आरक्षण की असंवैधानिक व्यवस्था का अंत आखिर कहां होगा?

    गलत नीतियों और असंवैधानिक तौर-तरीकों पर आधारित आरक्षण कब तक चलता रहेगा?

    आरक्षण को जितनी जल्दी आर्थिक आधार दिया जाएगा, समाज में बढ़ रही वैमनस्यता को उतनी ही जल्दी रोका जा सकेगा

    पिछले 70 सालों में आरक्षण पाया एक भी व्यक्ति सामान्य नहीं बन पाया, ऐसे में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का औचित्य क्या है?

    सुरेश त्रिपाठी

    एक तरफ सर्वसामान्य वर्ग का युवा 90 अंक पाकर भी किसी चयन के योग्य नहीं माना जा रहा है और आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है, तो दूसरी तरफ 33-35 अंक पाने वाला कथित दलित वर्ग का युवा आईएएस/आईपीएस और ऐसी ही उच्च वर्गीय नौकरियों के लिए में चयनित हो रहा है. जब सामान्य वर्ग का कोई युवा छात्र आरक्षण को आर्थिक आधार दिए जाने और इस तरह समाज के सबसे निचले और दबे-कुचले आदमी को इसका लाभ पहुंचाने की बात करता है, तो पीढ़ियों से आरक्षण का लाभ ले रहे कुछ तथाकथित दलित, जो लाखों रुपये सालाना कमाकर भी जाति या आरक्षण छोड़ने को तैयार नहीं हैं, पहले जाति को खत्म करने की बात उठाकर बहस के मुद्दे को ही निरर्थक बना देना चाहते हैं.

    जिसको आरक्षण दिया जा रहा है, वह सामान्य आदमी बन ही नहीं पा रहा है. पिछले 70 सालों में तो आरक्षित वर्ग का ऐसा एक भी व्यक्ति सामान्य वर्ग का नहीं बन पाया है, ऐसे में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का क्या औचित्य रह गया है? जब किसी व्यक्ति को एक बार आरक्षण दिया गया और वह किसी सरकारी नौकरी में आ गया, और अब उसका वेतन 5,500 से 50,000 रुपये प्रतिमाह तक हो गया, परंतु जब उसकी संतान हुई, तो फिर वहीं से शुरुआत क्यों?

    क्या फिर से वह उसी गरीब, पिछड़ा और सवर्णों के अत्याचार का मारा पैदा हुआ? उसका पिता लाखों रुपये सालाना कमा रहा है तथा उच्च पद पर आसीन है. सारी सरकारी सुविधाएं ले रहा है. वह खुद जिले के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है, फिर भी सरकार उसे पिछड़ा मान रही है? सरकार उसे भी सदियों से सवर्णों के अत्याचार का शिकार मान रही है, ऐसा क्यों?

    समाज के सबसे पिछड़े, दबे-कुचले, सबसे निचले आदमी को आरक्षण निश्चित रूप से दिया जाना चाहिए. परंतु उसे नौकरी देने के बाद सामान्य भी बनाया जाना चाहिए, यह भी सरकार की ही जिम्मेदारी है. आखिर उसे गलत नीतियों और असंवैधानिक तौर-तरीकों पर आधारित यह आरक्षण कब तक मिलता रहेगा? इसकी भी कोई समय सीमा तो तय की ही जानी चाहिए कि बस जाति विशेष में पैदा हो गया, तो आरक्षण का हकदार हो गया! ऐसा क्यों और आखिर कब तक?

    परदादा सवर्णों के जुल्म का शिकार रहे, दादा जी भी उन्हीं के जुल्म के मारे रहे, बाप भी उनके ही जुल्म का मारा रहा तथा पोता भी जुल्म का मारा! वाह, यह कैसा दुर्भाग्य है इस देश का? जिस आरक्षण से उच्च पदस्थ अधिकारी, आईएएस/आईपीएस, मंत्री, प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर भी पिछड़े ही रह जाएं, ऐसे असफल अभियान को लगातार जारी रखने का क्या औचित्य है? जिस कार्य या अभियान अथवा व्यवस्था से कोई आगे न बढ़ पा रहा हो उसे लगातार 70 सालों तक जारी रखना मूर्खतापूर्ण कार्य ही कहा जा सकता है.

    समाज का कोई भी व्यक्ति आरक्षण के खिलाफ नहीं है, परंतु आरक्षण का आधार जातिगत न होकर आर्थिक आधार पर होने का पक्षधर जरूर है. इसके अलावा पदोन्नति में आरक्षण तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए. नैतिकता का तकाजा भी यही है, क्योंकि यदि आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था असंवैधानिक है, तो पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था निहायत ही असंवैधानिक कही जा सकती है. आरक्षण की दोहरी-तिहरी व्यवस्था राजनीति की सबसे खतरनाक और कुटिल चाल है. यह देश और समाज को कहीं नहीं ले जा पा रही है, बल्कि यह चाल देश और समाज को निरंतर बांट रही है.

    आरक्षण का लाभ एक ही व्यक्ति को बार-बार कैसे दिया जा सकता है? क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी मंदिर में प्रसाद बंट रहा हो, तो एक व्यक्ति को चार बार मिल जाए और एक व्यक्ति लाइन में रहकर भी अपनी बारी का इंतजार ही करता रहे. आरक्षण देना है तो समाज के उन गरीबों, लाचारों को चुन-चुनकर दिया जाना चाहिए, जो दो वक्त की रोटी को भी मोहताज हैं. चाहे वे पढ़े-लिखे हों या अनपढ़ हों, उन्हें चौकीदार, सफाई कर्मचारी, सिक्योरिटी गार्ड या कोई भी उच्च पदस्थ नौकरी दी जाए, किसी को कोई आपत्ति नहीं है. ऐसे लोगों को समाज की मुख्य धारा में लाना भी सरकार का ही सामाजिक उत्तरदायित्व है.

    परंतु गलत आरक्षण व्यवस्था के चलते जिनके पेट भर गए हैं, जो पूरे अघाए हुए हैं, को बार-बार 56 व्यंजन परोसने की यह गलत और असंवैधानिक नीति अब बंद होनी ही चाहिए. जिसे एक बार आरक्षण मिल गया, उसे आगे कोई आरक्षण का लाभ पुनः नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि उसकी अगली पीढ़ियों को ‘सामान्य’ माना जाना चाहिए और आरक्षण का लाभ उसे नहीं मिलना चाहिए. यही उचित होगा तथा आर्थिक आधार पर आरक्षण की नीति पर जितनी जल्दी अमल होगा, समाज में बढ़ रही वैमनस्यता को उतनी ही जल्दी रोका जा सकेगा.

सम्पादकीय