दुर्घटना के जिम्मेदार अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए

    रोड शो, प्रचार, विकास शिविर जैसी नई-नई नौटंकियों ने रेलवे को बना दिया असुरक्षित

    स्टोर की खरीद में सालाना पांच हजार करोड़ के हो रहे भ्रष्टाचार से सुपरिचित हैं सीआरबी

    शीर्ष पर ‘स्टोरकीपर’ की पुनर्नियुक्ति से हताश अधिकारियों में काम के प्रति पैदा हुई अरुचि

    परिजनों के लिए फायदे का सौदा हो गया है किसी रेल दुर्घटना में अपने प्रियजन की जान गंवाना

    सामने आ रहे हैं अधिकारियों को मुख्य कार्य के बजाय अनुत्पादक कार्यों में लगाने के दुष्परिणाम

    सुरेश त्रिपाठी

    रविवार, 20 नवंबर 2016 को दो बड़ी रेल दुर्घटनाएं हुईं. पहली भीषण दुर्घटना में कानपुर देहात के पुखरायां-मलाशा सेक्शन के बीच गाड़ी संख्या 19321 इंदौर-राजेंद्रनगर एक्सप्रेस सुबह करीब 3.04 बजे बुरी तरह डिरेल हुई. झांसी मंडल, उत्तर मध्य रेलवे के अंतर्गत हुई इस दुर्घटना में लगभग 150 से ज्यादा निरीह-निर्दोष यात्रियों की मौत हुई और करीब 300 यात्री घायल हुए. दूसरी बड़ी घटना रायपुर मंडल, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के टिल्डा-रायपुर सेक्शन के बीच एक मालगाड़ी डिरेल होने की हुई. यह दुर्घटना भी सुबह के ही समय हुई, जिससे दोनों अप-डाउन लाइनें दिनभर के इए ब्लॉक हो गईं. हालांकि इस घटना में किसी के हताहत होने की खबर नहीं है, मगर यह दुर्घटना सबसे कुप्रसिद्ध डीआरएम/रायपुर की अकर्मण्यता का परिणाम बताई जा रही है, जो अभी पंद्रह दिन पहले तक सबसे सुरक्षित और सर्वाधिक पन्क्चुअलिटी वाला डिवीजन होने की हांक लगा रहे थे, मगर इस घटना में पूरी की पूरी मालगाड़ी पलट जाने और लगभग पूरा दिन दोनों लाइनें ब्लॉक रहने से उनकी कार्य-क्षमता की सारी पोल खुल गई. इसके एक दिन पहले शनिवार, 19 नवंबर को तड़के भटिंडा-जोधपुर सवारी गाड़ी राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के राजियासर थाने के अंतर्गत प्रेमनगर गांव के पास डिरेल हो गई, जिसमें चार डिब्बे गिरे और 12 यात्री घायल हुए.

    संयोग यह है कि ये तीनों रेल दुर्घटनाएं तब हुई हैं, जब हरियाणा के सूरजकुंड में रेलवे का महाकुम्भ ‘रेल विकास शिविर’ चल रहा था. जिस दिन पुखरायां दुर्घटना हुई, उस दिन यानि 20 नवंबर को प्रधानमंत्री इस शिविर को प्रत्यक्ष संबोधित करने पहुंचे थे. पहले दिन 18 नवंबर को उन्होंने वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से संबोधित करके इस कथित ‘विकास शिविर’ की औपचारिक शुरुआत करवाई थी. यह भी एक बड़ा संयोग है कि जिस दिन 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, उस दिन भी पूर्वोत्तर रेलवे के बस्ती-खलीलाबाद सेक्शन में एक बड़ी भीषण रेल दुर्घटना हुई थी. जिस प्रकार उक्त बड़ी रेल दुर्घटना की बाद में लीपापोती कर दी गई और एक एसएसई को निलंबित करके लखनऊ मंडल के अधिकारियों ने अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी, वाही हस्र अब पुखरायां रेल दुर्घटना का भी होगा.

    हालांकि भारतीय रेल में आए दिन कहीं न कहीं रेल दुर्घटनाएं होती रहती हैं, मगर रेलमंत्री सुरेश प्रभु उनके बारे में कोई बयान देना जरुरी नहीं समझते रहे हैं. परंतु पुखरायां में हुई इंदौर-राजेंद्रनगर एक्स. की भीषण दुर्घटना पर उन्होंने न सिर्फ बयान दिया है, बल्कि अपना दुःख-दर्द जताने वह दुर्घटना-स्थल पर भी देर शाम को पहुंचे. रेलमंत्री ने दुर्घटना-स्थल पर मीडिया को दिए अपने बयान में कहा कि जांच के बाद जो भी इसके लिए जिम्मेदार पाया जाएगा, उसके खिलाफ ‘स्ट्रिक्टेस्ट’ कार्रवाई की जाएगी. घटना-स्थल की हालत देखकर अपना दुःख-दर्द और आक्रोश व्यक्त करने के लिए रेलमंत्री को शायद हिंदी में इससे ज्यादा कड़ा कोई शब्द नहीं मिल पाया था, इसलिए उन्होंने इस मौके पर अंग्रेजी में एक नए शब्द की रचना कर डाली.

    इससे पहले दुर्घटना में मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजा राशि घोषित करने की जैसे होड़ सी लग गई. उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नजदीक होने के कारण सबसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह कहते हुए प्रत्येक मृतक के परिजन को पांच-पांच लाख रुपए का मुआवजा घोषित किया कि यह घटना चूंकि उनके प्रदेश में घटित हुई है, इसलिए राज्य सरकार की पहली जिम्मेदारी बनती है. इसके बाद दुर्घटना-स्थल पर पहुंचे रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा ने शायद सही ही कहा कि मौत का कोई मुआवजा नहीं होता, तथापि उन्होंने रेलवे की तरफ से प्रत्येक मृतक के परिजन को 3.50 लाख और गंभीर रूप से घायलों को 50 हजार तथा मामूली रूप से घायलों को 25 हजार रुपए का मुआवजा घोषित किया. इसके तत्काल बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह कहते हुए कि चूंकि उक्त गाड़ी इंदौर से चलती है, इसलिए मृतकों के परिजनों के लिए दो-दो लाख का मुआवजा घोषित किया जाता है. हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनका यह मुआवजा दुर्घटना में मृत हुए सभी मृतकों के परिजनों को दिया जाएगा, या फिर केवल मध्य प्रदेश के उन यात्रियों को, जो इस दुर्घटना में मारे गए हैं. इसके बाद प्रधानमंत्री राहत कोष से भी सभी मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपए दिए जाने की घोषणा की गई. यानि इस तरह किसी रेल दुर्घटना में अपने किसी प्रियजन की जान गंवाना परिजनों के लिए फायदे का सौदा हो गया है?

    इसके साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की दुर्घटना में मृतकों और उनके परिजनों के प्रति दुःख जताने और रेलवे की संरक्षा एवं सुरक्षा को कोसने की बयानबाजी और रश्म-अदायगी शुरू हो गई. सभी नेताओं ने कुछ न कुछ विशेष कहकर अपना दुःख जताया. मगर सबसे आपत्तिजनक बयान कानपुर के बुजुर्ग सांसद, केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी का आया. उन्होंने अपना दुःख जताने के साथ-साथ यह भी कहा कि हो सकता है कि केंद्र सरकार को बदनाम करने के लिए यह कोई साजिश हो. सांसद डॉ. जोशी का यह बयान उसी तर्ज पर अत्यंत आपत्तिजनक है, जिस तर्ज पर उत्तर प्रदेश के मंत्री आजम खान ने बुलंदशहर बलात्कार कांड को राज्य सरकार को बदनाम करने की साजिश बताया था और अब सुप्रीम कोर्ट के सामने वह माफी मांगने को तैयार हैं.

    पुखरायां के पास घटित हुई इंदौर-राजेंद्रनगर एक्स. की यह दुर्घटना शुद्ध रूप से तकनीकी और मानवीय लापरवाही का परिणाम है. तकनीकी रूप से इसलिए क्योंकि इंदौर से उज्जैन तक रोजाना इस गाड़ी से यात्रा करने वाले प्रकाश शर्मा नामक यात्री ने गाड़ी के चलने के कुछ देर बाद ही गाड़ी के ऑन बोर्ड स्टाफ को बताया था कि एस-1/2 कोच के एक्सेल और पहियों में जर्किंग जैसी हो रही है. मगर तब श्री शर्मा की बात को स्टाफ ने हवा में उड़ा दिया. इसके बाद इसी बात की सूचना झांसी में गाड़ी के ड्राइवर ने भी दी थी. इसी कारण से करीब 20 मिनट तक गाड़ी को झांसी में डिटेन भी किया गया था. परंतु जो ड्राइवर झांसी से उक्त गाड़ी को आगे ले जाने वाला था, उसे यह कहकर गाड़ी ले जाने को कहा गया कि कानपुर तक कैसे भी इसे लेकर जाओ, वहां इसकी जांच करने का मैसेज दे दिया जाएगा. जबकि झांसी में गाड़ी की पूरी जांच की जानी चाहिए थी और यदि किसी कोच का एक्सेल अथवा पहिया डगमग था, तो उसे काटकर अलग किया जाना चाहिए था, भले ही इस काम में चाहे जितना समय लगता, क्योंकि यात्रियों की जान से ज्यादा कोई समय कीमती नहीं हो सकता है.

    कुछ तकनीकी जानकारों का मानना है कि उक्त गाड़ी के कुछ कोचों में फ्लैट टायर हो सकता है. उनका कहना है कि किसी कोच में फ्लैट टायर जरुर रहा होगा. यही वजह है कि उसकी सूचना उज्जैन के दैनिक यात्री ने स्टाफ को दी थी. उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ती है और रफ्तार पकड़ती जाती है, वैसे-वैसे यह फ्लैट टायर बढ़ता जाता है. इसकी वजह से भी यह दुर्घटना हुई हो सकती है. इसके अलावा उनका यह भी कहना है कि यदि किसी कोच में एक्सेल पुली लगी हुई है, यह एक्सेल पुली ढ़ीली होती है और कास्ट आयरन से बनी होती है. यह पुली कास्ट आयरन को काटती रहती है, यदि किसी एक्सेल पुली ने कास्ट आयरन को काट दिया, तो पहिया बाहर को चला जाएगा. ऐसी स्थिति में दुर्घटना तो होनी ही है. उनका यह भी कहना है कि यदि इस प्रकार की सूचना थी, तो झांसी के एसएसई/सीएंडडब्ल्यू/ऑन ड्यूटी को गाड़ी को आगे जाने ही नहीं देना चाहिए और अगर उसने ऐसा किया है, तो यह उसकी बहुत गंभीर चूक है, जिसका दुष्परिणाम 150 से ज्यादा मौतों और 300 से ज्यादा घायलों के रूप में सामने आया है.

    इसके अलावा जानकारों का कहना है कि पुखरायां-मलाशा के बीच अवश्य पटरी में कहीं न कहीं दरार रही होगी, जिससे इंजन सहित दो-तीन डिब्बे तो सही-सलामत निकल गए, मगर 110 किमी. प्रति घंटे की गति से भागती गाड़ी का लोड उक्त दरार ज्यादा देर सहन नहीं कर पाई और पटरी टूट गई, जिससे पीछे के बाकी सभी कोच डिरेल हो गए. अत्यधिक गति होने के परिणामस्वरूप कुछ डिब्बे एक-दूसरे के अंदर घुस गए, जिसके फलस्वरूप ज्यादा मौते हुईं और ज्यादा लोग घायल हुए. हालांकि यह बताने को कोई अधिकारी तैयार नहीं है कि उक्त सेक्शन का अल्ट्रा-साउंड, डीप स्क्रीनिंग अथवा कम्पलीट ट्रैक रिन्यूवल (सीटीआर) कब हुआ था? तथापि इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह निकट विगत में तो नहीं ही हुआ होगा. इसके अलावा अब तमाम पीडब्ल्यूआई, जो कि अब सीनियर सेक्शन इंजीनियर-पी-वे कहलाने लगे हैं, शायद ही अब कभी ट्राली करते हैं. ट्राली नहीं किए जाने से ट्रैक की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चल पाता है, क्योंकि इसी दौरान ट्रैक का अल्ट्रा-साउंड करके उसमें जहां तहां आने वाली संभावित दरारों का पता लगाया जाता है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विगत कुछ वर्षों से खरीदी जा रही रेलें भी कम गुणवत्ता वाली पाई गई हैं.

    ज्ञातव्य है कि ठंड के मौसम में रेल सिकुड़ती है. और यदि जोड़ के पास पर्याप्त जगह नहीं छोड़ी गई होती है, तो यह बकल (टेढ़ी-मेढ़ी) हो जाती है और साथ ही सिकुड़न की वजह से इन रेलों में दरारें भी पड़ती हैं. इसके विपरीत गर्मी के मौसम में रेल फैलती है. इसलिए ठंडी और गर्मी के मौसम में इन तमाम बातों का विशेष ध्यान रखते हुए सभी एसएसई/पी-वे और उनके संबंधित अधिकारी ट्रंक रेल रुट्स का खासतौर पर दैनिक निरीक्षण करते हैं. एक जेई/पी-वे ने ‘रेलवे समाचार’ को व्हाट्सऐप पर लिखकर भेजा है कि पुखरायां जैसी रेल दुर्घटनाएं तब तक नहीं रुक सकती हैं, जब तक कि सबसे निचले स्टाफ और सबसे ऊपरी अधिकारी को जिम्मेदार, जवाबदेह और उत्तरदायी नहीं ठहराया जाएगा. उसका कहना है कि छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज किए जाने के परिणामस्वरूप ही बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं हो रही हैं. उसका यह भी कहना है कि लोअर कैडर की वर्किंग में ट्रेड यूनियनों का अनावश्यक या अनधिकृत हस्तक्षेप रेलवे में भयंकर दुष्परिणामों का कारण बन रहा है. उसका यह भी कहा है कि अंततः जेई और एसएसई को ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, मगर कोई भी ट्रैक मेंटेनर की ड्यूटी क्या है, यह पूछने तक की हिम्मत नहीं कर पाता है. उसका सबसे बड़ा सवाल यह है कि रेलवे द्वारा 65 मीटर लांग रोल्ड रेल का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है? यहां तक कि आज भी 13 मीटर और इससे भी कम लंबी रेल का इस्तेमाल किया जा रहा है और कोई देखने-सुनने वाला नहीं है. उसका कहना है कि गुणवत्तापूर्ण और पर्याप्त मटीरियल की उपलब्धता के बारे में तो अब रेलवे में सोचना भी गुनाह हो गया है. रेल दुर्घटनाओं के मामले में मटीरियल की खरीद में हो रहा भारी भ्रष्टाचार और इसकी अपर्याप्त उपलब्धता की भी महत्वपूर्ण भूमिका है.

    रेलकर्मी ही खुद बताते हैं और अक्सर विभागीय सेफ्टी सेमिनारों में इसका खुलकर बयान भी करते हैं कि कलपुर्जों और मटीरियल की कमी के कारण उन्हें गाड़ियों को अनसेफ या भगवान भरोसे भेजना पड़ता है. वह यह भी कहते हैं कि कई बार मेंटीनेंस के लिए आए हुए किसी कोच के कलपुर्जे निकालकर दूसरे कोच में लगालाकर उसे फिट करके भेजना पड़ता है. ऐसी स्थिति तब है जब एक ‘स्टोरकीपर’ (चेयरमैन, रेलवे बोर्ड ए. के. मितल) खुद पिछले लगभग ढ़ाई साल से भारतीय रेल के शीर्ष पर बैठे हुए हैं. यही नहीं, रेलवे स्टोर की खरीद में सालाना पांच हजार करोड़ के हो रहे भ्रष्टाचार की जानकारी भी ‘शीर्ष स्टोरकीपर’ को है, क्योंकि वह जांच समिति के एक प्रमुख सदस्य रहे हैं. शीर्ष में रहने के बावजूद उन्होंने उक्त समिति की रिपोर्ट को आज तक लागू नहीं किया है. इसे क्या समझा जाना चाहिए?

    यदि ऊरी हमले के परिणामस्वरूप ब्रिगेड कमांडर को तत्काल बर्खास्त किया जा सकता है, जिसमें उसकी लापरवाही से कुछ सैनिकों की मौत हुई थी, तो जहां 150 से ज्यादा मौतें हुई हैं और जिनके कारण 300 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं, उन्हें भी क्यों नहीं तत्काल बर्खास्त किया जाना चाहिए? इस अपराधिक एवं लापरवाहीपूर्ण कृत्य के लिए संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों का हमेशा के लिए कैरियर बाधित किया जाना चाहिए. यदि इस तरह का कड़ा कदम, रेलमंत्री सुरेश प्रभु के शब्दों में स्ट्रिक्टेस्ट’, उठाया जाता है, तो निश्चित रूप से संबंधित मंडलों के मंडल रेल प्रबंधक, सीनियर डीईएन अथवा ब्रांच ऑफिसर्स, जो ट्रैक और कोचों का मेंटीनेंस देखते हैं, फिर कभी ऐसी अपराधिक लापरवाही नहीं करेंगे, और यात्रियों की संरक्षा-सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने के बारे में कभी सपने में भी नहीं सोचेंगे.

सम्पादकीय