सेफ्टी, सिक्योरिटी और पंक्चुअलिटी

    अब तक के सबसे असफल रेलमंत्री साबित हो रहे हैं वर्तमान रेलमंत्री सुरेश प्रभु

    यदि रेलमंत्री एवं सीआरबी की नीतियां सही हैं, तो भारतीय रेल घाटे में क्यों जा रही है?

    विनोद राय की अध्यक्षता में एक और सेफ्टी कमेटी के गठन का औचित्य क्या हो सकता है?

    सीआरबी द्वारा अपने अलावा बाकी अधिकारियों को मूर्ख समझकर किया जा रहा कार्य-व्यवहार

    भा. रेल में वह सारी फालतू गतिविधियां चल रही हैं, जिनका मुख्य गतिविधि से कोई संबंध नहीं

    भारतीय रेल में सेफ्टी, सिक्योरिटी और पंक्चुअलिटी तीनों न सिर्फ अपने आपमें संपूर्ण बोध वाक्य हैं, बल्कि भारतीय रेल की सबसे पहली प्राथमिकता भी यही है. जबकि वर्तमान में भारतीय रेल से यही तीनों चीजें सिरे से गायब हो गई हैं. सेफ्टी की हालत यह है कि उत्तर मध्य रेलवे के एक ही सेक्शन में लगभग दो महीनों के अंतराल में दो बड़ी और भीषण रेल दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. उधर पूर्व मध्य रेलवे के लगभग सभी मंडलों में पिछले दिनों डिरेलमेंट हुए हैं. मध्य रेलवे में तो यह सिलसिला रुक ही नहीं रहा है, जबकि दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में भी मालगाड़ियों के कई डिरेलमेंट और यात्री ट्रेनों की दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. इसी प्रकार अन्य जोनल रेलों में भी लगातार रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं. रेलवे बोर्ड ने उत्तर मध्य रेलवे के इलाहाबाद मंडल और पूर्व मध्य रेलवे के धनबाद मंडल का सेफ्टी ऑडिट करने के लिए राइट्स की नियुक्ति की है. जबकि जिंदगी भर एक अंकगड़क या अकाउंटेंट की नौकरी करने वाले पूर्व सीएजी विनोद राय की अध्यक्षता में रेलवे बोर्ड द्वारा एक और सेफ्टी कमेटी का गठन किया गया है.

    आखिर इतनी सारी सेफ्टी कमेटियों के गठन से ही क्या रेलवे की सेफ्टी सुधर जाएगी? जबकि शुंगलू, वांचू, खन्ना और काकोड़कर जैसे विषय-विशेषज्ञों की विशेष सेफ्टी रिपोर्ट्स रेलवे बोर्ड की अलमारियों में वर्षों से पड़ी धूल फांक रही हैं. इसके अलावा हाल ही में उत्तर मध्य रेलवे के महाप्रबंधक की अध्यक्षता में सेफ्टी विशेषज्ञ रेल अधिकारियों की एक तीन सदस्यीय सेफ्टी कमेटी का गठन किया गया था, जिसकी रिपोर्ट जल्दी ही रेलवे बोर्ड को सौंपी जाने वाली है. ऐसे में एक विनोद राय की अध्यक्षता में एक और सेफ्टी कमेटी के गठन का औचित्य क्या हो सकता है? इसके अतिरिक्त विनोद राय की सेफ्टी के मामले में विशेषज्ञता क्या है? क्या इसका मतलब यह लगाया जाना चाहिए कि एक अकाउंटेंट अपने जैसे ही दूसरे अकाउंटेंट के अलावा किसी अन्य को रेलवे का विशेषज्ञ मानता ही नहीं है? अथवा यह सारी कवायद पूरी दुनिया सहित पूरे देश की जनता को मूर्ख बनाने के लिए की जा रही है? पूरी भारतीय रेल पिछले ढ़ाई सालों से प्रचार तंत्र पर चल रही है. जबकि इस दरम्यान जमीनी स्तर पर भारतीय रेल में कोई भी सुदृढ़ कार्य नहीं किया गया है.

    रेलमंत्री की यह सारी मूर्खतापूर्ण कवायदें देखकर रेलवे के तमाम वरिष्ठ अधिकारी न सिर्फ खीझ रहे हैं, बल्कि वह अपने बाल नोचने तक की स्थिति में पहुंच गए हैं. जिस तरह रेलवे के बारे में कुछ भी न जानते हुए भी रेलमंत्री स्वयं को रेलवे का विशेषज्ञ समझ रहे हैं, ठीक उसी तरह पुनर्नियुक्त सीआरबी उर्फ स्टोरकीपर द्वारा अपने और अपने कैडर के अलावा बाकी सभी कैडर के रेल अधिकारियों को मूर्ख समझकर कार्य-व्यवहार किया जा रहा है. इसके चलते चालू वित्तवर्ष 2016-17 के पिछले 9 महीनों के दौरान माल लदान में लगभग 92 हजार मीट्रिक टन की कमी आई है और भारतीय रेल लोडिंग के मामले में अपने घोषित लक्ष्य से बहुत पीछे है. जहां गुड्स यार्डो की हालत खस्ता है, वहां न लाइट है, न पानी है, और न ही कोई सही-सलामत अप्रोच रोड ही है, जबकि यहां से भारतीय रेल प्रतिमाह-प्रतिवर्ष करोड़ों-अरबों रुपए की कमाई करती है, वहीं यात्री सुविधा (पैसेंजर एमिनिटी) में लाखों करोड़ रुपए झोंके जा रहे हैं और इस तरह एलआईसी से मिले डेढ़ लाख करोड़ रुपए के कर्ज का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है. क्या इसको इस तरह से समझा जाना चाहिए कि बुनियादी विकास योजनाओं के बजाय यात्री सुविधा के कार्यों में ‘कमीशन’ ज्यादा मिलता है? जबकि वास्तव में इस कर्ज का उपयोग खस्ताहाल रेल लाइनों और माल गोदामों तथा गुड्स यार्डो की हालत सुधारने के लिए किया जाना चाहिए था.

    यदि रेलमंत्री की नजर में पैसा कमाना ही सर्वश्रेष्ठ टारगेट है, तो सर्वप्रथम भारतीय रेल को एक कमर्शियल आर्गेनाईजेशन घोषित किया जाना चाहिए. और यदि रेलमंत्री एवं सीआरबी की नीतियां सही हैं, तो भारतीय रेल घाटे में क्यों जा रही है. विज्ञापनों से कमाई का लक्ष्य चालू वर्ष में करीब 1700 करोड़ रुपए का रखा गया है, मगर यह लक्ष्य न कभी प्राप्त किया जा सकता और न ही आगे कभी प्राप्त किया जा सकेगा. इसका कारण यह है कि रेल अधिकारी रेल चलाने के लिए नियुक्त किए गए हैं, न कि परचून की दूकान चलाने के लिए इनकी नियुक्ति हुई है. यदि रेलवे को विज्ञापनों से कमाई करनी है, तो इसके लिए सबसे पहले इसका एक अलग विभाग बनाया जाना चाहिए और उसके बाद उक्त क्षेत्र के विशेषज्ञ लोगों की नियुक्ति की जानी चाहिए. वर्तमान रेल अधिकारियों को विज्ञापन से कमाई करने का न तो कोई अनुभव है और न ही उन्हें इसका कोई प्रशिक्षण दिया गया है. ऐसे में वह विज्ञापन से कमाई कैसे ला सकते हैं?
    भारतीय रेल की प्रमुख गतिविधि (कोर एक्टिविटी) ट्रांसपोर्टेशन है. मगर इस मुख्य गतिविधि को पिछले ढ़ाई सालों से साइड लाइन में डाल दिया गया है. इसकी जगह भारतीय रेल में वह सारी फालतू गतिविधियां चलाई जा रही हैं, जिनका इसकी मुख्य गतिविधि (ट्रांसपोर्टेशन) से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है. आदर्श और वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन बनाए जा रहे हैं, स्टेशनों पर मॉल और फाइव स्टार रेस्टोरेंट्स स्थापित किए जा रहे हैं. मेडिकल स्टोर्स और पालनाघर बनाए जा रहे हैं. स्टेशनों को वाई-फाई किया जा रहा है. एस्केलेटर लगाए जा रहे हैं. टिकट चेकिंग कर्मचारियों और स्टेशन मास्टरों की वर्दी चमकाई जा रही है. सोशल मीडिया पर शिकायतों का पिटारा खोल दिए जाने को एकाउंटेंट्स की अपनी प्रचार नीति का हिस्सा कहा जा सकता है, जिसके लिए काबिल से काबिल रेल अधिकारियों का इस्तेमाल यात्रियों को दूध की बोतल, जुकाम की सुंघनी और सिरदर्द की गोली पहुंचाने के लिए किया जा रहा है. उन्हें साफ-सफाई में झोंक दिया गया है. मीटिंग्स और फालतू चर्चाओं में कीमती समय जाया किया जा रहा है. मगर गाड़ियां समय पर चलें और समय पर अपने गंतव्य पर पहुंचें, इसकी तरफ किसी का कोई ध्यान नहीं है. गाड़ियों की लेट-लतीफी की स्थिति यह है कि वह 12-12 घंटों से लेकर 15-15 घंटों तक देरी से अपने गंतव्य पर पहुंच रही हैं और इसका ठीकरा कोहरे पर फोड़ा जा रहा है. जबकि साइबेरिया, जापान, रूस और चीन, जहां वर्ष भर सर्दियों का मौसम रहता है, में कभी गाड़ियां लेट नहीं होती हैं.

    पिछले 15-20 वर्षों से यह कहकर देश की जनता को रेलवे बोर्ड द्वारा मूर्ख बनाया जा रहा है कि कोहरे के दौरान ‘क्लियर विजन’ की तकनीक लाई जा रही है. परंतु यह आज तक नहीं आ पाई है और हर साल यात्रियों को सर्दियों में कोहरे के दौरान यात्रा में भयंकर परेशानी झेलनी पड़ रही है. रेल दुर्घटनाएं रोकने के लिए एंटी कोलिजन डिवाइस (एसीडी) का खूब ढ़ोल पीटा गया, यहां तक कहा गया कि इसका सफल परीक्षण किया जा चुका है, मगर इसके बावजूद रेल दुर्घटनाओं को नहीं रोका जा सका है. तो इसका सबसे बड़ा कारण एक ही रेलवे, एक ही मंडल, एक ही शहर में 15-15, 20-20 सालों से भ्रष्ट अधिकारियों का जमा हुआ होना और उनके मन में सरकार एवं प्रशासन का कोई भी डर नहीं होना है. इसके साथ ही सिफारिशों के आधार पर नाकाबिल अधिकारियों की पोस्टिंग किया जाना भी इसके लिए एक मजबूत और जिम्मेदार कारण है. अब जहां तक रेलवे में सिक्योरिटी (सुरक्षा) की बात है, तो इसके लिए पूरी तरह से सरकार जिम्मेदार है, जिसने कानून-व्यवस्था राज्यों का विषय मानते हुए फर्जी और गैर-कानूनी एवं असंवैधानिक कारण के तहत रेलवे में दोहरी सुरक्षा व्यवस्था को पिछले 70 सालों से कायम कर रखा है. इसी असंवैधानिक व्यवस्था के चलते आए दिन चलती गाड़ियों में यात्रियों को लूटा जा रहा है, महिलाओं के साथ छेड़खानी, हत्या और बलात्कार जैसे कुकृत्य हो रहे हैं.

    लगभग पूरी भारतीय रेल में अवैध हाकरों की भरमार है, जो कि न सिर्फ यात्रियों को अखाद्य बेच रहे हैं, मौका पाकर उन्हें लूट रहे हैं, बल्कि इससे बहुत बड़ा भ्रष्टाचार भी जुड़ा है. रेल प्रशासन उपरोक्त सभी कारण जानते हुए भी चुप है. यदि उसे कोई समझदार व्यक्ति कुछ सही सलाह भी देता है, तो वह अपने नौकरशाही के अहंकार के नशे में इतना चूर है कि उसे उचित-अनुचित की समझ ही नहीं हो रही है. भारतीय रेल की उपरोक्त तमाम दुर्दशा को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान रेलमंत्री सुरेश प्रभु अब तक के सबसे असफल रेलमंत्री साबित हो रहे हैं, जिन्हें एक अकाउंटेंट होने के नाते फर्जी आंकड़े और फर्जी दस्तावेज बनाने तथा प्रधानमंत्री के समक्ष अपनी प्रोफाइल ठीक दिखाने की महारत हासिल है.

     

सम्पादकीय