घनश्याम सिंह को आखिर बार-बार क्यों अनुमति दी जा रही है दिल्ली आने की?

    डी.ए. को बाईपास करके फाइल वाया विजिलेंस सीवीसी को भेजे जाने का प्रयास

    जांच एजेंसी ने उत्तर रेलवे की 50एमडब्ल्यू सोलर पैनल खरीद की फाइल उठाई

    जीएम/एमटीआर की नियुक्ति प्रक्रिया जारी है -प्रदीप कुमार, मेंबर स्टाफ/ट्रैक्शन

    सुरेश त्रिपाठी

    मेंबर ट्रैक्शन, रेलवे बोर्ड ए. के कपूर को रिटायर हुए और इसका अतिरिक्त चार्ज मेंबर स्टाफ प्रदीप कुमार को सौंपे हुए 21 दिन बीत चुके हैं, परंतु अब तक रेलवे बोर्ड द्वारा मेंबर ट्रैक्शन की नियुक्ति का अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका है. इसके अलावा इतना समय जीएम/प.रे. जी. सी. अग्रवाल एवं डीजी/आरडीएसओ पी. के. श्रीवास्तव को सेवानिवृत्त हुए भी हो चुका है, और इतना ही समय जीएम/मेट्रो रेलवे, कोलकाता का अतिरिक्त चार्ज जीएम/उ.म.रे. एम. सी. चौहान को सौंपे भी हो चुका है, जिन्हें लेटरल शिफ्टिंग में जीएम/उ.म.रे. बना दिया गया है. तथापि, उक्त चारों पदों पर योग्य वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्तियों का अब तक कुछ अता-पता नहीं है.

    इस दरम्यान रेलवे बोर्ड के विश्वसनीय सूत्रों से ‘रेलवे समाचार’ को पता चला है कि पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक घनश्याम सिंह को सीआरबी उर्फ ‘स्टोरकीपर’ द्वारा दिल्ली आने की बार-बार अनुमति दी जा रही है. सूत्रों का यह भी कहना है कि कई बार तो हफ्ते में दो बार भी घनश्याम सिंह अपना मुख्यालय छोड़कर दिल्ली आ रहे हैं. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि घनश्याम सिंह मेंबर ट्रैक्शन, रेलवे बोर्ड पद के प्रमुख दावेदारों में से एक हैं.

    आखिर सीआरबी द्वारा बार-बार घनश्याम सिंह को दिल्ली आने की यह अनुमति क्यों दी जा रही है? इस सवाल के जवाब में रेलवे बोर्ड के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने उनका नाम उजागर न किए जाने की शर्त पर बताया कि वास्तव में उन्हें यह अनुमति दिल्ली आकर अपने लिए जोड़तोड़ करने के लिए दी जा रही है, जिससे कि वह हर बार की तरह इस बार भी जोड़तोड़ करके उच्च पद हासिल करने में कामयाब हो जाएं. जानकारों का कहना है कि घनश्याम सिंह का इस दरम्यान दिल्ली आने-जाने का टीए/डीए चेक कराया जाना चाहिए.

    रेलवे बोर्ड के उक्त वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ही कई जानकारों का भी यही कहना है कि सीआरबी द्वारा विवादस्पद जीएम घनश्याम सिंह का फेवर किया जा रहा है, यह बात उन्हें बार-बार दिल्ली आने की अनुमति दिए जाने से भी सही साबित हो रही है. जानकारों का यह भी कहना है कि सीआरबी द्वारा रेलवे का पूरा-पूरा बंटाधार किया जा रहा है, यह बात पीएमओ द्वारा लिखी गई चिट्ठी से भी साबित हो रही है, तथापि मंत्री और पीएमओ के कान में जूं नहीं रेंग रही है. इसके अलावा जानकारों ने यह भी कहा कि वर्तमान गतिविधियों के मद्देनजर सरकार कुछ भी कर सकती है, यहां तक कि सर्वाधिक विवादस्पद और भ्रष्ट माने जा रहे घनश्याम सिंह को वह अंततः सभी विरोधों और सीवीसी/सीबीआई की भावना एवं जनभावनाओं को दरकिनार करके मेंबर ट्रैक्शन भी बना सकती है.

    इस बीच ‘रेलवे समाचार’ को यह भी पता चला है कि उत्तर रेलवे में 50 मेगा वॉट के सोलर पैनल्स की खरीद से संबंधित फाइल को एक जांच एजेंसी ने गत सप्ताह अपने कब्जे में ले लिया है. यह फाइल उत्तर रेलवे विजिलेंस ने उठाई है या रेलवे बोर्ड विजिलेंस अथवा सीबीआई ने, इसकी पुष्टि फिलहाल नहीं हो पाई है. परंतु फाइल उठाए जाने की पुष्टि एक अत्यंत वरिष्ठ अधिकारी ने की है, यह बात सही है. ज्ञातव्य है कि 50 मेगा वॉट सोलर पैनल्स की खरीद से संबंधित टेंडर कमेटी (टीसी) की सिफारिशों की एक्सेप्टिंग अथॉरिटी तत्कालीन चीफ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर, उत्तर रेलवे घनश्याम सिंह ही थे. सूत्रों का कहना है कि उक्त टेंडर में बड़े पैमाने पर जोड़तोड़ और भ्रष्टाचार हुआ है. इसी आशंका से संबंधित शिकायत पर उक्त फाइल को जांच एजेंसी से अपने कब्जे में लिया है.

    इसके अलावा ‘रेलवे समाचार’ को रेलवे बोर्ड के अपने विश्वसनीय सूत्रों से यह भी पता चला है कि सीआरबी द्वारा घनश्याम सिंह के डीएंडआर मामले में अनुशासनिक अधिकारी (मेंबर ट्रैक्शन) को बाईपास करके सीवीसी द्वारा भेजी गई फाइल पर एडवाइजर विजिलेंस, रेलवे बोर्ड से आवश्यक टिप्पणी लिखाकर उक्त फाइल वापस सीवीसी को भेजे जाने का प्रयास किया जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि इस बार मेंबर स्टाफ/ट्रैक्शन प्रदीप कुमार किसी भी दबाव आकर कोई अनुचित टिप्पणी लिखने के मूड में नहीं हैं. इसी बात की आशंका को भांपकर उन्हें बाईपास किया जा रहा है, जो कि घनश्याम सिंह के फेवर में जा रहा है अथवा यह कहना शायद ज्यादा उचित होगा कि ऐसा उन्हीं (घनश्याम सिंह) की एडवाइस पर ही किया जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि यही उनके बार-बार दिल्ली आने और जोड़तोड़ करने/करवाने का वास्तव में एक पुख्ता प्रमाण भी है.

    इस संबंध में रेलवे विजिलेंस मामलों के एक घनिष्ठ जानकार और रेलवे बोर्ड के एक पूर्व मेंबर का कहना है कि यदि मामला तकनीकी नहीं है, तो संबंधित अधिकारी को फेवर करने के लिए सीआरबी द्वारा ऐसा किया जा सकता है. यानि अनुशासनिक अधिकारी (डी. ए.) को बाईपास करके उक्त फाइल वाया एडवाइजर विजिलेंस सीवीसी को भेजी जा सकती है. उनका कहना था कि यदि मामला तकनीकी है, तो तकनीकी तौर पर ऐसा नहीं किया जा सकता है. मगर जुमलेबाजी में उलझी इस सरकार और बिना काम के रेलमंत्री तथा इस अनभिज्ञ सीआरबी द्वारा कुछ भी किया जा सकता है, यह टिप्पणी भी इस पूर्व बोर्ड मेंबर ने की है.

    उधर पूर्वोत्तर रेलवे, गोरखपुर के दौरे पर गए मेंबर स्टाफ, रेलवे बोर्ड प्रदीप कुमार, जिनके पास फिलहाल मेंबर ट्रैक्शन का भी अतिरिक्त प्रभार है, से प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ‘रेलवे समाचार’ के गोरखपुर ब्यूरो चीफ विजय शंकर श्रीवास्तव द्वारा जब यह सवाल पूछा गया कि आप मेंबर स्टाफ होने के साथ ही मेंबर ट्रैक्शन का भी अतिरिक्त चार्ज देख रहे हैं, तो कृपया बताएं कि तीन जीएम और मेंबर ट्रैक्शन की नियुक्ति में इतना विलंब होने का कारण क्या है? ‘रेलवे समाचार’ के इस सवाल के जवाब में प्रदीप कुमार ने कहा कि वह फिलहाल इतना ही कह सकते हैं कि उक्त पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है. हालांकि उन्होंने अपनी बात को थोड़ा और स्पष्ट करते हुए आगे यह भी कहा कि जितना बड़ा पद होता है, उसकी नियुक्ति की प्रक्रिया और जिम्मेदारी भी बड़ी होती है, इसलिए इन सब बातों का ख्याल रखते हुए इनकी नियुक्ति जल्दी ही कर दी जाएगी.

    फोटो परिचय : पूर्वोत्तर रेलवे, गोरखपुर के महाप्रबंधक सभाकक्ष में सोमवार, 20 मार्च को प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया कर्मियों को संबोधित करते हुए मेंबर स्टाफ/ट्रैक्शन, रेलवे बोर्ड प्रदीप कुमार. उनके साथ हैं बाएं महाप्रबंधक, पूर्वोत्तर रेलवे राजीव मिश्र एवं दाएं अपर महाप्रबंधक योगेश अस्थाना एवं मुख्या जनसंपर्क अधिकारी संजय यादव.

    इस अवसर पर ‘रेलवे समाचार’ द्वारा प्रदीप कुमार से यह भी पूछा गया कि आप खुद मेडिकल विभाग के सर्वोच्च अधिकारी हैं. ऐसे में कृपया यह बताएं कि रेलवे अस्पतालों और रेलवे स्वास्थ्य केंद्रों में सैकड़ों डॉक्टर 15-20-25 सालों से एक ही जगह आखिर क्यों जमे हुए हैं, क्या उनके पीरियोडिकल ट्रांसफर की कोई पालिसी नहीं है? कोई डॉक्टर 20 साल में पांच-छह बार ट्रांसफर हो रहा है, जबकि कई डॉक्टर्स इससे भी ज्यादा लंबे समय से एक ही यूनिट में जमे हुए हैं. क्या इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं मिल रहा है?

    ‘रेलवे समाचार’ के इस महत्वपूर्ण सवाल के जवाब में मेंबर स्टाफ प्रदीप कुमार ने कहा कि ऐसा तो नहीं है, डॉक्टर्स के ट्रांसफर की भी एक पालिसी रेलवे बोर्ड ने बनाई हुई है. उन्होंने अपनी बात को थोड़ा स्पष्ट करते हुए कहा कि डॉक्टर्स के साथ थोड़ी अलग स्थिति है. उनका कहना था कि जिस प्रकार किसी व्यक्ति या परिवार का अपने फेमिली डॉक्टर के साथ जुड़ाव होता है, उसी प्रकार मरीज का भी अपने डॉक्टर के साथ एक जुड़ाव होता है, वह उसी डॉक्टर से अपना इलाज कराना चाहते हैं, जिस पर उनका भरोसा जम जाता है. तथापि वह यह भी देखेंगे कि ऐसा न हो जैसा ‘रेलवे समाचार’ ने उल्लेख किया है.

    हालांकि मेंबर स्टाफ प्रदीप कुमार बड़ी सफाई से डॉक्टर-मरीज का रिश्ता बताकर सवाल के मर्म को टाल गए. मगर यह बात तो पूरी भारतीय रेल में जग-जाहिर ही है कि पूर्वोत्तर रेलवे सहित पूरी भारतीय रेल में सैकड़ों डॉक्टर्स एक ही यूनिट में बीसों साल से जमे हुए हैं, जिसकी वजह से भारतीय रेल का मेडिकल विभाग भारी भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है. पूर्वोत्तर रेलवे में जहां सीएमडी द्वारा चुन-चुनकर और ‘ओब्लाइज’ न करने वाले डॉक्टर्स के ट्रांसफर के प्रस्ताव टुकड़ों में जीएम को भेजे जा रहे हैं और दवाईयों की खरीद की फाइल पिछले छह महीनों से अपने पास दबाए रखकर मात्र 30-35% उपलब्ध दवाईयों और लोकल परचेज से काम चलाया जा रहा है, वहीं अन्य रेलों में भी यह स्थिति बहुत अलग नहीं है. यह सब भरी प्रेस कांफ्रेंस में मेंबर स्टाफ को बताकर उन्हें ‘क्रिटीसाइज’ करने का ‘रेलवे समाचार’ का कोई इरादा नहीं था, क्योंकि ‘रेलवे समाचार’ का मानना है कि मेंबर स्टाफ और जीएम सहित वहां उपस्थित सभी विभाग प्रमुखों को इस सवाल से ही मामले की गंभीरता का अंदाज अवश्य हो गया होगा.

सम्पादकीय