गरीब दलितों के हित में लागू हो एससी/एसटी पर क्रीमी लेयर नियम !

    क्‍या संसद और मंत्रि-परिषद को असमानता के आयामों का पता नहीं है?

    क्रीमी लेयर के महत्‍वपूर्ण मुद्दे पर संदिग्‍ध और टालू किस्म का है ‘प्रेस’ का रवैया

    भारतीय संसद समानता के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुए क्रीमी लेयर पर तुरंत कानून बनाए

    एससी/एसटी के संदर्भ में क्रीमी लेयर पर सरकार जानबूझकर कर रही है समानता के सिद्धांतों की हत्या

    भारतीय संविधान में प्रदत्‍त समानता की खातिर एससी/एसटी समुदायों पर तुरंत क्रीमी लेयर लागू की जाए

    प्रेमपाल शर्मा

    सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक समानता के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर के सपनों को साकार करने में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका असंदिग्‍ध रही है. ताजा उदाहरण है पिछले हफ्ते प्रोन्नति में आरक्षण की सुनवाई करते वक्‍त क्रीमी लेयर को समझने-समझाने के क्रम में जस्टिस कूरियन का सहज प्रश्‍न कि जब ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्‍यवस्‍था है, तो यह एससी/एसटी में क्‍यों नहीं? उन्‍होंने न्‍यायालय के एक छोटे से उदाहरण से जानने की कोशिश की कि यदि सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश एससी हों और उनका ड्रायवर भी, तो ऐेसे में बराबरी ओर समानता का क्‍या सिद्धांत होगा? जाहिर है कि वहां उपस्थित कोई भी विद्वान वकील उनकी इस बात का जबाव नहीं दे पाया, सिवाय इस वाक्य के कि यही कानून है. माननीय न्‍यायाधीश ने इस प्रश्‍न पर विचार के लिए इस मामले को संविधान पीठ को सोपने का सुझाव दिया है.

    क्‍या हमारी सर्वोच्‍च संस्‍था संसद और मंत्री परिषद को असमानता के इन आयामों का पता नहीं है? और नौकरशाही? उसे खूब पता है, लेकिन क्‍या उसे बोलने का अधिकार है? आखिर बोलना भी पड़ा, तो न्‍यायालय को ही, वह भी तब, जब दशकों से हर राज्‍य और केंद्र सरकार के पाले में लुढ़कती आरक्षण की गेंद सुप्रीम कोर्ट में टकराई. न जाने कितने ऐसे प्रश्‍नों पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने हस्‍तक्षेप किया है. गंगा-यमुना के प्रदूषण के प्रश्‍न हों, विचाराधीन कैदियों के या हिंदू-मुसलमान की वैवाहिक-सामाजिक समस्‍याओं में तलाक, उत्‍तराधिकार के मुद्दे. मानो न्‍यायापालिका भारतीय लोकतंत्र का ‘क्‍लीनर’ हो. कभी-कभी ‘प्रेस’ नामक चौथा स्तंभ भी अपनी भूमिका निभाता रहा है, लेकिन क्रीमी लेयर के इतने महत्‍वपूर्ण मुद्दे पर उसका आचरण या रवैया संदिग्‍ध और अत्यंत टालू किस्म का ही कहा जाएगा. संविधान में न्‍यायापालिका, कार्यपालिका और विधायिका को प्रदत्त स्‍वतंत्रता सचमुच हमारे संविधान की रीढ़ है.

    लोकतंत्र में हर वोट का महत्‍व है, लेकिन जब पूरी राजनीति वोट को गिरोह में बदलकर चलती है, तो लोकतंत्र का प्रयोजन ही चौपट हो जाता है. पूना पैक्‍ट के तहत समाज के सदियों से अस्‍पृश्‍यता से प्रताड़ित दबे-कुचले समुदायों को कुछ रियायतें दी गईं, जिन्‍हें संविधान में भी सर्वसम्‍मति से शामिल किया गया. यथास्थितिवादी कुछ नासमझों को छोड़कर पूरे देश की राजनीति में इसे स्‍वीकार्यता मिली. हजारों साल से ठहरे जातिवादी समाज के तालाब में यह पहली कंकड़ी थी. तत्‍कालीन राजनेताओं ने भी इसे सही परिप्रेक्ष्‍य में समझा. जहां डॉ. आंबेडकर ने स्‍पष्‍ट किया कि ‘यह वैशाखी अनंत काल के लिए नहीं है. शुरू में यह दस वर्ष तक होगी और यदि जरूरत हो तभी इसे आगे बढ़ाया जाए.’ वहीं जवाहरलाल नेहरू ने आरक्षण व्‍यवस्‍था को पूरा समर्थन देते हुए यह भी स्‍पष्‍ट किया कि ‘प्रशासनिक योग्‍यता, क्षमता की कीमत पर आरक्षण स्‍वीकार्य नहीं है.’

    तथापि, धीरे-धीरे ही सही मगर इस व्‍यवस्‍था ने सामाजिक बराबरी की तरफ कुछ कदम बढ़ाए हैं, लेकिन नेहरु-आंबेडकर के कथनों से बचकर. वर्ष 1979 में कोठारी समिति की सिफारिशों से जब अपनी मातृ-भाषाओं में यूपीएससी ने सिविल सेवा परीक्षा में उत्‍तर देने की छूट दी, तो सबसे ज्‍यादा फायदा, समाज के इन्‍हीं गरीबों, वंचितों को मिला. वर्ष 1990 में 27 प्रतिशत आरक्षण अन्‍य पिछड़ा वर्ग और ओबीसी को भी देने का फैसला सरकार ने लिया. हालांकि कई लड़ाई-झगड़ों के बाद यह वर्ष 1994 से लागू हुआ. यहां फिर सुप्रीम कोर्ट ने ही रास्‍ता दिखाया – ‘इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार के मामले में.’

    'क्रीमी लेयर' शब्‍द भी पहली बार तभी सुप्रीम कोर्ट के आदेश में शामिल हुआ, इस स्‍पष्‍ट स्‍थापना के साथ कि आरक्षण का लाभ नीचे तक पहुंचना चाहिए, यह इन वर्गों के अमीर उर्फ क्रीमी लेयर तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए. ओबीसी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्‍नति में आरक्षण को साफ नकार दिया था और यह भी कहा था कि पदो‍न्‍नति में एससी/एसटी को भी पांच वर्ष के बाद जारी रखने के लिए सरकार ओबीसी के लिए समीक्षा करे.

    वर्ष 1994 में जिस क्रीमी लेयर की सीमा ओबीसी के लिए एक लाख रखी गई थी, कई बार के संशोधन के बाद हाल ही में इसे राजनीतिक कारणों के चलते बढ़ाकर आठ लाख कर दिया गया है. लेकिन एससी/एसटी के संदर्भ में सरकार ने जानबूझकर आंखें मूंद रखी हैं. यहीं समानता के सिद्धांतों की हत्या हो रही है, जिसे न्‍यायाधीश कूरियन ने पकड़ा है.

    यदि पिछले बीस वर्षों के यूपीएससी या राज्‍यों की उच्‍च सेवाओं के आंकड़े देख लिए जाएं, तो उनमें अधिकांश इन समुदायों के अमीरों के बच्‍चे ही सफल हुए हैं. यह उनकी स्‍कूली शिक्षा, माध्‍यम और मां-बाप हैसियत जैसे विवरणों से जाहिर है. यानि समानता की तरफ बढ़ने के बजाय इन समुदायों की क्रीमी लेयर ही सारी सुविधाओं को हड़प रही है, जबकि निचला हिस्‍सा उतना ही वंचित है. खुर्जा के एक गांव की शांति बाल्‍मीकि जमादारिन और छीतरमल जाटव आज भी वही हैं, जहां उनकी तीन-चार पूर्व पीढ़ियां थीं, क्योंकि इनका मुकाबला दिल्‍ली में बैठे उनकी ही जाति के वरिष्‍ठ नौकरशाहों, प्रोफेसरों, राजनेताओं, मंत्रियों के उन बच्‍चों से है, जो अंग्रेजी माध्‍यम, मंहगी कोचिंग, पब्लिक स्‍कूलों में पढ़े हैं. कई तो अमेरिका, इंग्‍लैंड में पढ़कर भी आरक्षण की सुविधाओं में शामिल हैं. नौकरशाही में तो ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं, जब तीसरी पीढ़ी कलक्‍टर, एसपी या जज है.

    यह सब जानते हुए भी सभी ने न सिर्फ चुनी हुई चुप्‍पी साधी हुई है, बल्कि कभी कोई आवाज उठे भी तो उसे ब्राह्मणवादी, सवर्ण, मनुवादी और आरक्षण विरोधी घोषित करके, यहां तक कि पहले जाति खत्म करने जैसे कुतर्क देकर, घेरकर चुप करा दिया जाता है. क्रीमी लेयर में रईसी जीवन जीते मगर अस्‍पृश्‍यता, दलित-शोषित का बैनर थामे उन गिरोहों से भी सावधान रहना होगा, जो तुरंत सिर्फ झूठी-मनगढ़ंत आंकड़ेबाजी पर उतर आते हैं. संविधान की आत्‍मा आंकड़ों से परे जाकर समानता में निहित है और इसलिए क्रीमी लेयर का सिद्धांत ओबीसी में एक तर्क के साथ दो दशक से लागू है. इस कसौटी पर इसे अभी तक एससी/एसटी पर लागू न करना पूरी व्‍यवस्‍था पर सवालिया निशान लगाता है.

    कहने का तात्पर्य यह है कि सुविधा के जैसे कंगूरे सवर्णों में रहे हैं, वैसे ही कंगूरे इन तथाकथित दलितों के समुदायों में भी बन गए हैं. यह भी वैसे ही बिलबिलाने लगे हैं जैसे आरक्षण विरोधी. माना कि सत्‍तर वर्षों में इनकी भागीदारी बढ़ी है, लेकिन इसे और चुस्‍ती से लागू किया जाना चाहिए. क्रीमी लेयर का नियम इन पर लागू करना, आरक्षण का विरोध नहीं उसे सुधारना है, उन्‍हीं के गरीब समुदायों के हित में. इन समुदायों के गरीबों को भी एससी/एसटी की ‘क्रीमी लेयर’ वैसे ही बरगला लेती है जैसे वर्णवादी व्‍यवस्‍था पूरे समाज को शोषित कर रही थी.

    जाने-माने समाजशास्‍त्री, राजनीतिशास्‍त्री धीरू भाई सेठ ने अपने अन्‍य पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्‍य के रूप में आरक्षण व्‍यवस्‍था में लगातार संशोधन, परिवर्तन की बात उठाई थी. उनका तर्क इसी क्रीमी लेयर या उन जातियों को बाहर करने का था, जो इसका लाभ पिछले सत्‍तर सालों में ले चुकी हैं. जाटव, राजस्‍थान के मीणा आदि उसी में आते हैं. धीरूभाई सेठ की टिप्‍पणी भी यहां विचारणीय है– ‘आयोग का मेरा अनुभव मुझे बताता है कि जाति-प्रथा का असर मंद करने के लिए जो ताकतें और प्रक्रियाएं खड़ी हुई थीं, वे अब खुद जाति-प्रथा की अनुकृति बनती जा रही हैं. ये लोग सब मिलकर पूरी कोशिश में रहते हैं कि किसी भी तरह से पिछड़ी जातियों को अत्‍यधिक पिछड़े और कम पिछड़े में वर्गीकृत न होने दिया जाए. वे आरक्षण के फायदे अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते. जो समुदाय पिछड़े नहीं रह गए हैं, उनकी शिनाख्‍त नहीं की जा रही है, और न की जाएगी. इंदिरा साहनी वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के विरोध में जाता है यह रवैया. लोकतांत्रिक संस्‍थाओं की एक समस्‍या होती है कि एक सीमा के बाद नौकरशाही और राजनीतिक हित मिलकर उन्‍हें आपस में होड़ कर रहे हितों के औजार में बदल देते हैं. यह हमारे लोकतांत्रिक निज़ाम के पिछड़ेपन का चिन्ह है.’ (संदर्भ : ‘सत्‍ता और समाज’ संपादन - अभय कुमार दुबे).

    हाल ही में हुए एक महत्‍वपूर्ण अध्‍ययन ‘कास्‍ट इन ए डिफरेंट माउल्‍ड‘ (caste in a different mould; understanding the discrimination) लेखक : राजेश शुक्‍ला, सुनील जैन, प्रीति कक्‍कर, बिजनेस स्‍टैंडर्ड का प्रकाशन 2010) में दिए गए तथ्‍य आंखे खोलने वाले हैं. संक्षेप में जहां उत्‍तर प्रदेश में एक दलित की औसत आय 39,000 रुपये प्रतिवर्ष है, वहीं पंजाब में यह 63,000 है. बिहार में ओबीसी की औसत आय 40,000 रुपये है, जबकि महाराष्‍ट्र में 74,000. कर्नाटक में एक आदिवासी की औसत आय प्रतिवर्ष 62,00 रुपये है, तो बिहार में सवर्ण जाति की भी सिर्फ 51,000. इतना ही अंतर आदिवासी जनता के बीच भी है. एक अनपढ़ आदिवासी परिवार की औसत आय केवल 22,500 रुपये प्रतिवर्ष है, जबकि आदिवासी ग्रेजुएट की 85,000. गांव के आदिवासी की औसत आय 37,000 रुपये है, तो शहरी की 1 लाख से ज्‍यादा. यानि देश के अलग-अलग हिस्‍सों में सामाजिक, आर्थिक पिछड़ेपन की तस्‍वीर इतनी भिन्‍न है कि उसे सिर्फ जाति के नाम पर इकहरे मानदंड से व्‍याख्‍यायित नहीं किया जा सकता. इस पुस्‍तक के सभी आंकड़े धीरूभाई की स्‍थापनाओं को प्रमाणित करते हैं.

    क्रीमी लेयर लागू करने से गुजरात के पाटीदार, पटेल, जाट, मराठा, आंध्र प्रदेश के कापू, राजस्थान के गुर्जर जैसे आंदोलनों को भी आसानी से सुलझाया जा सकता है. भारत सरकार ने ऐसी ही हलचलों, असंतोष को देखते हुए अन्‍य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करके उसे यथाशीघ्र रिपोर्ट देने के लिए कहा है. बिहार, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल जैसे राज्‍यों में अति पिछड़ा वर्ग जैसी कुछ कोटियां आय, व्‍यवसाय जैसे आधारों पर बनाई गई हैं. सरकार के पास एससी/एसटी कर्मचारियों की संख्या, प्रतिशतता के साथ-साथ आर्थिक, शैक्षिक और उनकी सामाजिक उन्नति के आंकड़े भी उपलब्‍ध हैं, तो फिर भारतीय संविधान में प्रदत्‍त समानता की खातिर क्‍यों न तुरंत क्रीमी लेयर को इन समुदायों पर लागू किया जाए. भारतीय संसद भी समानता के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुए इस पर तुरंत कानून बनाए. सुविधाजीवी, जातिवादी, क्रीमीलेयर समर्थक गिद्ध-बुद्धिजीवियों से भी पहले इस मसले पर राजनीतिक बखेड़ा न करने का अनुरोध किया जाए, नहीं मानने पर उन्हें कड़ाई से चुप कराया जाए. क्योंकि यही वक्‍त की जरूरत है. सरकार का यह कदम जाति व्‍यवस्‍था का कमजोर भी करेगा. सुप्रीम कोर्ट देश और सरकार को यह सुनहरा मौका दे रहा है.

सम्पादकीय