एक खुला पत्र चितचोर श्री माल्या जी के नाम

    हम आपको और आपके जैसों को ही डिजर्व करने को अभिशप्त हैं, इस बात का हमें पूरा यक़ीन है..!

    व्यंग्य : रवींद्र कुमार

    हे माधव ! ये मैं क्या सुन रहा हूं कि आपको डर है कि कहीं आपके दिल्ली उतरते ही लोग आपको तिहाड़ में न डाल दें ! सर जी ! कर दी न दिल तोड़ने वाली बात. इसका मतलब फिर तो आप दिल्ली और हम दिल्ली वालों को समझे ही नहीं. सर जी ! तिहाड़ दिल्ली की पहचान नहीं. दिल्ली दिल वालों की है. पर आपका भी क्या कुसूर? आपको वादियों में, समुद्र तटों से और सागर पर हिचकोले लेती ‘याट’ से और गगन विहार के श्रम साध्य क्रिया-कलापों से दो क्षण फुरसत के मिलते, तो न दिल्ली की नब्ज़ पहचानते..

    हे नंदनंदन ! मैं दिल्ली का रहने वाला हूं, मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि आपका बाल भी बाँका न होगा. आपने वो कहावत नहीं सुनी, जाको राखे साईंया.. कौन नासमझ और मूढ़ कहता है कि अच्छे दिन नहीं आए.. हे गिरधर गोपाल ! आप खातिर जमा रखें.. ये लीला.. ये खेल तमाशा यूँ ही चलता रहेगा.. कभी आपका पासपोर्ट रद्द होगा, कभी बहाल होगा..

    हे कुंजबिहारी ! गोया कि आपको वन-वन.. कुंज-कुंज केलि करने को पासपोर्ट दरकार है क्या? ये व्यवस्था बावली आपकी लीला समझने में नितांत असमर्थ है. “होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे..” आपके केस ने इनका वही हाल किया है जैसे कि बावले गाँव में ऊंट आया समझो. सब अपनी-अपनी हाँक रहे हैं. फिर इन्हें कौनो औउर काम भी तो नहीं. चैनल चलाने हैं. अखबार छापने हैं.. विपक्ष को भी कछु न कछु बोलन कू परि.. परि कि न परि..?

    हे राधावल्लभ ! कलैंडर सृजनहारी ! ये पैसा, ये धन-सम्पति क्या है? हाथ का मैल ही है न. क्या तेरा, क्या मेरा.. दुनिया चार दिन का रैन बसेरा.

    हे चार्वाक के दर्शन वाहक ऋषिवर ! ज़माने को अभी सदियां लगेंगी पार्थसार्थी, आपको और आपकी लीला को समझने में. हे प्रजापति ! कभी क्लीन शेव, कभी हाइकू, कभी फ्रेंच कट, कभी करीने से छँटी हुई फुल दाढ़ी.. ये जीवन है.. इस जीवन का यही है.... यही है.....

    हे यदुराज ! आपके सहस्र रूप, आपको कोटि-कोटि बल्कि यूँ कहिये, साठ हज़ार पाँच सौ करोड़ बार प्रणाम. लगे हाथों तिहाड़ की भी बात कर लें. हे गगन विहारी ! आपको पता नहीं तिहाड़ में क्या क्या नहीं उपल्ब्ध ? आप तो बस अपनी ‘डिजायर’ बताईयेगा वहाँ ‘हुकुम मेरे आका’ कहने वालों को आपको ढूंढने नहीं जाना पड़ेगा. वे स्वयं आपसे सम्पर्क साध लेंगे. यक़ीन न हो तो सहारा श्री से पूछ देखियेगा.

    हे सोमरस सौदाई ! आपके द्वारा निर्मित सोमरस के विभिन्न-विभिन्न पेय पदार्थों से ही ये विश्व चलायमान है, गतिमान है, शक्तिमान है, आपसे बेहतर इसे कौन जानता है. आपने जैसे ही भृकुटि टेढ़ी की और कहा कि ओए कलम घिस्सू पत्रकारो ! वो दिन भूल गए जब चाटुकारों में प्रथम आने की रेस में शामिल थे तुम सब. वो सुरा.. वो सुंदरी... आपने जरा सा ही हिंट दिया था कि आपके पास सबके स्टे और पीने ठहरने का रेकार्ड है, तो बस सबको साँप सूंघ गया. हे विश्वकर्मा ! सब ऐसी चुप्पी लगा गए कि जैसे आपसे वाकिफ ही नहीं. हे बंसी बजैया ! आप तो बस ऐसे ही बजाते रहो.. बजाते रहो..!

    हे हैट, सिगार, विचित्र वस्त्र धारक ! आप किसी बैंक, किसी संस्था के ऋणी हैं? ये सब मिथ्या कथन है. उल्टा ये देश, ये समाज, आपका ऋणी है और सदैव ऋणी रहेगा. आपने कैसे-कैसे कीर्तिमान स्थापित किए हैं. भला आप यदि करोड़ो न खर्च करते, तो क्या राष्ट्र की धरोहर टीपू सुल्तान की तलवार देश में वापस आ सकती थी? कदापि नहीं. आप देश के लिए पैसा बीयर की तरह बहाकर देश का नाम ऊँचा और ऊँचा कर रहे हैं, जबकि कुछ छुद्र मानसिकता के लोग यहाँ हाय तौबा मचाए हैं. हाय भाग गया.. भाग गया.. ये मूर्ख क्या जानें कि ‘वर्ल्ड इज योर ऑयस्टर’ इन्होंने ‘चेतक’ वाली कविता नहीं पढ़ी ‘राणा की पुतली फिरी नहीं, तब तक चेतक मुड़ जाता था... है यहीं रहा, अब यहां नहीं, वह वहीं रहा था अब यहां नहीं. थी जगह न कोई जहाँ नहीं’ अगर कोहिनूर की नीलामी हो, तो हे लक्ष्मीपति ! एक आप ही हैं इतने दैदिप्यमान और विशाल एवं उदार हृदय जो कोहिनूर भी देश में वापस ला सकते हैं. किसी और मैं इतना राष्ट्र प्रेम और जिगरा नहीं. पिछले 200 साल से हाथ पर हाथ रखकर खाली-पीली गाल बजाते रहे हैं.

    हे त्रिकालदर्शी ! अब उन अल्पतम वस्त्र धारिणी सुंदर तरुणियों का क्या होगा? न कलैंडर रहा, न हवाई सुन्दरी ही बनी रह पाईं... अब उन्हें पिक-निक पार्टियों पर कौन ले जाएगा? वे बावली हो क्लब-क्लब, कॉकटेल-कॉकटेल साज श्रंगार-विहीन हो अपनी सुधि-बुधि खो विलाप करती घूम रही हैं.. “वीजू वीजू पुकारूं मैं वन में... मेरा वीजू बसा मेरे मन में...”

    हे नटवर नागर ! तुमने माखन तो खूब ही खा लियो है. ‘ऊपर गगन विशाल नीचे गहरा पाताल, बीच में धरती, वाह मेरे मालिक तू ने किया कमाल’ जब आकाश में आपकी विमानों की श्रंखला अठखेलियां करती थी, तो बरबस यक़ीन ही नहीं होता था कि हवाई सुंदरियों की वजह से विमान हिचकोले खा रहा है या विमान की वजह से हवाई सुंदरियां अठखेलियां खा रही हैं. उसी तरह समुद्र के विशाल सीने को रौंदती आपकी आधुनिकतम श्वेत याट जैसे कि समुद्र में ताजमहल प्रकट हो गया हो.

    हे त्रिपुरारी ! भारतीय सदैव आपके ऋणी रहेंगे, आपने उन्हें एक नयी जीवन शैली से परिचित कराया है. ये ज़ाहिल लोग न तो ज़िंदगी जीना जानते हैं, न ही जीवन की रंगीनियों से वाक़िफ हैं. आपने सहज ही इन्हें शिक्षा दी है कि जीवन का असली ध्येय क्या है. आज को पूरी तरह जी लेना ही जीवन है. कल किसने देखा है. ये एक आधुनिकतम और नवीनतम जीवन दर्शन है.

    हे मधुसूदन ! मेरी राय मानें तो अब वक़्त आ गया है कि आप अपनी एक नयी पार्टी बना लें. क्या रखा है महज़ एमपीगीरी में.. पार्टी का नाम होगा बी.एम.पी. (भारतीय मौज़ा पार्टी) हर राज्य, हर ज़िले में इसके ऑफिस होंगे और आपकी कलैंडर गर्ल्स तथा हवाई सुंदरियां, जो वैसे ही आपके विदेश-गमन से व्याकुल और बेरोज़गार हो गई हैं, को सदस्य बनाने का काम सौंपा जाएगा. देखते-देखते पार्टी की सदस्य संख्या आकाश न छू ले तो कहना. आपने महान कार्यों को सम्पन्न करने को जन्म लिया है.

    हे चतुर्भुज ! अजेंडा में पहला आइटम होगा ये मद्य निषेध, शराब-बंदी जैसे काले कानून का खात्मा. यह बचकाना क़ानून है, मानव प्रकृति के खिलाफ है, और काऊंटर प्रोडक्टिव है. फिर अपने को अगले चुनाव की स्ट्रैटेजी बनानी है. सभी सीटों पर पार्टी अपने कैंडिडेट्स उतारेगी. जहां ये 30 प्रतिशत को रो रहे हैं और आज तक अचीव नहीं कर पाए हैं, वहीं हमारी पार्टी 70 प्रतिशत भद्र महिलाओं को टिकट देगी. मर्दों की एंट्री कम से कम रखें. वैसे ही रौला पाते रहते हैं. इससे आपकी छवि और निखरेगी. अबला, लाचार और ज़रूरतमंद महिलाओं के एक मात्र उद्धारक, एक मात्र मसीहा बन के उभरोगे आप.

    हे देवकी नंदन ! चुनाव 2019 में होना है. बड़ा काम पड़ा है. शाम को वीडियो कॉन्फ्रेसिंग में तफसील से बातें होंगी.

    पी.एस. : हे कंजलोचन ! आप हमें करते हो कि नहीं, ये तो पता नहीं, लेकिन हम आपको और आपके जैसों को ही डिजर्व करने को अभिशप्त हैं, इस बात का हमें पूरा यक़ीन है..!!

सम्पादकीय