गुवाहाटी स्टेशन पर चल रहा है करोड़ों रुपए का मनी रिसिप्ट घोटाला

    घोटाले में पकड़े गए बुकिंग क्लर्क को पुनः उसी काउंटर पर पदस्थ किया गया

    पकड़े जाने के डर से बुकिंग क्लर्क को बचाने में जुटे घोटाले में लिप्त अधिकारी

    गुवाहाटी : पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के प्रमुख स्टेशन गुवाहाटी जंक्शन रेलवे स्टेशन पर पिछले दिनों एक बड़ा घोटाला पकड़ा गया, जिसके लिए चंदन आचार्जी नामक बुकिंग क्लर्क को जिम्मेदार माना जा रहा है. प्राप्त जानकारी के अनुसार गुवाहाटी स्टेशन पर कार्यरत टीटीई एवं अन्य स्टाफ द्वारा बेटिकट यात्रियों और अन्बुक्ड लगेज से एकत्रित की गई राशि नियमानुसार कैश बुकिंग ऑफिस में जमा कराई जाती है. यह राशि विशेष रूप से बुकिंग क्लर्क चंदन आचार्जी के बुकिंग काउंटर पर जमा होती रही है. इसके लिए उक्त स्टाफ को उनकी जमा कराई गई राशि के प्रमाण स्वरूप बुकिंग काउंटर से एक मनी रिसिप्ट (एमआर) जारी की जाती है.

    परंतु उक्त यूटीएस टिकट बुकिंग काउंटर से जो रिसिप्ट कॉपी जारी की जाती है, वह ‘एनआई’ के रूप में दर्शाई जाती है. इसके बाद अगला यूटीएस टिकट ‘नॉन इशू’ बता दिया जाता है और इस प्रकार उक्त सारी राशि आरोपी बुकिंग क्लर्क की जेब में चल जाती है. यह घोटाला उक्त विशेष बुकिंग क्लर्क चंदन आचार्जी के पकड़े जाने तक पिछले कई वर्षों से सतत चल रहा था. बताते हैं कि इस गोरखधंधे से चंदन आचार्जी द्वारा अब तक लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों रुपए रेलवे राजस्व से चोरी किए जा चुके हैं. जैसा कि सामान्य तौर पर होता है, उसी तरह इस घोटाले के पकड़े जाने के बाद चंदन आचार्जी को रेल प्रशासन द्वारा निलंबित भी किया गया.

    रेलकर्मियों का सवाल यह है कि चंदन आचार्जी को सिर्फ निलंबित ही क्यों किया गया? उसे इस घोटाले के लिए दर्ज कराई गई एफआईआर के तहत गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? प्राप्त जानकारी के अनुसार करीब दो साल पहले भी ऐसे ही एक मामले में चंदन आचार्जी को विजिलेंस द्वारा पकड़ा गया था. परंतु अपनी अवैध कमाई की बदौलत उसने उक्त मामले को रफादफा करा लिया और रेल प्रशासन द्वारा उसे ड्यूटी पर लेते हुए उसकी पोस्टिंग कामख्या रेलवे स्टेशन पर कर दी गई. बताते हैं कि चंदन आचार्जी एक मान्यताप्राप्त श्रमिक संगठन का प्रमुख पदाधिकारी भी है.

    दो-तीन महीने पहले ही उसे पुनः गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर न सिर्फ पदस्थ कर दिया गया, बल्कि उसे अपने उसी पुराने बुकिंग काउंटर पर काम में लगा दिया गया. कई रेलकर्मियों का कहना है कि वास्तव में तो उसे सबसे पहले गुवाहाटी स्टेशन पर पोस्टिंग ही नहीं मिलनी चाहिए थी, यदि यह मिल भी गई थी, तो भी उसे उसी बुकिंग काउंटर अथवा उसी बुकिंग ऑफिस में नहीं बैठाया जाना चाहिए था. जाहिर है कि इसमें मंडल के कुछ वाणिज्य अधिकारियों की उसके साथ मिलीभगत है.

    सवाल यह उठता है कि गुवाहाटी रेलवे स्टेशन अथवा उसी बुकिंग ऑफिस या बुकिंग काउंटर पर चंदन आचार्जी की पोस्टिंग कैसे हुई? किस अधिकारी ने उसका यह ट्रांसफर किया और किसने उसी बुकिंग ऑफिस/काउंटर में उसके बैठने का रास्ता साफ किया? क्या इस मामले में कुछ विजिलेंस अधिकारी भी शामिल हैं? कमर्शियल इंस्पेक्टर्स और ट्रैफिक एकाउंट्स इंस्पेक्टर्स ने अपनी सही भूमिका का निर्वाह करते हुए उक्त घोटालेबाज को पहले ही क्यों नहीं रंगेहाथ पकड़ा था? उन्होंने प्रॉपर सुपरविजन क्यों नहीं किया? बुकिंग ऑफिस के कोचिंग सुपरवाइजर महोदय क्या कर रहे थे? इस मामले में उनकी क्या भूमिका थी? यह सभी लोग क्या इस घोटाले में शामिल नहीं थे? इन्होंने एनआई टिकट स्टेटमेंट्स की समय पर जांच न करके भारी गलती नहीं की थी? ऐसे और भी तमाम सवाल हैं, जिनका उत्तर अभी मिलना बाकी है.

    इसके अलावा उपरोक्त सभी स्टेशन कर्मियों ने अब तक इस घोटाले पर चुप्पी क्यों साध रखी है? विजिलेंस अथवा रेल प्रशासन द्वारा उपरोक्त सभी स्टेशन कर्मियों से अब तक इस घोटाले पर सवाल क्यों नहीं किए गए हैं? पता चला है कि इस मामले में अब सबसे बड़ा प्रयास यह किया जा रहा है कि ऐसे सभी अधिकारी और कर्मचारी, जो इस घोटाले में शामिल हैं, मिलकर चंदन आचार्जी को बचाने में इसलिए जुटे हुए हैं, क्योंकि यदि चंदन आचार्जी के खिलाफ कोई कार्रवाई की जाती है, तो कई बड़े अधिकारियों की पोल खुलने के साथ ही स्टेशन पर कार्यरत उपरोक्त सभी सुपरवाइजरी स्टाफ के कर्मचारी भी पकड़ में आ जाएंगे.

    प्राप्त जानकारी के अनुसार उपरोक्त तथ्यों की जानकारी चंदन आचार्जी के पकड़े जाने के 10-12 दिनों के अंदर ही विजिलेंस को मिल गई थी. इसके अलावा विजिलेंस द्वारा अभी भी गुवाहाटी स्टेशन से लॉग डाटा एकत्रित किया जा रहा है. कर्मचारियों का मानना है कि यह घोटाला कई करोड़ रुपए का हो सकता है, इसलिए यह मामला विजिलेंस द्वारा अथवा विजिलेंस से हटाकर सीबीआई को अविलंब सौंपा जाना चाहिए, जिससे की रेलवे राजस्व की और ज्यादा हानि होने से रोकी जा सके.

    कर्मचारियों का यह भी कहना है कि इतने बड़े घोटाले की कोई भी खबर स्थानीय असमी मीडिया और अखबारों में कवर नहीं की गई. इसका मतलब यह भी है कि इस घोटाले में लिप्त संबंधित अधिकारियों ने या तो खबर प्रकाशित नहीं होने दी अथवा खबर को पूरी तरह से दबा दिया गया है. उन्होंने कहा कि घोटालेबाजों से भारतीय रेल को बचाया जाना चाहिए, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति की संपत्ति न होकर देश के सवा सौ करोड़ लोगों की संपत्ति है. उनका यह भी कहना है कि प्रत्येक घोटालेबाज को सजा मिलनी चाहिए, फिर वह चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो.

सम्पादकीय