रेल विकास शिविर : प्रधानमंत्री के सामने क्या वास्तविक सुझाव पेश किए जाएंगे?

    रेलमंत्री के एक गैर-रेलवे जानकार ओएसडी के दिमाग की उपज है रेल विकास शिविर

    पूर्व सीआरबी अरुणेंद्र कुमार को अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में जापान भेजने का औचित्य क्या है?

    रेलवे निजाम की प्रचारीकरण नीति से रेलवे में पसरा है चौतरफा अराजकता का वातावरण

    रेल अधिकारी-कर्मचारी दिग्भ्रमित, मुख्य कार्य से विरत करके तोड़ दिया गया उनका मनोबल

    सुरेश त्रिपाठी

    पिछले चार-पांच सालों से भारतीय रेल लगातार गर्त में जा रही है. गर्त में जाने की इसकी गति में पिछले दो-ढ़ाई सालों के दरम्यान ज्यादा तेजी आई है. रेलयात्री लगातार घट रहे हैं. रेल राजस्व में लगातार गिरावट आ रही है. मगर रेलमंत्री के तथाकथित सलाहकर आए दिन नई-नई नौटंकी से रेलमंत्री को परिचित करवाकर उसमें उनकी भूमिका को संदिग्ध बनाते जा रहे हैं. हर गलत कदम को एक और गलत कदम उठाकर हर गलती को जनता की नजर से ओझल किए जाने की युक्तियां इस्तेमाल की जा रही हैं. सभी रेल अधिकारियों और कर्मचारियों को सोशल मीडिया और प्रचार-तंत्र में झोंककर सुदृढ़ रेल परिचालन और राजस्व आय बढ़ाने के मुख्य कार्य से विरत करके उनके मनोबल को तोड़ दिया गया है. इसके परिणामस्वरूप आए दिन जहां-तहां रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं, जिन पर रेलमंत्री कोई उचित बयान देना भी जरुरी नहीं समझते हैं, फ्लेक्सी किराया पद्धति जैसे मूर्खतापूर्ण मशवरे रेलमंत्री को दिए जा रहे हैं. इससे रेलवे की राजस्व आय कम हो रही है.

    अब कहा जा रहा है कि रेलवे की इसी राजस्व आय को बढ़ाने के लिए यह ‘रेल विकास शिविर’ आयोजित किया जा रहा है. इसके लिए भी सभी जोनल रेलों के सभी अधिकारी रात-दिन सिर्फ नई-नई- युक्तियां खोजने और सोचने में पिछले करीब दो महीनों से लगे हुए हैं. 1 नवंबर से 10 नवंबर तक राष्ट्रीय स्तर पर चार-चार जोनल रेलों को बुलाकर रेलवे बोर्ड में उनकी रेलों से आए सुझावों की शार्टिंग की गई है. यह काम अभी तब तक जारी रहने वाला है जब तक कि प्रधानमंत्री के समक्ष रखने के लिए उचित सुझाव प्राप्त नहीं हो जाते हैं. पहली बार कोई प्रधानमंत्री रेलकर्मियों को सीधे संबोधित करने जा रहा है. यह काम प्रधानमंत्री की लोक-लुभावन छवि निर्माण के लिए अच्छा हो सकता है, मगर बतौर सीआरबी पुनर्नियुक्त स्टोरकीपर सहित रेलमंत्री के कुछ अधकचरे सलाहकार इस लोक-लुभावन कदम के पीछे वास्तव में अपनी अकर्मण्यता को ही छिपा रहे हैं. तथापि, यह भी सुनने को मिल रहा है कि रेलवे को फायदा पहुंचाने वाले वास्तविक सुझाव शायद ही प्रधानमंत्री तक पहुंच पाएं, क्योंकि अधिकारीगण ऐसा कोई सुझाव प्रधानमंत्री तक पहुंचने नहीं देंगे, जिससे कि उनकी आरामतलबी और सुख-सुविधाओं में किसी प्रकार की कोई कमी आए. वह विज्ञापनों से कमाई करने जैसे कुछ टुटपुंजिया सुझाव ही ऊपर तक जाने दे रहे हैं.

    यह भी बताया गया कि रेल विकास शिविर का यह घटिया आईडिया रेलमंत्री के ओएसडी हनीश यादव के अधकचरे दिमाग की उपज है. उनका यह आईडिया घटिया इसलिए है, क्योंकि उन्हें रेलवे में काम करने का बहुत छोटा अनुभव रहा है, वह भी भाप इंजनों के समय का. उसके बाद तो वह रेलवे छोड़कर निजी क्षेत्र में चले गए थे और अब रेलमंत्री के सेल में उनकी पैठ पूर्व सीआरबी अरुणेंद्र कुमार की वजह से बनी है, जहां वह रेलमंत्री के सलाहकार कम अरुणेंद्र कुमार के हितसाधक और भेदिया के रूप में ज्यादा काम कर रहे हैं. यदि ऐसा नहीं होता, तो इंटरनेशनल हाई-स्पीड रेल एसोसिएशन (आईएचआरए) की गुरुवार, 17 नवंबर 2016 को जापान में ‘चैलेंजेज टु कनेक्टिविटी, इंटीग्रेशन एंड सस्टेनेबिलिटी इन एचएसआर प्रोजेक्ट्स’ विषय पर हो रही अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में विश्व की सबसे बड़ी दूसरी रलवे ‘भारतीय रेल’ का प्रतिनिधित्व अरुणेंद्र कुमार जैसे क्रुक्ड नहीं कर रहे होते. क्या भारतीय रेल के पास काबिल अथवा योग्य अधिकारियों का इतना बड़ा टोटा हो गया है कि वह ऐसे अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में एक पूर्व और क्रुक्ड अधिकारी को भेज रही है? उसके इसमें शामिल होने से भारतीय रेल को आखिर क्या लाभ मिलेगा? क्या रेलमंत्री अथवा उनके रेलवे बोर्ड के पास इस सवाल का कोई वाजिब जवाब है?

    खैर, यहां विषय रेल विकास शिविर का है, तो क्या रेलमंत्री या उनके कथित सलाहकारों के पास इस बात कोई जवाब है कि जब उन्होंने रेलमंत्री का चार्ज संभाला था, तब रेलवे के तमाम काबिल अधिकारियों और कर्मचारियों से रेलवे के उत्थान हेतु जो तमाम बंडल के बंडल विचार आमंत्रित किए गए थे, उनका क्या हुआ? ‘रेलवे समाचार’ के पास इस बात की पुख्ता जानकारी है कि तब तमाम काबिल रेल अधिकारियों और कर्मचारियों ने बहुत उपयोगी सुझाव भेजे थे, जो कि रेलवे बोर्ड के एक ईडी के पास उसकी अलमारी में आज भी बंद पड़े सड़ रहे हैं. जब पहले ही तमाम रेल अधिकारियों और कर्मचारियों ने बहुत सारे उपयुक्त सुझाव रेलवे के उत्थान हेतु भेजे हुए हैं, तब प्रधानमंत्री के संबोधन का यह स्टंट क्यों आयोजित किया जा रहा है? आज तक उन तमाम सुझावों पर अमल क्यों नहीं किया गया? पुनः इस प्रकार की तमाम उठापटक से रेल अधिकारियों और कर्मचारियों की जो ऊर्जा और श्रम एवं समय की बरबादी हो रही है, उसका अंतिम नतीजा अंततः उसी तरह शून्य ही रहने वाला है, जिस तरह रेलमंत्री द्वारा गठित की गई तमाम कमेटियों के नतीजों का रहा है. जबकि अधिकारियों एवं कर्मचारियों का ध्यान उनके मुख्य कार्य - समय पर गाड़ी परिचालन और राजस्व अर्जन - से हटाकर रेलवे को गर्त में ढकेला जा रहा है और उनको हीनभावना का शिकार बनाया जा रहा है.

    ‘यदि आप एक दिन के लिए रेलमंत्री होते’ जैसे जुमले के साथ इस कथित रेल विकास शिविर के लिए रेलकर्मियों और अधिकारियों से सुझाव मांगे गए हैं. जब रेलकर्मियों द्वारा तमाम अधिकारियों के बंगलों पर कार्यरत करीब 20-25 हजार रेलकर्मियों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त करके रेलवे में उन्हें उनके मुख्य निर्धारित कार्य पर लगाए जाने जैसे सुझाव दिए गए, तो ऐसे सुझावों को तुरंत रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया. क्या यह सुझाव महत्वपूर्ण नहीं है? जबकि फील्ड में रेलवे निचली श्रेणी के कर्मचारियों की कमी से जूझ रही है और उनकी जगह ठेकेदारों से इसलिए काम करवाया जा रहा है जिससे कमीशन प्राप्त हो सके. अधिकारियों को दी गई सरकारी गाड़ियां उनके निजी कार्यों में इस्तेमाल हो रही हैं. इन सभी गाड़ियों में जीपीएस सिस्टम लगाए जाने का सुझाव दिया गया, जिससे उनकी ट्रेकिंग की जा सके कि वह दिनभर में कहां-कहां गईं और कितना चलीं, मगर इस सुझाव को भी आगे नहीं जाने दिया गया.

    रेलकर्मियों की मुफ्तखोरी की जब बात आती है, तो उनके संगठनों के शीर्ष पदाधिकारी हकड़कर बोलते हैं कि ‘यदि रेलकर्मी काम नहीं करते हैं तो यह प्रतिदिन जो 12 हजार यात्री ट्रेनें और करीब 9 हजार मालगाड़ियां दौड़ रही हैं, वह किसके काम के बलबूते दौड़ रही हैं.’ उनकी यह हकड़ वास्तव में अर्धसत्य है. रेलकर्मी काम कर रहे हैं, यह सही है, और उनके काम की बदौलत ही हजारों यात्री एवं मालगाड़ियां भी दौड़ रही हैं. मगर यह भी सत्य है कि यूनियन के नाम पर करीब 1.20 लाख रेल कर्मचारी तिनका भर भी रेलवे का काम नहीं कर रहे हैं और मुफ्त की तनख्वाह के साथ टीए भी ले रहे हैं. इसका ताजा उदाहरण दक्षिण रेलवे है, जहां यूनियन के नाम पर सालों से मुफ्तखोरी करने वाले सैकड़ों रेलकर्मियों के विरुद्ध विभागीय एवं सीबीआई जांच चल रही है. श्रमिक संगठनों में कार्यरत सेवानिवृत्त पदाधिकारियों के अलावा बाकी सभी पदाधिकारियों को उनकी निर्धारित ड्यूटी पर लगाया जाना चाहिए. इससे रेलवे की उत्पादकता में निश्चित रूप से पर्याप्त वृद्धि होगी. इसके अलावा यूनियन के नाम पर रेलवे में फैली अराजकता को भी इसी तरीके से समाप्त किया जा सकता है. इसके अलावा मान्यताप्राप्त संगठनों की मीटिंग्स, धरना-मोर्चा और आंदोलनों पर भी कुछ अंकुश लगाया जाना चाहिए, क्योंकि इससे भी मानव-संसाधन और समय की अपव्यता के साथ-साथ उत्पादकता भी प्रभावित होती है.

    अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) लिखने से पहले उनके मातहत कार्यरत रेलकर्मियों और अधिकारियों सहित कॉन्ट्रैक्टर्स से भी संबंधित अधिकारी के कार्य-व्यवहार की गोपनीय रिपोर्ट मांगी जाए. इसके बाद ही उनके अगले प्रमोशन पर विचार किया जाना चाहिए. यदि तीन कांट्रेक्टर विपरीत रिपोर्ट देते हैं, तो संबंधित अधिकारी से न सिर्फ स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिए, बल्कि उसके खिलाफ विभागीय कार्यवाही भी की जानी चाहिए. इससे सिर्फ भ्रष्ट अधिकारियों पर लगाम ही नहीं लगेगी, बल्कि इस प्रकार की गोपनीय रिपोर्टो से वह एक्सपोज भी होंगे. इसके अलावा इस माध्यम से उनकी काबिलियत के बारे में भी प्रशासन को पुख्ता जानकारी मिल सकेगी.

    प्रत्येक फाइल और टेंडर को फाइनल करने का समय निर्धारित किया जाए, नियत समय पर काम न करने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और कॉन्ट्रैक्टर्स पर उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए. यदि कोई अधिकारी हप्ते भर से ज्यादा किसी फाइल को अपने पास रोकता है, तो न सिर्फ उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, बल्कि उस महीने उसके वेतन की कटौती के साथ ही उसका अगला प्रमोशन भी रोका जाना चाहिए. किसी भी कार्य का टेंडर अंतिम तौर पर जारी करने से पहले उसकी पूर्व बिड वेटिंग का मौका कुछ रजिस्टर्ड कॉन्ट्रैक्टर्स को भी दिया जाना चाहिए, जिससे वे उक्त कार्य की वास्तविक लागत का सही आकलन करके अपनी भी राय दे सकें. कॉन्ट्रैक्टर्स द्वारा बिड पूर्व पूछे जाने वाले सवालों का नियत समय पर जवाब दिया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए. भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए कॉन्ट्रैक्टर्स को निर्धारित समय पर भुगतान किया जाए. प्रत्येक टेंडर न सिर्फ निर्धारित समय पर फाइनल होना चाहिए, बल्कि उसके अंतर्गत होने वाला कार्य भी निर्धारित समय-सीमा में पूरा करवाया जाना चाहिए. इससे कार्य की लागत बढ़ाने में कॉन्ट्रैक्टर्स कामयाब नहीं होंगे और भ्रष्टाचार कम होगा.

    फाइनल टेंडर जारी किए जाने के साथ ही उसके तहत किए जाने वाले कार्य की ड्राइंग-डिजाइन भी दी जानी चाहिए. टेंडर के साथ ड्राइंग-डिजाइन नहीं दिए जाने से कॉन्ट्रैक्टर्स के साथ चीटिंग की जाती है और टेंडर्स में शेड्यूल नहीं किए गए कार्य भी उससे करवाए जाते हैं, जिनका भुगतान करने से पहले ही अपना कमीशन लेकर संबंधित अधिकारी ट्रांसफर होकर चला जाता है. कई बार संबंधित अधिकारी अपनी मनमर्जी से टेंडर का ‘स्कोप ऑफ वर्क’ बदल या बढ़ा देते हैं. इससे कुछेक बार कांट्रेक्टर का नुकसान होता है, तो ज्यादा बार रेलवे राजस्व को ही चूना लगता है. ऐसा कई बार संबंधित अधिकारी द्वारा या तो कांट्रेक्टर को प्रताड़ित करने के लिए किया जाता है, या फिर अपना निहितस्वार्थ साधने के लिए अपने असीमित अधिकार दिखाने के लिए होता है. इसका सटीक अनुमान अधिकारियों को सौंपे गए असीमित अधिकारों का सम-सामयिक परीक्षण करके किया जा सकता है.

    अधिकारियों का प्रत्येक तीन साल में और ऑफिस कर्मचारियों का प्रत्येक चार साल में पीरियोडिकल ट्रांसफर किया जाना सुनिश्चित होना चाहिए. रेलवे बोर्ड की यह पालिसी भी है और सीवीसी ने भी रेलवे के सभी विभागों के संवेदनशील पदों की सूची भी तैयार करके रेलवे बोर्ड को सौंपी हुई है, तथापि उसके अनुरूप ट्रांसफर सुनिश्चित नहीं किए जा रहे हैं. इसके अलावा सिर्फ टेबल-कुर्सी बदलने को ही ट्रांसफर नहीं माना जा सकता, उनका कार्यालय और शहर भी बदला जाना चाहिए. वर्तमान स्थिति यह है कि भले ही संबंधित अधिकारी या कर्मचारी बहुत बढ़िया योजनाकार हैं, मगर उन्हें सिर्फ इसीलिए एक ही जगह पर बनाए रखा जाना सही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सच्चाई यह है कि वे अपने पद का संस्था के हित में कम, खुद के हित में ज्यादा उपयोग करने लगे हैं.

    पीएसयू तथा अन्य जगहों पर कथित सलाहकार या कंसल्टेंट्स के नाम पर रिटायर्ड अधिकारियों की नियुक्ति पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए. यदि इसके पीछे रिटायर्ड लोगों के अनुभव का लाभ लेने की ही भावना निहित है, तो उनसे अवैतनिक सेवा देने के लिए कहा जाना चाहिए. इससे नए, काबिल एवं जोखिम लेने वाले युवा अधिकारियों को अपनी काबिलियत दिखाने का बेहतर अवसर प्राप्त होगा तथा नए लोगों को इससे रोजगार के अवसर भी मिलेंगे. रेलमंत्री को चाहिए कि वह अपने सेल सहित प्रत्येक जोनल रेलवे मुख्यालय में अपने नाम की एक-एक शिकायत पेटी भी लगवाएं, जिससे रेल अधिकारियों, कर्मचारियों सहित रेलवे के लिए काम कर रहे कांट्रेक्टर और सप्लायर्स जैसे बाहरी लोग भी अपनी शिकायत सीधे उन्हें भेज सकें. मगर इसके लिए वह अनंत स्वरूप जैसे अपने पूर्वाग्रही सहायक को न लगाएं, क्योंकि वह उनके पास वास्तविक शिकायतों को पहुंचने ही नहीं देगा. सुझाव तो बहुत सारे हैं. इसके पहले जब मांगे गए थे, तब भी ‘रेलवे समाचार’ कई अमूल्य सुझाव दिए थे, मगर उनमें से आज तक किसी भी सुझाव पर अमल नहीं किया गया है. रेलवे के वर्तमान निजाम की सिर्फ प्रचारीकरण की नीति से रेलवे में चारों तरफ अराजकता पसरी हुई है और रेलवे के कर्ता-धर्ता दिग्भ्रमित स्थिति में समय गुजार रहे हैं.

सम्पादकीय