आरक्षण : खत्‍म नहीं, बल्कि समीक्षा होनी चाहिए

    सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को सिर्फ जाति के इकहरे मानदंड से व्‍याख्‍यायित नहीं किया जा सकता

    प्रेमपाल शर्मा

    आरक्षण की आग में वर्ष 2015 के अंतिम दिनों में गुजरात (पटेल या पाटीदार) सुलग रहा था, जनवरी 2016 में आंध्रप्रदेश (कपू समुदाय) और फरवरी में हरयाणा, राजस्थान में गुर्जरों की मांग और हिंसा से हम सब वाकिफ हैं. पटेल, जाट जैसे सवर्ण ओबीसी का दर्जा चाहतें हैं, तो गुर्जर, मीणाओं की तर्ज पर अनुसूचित का. मंडल आयोग के बाद यह होड़ और तेज हुई है. आर्थिक, सामाजिक कारण हैं, तो राजनीतिक और भी ज्यादा. ये सभी समुदाय किसानी के पेशे से हैं, जो निरंतर घाटे का सौदा साबित हो रहा है. इसलिए युवा मरने-मारने पर उतारू हैं. सैकड़ों जानें अभी तक जा चुकीं हैं. जाहिर है नेता तो ऐसे मसलों पर सिर्फ रोटियां सेकना चाहते हैं, लेकिन प्रगतिशीलता, संवेदना, जनपक्षधरता का दावा करने वाले पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी चुप क्यों हैं? क्या ऐसी चुप्पी अपराध नहीं है? एक बार मुकम्मिल समीक्षा कर समाधान क्यों नहीं खोजा जाता?

    यह सही है कि आरक्षण को फिलहाल या एकदम से खत्‍म नहीं किया जा सकता. मगर इसकी पूरी प्रक्रिया, पद्धति, कार्यान्‍वयन की समीक्षा अवश्य होनी चाहिए. यह समय की मांग है. यदि जरूरत हो, तो इसे बढ़ाएं और समयबद्ध कार्यक्रम के तहत पूरा करें. परंतु इसकी सियासत पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए.

    जब तक कोई समाज असमानता की इतनी परतों - जातिगत, क्षेत्र, धर्म, नस्‍ल, नियम, विश्‍वास, अंधविश्‍वास, लैंगिक आदि में जकड़ा हो, इनसे मुक्ति की तलाश और प्रयास में कुछ कदम सत्‍ता या शासन को उठाने ही होंगे. उसे चाहे आरक्षण का नाम दें या सकारात्‍मक कदम का. यह पूरे समाज, राष्‍ट्र की सुख-शांति और विकास के लिए यह जरूरी है. मिड डे मील, आंगनवाड़ी, स्कूल, अस्पताल से लेकर लगभग सभी सार्वजनिक स्थानों पर रोज दलितों के साथ भेदभाव और अत्याचार की ख़बरें आती हैं. आरक्षण का विरोध करने वालो का फर्ज है कि पहले इन बुराईयों, भेदभावों के खिलाफ सामने आएं, आरक्षण की जड़ यह असमानता और भेदभाव ही है.

    लेकिन कोई भी कदम, उपचार, नीति उसी रूप में हमेशा के लिए कारगर नहीं हो सकती. बिल्‍कुल दवा की तरह. उसे बराबर जॉंचने की जरूरत है कि क्‍या उपचार ठीक भी हो रहा है या उल्‍टा असर है. यहां तक कि अच्‍छे प्रगतिशील धर्मों के लिए भी यही सिद्धांत लागू होता है. हिन्‍दी के विद्धान, मनीषी हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन यहां अत्यंत महत्‍वपूर्ण है - ‘जो धर्म परम्पराएं, वक्‍त के साथ नहीं बदलतीं, जिन पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, वे उस धर्म को भी नष्‍ट कर देती हैं.’ विज्ञान का नाम ही बार-बार अपने को जांचने, परखने, परीक्षण और प्रश्‍न करने का है. इसीलिए जिस वैज्ञानिक युग में हम जी रहे हैं या भारत आगे बढ़ रहा है, वहां हर कार्य के लिए यही वैज्ञानिक विधि अपनाने की जरूरत है. अत: पिछली सदी में शुरू किए आरक्षण के कदम, कसौटियों को नए सिरे से इन्‍हीं समाजशास्त्रीय वैज्ञानिक पद्धतियों पर कसा, परखा जाना चाहिए. यहां सवाल यह उठता है कि समय-समय पर जब कानून-संविधान सहित अन्‍य संस्थाओं की समीक्षाएं की गई हैं, तो इस मुद्दे पर सरकारें क्‍यों बचती रही हैं? ‘समीक्षा’ शब्‍द से इतनी बैचेनी क्‍यों?

    सामाजिक समानता के रास्‍ते आर्थिक और फिर राजनैतिक बराबरी के लिए लगभग सौ वर्ष पहले आरक्षण की जो शुरुआत मुख्‍यत: दक्षिण और महाराष्‍ट्र में फुले, साहूजी महाराज आदि ने की और सामाजिक बराबरी के सबसे बड़े पैरोकार भीमराव अम्‍बेडकर ने जिसके लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उसमें इसे उम्‍मीद के मुताबिक सफलता क्‍यों नहीं मिली? समाज के दबे-कुचले, पिछड़े, साधनहीन वर्गों के लिए गांधी, नेहरू, पटेल की सदिच्छिओं के बावजूद क्‍यों इन्‍हीं कार्यों के लिए कांशीराम, मायावती या दूसरे राजनेताओं को आगे आना पड़ा? आधी शताब्‍दी कम नहीं होती, और इस दौर में शासन भी मोटा-मोटी एक ही पार्टी का रहा. क्‍या नीतियों में कमी रही या शासन की नीयत में? या समाज में गैर-बराबरी की संरक्षक सामंती, धार्मिक शक्तियां इतनी मजबूत रहीं कि बराबरी का स्‍वप्‍न अभी भी उतना ही दूर है? या यह गैर-बराबरी अब धर्म-जाति की अपनी-अपनी सत्‍ता, अस्मिता को कायम रखते हुए जाति विशेष के अंदर भी एक कैंसर की तरह चारों ओर फैल रही है?

    क्‍या इन कट्टर बहसों के धुरवान्‍तों में ‘आरक्षण’ शब्‍द भी एक ऐसे धर्म का यथार्थ नहीं होता जा रहा कि अपने-अपने भगवानों, पैगम्‍बरों ने जो कह दिया, कर दिया, उस पर बहस करना गुनाह होगा. जो बोले उसे फांसी पर लटका दो. क्‍या हर महत्‍वपूर्ण मुद्दे को ‘होली काऊ’ बनाना या घोषित करने से किसी का भी भला होने वाला है? क्‍या संविधान की आस्‍था इसकी इजाजत देती है? क्या यह मूल अधिकार, नीति निर्देशक तत्‍व और संविधान के संशोधन, समीक्षा और प्रगतिशील चेतना के खिलाफ नहीं है?

    समीक्षा, संशोधन के चंद उदाहरण :

    संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा भारतीय नौकरीशाही के उच्‍च पदों के लिए की जाने वाली भर्ती प्रक्रिया की कई बार समीक्षा की गयी है. इसमें सबसे प्रमुख है वर्ष 1974 में गठित कोठारी समिति, जिसने वर्ष 1976 में अपनी रिपोर्ट दी और संसद में बहस के बाद वर्ष 1979 की सिविल सेवा परीक्षा से उसे लागू किया गया. इसकी क्रांतिकारी सिफारिश अपनी मातृभाषाओं में उत्‍तर लिखने की छूट थी. अंग्रेजी का एकाधिकार समाप्‍त. वाकई करिश्‍माई था यह कदम. परीक्षा में बैठने वाले उम्‍मीदवारों की संख्‍या एक साथ दस गुना बढ गई और अपनी भाषा में पढ़े नौजवान पहली बार अंग्रेजी के दुर्ग में प्रवेश कर सके. क्‍या इस समीक्षा से फायदा पूरे देश को नहीं हुआ? क्‍या यह लोकतंत्र के हित में नहीं हुआ?

    इसके ठीक दस बरस बाद वर्ष 1989 में फिर प्रोफेसर सतीश चंद की अध्‍यक्षता में एक समिति बनी यह जांचने के लिए कि क्‍या कोठारी समिति की सिफारिशें ठीक हैं या नहीं? उनका कार्यान्‍वयन ठीक है? ठीक दस बरस बाद 1999 में प्रोफेसर योगेन्‍द्र कुमार अलघ की अध्‍यक्षता, फिर समीक्षा की गई. नई सरकार ने हाल ही में सीसेंट विवाद आदि के चलते फिर एक समिति गठित की है.

    क्‍या ऐसी समीक्षा लोकतंत्र के खिलाफ है? कतई नहीं, बल्कि यह ‘चलता पानी निर्मला’ वाली कहावत को सार्थक करती है, यानि जिस नदी का पानी चलता-बहता रहता है, वह निर्मल, शुद्ध बना रहता है, जबकि  तालाब का ठहरा हुआ पानी सड़ जाता है.

    इसीलिए आरक्षण को राष्‍ट्रहित में ऐसे तालाब में बदलने से बचाने की जरूरत है जिसमें राजनेता और समाज के स्‍वार्थी तत्‍व सिर्फ सत्‍ता की मछलियों की खातिर बदबू फैला रहे हैं. शिक्षा के मामलों में भी बार-बार समीक्षा हुई है. 1948 में राधाकृष्‍णन आयोग, 1964 में कोठारी आयोग आदि. इसके अलावा, डाक्‍टर जाकिर हुसैन, प्रोफेसर यशपाल समिति ने भी बहुमूल्‍य सुझाव दिए हैं. एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में बदलाव बार-बार के विवाद के बावजूद एक जीवंत लोकतंत्र का उदाहरण है.

    राज्‍यों के पुनगर्ठन, भाषा आदि के पक्षों पर भी बार-बार समीक्षाएं की गई हैं. प्रशासनिक आयोग का गठन, ज्ञान आयोग भी इसी वैज्ञानिक दृष्टि की कड़ी है. आजादी के बाद का सबसे ज्वलंत उदाहरण सूचना का अधिकार है. क्‍या अंग्रेजों के जमाने से लागू सरकारी गोपनीय नियम (ऑफिसियल सीक्रेट एक्ट, 1923) से देश चल सकता है? लालफीताशाही, भ्रष्‍ट्राचार से लड़ने के खिलाफ सूचना का अधिकार अधिनियम सबसे प्रभावी हथियार साबित हुआ है. कुछ विद्धानों के अनुसार यह संसद से भी बेहतर है.

    क्‍या ‘आरक्षण की बहस’ को भी संसद से मुक्‍त नहीं किया जाना चाहिए? क्‍या देश में बुद्धिजीवी, पत्रकार, संपादक, समाज विज्ञानी, शिक्षाविद, वैज्ञानिकों की टीम ऐसी समीक्षा या बहस-मुबाहिसा नहीं कर सकती?

    समाज में जातिवाद, विशेषकर ग्रामीण भारत में, के मद्देनजर आरक्षण की जरूरत अभी भी बनी हुई है. सही शिक्षा का अभाव, धार्मिक अंधविश्‍वास और वर्ण, धर्म की जकड़बंदी अभी अपनी अमानवीयता को नहीं छोड़ पाई है. मनुष्‍य-मनुष्‍य के बीच भेद का ऐसा कलंक दुनिया की किसी भी सभ्‍यता में न है, न सोचा जा सकता है. दुर्भाग्‍य यह कि ऐसा भयानक कलंक शताब्दियों तक न केवल टिका रहा, बल्कि और क्रूर होता गया. आजादी के बाद या कहें ब्रिटिश काल के अच्‍छे मानवीय पक्षों के सम्‍पर्क में ‘जाति प्रथा’ पर जोरदार हमला हुआ, पर यह राक्षस अभी मरा नहीं है. लेकिन क्‍यों? यदि एक दवा कारगर नहीं हो, तो दूसरी आजमाई जाए. यहीं पर आरक्षण को जारी रखने, मगर इसकी समीक्षा की अत्यंत जरूरत है.

    क्‍यों निर्धारित कोटा पूरा नहीं हो पाया? क्‍यों समान शिक्षा या अंतिम आदमी तक शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य पहुँचाने के बजाय पूरी नीतियां ‘क्रीमीलेयर’ बनाने में तब्‍दील हो गईं? मुकम्मल समीक्षा हो, देशव्‍यापी बहस हो और फिर कदम उठाया जाए.

    समीक्षा के लिए कुछ और जीवंत उदाहरण..

    दो वर्ष पहले भारतीय विदेश सेवा की अमेरिका में तैनात एक महिला देवयानी खोब्रागडे चर्चा में आई थीं. कारण उनकी नौकरानी ने उन पर अत्‍याचार के आरोप लगाए थे. अमेरिकी कानूनों के अनुसार मामला बहुत गंभीर था, लेकिन भारत में महिला अधिकारी के पक्ष में जो आवाजें उठीं, वे उनकी जाति समर्थक ज्‍यादा थीं. तभी पता चला कि अत्‍याचारी दलित है और नौकरानी ईसाई.

    खैर यह पक्ष अलग बहस की मांग करता है, लेकिन आरक्षण की समीक्षा के संदर्भ महत्‍वपूर्ण बात यह है कि श्रीमती खोब्रागडे के पिता भी आईएएस सेवा में थे और दलित आरक्षण ले चुके थे. उनकी बेटी भी उसी का फायदा लेकर विदेश सेवा में है. इनके बच्‍चे, जो अमेरिका में पढ़ रहे हैं, भी मौजूदा कानून के अनुसार दलित आरक्षण के हकदार हैं.

    क्‍या वाकई इनके बच्‍चों को आरक्षण मिलना चाहिए?

    अमेरिका, इंग्‍लैंड में रहते, पढ़ते ये कौन सी अस्‍पृश्‍यता, सामाजिक भेदभाव के शिकार हुए?

    आजादी के बाद दलितों की वह तीसरी-चौथी पीढ़ी, जिसके पिता, दादा उच्‍च सरकारी सेवाओं, विश्‍वविद्यालयों में रहे हैं, महानगरों में जिनका जीवन सबसे पॉश कालोनियों में बीता है, क्‍या वे इस सामाजिक रियायत के हकदार हैं?

    मौजूदा वक्‍त में ऐसे हजारों सरकारी अधिकारी लाखों सरकारी कर्मचारी हैं, जिनके बच्‍चों ने गांव देखा तक नहीं है, वे पढ़ने के लिए इंग्‍लैंड, अमेरिका में रहे हैं, लेकिन भारत में कदम रखते ही उन्‍हें आरक्षण का सहारा चाहिए. क्‍या यह समता, बराबरी के सिद्धांत के वैसे ही खिलाफ नहीं है जैसे सवर्णों को मिला जन्मजात विशेषाधिकार.

    क्‍या खुर्जा के किसी गांव में मजदूर, मोची का लड़का दलितों के बीच पैदा हुए ऐसे सवर्णों और अभिजात्यों के रहते कभी आरक्षण का फायदा उठा पाएगा?

    यदि जरूरत हो तो आरक्षण का प्रतिशत और बढ़ाया जाए, लेकिन समृद्ध (क्रीमी लेयर) को इससे तुरंत बाहर करने की जरूरत है. इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर के सिद्धांत को एससी/एसटी कोटे पर भी लागू करने की हिदायत दी थी. ओबीसी के लिए यह सिद्धांत कुछ कमियों के बावजूद लागू तो हुआ मगर बाद में उसकी सीमा बढ़ा दी गई. राजनीतिक दबाव या लाभ, लोकतंत्र की दुहाई देते हुए इस जरूरी समानता के खिलाफ दलितों का एक वर्ग आज तक डटा हुआ है. और यह वर्ग दलितों के बीच पैदा हुए नए सवर्णों का है. आरक्षण के नाम पर सामाजिक असंतोष की जड़ें यहीं पर हैं. चार बरस पहले राजस्‍थान के गुर्जरों का भी यही दर्द था. पूरा देश जानता है कि राजस्‍थान के मीणाओं ने आदिवासियों के लिए आरक्षित कोटा कैसे हड़प लिया है, जो कोटा बस्‍तर, नागालैंड, लद्दाख, भील, झारखंड के वास्तविक आदिवासियों और उनकी संस्‍कृति, पिछड़ेपन को ध्‍यान में रखकर नियत किया गया था, पचास के दशक में दबाव की राजनीति के तहत मीणा एसटी समूह में शामिल हो गए, क्‍योंकि वे अपेक्षाकृत समृद्ध हैं, तीन-चार पीढ़ी से प्रशासन में हैं, अत: दौड़ में आगे भी. उसी क्षेत्र में रहने वाले गुर्जर इसी से आहत हैं कि वे भी दबाव बनाकर क्‍यों नहीं आदिवासी के फायदे के हकदार बनें? नतीजा -हिंसा, आंदोलन, रेल रोको, सड़क तोड़ो आदि. फिर जाट भी इसी दौड़ में शामिल हुए. ताजा मामला गुजरात के पटेलों का है, जिसे बिहार के नीतिश, लालू ने भी तुरंत समर्थन दे दिया है. कभी पटेलों की मांग के खिलाफ बोलने वाली कांग्रेस पीछे से पटेलों की मांग को हवा दे रही है. भारतीय जनता पार्टी का रवैय्या भी मंडल आयोग से लेकर जाट आरक्षण तक ऐसा ही रहा है. इस राजनीतिक, सामाजिक विकृति को एक बड़े समीक्षा आयोग से ही हल किया जा सकता है.

    यूपीएससी के ताजा परिणाम :

    भारत की उच्‍च नौकरशाही के लिए आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम भी आरक्षण समीक्षा की तुरंत मांग करते हैं. पिछले दो दशकों में गांव-देहात, पिछड़े क्षेत्रों से आने वाले उम्‍मीदवार लगातार कम हो रहे हैं. वे चाहे दलित हों या सवर्ण. वर्ष 1979 में जब कोठारी समिति ने अपनी भाषा में परीक्षा देने की इजाजत दी थी, तो पहली पीढ़ी के पढ़े, लिखे, गांवों में रहने वाले मोची, बढ़ई, कुम्‍हार, जाटव, मजदूरों के बच्‍चे सफल हुए थे. अब वे इस परिदृश्य से पूरी तरह गायब हैं. उनका कोटा वे हड़प रहे हैं, जो शहरों में हैं, जिनके माता-पिता अफसर हैं, जो दिल्‍ली के चाणक्‍यपुरी और शाहजहां रोड में रहते हैं और जिनका माध्‍यम अंग्रेजी है. मौजूदा स्थिति की क्रीमी लेयर अपने ही दलित भाईयों का हक मार रही है. भाषा, आर्थिक स्थिति के सभी आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि ओबीसी की तरह क्रीमी लेयर का प्रावधान एससी/एसटी कोटा में भी अविलंब और सख्ती से लागू होना चाहिए.

    कुछ बातें क्रीमी लेयर के बारे में..

    मंडल कमीशन के निर्णय में क्रीमी लेयर शामिल हुआ था और बहुत अच्‍छी मंशाओं के साथ. लेकिन यहां भी राजनीति हुई. समानता के सिद्धांत पर इसे भी एससी/एसटी पर लागू किया जाना चाहिए था. ओबीसी पर लागू भी हुआ, तो बड़े हास्‍यापद ढंग से हुआ है. जिस देश की सरकारें और योजना आयोग वीपीएल के मामले में प्रतिदिन प्रति व्‍यक्ति छब्‍बीस रूपए की आय जीने के लिए पर्याप्‍त मानता हो, वही क्रीमी लेयर को तब मानता है, जब प्रतिदिन दो-तीन हजार से ज्‍यादा आय हो. क्‍या प्रति व्‍यक्ति आय और क्रीमी लेयर निर्धारण में कोई वैज्ञानिक दृष्टि अपनाई जाती है या जैसे सवर्ण अपने लिए कोई न कोई जुगाड़ ढूंढ लेते हैं वैसे ही लोग इन वर्गों में आरक्षण के नाम पर पैदा हो गए हैं? भारतीय परिवेश में, अमीरों से गरीब नहीं जीत सकते, वे चाहे किसी भी जाति, धर्म के हों.

    जेएनयू का अनुभव इस समीक्षा में मदद कर सकता है और यह है भी उतना है वैज्ञानिक. इसमें जाति का महत्‍व तो है, लेकिन उतना ही महत्व वंचित सुविधाओं का भी है. जैसे इसके मुख्‍य घटक हैं - जहां पैदा हुए, बचपन बीता, आरभिक शिक्षा हुई? शिक्षा का माध्‍यम, आर्थिक स्थिति, लड़का या लड़की, पिता का व्‍यवसाय, कॉलेज, शिक्षा, जाति आदि. इस फामूले में एक दलित, जो बस्तर, झारखंड या उड़ीसा, केरल के गांव में पला-बढ़ा है, उसे दिल्‍ली के चाणक्‍यपुरी में पले-बढ़े से पहले रखा जाएगा. सिर्फ जाति के प्रमाण-पत्र से काम नहीं चलेगा.

    पिछड़ा आयोग के सदस्‍य रहे और जाने-माने समाजशास्‍त्री धीरूभाई सेठ की टिप्‍पणी भी यहां विचारणीय है - ‘आयोग का मेरा अनुभव मुझे बताता है कि जाति प्रथा का असर मंद करने के लिए जो ताकतें और प्रक्रियाएं खड़ी हुई थीं, वे अब खुद जाति प्रथा की अनुकृति बनती जा रही हैं. प्रगति के कई सोपान चढ़ चुकी पिछड़ी जातियों का एक बड़ा और मजबूत निहितस्‍वार्थ बन चुका है. वे अपने से नीची जातियों के साथ वही सुलूक कर रहे हैं जो कभी सवर्णों ने उनके साथ किया था. मैं आयोग की पहली टीम का सदस्‍य था. कुल मिलाकर स्थिति यह बनी है कि आयोग के सदस्‍य, उससे जुड़ी नौकरशाही और पूरा का पूरा क्षेत्र ही इसी जबरदस्‍त निहितस्‍वार्थ की नुमाइंदगी करता नजर आता है. ये लोग सब मिलकर पूरी कोशिश में रहते हैं कि किसी भी तरह से पिछड़ी जातियों को अत्‍यधिक पिछड़े और कम पिछड़े में वर्गीकृत न होने दिया जाए. जब मैं आयोग में था उस समय भी प्रभुत्‍वशाली पिछड़ी जातियों द्वारा ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ प्रतिरोध होता था.’

    ‘आयोग की पहली टीम का ज्‍यादातर वक्‍त तो मंडल आयोग द्वारा बनाई सूची को तर्कसंगत बनाने में ही खर्च हो गया, क्‍योंकि सूची में बड़ी खामियां थीं. अब स्थिति यह है कि मजबूत पिछड़ी जातियों के हितसाधक आरक्षण के फायदे निचली ओबीसी जातियों तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं. खासतौर पर दक्षिण के ओबीसी, जिन्‍हें सबसे पहले आरक्षण मिल गया था. इन तगड़ी ओबीसी जातियों को सत्‍ता भी मिल गई है. वे आरक्षण के फायदे अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते. जो समुदाय पिछड़े नहीं रह गए हैं, उनकी शिनाख्‍त नहीं की जा रही है, और न की जाएगी. इंदिरा साहनी वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के खिलाफ है यह रवैया. लोकतांत्रिक संस्‍थाओं की एक समस्‍या होती है कि एक सीमा के बाद नौकरशाही और राजनीतिक हित मिलकर उन्‍हें आपस में होड़ कर रहे हितों के औजार में बदल देते हैं. यह हमारे लोकतांत्रिक निज़ाम के पिछड़ेपन का द्योतक है.’ (‍पृष्‍ठ, 102, 103 और 105. सत्‍ता और समाज, संपादन - अभय कुमार दुबे).

    पिछड़ों के लिए आरक्षण की पूरी बहस पर इससे बेहतर टिप्‍पणी नहीं हो सकती. पुस्‍तक में ‘आरक्षण के पचास साल’ खंड के अंतर्गत चार उप-शीर्षकों में इस मुद्दे पर विचार किया गया है. ये अध्‍याय हैं - धर्म, जाति निरपेक्ष नीति के विविध आयाम, आरक्षण विरोधियों के तर्कों की असलियत, आरक्षण नीति: एक पुन: संस्‍कार की आवश्‍यकता, अति पिछड़ों और निजी क्षेत्र में आरक्षण का सवाल. धीरूभाई के शब्‍दों में - ‘आरक्षण के जरिए प्रगति के अवसरों को हड़पने की इस होड़ ने हमारी लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति को अलोकतांत्रिक रुझानों से ग्रस्‍त कर दिया है. इसके कारण झूठे-सच्‍चे आश्‍वासन दिए जाते हैं, और अंतत: समाज को तनावग्रस्‍त होना पड़ता है. बिरादरियों के बीच का भाईचारा खत्‍म होता जा रहा है. गुज्‍जरों को दिया गया आश्‍वासन तो एक उदाहरण है, मुसलमानों को धर्म आधारित आरक्षण देने के अध्‍यादेश तक जारी किए जा चुके हैं. हिंदू समाज की संरचना की जानकारी रखने वाला कोई भी प्रेक्षक जानता है कि प्रजापतियों (कुम्‍हारों) को समाज में अछूत या दलित नहीं माना जाता, लेकिन पिछले दिनों उन्‍हें (प्रजापतियों को) भी उत्‍तर प्रदेश में अनुसूचित जाति का दर्जा देने का प्रयास किया जा चुका है.’ (पृष्‍ठ 244).

    संक्षेप में (आरक्षण नीति : एक पुन: संस्‍कार की आवश्‍यकता) धीरूभाई के निष्‍कर्ष हैं : ‘इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि आरक्षण का अनुचित लाभ उठा रहे समुदायों की शिनाख्‍त की जाए और उन्‍हें इस लाभ से बाहर किया जाए. आरक्षण नीति का पुन: संस्‍कार करने के लिए आरक्षित समुदायों के बीच पूरे देश में न केवल राज्‍य स्‍तर पर, बल्कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अनिवार्य रूप से श्रेणियां बनाना उचित होगा. मसलन, अनुसूचित जनजातियों में माली और जाटव जैसे समुदाय हैं, जो वाल्‍मीकियों और पासियों के मुकाबले बहुत आगे बढ़ चुके हैं. उप-श्रेणियां बनाने से यह भी पता लग सकेगा कि आरक्षण का लाभ उठाने से वंचित रह गई जातियां कौन-कौन सी हैं और अत्‍यधिक कमजोर जातियों को आरक्षण का लाभ उठाने के काबिल बनाने के कौन-कौन से कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं. अगर इन पहलुओं पर जोर नहीं दिया जाएगा, तो पूरी बहस आरक्षण के प्रतिशत के आसपास ही सिमट कर रह जाएगी. पिछड़े वर्गों में घुस आए अगड़े समुदायों और उनके बीच बन चुके जातिगत कोटिक्रम का स्‍वार्थ यही है.’ (पृष्‍ठ 246 और 247).

    एम्‍स, अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय सरीखे अल्‍पसंख्‍यक विश्‍वविद्यालय, शिक्षण संस्‍थान, विदेशी विश्‍वविद्यालयों में आरक्षण का सवाल जैसे सैंकड़ों ज्‍वलनशील बहसें हवा में जिन्‍दा हैं और कभी भी 1990 के मंडल आयोग की याद ताजा करा सकती हैं. कुछ वर्ष पहले एम्‍स में यह दोहराया जा चुका है. गुजरात में पटेल लामबंद हो रहे हैं. जाट और गुर्जर पहले से ही सड़कों पर हैं. वक्‍त का तकाजा है कि धीरूभाई सेठ जैसे समाजशास्‍त्री, चिंतक, गैर-पार्टी कार्यकर्ता की बातों पर ध्‍यान देकर सरकार ‘क्रीमीलेयर’ को बाहर करते हुए आरक्षण को और प्रभावी बनाए. देशहित के लिए भी और समाज के हित के लिए भी यह आवश्यक है.

    हाल ही में हुए एक महत्‍वपूर्ण अध्‍ययन ‘कास्‍ट इन ए डिफरेंट मोल्ड : अंडरस्टैंडिंग द डिस्क्रिमिनेशन’ (लेखक : राजेश शुक्‍ला, सुनील जैन, प्रीति कक्‍कर. बिजनेस स्‍टैंडर्ड का प्रकाशन 2010) में दिए गए तथ्‍य सरकार और समाज की आंखे खोलने वाले हैं. संक्षेप में जहां उत्‍तर प्रदेश में एक दलित की औसत आय 39,000 रुपए प्रतिवर्ष है, वहीं पंजाब में यह 63,000 है. बिहार में ओबीसी की औसत आय 40,000 है, जबकि महाराष्‍ट्र में 74,000 हजार. कर्नाटक में एक आदिवासी की औसत आय प्रतिवर्ष 62,000 रुपए है, तो बिहार में सवर्ण जाति की भी सिर्फ 51,000. इतना ही अंतर आदिवासी जनता के बीच है. एक अनपढ़ आदिवासी परिवार की औसत आय केवल 22 हजार 500 रुपए प्रतिवर्ष है, जबकि आदिवासी ग्रेजुएट की 85,000. गांव के आदिवासी की औसत आय 37,000 रुपए है, तो शहरी की आय एक लाख से ज्‍यादा. यानि देश के अलग-अलग हिस्‍सों में सामाजिक, आर्थिक पिछड़ेपन की तस्‍वीर इतनी भिन्‍न है कि उसे सिर्फ जाति के नाम पर इकहरे मानदंड से व्‍याख्‍यायित नहीं किया जा सकता. इस पुस्‍तक के सभी आंकड़े धीरूभाई सेठ की स्‍थापनाओं को प्रमाणित करते हैं.

    दिल्‍ली के चाणक्‍यपुरी में रहने वाले दलित, आदिवासी आज किसी भी पैमाने से आरक्षण के हकदार नहीं हैं. बल्कि वे अपनी ही जाति के वंचितों की बाधा बन रहे हैं. आज यदि आरक्षण और अपनी भाषा के अप्रतिम योद्धा लोहिया होते तो धीरूभाई सेठ, राजेंद्र सच्‍चर, वी. जी. वर्गीज और दूसरे विद्वानों की तर्ज पर खुद अपने नारे और उसके सिद्धांत को बदल देते. वे पांच साल इंतजार के हक में भी नहीं थे! 68 वर्ष के बाद तो आरक्षण की समीक्षा होनी ही चाहिए. इसे खत्म करने की तो फिलहाल सोची भी नहीं जा सकती है.

सम्पादकीय