यूनियन माफिया का दुष्टतापूर्ण प्रतिशोध

    यूनियन के धनबल के समक्ष रेल प्रशासन किंकर्तव्यविमूढ़

    जोनल संगठनों से रिटायर्ड रेलकर्मी/पदाधिकारी हटाए जाएं

    यूनियनों के ब्लैकमेल से रेल प्रशासन को अपना काम करना मुश्किल हो जाएगा

    सुरेश त्रिपाठी

    भारतीय रेल में कोई यूनियन इस हद तक कैसे मनबढ़ हो सकती है कि उसके सामने पूरा रेल प्रशासन नतमस्तक और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाए? उसके मन-मुताबिक उस जोन में उसकी पसंद का महाप्रबंधक और अन्य विभाग प्रमुखों की पोस्टिंग हो, उसके कहे अनुसार रेलवे के निर्धारित नियमों में न सिर्फ फेरबदल किया जाए, बल्कि उसके बताए अनुसार नियम बनाए जाएं. और यदि उसके यह नियम कोई अधिकारी मानने से इंकार कर दे, या वह रेलवे के निर्धारित नियमों के अनुसार काम करना चाहे, तो उसे यूनियन द्वारा न सिर्फ परेशान और प्रताड़ित किया जाए, बल्कि चरित्रहनन करके ब्लैकमेल करने की तमाम अनुचित कोशिशों सहित उसे जान से मारने की धमकी देकर अपने अनुसार काम करने के लिए विवश किया जाए. और यदि इस सबसे भी उक्त अधिकारी से पार न पाया जा सके, तो उसके विरुद्ध अपने धनबल की बदौलत कानून का दुरुपयोग करते हुए किसी भी तरह से अपना वर्चश्व स्थापित करके रखा जाए.

    उपरोक्त सभी हथकंडे दक्षिण रेलवे में माफिया यूनियन द्वारा एक ईमानदार अधिकारी अजीत सक्सेना, मुख्य वाणिज्य प्रबंधक (सीसीएम) के विरुद्ध अपनाए जा रहे हैं. दक्षिण रेलवे में इस यूनियन की दहशतगर्दी का यह आलम है कि वहां किसी अधिकारी या कर्मचारी में इसके विरुद्ध जाने अथवा कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं है. यूनियन की इस दहशतगर्दी के चलते कई अधिकारी उसके सामने नतमस्तक होकर उसके कहे अनुसार सरकारी कामकाज करते हैं. उनमें इतनी हिम्मत नहीं है कि वह यूनियन को गलत काम के लिए मना कर सकें. इसके चलते यूनियन के सामने सरेंडर करके कई अधिकारी उसके पे-रोल पर भी रहते हैं? जैसे कि वर्तमान में वरिष्ठ उप-महाप्रबंधक (एसडीजीएम) और मुख्य कार्मिक अधिकारी (सीपीओ) सहित कुछ अधिकारी हैं?

    दूसरी तरफ सीसीएम अजीत सक्सेना ने यूनियन के नियम मानने से इंकार कर दिया था और रेलवे के निर्धारित नियमों के अनुसार ही रेलवे का कामकाज करने को अपनी कार्य-प्रणाली निर्धारित किया था. इसी वजह से यूनियन के दबाव में हटाए गए चेन्नई मंडल के सीनियर डीसीएम को उन्होंने सीसीएम बनते ही सर्वप्रथम पुनर्स्थापित किया था. इसके बाद रेलकर्मी होकर रेलवे के बजाय यूनियन के लिए काम करने वाले तमाम वाणिज्य स्टाफ को उन्होंने पीरियोडिकल ट्रांसफर में दर-बदर किया था, जो कि पिछले पचीसों वर्षों से एक ही जगह, एक ही रूट में कार्यरत था. उन्होंने रोस्टर प्रणाली को पुनर्स्थापित किया, जिसके बारे में दक्षिण रेलवे में शायद किसी को पता भी नहीं था कि यह रोस्टर प्रणाली होती क्या चीज है, क्योंकि नौकरी में आने से लेकर अब तक उक्त स्टाफ यूनियन के कहे अनुसार मनमानी काम कर रहा था और रेलवे की तिजोरी के लिए काम करने के बजाय यूनियन की और अपनी तिजोरी भर रहा था. घर बैठे फ़ोकट का टीए-डीए बनाकर रेलवे को करोड़ों का चूना लगा रहा था. टिकट काउंटरों पर अपनी जगह बाहरी लोगों को बैठाकर और टिकट चेकिंग के लिए गाड़ियों में अपनी जगह दूसरों को भेजकर कमीशनखोरी कर रहा था. अंडर ट्रांसफर और सिक-लीव पर होकर भी अनधिकृत रूप से टिकट चेकिंग करके अपनी और यूनियन की जेबें भर रहा था.

    यूनियन और स्टाफ की उपरोक्त तमाम अवैध गतिविधियों एवं अनियमितताओं के मद्देनजर रेलवे को हो रहे करोड़ों रुपए के मासिक नुकसान को देखकर सीसीएम अजीत सक्सेना की रूह काँप उठी. उन्होंने इस अंधेरगर्दी पर लगाम लगाने और यूनियन एवं स्टाफ को रेलवे के नियमानुसार काम करने के लिए तत्पर करने की ठान ली. उन्होंने सबसे पहले यूनियन की ट्रांसफर पालिसी मानने से इंकार कर दिया. यूनियन की ट्रांसफर पालिसी यह थी कि एक स्टाफ को एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म में अथवा एक टेबल से दूसरी टेबल पर ट्रांसफर कर दिया जाए. रोस्टर पद्धति लागू नहीं की जाए. उन्होंने उन 40-45 वाणिज्य कर्मियों का चेन्नई से बाहर अन्य स्टेशनों पर ट्रांसफर कर दिया, जिन्होंने अंडर ट्रांसफर या सिक लीव में रहते हुए अनधिकृत रूप से ईएफटी लेकर अवैध रूप से यात्रियों से वसूली की थी. तमाम धनबल के बावजूद अब तक इस मामले में अदालत से यूनियन को उचित सफलता नहीं मिल पाई है. जबकि इन सभी वाणिज्य कर्मियों का यह मामला अब सीबीआई की जांच के अधीन है.

    इस दरम्यान खिसियानी बिल्ली की तरह यूनियन के लोगों ने तिरुचिरापल्ली, मदुरै और चेन्नई सहित कई स्थानों पर रेलकर्मियों के साथ हाथापाई, मारपीट और गाली-गलौज किया. तिरुचिरापल्ली मंडल के सीनियर डीसीएम के चेंबर में अनधिकृत रूप से जबरन घुसकर और अंदर से दरवाजा बंद करके यूनियन पदाधिकारियों ने सीनियर डीसीएम के साथ मारपीट की. वर्कशॉप के एक कर्मचारी द्वारा दो हजार रुपए का डोनेशन नहीं दिए जाने पर उसे यूनियन कार्यालय में बुलाकर यूनियन पदाधिकारियों ने उसको बुरी तरह पीटा. दोनों मामलों में पुलिस में एफआईआर दर्ज हुईं, मगर धनबल की बदौलत अब तक पुलिस ने इन मामलों में यूनियन पदाधिकारियों के विरुद्ध कोई उचित कानूनी कदम नहीं उठाया है.

    यूनियन ने अजीत सक्सेना को भी प्रताड़ित करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी. उनका चरित्रहनन करने की कुत्सित कोशिश के रूप में सर्वप्रथम कुछ महिला कर्मियों और एक महिला पदाधिकारी को आगे करके जबरन उनके चेंबर में घुसा दिया. महिलाओं ने चेंबर का दरवाजा अंदर से बंद करके वही सब त्रिया-चरित्र करने की कोशिश की, जैसा कि यूनियन के कहने पर वे इससे पहले भी कई अधिकारियों के विरुद्ध कर कर चुकी थीं. मगर समय बलवान था कि अजीत सक्सेना समय रहते अपनी मातहत एक महिला अधिकारी और सहायक स्टाफ को अपने चेंबर में बुलाने में कामयाब हो गए थे और पुलिस को कॉल किए जाने पर सभी उद्दंड महिलाएं वहां से अपना मुंह छिपाकर भाग खड़ी हुई थीं.

    इस मामले में 9 महिला कर्मियों को निलंबित किया गया था. उनका निलंबन तभी वापस लिया गया, जब उनके द्वारा प्रशासन को यह लिखित में दिया गया कि उन्होंने जो कुछ भी किया, यूनियन के कहने पर किया और उन्हें दिग्भ्रमित करके सीसीएम के चेंबर में भेजा गया था. यह मामला अब तक अनसुलझा है, क्योंकि इसमें यूनियन की संबंधित महिला पदाधिकारी, जिसके नाम से यूनियन द्वारा सीसीएम अजीत सक्सेना के विरुद्ध महिलाओं के साथ कथित तौर पर बदसलूकी करने की शिकायत दर्ज कराई गई थी, आज तक पुलिस के सामने अपना बयान दर्ज कराने भी नहीं प्रकट हुई है.

    इसके बाद यूनियन ने सीसीएम अजीत सक्सेना के विरुद्ध रिवाल्वर लेकर चलने और कथित रूप से रिवाल्वर दिखाकर स्टाफ को धमकाने के एक दस साल पुराने मामले, जिसमें पुलिस की फाइनल रिपोर्ट लग चुकी थी, को कोर्ट के माध्यम से खुलवाया. हालांकि पुलिस ने पुनः इस मामले में तथ्यहीनता की रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर दी है, जिससे इस मामले में अब कोई तथ्य नहीं रह गया है. इन तमाम तिकड़मों और पैंतरों से जब यूनियन सीसीएम अजीत सक्सेना से कोई पार नहीं पा सकी, तब उसने बहुत चुपके से 28 अक्टूबर 2016 को मदुरै के एक वकील से अजीत सक्सेना के विरुद्ध सीबीआई को यह शिकायत भेजवाई कि सरकारी अधिकारी होते हुए भी अजीत सक्सेना द्वारा अवैध रूप से एक एनजीओ चलाया जा रहा है. इस शिकायत में अजीत सक्सेना पर घिनौना आरोप लगाया गया कि उक्त एनजीओ के माध्यम से छोटी-छोटी बच्चियों का शोषण और अकूत धन एकत्रित किया जा रहा है. इसके आलावा भी उक्त शिकायत में अन्य तमाम अनर्गल आरोप अजीत सक्सेना पर लगाए गए थे.

    सीबीआई ने उक्त शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की, क्योंकि रेलवे बोर्ड से उसे पता चल गया था कि अजीत सक्सेना ने उक्त एनजीओ के लिए बाकायदा रेलवे से पूर्व अनुमति ले रखी है और उसके तहत ऐसा कोई काम नहीं क्या जा रहा है, जो नियम और कानून के विरुद्ध हो. इसके बाद सीबीआई ने उक्त शिकायत को रेलवे बोर्ड के पास भेज दिया, जिसे रेलवे बोर्ड ने दाखिल दफ्तर कर दिया था. मगर जब किसी शिकायत के पीछे किसी अधिकारी और प्रशासन को ब्लैकमेल करने का इरादा छिपा हो, तो शिकायतकर्ता के पीछे लगी हुई शक्ति चुप कैसे बैठ सकती है? इसके परिणामस्वरूप उक्त कथित वकील के जरिए मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच के समक्ष सीबीआई को प्रतिवादी बनाते हुए चुपचाप एक रिट पिटीशन दाखिल करवाई गई, जिसमें याचिकाकर्ता वकील द्वारा कोर्ट से यह मांग की गई कि सीबीआई ने उसकी शिकायत पर उचित संज्ञान नहीं लिया, लिहाजा सीबीआई को उचित निर्देश दिया जाए.

    बहरहाल, मदुरै बेंच ने 24 नवंबर 2016 को वकील की याचिका पर सीबीआई को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर शिकायत में उठाए गए मुद्दों की जांच करे और तदनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करे. (पढ़ें- नीचे पूरा कोर्ट ऑर्डर). तारीफ यह है कि इस रिट पिटीशन के बारे में इस दरम्यान रेल प्रशासन अथवा अजीत सक्सेना को कानोकान कोई भनक भी नहीं लगने दी गई, जबकि यूनियन को मदद करने के लिए इसकी संपूर्ण धुरी चेन्नई से एसडीजीएम और सीपीओ द्वारा घुमाई जा रही थी. इसकी जानकारी रेल प्रशासन को तब लगी, जब अजीत सक्सेना का बतौर मेंबर टेक्निकल, रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में चयन हो गया और उनका पोस्टिंग ऑर्डर निकालने वाला था. तभी उक्त वकील के जरिए रेलवे बोर्ड सहित रेलमंत्री को मदुरै बेंच के ऑर्डर की प्रति सहित एक पत्र लिखवाया गया कि अजीत सक्सेना को सेमी-जुडिशियल पद पर कैसे भेजा जा सकता है, जबकि कोर्ट ने उनके विरुद्ध सीबीआई को जांच का आदेश दे रखा है.

    अब तक कभी-भी अपने विवेक का इस्तेमाल न करने वाले रेलमंत्री ने बिना कोई विचार किए उक्त वकील के इस पत्र के आधार पर अजीत सक्सेना का आरसीटी में पोस्टिंग ऑर्डर रोक दिया. रेलमंत्री अथवा रेलवे बोर्ड ने यह भी नहीं देखा कि हाई कोर्ट मदुरै बेंच के ऑर्डर में रेलवे को कोई निर्देश नहीं दिया गया था. जो भी निर्देश था, वह सीबीआई को था और कोर्ट द्वारा सीबीआई को भी दी गई मियाद बहुत पहले खत्म हो चुकी थी.

    रेलमंत्री ऐसी ही गलती वरिष्ठ आईआरटीएस अधिकारी संदीप साइलस के एचएजी प्रमोशन को लेकर भी कर चुके हैं. जब सीवीसी ने श्री साइलस को क्लीन चिट दे दी थी, तब रेलमंत्री को उनकी फाइल पर पुनः सीबीआई से ओपिनियन मांगने को कहने का कोई औचित्य नहीं था. सीबीआई, सीवीसी के मातहत है, यह रेलमंत्री को मालूम होना चाहिए. यदि इतना भी ज्ञान रेलमंत्री को नहीं है, तो उन्हें रेलमंत्री के संवैधानिक पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं बनता है. वैसी भी अपने पास कोई अधिकार न रखकर ‘मिस्टर क्लीन’ बने रहने और रेलवे में चौतरफा भ्रष्टाचार और मनमानी चलने की खुली छूट देने वाले रेलमंत्री की रेलवे बोर्ड में सुनता या मानता ही कौन है?

    बहरहाल, अब जब रेलवे बोर्ड ने उक्त वकील की तमाम आपत्तियों को दरकिनार करके अजीत सक्सेना का आरसीटी में पोस्टिंग ऑर्डर निकाल दिया है, तब यूनियन की तरफ से पुनः उन्हें रोकने के लिए मद्रास हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका लगवाई गई है. इस जनहित याचिका में भी यही कहा गया है कि सीबीआई को मदुरै बेंच द्वारा दिए गए जांच निर्देश के अनुसार अजीत सक्सेना की आरसीटी में पोस्टिंग उचित नहीं है. इस याचिका पर सोमवार, 27 मार्च यानि आज सुनवाई होने वाली है.

    कानून का इस्तेमाल और न्याय पाने का अधिकार सबको है. मगर जब धनबल से कानून का इस्तेमाल किया जाए और न्याय को खरीदने की कोशिश होती नजर आए, तथा इसी तरह जब पूरी व्यवस्था को ब्लैकमेल करने की कोशिश की जाए, तब इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किए जाने की जरुरत पैदा हो जाती है. यूनियन द्वारा यह कोशिश बार-बार की जाती रही है और रेल प्रशासन उसकी इन तमाम कोशिशों से बखूबी वाकिफ भी रहा है. परंतु रेल प्रशासन द्वारा अब तक यूनियन को काबू में रखने की कोई कोशिश होती नजर नहीं आई है.

    क्या अजीत सक्सेना ने रेलवे के नियम-कानून के मुताबिक काम करने की कोशिश अपने व्यक्तिगत हित में की थी? यदि नहीं, तो फिर यूनियन की तमाम दुष्टताओं और प्रताड़नाओं से जूझने के लिए रेल प्रशासन ने उन्हें अकेला क्यों छोड़ दिया है? अब इस बात पर रेल प्रशासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि जोनल संगठनों से रिटायर्ड पदाधिकारियों को निकाल बाहर किया जाए. इसकी व्यवस्था उसी तरह से की जानी चाहिए जिस तरह मंडल स्तर पर मान्यताप्राप्त संगठनों में रिटायर्ड रेलकर्मियों को पदाधिकारी नहीं रखे जाने का प्रावधान है. इसके अलावा यदि किसी यूनियन द्वारा इसी प्रकार रेल प्रशासन और अधिकारियों को ब्लैकमेल किया जाता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब रेल प्रशासन को अपना काम करना मुश्किल हो जाएगा.

    Before the Madurai Bench of Madras High Court

    M. Ramesh - Petitioner
    Vs.
    The Central Bureau of Investigation (CBI) - Respondent

    Prayer : Writ Petitions filed Under Article 226 of the Constitution of India, to issue a Writ of Man -directing the respondent to consider the petitioner’s representation dated 28.10.2016 seeking to ensure the benefit of public and welfare of innocent girl children from being exploited by false claims and after due investigation into the financial transactions of Bharanagth trust, take such appropriate legal actions to uphold rule of the raw and prevent abuse of official position.

    For Petitioner: Mr. Veeralathiravan, senior counsel
    For M/s. C. Selvakumar
    For Respondent: Mr. S. Jayakumar
    Special Public Prosecutor for CBI Cases

    ORDER

    Order of the Court was delivered by M. Y. Muralidaran, J.

    The writ petitioner, who is a practicing advocate of this court has filed the above writ petition for issuing a writ of Managing directing the respondent to consider the petitioner's representation dated 28.10.2016 seating to ensure the benefit of public and welfare of innocent girl children from being exploited by false claims, and after due investigation into the financial transactions of Sharangath Trust take such appropriate legal actions to uphold rule of law and prevent abuse of official position.

    2. The case of the petitioner is that he is a resident of Madurai and doing service to General Public and he is an Advocate by profession and practicing in this court and other Courts in and around of Madurai. He has filed the present Public Interest Litigation writ petition for the welfare of the general public in Tamil Nadu and there is no personal interest. He is spending out of his own funds and there is no outside fund.

    3. The case of the petitioner is that he came to understand that a senior official of Southern Railway in Chennai is using his official position and asking donations in the alleged name of helping girl children of vulnerable age group claiming that he is an additional secretary in the government of India. On his verification, this writ petitioner came to know that the said person by namely Mr. Ajeet Saxsena, who in presently working as Chief commercial Manager of Southern Railway, Head Quarterer at Chennai, claiming himself as a devoted disciple of Maha Avatar baba is clandestinely claiming himself is Additional Secretary to the Government of India is including in collecting huge sums from the General Public. In the circumstances, this writ petitioner has sent a representation through email dated 28.07.2016 at 3.13 p.m. during his official working hours from the mail ID of Ajeet Saxena (ajeet_hotmail.com) sent all over India, wherein he concealed his official position as chief commercial manager of southern railway, but introduced himself as a person holding the post in the rant of additional Secretary to Government of India at Chennai by citing his qualification as an IIT graduate joined in Civil Service through IAS exam of 1982.

    4. The writ petitioner also states that the intention to hides his present position but at the same time creating an impression that, he is in Civil Service as an IAS holding Additional Secretary rank to Government of India is only to create an impression among public that he is a senior officer in Government of India, which may help to collect huge money from the public, mating an appeal for donation/money contribution in order to provide assistant to needy girl children this specific aspect needs deeper investigation to find out any illegal/illicit reason behind helping only girl children through his trust Sharanaghath Foundation.

    5. The writ petitioner also states that the said officers claims that he is operating in the name of providing succor to the children’s of Vidarbha farmers but stray from that aim and deviate into providing assistance to only girl children and his utopian thinking pf providing high-quality education seems to be only with an intention to collect huge money from the donors as he himself mention in his email that for a student it may require about 1.5 lakhs tuition fees and Rs. 4,500/-p.m. for Hostel fees all these seems to justify the collection of huge sum illegally. His -- Government or the Income Tax Department. Thus, Ajeet Saxena’s activities should be monitored and the money transaction to his trust Sharanaghath Foundation should be probed seriously to find out whether the contributions are genuine or tainted and whether any violation of FEMA taking place in this connection.

    6. Though working in Chennai for the last more than a decade Ajeet Saxena’s so-called activities seem to be centered around in Maharashtra only, which will deter the donor’s from physically verifying the fact. Also by mentioning only about helping girl children appears to be a trick to induce the individual donor who is sexually desired to venture out to a distant place in Maharashtra so that he can lay hands on a poor girl through his donation and such a person with these sort of intention will not bother about the credentials of the Trust or its IT exemption etc. Therefore, the writ petitioner stated that for all these above presumptions/facts justify that the nation’s highest investigation agency (CBI) needs to put its act together in order to unearth the illegal activities of Ajeet Saxena and take suitable action in order to save the public money, poor girl children and the image of the Government. He has also sent a representation dated 28.10.206 to the respondent with a request to take action against the said, Mr. Ajeet Saxena.

    7. The writ petitioner stated that the inaction of the respondent offends the right under article 21 of the Constitution of India and hence the writ petitioner has filed the writ petition for the above prayer on the gound that there is a statutory duty caused on the respondent to consider the petitioner’s representation dated 28.10.2016.

    8. On behalf of the respondent Mr. S. Jayakumar, learned special public prosecutor for CBI cases appeared, but no counter affidavit has been filed.

    9. Heard Mr. Veerakathiravan, learned senior counsel appearing for the petitioner and Mr. S. Jayakumer, learned special public prosecutor for CBI cases, appearing for the respondent.

    10. Admittedly, the petitioner who is practicing an Advocate has filed the writ petition for a general public cause. Ti is the case that the alleged person by namely Shree Ajeet Saxena, who is working as chief commercial manager, Southern Railway, Chennai, claiming himself as a devoted disciple of Maha Avatar Baba is clandestinely claiming himself as Additional Secretary to the Government of India is indulging in collecting huge sums from the general public as donation in the name of Sharangaghath Foundation. But, there were no details in the registration in respect of the said foundation.

    11. The writ petitioner has sent a representation on 28.10.2016 to the respondent narrating the entire activities of the Ajeet Saxena to the respondent/CBI and also by way of Email dated 28.07.2016 by way of representation dated 28.10.2016.

    12. When the representations were sent through email and by way of representation take action against the said person, who claiming himself as a devoted disciple of Maha Avatar Baba and also he is working chief Commercial Manager of Southern Railway Chennai, but he made false propaganda that he is working as Additional Secretary to Government of India and allegation of the petitioner is that collecting more money on the ground by saying that to provide assistance to only girl children and his utopian thinking of providing high quality education seems to be only with an intention to collect huge money from the donors for his illegal purpose and activities.

    13. When the Government officials namely the said Ajeet Saxena, who is presently working as Chief Commercial Manager, Southern Railway, Chennai is claiming himself as Additional Secretary to Government of India ans also claiming that he is a devoted disciple of Maha Avatar Baba, which require the investigation of the CBI since as per the allegation set out by the writ petitioner that collectin huge money in the name of unregistered Sharangaghath Foundation and it is bounden duty of the respondent/CBI to take into the investigation and to make through investigation in respect of the above illegal collection and his illegal activities.

    14. In support of his case, the writ petitioner has produced the Judgments passed by the Hon’ble Supreme Court of India reported in 1985 AIR893 and W.P. (PIL) No. 157 of 2011.

    15. In our opinion, if a public officer abuses his official position, either by an act of omission or commission and action should be initiated against such public officer. Where any well-established policy or norm has been flouted, such exercise of power amounts to misuse of power. Public accountability is the necessary component of a public office. This case the said Ajeet Saxena has allegedly misused his power and collecting money which may amount to corruption and the same is an abuse of public resources for private gain. A breach of statutory duty does give rise in public law to liability which has come to he was known as misfeasance in public office and which includes malicious abuse of power.

    16. The respondent, who is the Central Bureau of Investigation is the authority to enquire or investigate into such serious allegations against the said Government officials and the investigation authority namely the respondent should not keep the complaint sent by the writ petitioner pending without action, and necessary inquiry or investigation.

    17. We also make clear that the alleged activities of the said official may constitute a clear abuse of his official powers. Innocent girl children with his unregistered Sharanghat Foundation requires through investigation and further action.

    18. Therefore, in the interest of the public, we direct the respondent/CBI to consider the petitioner’s complaint through bail dated 28.07.2016 and the written complaint dated 28.10.2016 within a period of three months from the date of receipt of a copy of this order. No costs.

    Sd/-
    Assistant Registrar

    Sub Assistant Registrar

    To,
    The Director, Central Bureau of Investigation (CBI)
    Plot No. 5-B, CGO Complex,
    Lodhi Road, New Delhi-110003.
    Cc to Mr. C. Selva Kumar, Advocate Sr. No. 72362
    Wp (MD) No. 21214 of 2016, dtd. 24.11.2016

सम्पादकीय