रेल बजट पर जन-चर्चा और पारदर्शिता समाप्त

    एक लाख करोड़ का सेफ्टी फंड बनाने की घोषणा पर भी स्पष्टता नहीं

    आम बजट में 5-10 मिनट के उल्लेख पर ही खत्म हो गया रेल बजट

    रेलवे पीएसयू की शेयर बाजार में लिस्टिंग से हो रही है रेलवे के निजीकरण की शुरुआत

    सुरेश त्रिपाठी

    पिछले कुछ महीनों के दौरान हुई कई बड़ी रेल दुर्घटनाओं की छाया इस बार के ‘शार्ट’ रेल बजट पर स्पष्ट रूप से दिखाई दी. 92 वर्षों से चली आ रही अलग रेल बजट की परंपरा को समाप्त करके सामान्य बजट में समाहित हुआ रेल बजट मात्र 5-10 मिनट के उल्लेख पर ही खत्म हो गया. किसी की भी समझ में नहीं आया कि यात्रियों को क्या मिला, क्या नहीं. बजट में हालांकि एक लाख करोड़ रुपए का ‘राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष’ बनाए जाने की घोषणा हुई और कहा गया कि प्रतिवर्ष 20 हजार करोड़ रुपए इसके अंतर्गत रेल संपत्तियों पर खर्च किए जाएंगे, परंतु यह 20 हजार करोड़ कहां से आएंगे, इसमें सरकार, रेल मंत्रालय और रेल यात्रियों की कितनी-कितनी भागीदारी होगी, इस पर कोई स्पष्टता नहीं की गई. इसके अलावा काकोड़कर समिति ने जो 8.70 लाख करोड़ का सेफ्टी फंड बनाए जाने का प्लान सौंपा हुआ है, उसके सामने बजट में सिर्फ एक लाख करोड़ का सेफ्टी फंड बनाने और रेलवे ने जो 1.19 लाख करोड़ का आतंरिक सेफ्टी फंड बनाए जाने का प्लान सौंपा हुआ है, इन सब में इतना भारी-भरकम अंतर क्यों है?

    परंतु इस बजट के जरिए सरकार द्वारा यह संदेश देने का अवश्य प्रयास किया गया है कि रेलवे की आर्थिक दशा-दिशा सुधारने और इसको पटरी पर वापस लाने के लिए इसके आधुनिकीकरण और रेल एवं यात्री संरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. बजट में किसी बड़ी रेल परियोजना की घोषणा नहीं की गई है. इसके साथ ही यात्री किरायों में भी कोई परिवर्तन नहीं किया गया है. इसके पीछे शायद सरकार की मंशा यह है कि संरक्षा सेस लगाकर वैसे ही यात्री किराए बढ़ जाएंगे. हालांकि रेल यात्रियों को ई-टिकट पर सर्विस चार्ज खत्म करके थोड़ी राहत देने का प्रयास किया गया है. मगर यह चार्ज खत्म करने की घोषणा तो सरकार पहले ही कर चुकी थी, ऐसे में इसे राहत कहा जाना शायद सही नहीं होगा.

    इस बार का रेल बजट लगभग 1.31 लाख करोड़ रुपए का है. इसमें 55 हजार करोड़ उपाए बजटीय सहायता दिए जाने की बात कही गई है. जो कि नाकाफी है, क्योंकि यह पिछली बार की बजटीय सहायता से सिर्फ 10 करोड़ रुपए ही ज्यादा है. इसका मतलब है कि रेलवे को अब भी अपनी कमाई पर केंद्र सरकार को लाभांश की अदायगी करनी होगी. रेल बजट में साफ-सफाई, आधुनिकीकरण और एकाउंटिंग रिफार्म पर जोर दिया गया है. इंटीग्रेशन होने के कारण रेल बजट के सभी प्रावधान जनता के सामने नहीं आ सके हैं. अब डिमांड ऑफ ग्रांट के तहत किए गए प्रावधानों से ही यह उजागर हो सकेगा कि रेलवे की परियोजनाएं क्या हैं और उनके लिए कितनी-कितनी राशि का प्रावधान किया गया है. इस प्रकार रेल बजट की पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है. तथ्पी, राज्यवार राशि का सोशल मीडिया में उछाला देकर यह जताने की कोशिश की गई है कि सभी राज्यों पर भारी अहसान किया गया है.

    रेल बजट में रेलवे के आधुनिकीकरण के लिए कई प्रयासों का जिक्र किया गया है. तथापि, आधुनिकीकरण के लिए जिन कार्यों का उल्लेख किया गया है, उनमें से ज्यादातर कार्य पहले से चल रहे हैं. उनमें थोड़े से विस्तार और हेरफेर के साथ उनके नए नामकरण सहित उनका आधुनिकीकरण किए जाने की बात कही गई है. यही स्थिति उलझाने वाली है. पिछले ढ़ाई-तीन सालों में किसी नई रेल परियोजना को शुरू किए जाने के बजाय लगभग सभी पुरानी परियोजनाओं का नाम बदल-बदलकर सोशल मीडिया के जरिए सस्ती लोकप्रियता लूटने और मिथ्या प्रचार के ही प्रयास ज्यादा किए गए हैं. बुनियादी अथवा ढ़ांचागत कोई सुधार किए जाने के बजाय स्टेशनों पर एस्केलेटर, लिफ्ट, रैंप इत्यादि बनाकर यात्रियों को भरमाने का प्रयास इस दरम्यान ज्यादा हुआ है.

    यही स्थिति चलती गाड़ियों में और रेलवे स्टेशनों पर साफ-सफाई की भी है. इसकी लगभग पूरी तरह आउट सोर्सिंग कर दी गई है, जिसके चलते न सिर्फ कीमती रेल राजस्व अथवा जनता की गाढ़ी कमाई का अपव्यय हो रहा है, बल्कि यात्रियों को समुचित सफाई सुविधा भी नहीं मिल पा रही है. अब इसी के तहत एक नई योजना के रूप में ‘कोच मित्र सर्विस’ शुरू करने की घोषणा की गई है. कहा गया है कि यह कोच मित्र रेल यात्रियों की प्रत्येक समस्या का समाधान करेगा. इसके लिए यह तर्क दिया गया है कि अब तक अलग-अलग समस्या के लिए यात्री को अलग-अलग रेल अधिकारियों या कर्मचारियों से संपर्क करना पड़ता था, परंतु अब इस रेल मित्र के रूप में एक ही अधिकारी गाड़ी में नियुक्त होगा, जो कि यात्रियों की टिकट से लेकर गाड़ी में साफ-सफाई सहित हर समस्या का समाधान मुहैया कराएगा, जिन्न की तरह..

    पांच साल के लिए राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष में एक लाख करोड़ रुपए का बंदोबस्त किया गया है. इसमें प्रतिवर्ष 20 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे. इसमें 5 हजार करोड़ रुपए केंद्र सरकार की भागीदारी होगी. बाकी 15 हजार करोड़ रुपए कहां से आएंगे, इस बारे में अब तक कोई स्पष्टता नहीं है. इसका मतलब यही निकाला जाना चाहिए, पिछले बार जब 17 हजार करोड़ रुपए का ऐसा ही संरक्षा कोष बनाया गया था, तब भी सरकार यानि रेल मंत्रालय ने उसमें मात्र 6 हजार करोड़ रुपए की ही भागीदारी की थी. बाकी 12 हजार करोड़ रुपए संरक्षा सरचार्ज लगाकर रेलयात्रियों से ही वसूले गए थे. वह भी अनंत काल तक चलता रहा था. जब आरटीआई के तहत सवाल उठने शुरू हुए थे, तब रेल मंत्रालय ने इसका नाम बदलकर भी कुछ और समय तक इसकी वसूली की थी. वैसा ही कुछ इस बार भी रेलयात्रियों के साथ होने जा रहा है.

    बजट में कहा गया है कि उक्त राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष से वर्ष 2020 तक सभी मानवरहित समपारों पर रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) बना दिए जाएंगे और रेलवे ट्रैक का आधुनिकीकरण किया जाएगा. इस कोष के इस्तेमाल से आईसीएफ निर्मित कोचों की कप्लिंग बदली जाएगी, जबकि वास्तव में एलएचबी कोचों की कपलिंग सुधारने की ज्यादा जरुरत है. यह सही है कि आईसीएफ निर्मित कोच ज्यादा भारी-भरकम होते हैं, मगर उनका रिप्लेसमेंट सिर्फ एलएचबी कोच ही हो सकते हैं, यह मानना सही नहीं है.

    बजट में कहा गया है कि अगले वित्तवर्ष में 3500 किमी. नई रेल लाइन शुरू की जाएगी, जबकि चालू वित्तवर्ष में 2800 किमी. रेल लाइन शुरू की गई है. यह काफी अतिशयोक्ति है. बजट में एसएमएस आधारित ‘क्लीन माई कोच’ सेवा शुरू किए जाने की बात कही गई है, जो कि पहले से चल रही है, इसमें कोई नई बात नहीं है. वर्ष 2019 तक सभी ट्रेनों में बायो-टॉयलेट लगाए जाने की घोषणा स्वागत योग्य है, यदि यह वास्तव में साकार हो जाती है तो. बजट में रेलवे पीएसयू इरकॉन, आईआरएफसी और आईआरसीटीसी को शेयर बाजार में लिस्टिंग कराए जाने की बात से स्पष्ट है कि भारतीय रेल का निजीकरण शुरू किया जा रहा है.

    रेल बजट पर रेलवे बोर्ड के पूर्व मेंबर इंजीनियरिंग आदित्य प्रकाश मिश्रा की पहली प्रतिक्रिया यह थी कि इस पर कुछ कहने के लिए कुछ है नहीं, तो क्या प्रतिक्रिया दी जाए. उनका कहना है कि कुल ढ़ाई-तीन मिनट में निपटा दिए गए रेल बजट में रेलवे के कार्य-निष्पादन (परफोर्मेंस) पर कुछ भी नहीं कहा गया है. इसमें कोई स्पष्टता नहीं है. उनका कहना था कि रेलवे ने गत वर्ष में कितनी लोडिंग की, कितना नया किया, कितनी आमदनी हुई, कितना खर्च हुआ, आदि के बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है. इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि रेलवे की भावी योजनाएं क्या हैं, इस बारे में भी कोई बात नहीं कही गई है. पूरे बजट में रेलवे को कोई खास महत्व ही नहीं दिया गया, जबकि रेल अब तक राष्ट्रीय जीडीपी के साथ जुड़ी हुई है.

    श्री मिश्रा का कहना है कि एक लाख करोड़ रुपए का सेफ्टी फंड बनाए जाने की घोषणा लोगों को धीरज बंधाने के लिए सही हो सकती है, परंतु यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इसमें सरकार और जनता की भागीदारी कितनी होगी. उन्होंने कहा कि इसे एक बेस बनाकर छोड़ दिया गया है. अब जब इसका विस्तृत विवरण सामने आएगा, तभी इसकी स्थिति स्पष्ट हो पाएगी. उनसे जब ‘रेलवे समाचार’ ने यह पूछा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उन्हें भारतीय रेल का भविष्य कैसा लग रहा है, तो इस पर उनका कहना था कि भविष्य अंधकारमय कहना तो ठीक नहीं होगा, मगर यह अवश्य कहा जा सकता है कि भारतीय रेल का भविष्य ‘प्रकाशमान’ नहीं लग रहा है.

    भारतीय रेल की कार्य-निष्पादन क्षमता में कमी आने के पीछे आप क्या वजह देख रहे हैं, यह पूछे जाने पर उनका कहना था कि कोयले की लोडिंग कम हो गई है, क्योंकि कोयले का आयात बंद कर दिया गया है. जबकि रेलवे की 50 प्रतिशत अर्निंग कोयले की ढुलाई से हुआ करती थी. अब जब कोयले की लोडिंग खत्म हो गई है, तब रेलवे इसकी जगह अल्टरनेट जिंसों की ढुलाई नहीं खोज पा रही है. इसके अलावा उनका मानना है कि इसके लिए प्रयास भी जितनी मात्रा में किए जाने होने चाहिए, उतने स्तर पर नहीं किए जा रहे हैं. श्री मिश्रा का कहना है कि गैर-परंपरागत स्रोतों से आय के साधन जुटाने की बात तो हर बार की जाती है, मगर यह हो नहीं पाते हैं. ले-देकर रेलवे की जमीन बेचने या लीज करने पर आकर बात अटक जाती है, जबकि जमीन के मामले में कोई अधिकारी अपना हाथ नहीं फंसाना चाहता, क्योंकि जैसे ही कुछ करने का प्रयास होता है, वैसे ही विजिलेंस केस बन जाता है.

    पूर्व मेंबर इंजीनियरिंग एस. के. विज का कहना है कि एक साल में 20 हजार करोड़ का सेफ्टी फंड दिया जाना एक बड़ी बात है. परंतु सच यह भी है कि इतनी बड़ी राशि एक साल में रेलवे खर्च भी कर पाएगा, इसमें संदेह है. इसके अलावा बजटीय सहायता में 10 हजार करोड़ रुपए का इजाफा किया गया है, मगर उन्हें इस बात की फिलहाल कोई जानकारी नहीं है कि रेलवे को लाभांश अदायगी से मुक्त किया गया है या नहीं. उनका कहना है कि पिछले साल 36 हजार करोड़ दिए गए थे, अब 55 हजार करोड़ की बात कही गई है, तो इस प्रकार बजटीय सहायता 15 हजार करोड़ रुपए होनी चाहिए. ऐसे में यदि 1.31 लाख करोड़ का बजट प्लान है, तो इसमें कुछ तो गोलमाल है, क्योंकि रेलवे का अपना आतंरिक राजस्व अर्जन इतना नहीं है.

    उन्होंने पिछले बजट की बात का स्मरण करते हुए कहा कि गत वर्ष मंत्री जी ने कहा था कि अगले पांच वर्षों में 8.5 लाख करोड़ रुपए का रेलवे में निवेश किया जाएगा. इस प्रकार यदि देखा जाए तो 2.5 लाख करोड़ पीपीपी, जॉइंट वेंचर आदि से आने थे, 2.5 लाख करोड़ रुपए एक्स्ट्रा बजटरी सपोर्ट और 2.5 लाख करोड़ रेलवे को अपने आतंरिक स्रोतों से जमा करना था, जैसे एलआईसी से कर्ज इत्यादि. मगर पिछले ढ़ाई-तीन वर्षों में न तो पीपीपी, जॉइंट वेंचर आदि से और न ही एक्स्ट्रा बजटरी सपोर्ट से आ पाए हैं. उन्होंने कहा कि थोड़ा-थोड़ा करके केंद्र सरकार का 2.5 लाख करोड़ तो आ जाएगा, मगर रेलवे के आतंरिक स्रोतों वाला फंड और बाकी फंड का आना संदिग्ध लग रहा है. उन्होंने कहा कि रेलवे के आतंरिक स्रोत ही जब 35 हजार करोड़ रुपए सालाना हैं, तब उसका उक्त फंड कैसे आ पाएगा, इसमें गोलमाल कहां है, यह सोचने वाली है.

    एक लाख करोड़ के संरक्षा फंड के लिए सालाना 20 हजार करोड़ रुपए कैसे जुटाए जाएंगे, इस सवाल पर श्री विज ने कहा कि जिस तरह पहले यात्रियों पर सेफ्टी सरचार्ज लगाए जाने की अनुमति सरकार ने दे दी थी, वैसा ही इस बार भी किया जाएगा. उन्होंने कहा कि रेलवे ने खुद अपना 1.19 लाख करोड़ का आतंरिक प्लान बनाया हुआ है. यह एक लाख करोड़ रुपए की बात बजट में उसी के अंतर्गत कही गई लगती है. इस प्लान के कागजात रेलवे ने नीति आयोग आदि को सौंपे हुए हैं. उन्होंने कहा कि काकोड़कर समिति के 8.70 लाख करोड़ के सामने रेलवे के 1.19 लाख करोड़ का फंड कोई मायने नहीं रखता है. इसके अलावा दोनों के प्लान में इतना बड़ा अंतर क्यों है, यह समझ के परे है.

    पूर्व मेंबर इंजीनियरिंग आर. आर. जरुहार ने रेल बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि रेल बजट हो गया है, ऐसा तो इस बार कहीं से लग ही नहीं रहा. उन्होंने कहा कि इस बार के बजट में कोई पारदर्शिता नहीं दिखाई दे रही है. उन्हें ऐसा लग रहा है कि पहले जैसी चर्चा रेल बजट पर हुआ करती थी, अब शायद कभी नहीं हो पाएगी. उन्होंने कहा कि ऑपरेटिंग रेश्यो में कमी लाई जाएगी, मगर यह नहीं बताया गया है कि आखिर यह कमी कैसे लाई जाएगी. इस पर कमी लाने के लिए बजट में दो-चार लाइन तो बोलनी पड़ती हैं, मगर वह भी नहीं बोली गई हैं. सेफ्टी के लिए कहा गया है कि हम चीन, जापान और कोरिया से मदद लेंगे, मगर यहां अपने पास जो है, हम उसका ही सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि एक लाख करोड़ के साफ्टी फंड पर भी किसी रोड मैप को उजागर नहीं किया गया है.

    अब तक अलग रेल बजट होने से रेल मंत्रालय और इसके अधिकारियों पर लक्ष्य को हासिल करने के जो दबाव बना रहता था, क्या वह अब भी बना रह पाएगा, इस बार में पूछे जाने पर श्री जरुहार का कहना था कि उन्हें बिलकुल ऐसा नहीं लगता है कि अब भी वह दबाव बना रह पाएगा. उन्होंने कहा कि पहले जिस दिन रेल बजट प्रस्तुत हो जाता था, उसी दिन से सभी विभागों का खाता शुरू हो जाता था. पिंक बुक में सब कुछ स्पष्ट कर दिया जाता था कि किसको क्या करना है. परंतु अब ऐसा शायद ही हो पाएगा. उन्होंने रेलवे के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता के पक्ष में अपनी राय दी. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐसा नहीं मानते हैं कि रेलवे का तुरंत कुछ होने जा रहा है, परंतु यह तो कहा ही जा सकता है कि शेयर बाजार का रास्ता खोलकर भारतीय रेल को निजीकरण की तरफ धीरे-धीरे ढ़केलने की तैयारी शुरू कर दी गई है.

    पूर्व मेंबर इंजीनियरिंग सुबोध जैन का कहना है कि रेल बजट पर क्या प्रतिक्रिया दी जाए, जब कुछ हो ही नहीं रहा है तो क्या कहा जाए. उन्होंने कहा कि सेफ्टी-वेफ्टी कुल मिलकर इस बार का कुल बजट 1.31 लाख करोड़ का है, जबकि पिछले वर्ष यह बिना सेफ्टी-वेफ्टी के 1.21 लाख करोड़ का था. इसी के अंदर यह कहा गया है कि एक लाख करोड़ का सेफ्टी फंड बनाएंगे. इसमें सील्ड कैपिटल जनरल बजट से आएगी, बाकी रेलवे खुद जुगाड़ करेगी. इसका मतलब यदि सालाना 20 हजार करोड़ भी माना जाए, तो यह 1.31 लाख करोड़ में से ही निकालना है. इस प्रकार बचते हैं कुल 1.11 लाख करोड़ रुपए. इसमें भी 10% मुद्रा स्फीति में चले जाएंगे, पिछले साल यह बजता कुल 1.21 लाख करोड़ का था. श्री जैन का कहना है कि इस तरह वास्तविक स्थिति में तो यह बहुत बड़ा फेल्यूर है. उनका कहना है कि जो 55 हजार करोड़ रुपए के बजटरी सपोर्ट की बात की गई है, उसमें से 5 हजार करोड़ रुपए सेफ्टी फंड के लिए हैं. जबकि बाकी 15 हजार करोड़ के लिए रेल मंत्रालय को खुला छोड़ दिया गया कि वह किराया बढ़ाए, या सेफ्टी सरचार्ज लगाए, मगर वह खुद ही इस रकम का बंदोबस्त अपने स्तर पर करे. उन्होंने कहा कि इसके अलावा इस बार के रेल बजट में और कुछ नहीं कहने के लिए.

सम्पादकीय