थन में आ जाने का अत्यंत अनुकरणीय उदाहरण भी देश में शायद पहली बार प्रस्तुत हुआ है. एयर इंडिया और अन्य एयर लाइनों के कदम को न सिर्फ मीडिया में भारी समर्थन मिला है, बल्कि देश की पूरी जनता के समर्थन और दबाव का ही नतीजा है कि अब तक संबंधित सांसद और उसकी पार्टी की तमाम हायतौबा के बावजूद सरकार या संसद ने उक्त सांसद के खिलाफ लगाए गए यात्रा प्रतिबंध को उठाए जाने के लिए एयर इंडिया और अन्य एयर लाइनों को अब तक कुछ नहीं कहा है.

    संबंधित सांसद महोदय ने जब पुणे से दिल्ली की फ्लाईट बुक करवाई थी, तब उन्हें मालूम था कि उक्त फ्लाईट में सभी सीटें इकॉनोमी क्लास की ही हैं. तब वह विमान में पहुंचकर बिजनेस क्लास की सीट की डिमांड कैसे कर सकते थे? उन्होंने न सिर्फ विमान से उतरने से मना कर दिया, बल्कि हेकड़ी की हद यह कि उन्होंने एयर इंडिया के चीफ और उड्डयन मंत्री को उनके सामने पेश होने का हुक्म कर दिया. क्रू-मेंबर की तमाम अनुनय-विनय भी उन्होंने नहीं सुनी. अपना रुतबा और हेकड़ी दिखाने के लिए अपने बाप की उम्र के मैनेजर को चप्पलों से धुन दिया. बाद में मीडिया के सामने और ज्यादा हेकड़ी दिखाते हुए बड़े गर्व के साथ बयान किया कि उन्होंने उक्त मैनेजर को गिनकर 25 चप्पल मारी थी.

    अब उनके और उनकी पार्टी द्वारा संसद और बाहर यह बयान दिया जा रहा है कि जब गुंडे-बदमाश, तस्कर, आतंकवादी और अलगाववादी हवाई यात्रा कर सकते हैं, तब देश के एक सम्मानित और निर्वाचित जन-प्रतिनिधि को हवाई यात्रा से प्रतिबंधित किया जाना असंवैधानिक है. परंतु जब वह क्रू-मेंबर्स और 60 वर्षीय मैनेजर के साथ बदतमीजी से पेश आ रहे थे, उन्हें चप्पलें मार रहे थे, तब वह अपना यह रुतबा भूल गए थे कि एक सांसद को सार्वजनिक तौर पर कैसा व्यवहार करना चाहिए? उनकी पत्नी ने मीडिया को बयान दिया कि उनके पति ने मैनेजर को तब पीटा, जब उसने प्रधानमंत्री के बारे में अपशब्द कहे. यह कितना बचकाना है कि ये सांसद और उनके परिवार वाले देश की जनता को वास्तव में मूर्ख समझते हैं? समस्त सरकारी सेवाओं और संपत्ति को अपनी बपौती मानने और समझने वाले ऐसे सांसद और तमाम छुटभैये नेता अपने ऐसे कु-कर्मों पर शर्मिंदा होने और देश से माफी मांगने के बजाय चोरी और सीनाजोरी की तर्ज पर अनर्गल तर्क प्रस्तुत करने लगते हैं. संविधान और नैतिक आचरण को अपने ऐसे दुर्व्यवहार के समय भूल जाने वाले यह नेता बाद में उसी संविधान और नैतिकता की अपने हित में दुहाई देने लगते हैं.

    बहरहाल, यह विवाद जल्दी ही शांत हो जाएगा और दो बार ऐसा अनैतिक आचरण कर चुके इन सांसद महोदय का हवाई यात्रा अधिकार भी जल्दी ही बहाल हो जाएगा. तथापि उन्हें अपने इस द्वितीय सार्वजनिक दुर्व्यवहार के लिए देश की जनता और एयर इंडिया से माफी मांगनी चाहिए. देश की जनता बहुत उदार है, वह यदि जितनी जल्दी अपने नेता या सांसद पर गुस्सा हो सकती है, तो उतनी ही जल्दी उन्हें माफ भी कर सकती है. इसी संदर्भ में भारतीय रेल को भी अपनी और अपने ऑन बोर्ड स्टाफ की गरिमा की सुधि लेनी चाहिए.

    भारतीय रेल तो इस मामले में ‘गांव भर की भौजाई’ बन चुकी है. जहां आए दिन ऑन बोर्ड स्टाफ के साथ कोई न कोई यात्री, और सबसे ज्यादा सांसद, विधायक और छुटभैये नेता ही भयानक और भारी अपमानजनक बदतमीजी करते हुए निकल जाते हैं. उनकी झूठी-सच्ची शिकायतों की जांच जब होती है, तब होती है, मगर स्टाफ को तो ऑन द स्पॉट मुर्गा बना दिया जाता है, जिससे वह सार्वजनिक तौर पर अपनी नौकरी की मजबूरी में कई-कई बार अपमानित होता है. जबकि व्यक्तिगत तौर पर वह किसी अपने सगे द्वारा भी की जाने वाली बदतमीजी को कभी बर्दास्त नहीं करेगा.

    भारतीय रेल को भी एयर इंडिया और अन्य एयर लाइनों की तर्ज पर अपने ऑन बोर्ड स्टाफ और कार्यालयीन अधिकारियों एवं कर्मचारियों की गरिमा को बनाए रखने के लिए इस मामले में कोई न कोई न कारगर नीति अपनानी चाहिए. भारतीय रेल में उपभोक्ता और उपयोगकर्ता दोनों की शिकायतों को अत्यंत गंभीरता से लिया जाता है, यह अपने आपने में सराहनीय और प्रशंसा की बात हो सकती है. परंतु उसे अपने इन सम्माननीय उपभोक्ताओं अथवा उपयोगकर्ताओं को इसका यह भी संदेश नहीं देना चाहिए कि वह उनकी किसी भी तरह की बदतमीजी को हमेशा बर्दास्त करती रहेगी. इसके साथ ही ऑन बोर्ड और कार्यालयीन स्टाफ को भी ‘सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप’ की कानूनी धारा का सर्वप्रथम इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि ऐसा देखने में आया है कि तमाम कानूनी प्रक्रिया और समय की बरबादी को देखते हुए रेलवे स्टाफ इस धारा का इस्तेमाल करने से बचता है, तभी उसका कुछ हो सकता है.

सम्पादकीय